Search

Shop Our products Online @

www.gurutvakaryalay.com

www.gurutvakaryalay.in


मंगलवार, फ़रवरी 09, 2010

महाशिवरात्रि महत्व

MAHA SHIVA RATRI MAHATVA
महाशिवरात्रि महत्व

महाशिवरात्रि को हिंदू धर्म में एक प्रमुख त्योहार के रूप में मनाय जाता हैं। महाशिवरात्रि को कालरात्रि के नाम से भी जान जाता हैं।

महाशिवरात्रि पर्व प्रति वर्ष फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को मनाया जाता हैं। एसी मान्यता हैं कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्य रात्रि भगवान शिवजी का ब्रह्मा रुप से रुद्र रूप में अवतार हुआ था। प्रलय के समय में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए समग्र ब्रह्मांड को अपने तीसरे नेत्र की ज्वाला से समाप्त कर देते हैं। इसीलिए इसे महाशिवरात्रि कहाजाता हैं।

तीनों लोक की सुंदरी तथा शीलवती गौरां को अपनी अर्धांगिनी बनाने वाले शिव सर्वदा प्रेतों व पिशाचों से घिरे रहते हैं। उनका रूप अनोखा हैं। शरीर पर स्मसान की भस्म, और गले में सर्पों की माला, कंठ में विष, जटा में शशी (चंद्र) एवं पतित पावनी गंगा तथा मस्तक पर प्रलय कारी ज्वाला हैं। नंदि (बैल) को वाहन बनाने वाले हैं।

शिव अमंगल रूप होकर भी अपने भक्तों का अमंगल दूर कर मंगल करते हैं और सुख-संपत्ति एवं शांति प्रदान करते हैं।

शिवरात्रि व्रत का लाभ

Shiv Ratri Vrat Ka Labha,
शिवरात्रि व्रत का लाभ

महा शिवरात्रि भगवान शंकर का सबसे पवित्र दिन माना जाता हैं। शिवरात्रि पर अपनी आत्मा को निर्मल करने का महाव्रत माना जाता हैं। महाशिव रात्रि व्रत से मनुष्य के सभी पापों का नाश हो जाता हैं। उस्की हिंसक प्रवृत्ति बदल जाती हैं। समस्त जीवों के प्रति उसके भितर दया, करुणा इत्यादि सद्द भावो का आगमन होता है।
ईशान संहिता में शिवरात्रि के बारे मे उल्लेख इस प्रकार किया गया है-

शिवरात्रि व्रतम् नाम सर्वपाम् प्रणाशनम्।
आचाण्डाल मनुष्याणम् भुक्ति मुक्ति प्रदायकं॥

भावार्थ:- शिव रात्रि नाम वाला व्रत समस्त पापों का शमन करने वाला हैं। इस दिन व्रत कर ने से दुष्ट मनुष्य को भी भक्ति मुक्ति प्राप्त होती हैं।

शुक्रवार, फ़रवरी 05, 2010

भोजन और वास्तु सिद्धांत

bhojan or vastu siddhant, bhojan aur Vastu Siddhanta

भोजन और वास्तु सिद्धांत

भोजन सर्वदा पूर्व अथवा उत्तरकी ओर मुख करके करना चाहिये।

"प्राड्मुखोदड्मुखो वापि"
                                  ( विष्णु पुराण ३।११।७८)

"प्राड्मुखऽन्नानि भुञ्ञी"
                                   ( वसिष्ठ स्मृति १२।१५)


दक्षिण अथवा पश्चिमकी ओर मुख करके भोजन नहीं करना चाहिये।


भुञ्ञीत नैवेह च दक्षिणामुखो न च प्रतीच्यामभिभोजनीयम् ॥
                                                                            ( वामनपुराण १४।५१)

दक्षिणकी ओर मुख करके भोजन करनेसे उस भोजनमें राक्षसी प्रभाव आ जाता हैं।


 ' तद् वै रक्षांसि भुञ्ञते '
                                    ( पाराशरस्मृति १।५९)

अप्रक्षालितपादस्तु यो भुड्न्के दक्षिणामुखः ।
यो वेष्टितशिरा भुड्न्क्ते प्रेता भुञ्ञन्ति नित्यशः ॥
                                               ( स्कन्दपुराण, प्रभास० २१६ । ४१)

जो बिना पैर धोये भोजन करता हैं, जो दक्षिणकी ओर मुँख करके खाता हैं अथवा जो सिरमें वस्त्र लपेट कर (सिर ढककर) खाता हैं, उसके द्वारा ग्रहण किये गये अन्न को सदा प्रेत ही खाते हैं ।

यद् वेष्टितशिरा भुड्न्क्ते यद् भुडन्क्ते दक्षिणामुखः ।
सोपानत्कश्च यद् भुड्न्क्ते सर्वं विद्यात् तदासुरम् ॥
                                                  ( महाभारत, अनु० ९०।१९)

जो सिरमें वस्त्र लपेटकर भोजन करता हैं, जो दक्षिणकी ओर मुख करके भोजन करता है तथा जो चप्पल-जूते पहने भोजन करता हैं, उसके द्वारा ग्रहण किये गये भोजन को आसुर समझना चाहिये।

प्राच्यां नरो लभेदायुर्याम्यां प्रेतत्वमश्रुते ।
वारुणे च भवेद्रोगी आयुर्वित्तं तथोत्तरे ॥
                                           ( पद्मपुराण, सृष्टि० ५१ । १२८)

  • पूर्व की ओर मुख करके भोजन करने से व्यक्ति की आयु बढ़ती हैं।
  • दक्षिण की ओर मुख करके भोजन करने से प्रेत तत्व की प्राप्ति होती हैं।
  • पश्चिम की ओर मुख करके भोजन करने से व्यक्ति रोगी होता हैं।
  • उत्तर की ओर मुख करके भोजन करने से व्यक्ति की आयु तथा धन की प्राप्ति एवं वृद्धि होती हैं ।

बुधवार, फ़रवरी 03, 2010

वास्तु सिद्धांत (भाग: २)

Vastu Siddhant Part: 2, Bhaga: 2

वास्तु सिद्धांत (भाग: २)


जिस भवन में प्रात:काल के अलवा दोपहर को भी सूर्य की किरणे प्रवेश करती हो, उस भवन मे रहने वाले व्यक्तिओ का स्वास्थ्य प्रतिकूल रेहता हैं। क्योकि दोपहर के समय भवन पर पड़ने वाली सूर्य की किरणों नकारात्मक(अल्ट्रा वायलेट) होती हैं, जो स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह होती हैं। इसी वजह से वास्तुशास्त्र में दक्षिण और पश्चिम की दीवारों को ऊंचा रखने का उल्लेख मिलता हैं।

दक्षिण और पश्चिम दिशाओं में उत्तर व पूर्व की तुलना में कम खिड़की-दरवाजे रखे जाते हैं, जिस्से भवन में रहने वाले सदस्य इन नकारात्मक ऊर्जा युक्त सूर्य किरणों के संपर्क में कम से कम रहें। जिस्से उत्तर-पूर्व दिशा में स्थित जल स्रोतों पर सूर्य की किरणों का नकारत्मक प्रभाव पड़ने से बचाव किया जासकें।

जिस भवन का दक्षिण और पश्चिम (नैऋ त्य कोण), किसी भी प्रकार से नीचा हो या वहां किसी भी प्रकार का भूमिगत जल स्त्रोत होए जेसे का पानी की टांकी, कुआं, बोरवेल, सेप्टिक टैंक इत्यादि स्थित हो तो, वहां रहने वाले के असामयिक मृत्यु का शिकार होने की ज्यादा आशंका बनी रहती हैं। ध्यान रहे वास्तुशास्त्र एक सिद्धान्त एक विज्ञान हैं। घर की बनावट में ही वास्तु सिद्धान्त को अपना कर वास्तुदोषों को दूर किया जा सकता है।

क्योकि वास्तुदोष युक्त घरोमें कुछ समय उस भवन मे बिताने के बादमे जब घर में रेहने वाले व्यक्तिओ के भितर बिमारीया प्रवश कर लेती हैं। और डो. की दवाईया भी अपना पूर्ण प्रभाव नहीं दिखा पाती एवं व्यक्ति वहा से भी निराश होजात है, तब व्यक्ति यंत्र, मंत्र, तंत्र, ज्योतिष, वास्तु, आदि के माध्यम से किसी भी प्रकार से चाहे कुछ कर के व्यक्ति रोगों से छुटकारा प्राप्त करना चाहता हैं।

एसे में व्यक्ति की सोच होती हैं, जब इतना कुछ कर लिया हैं कोइ विशेष लाभ प्राप्त नहीं हो रहा तो क्यो ना इन्हे भी आजमा लिया जाये। शायद कुछ लाभ प्राप्त हो जाये?

मंगलवार, फ़रवरी 02, 2010

वास्तु सिद्धांत (भाग: १)

Vastu Siddhant (Part: 1), (Bhaga:1)

वास्तु सिद्धांत (भाग: १)

आज भौतिकता की दौड में भवनों की बनावट को सुंदर व भव्य बनाने की जरूर हो गई है, इस भव्य एवं सुंदर भवनो के निर्माण के चलते व्यक्ति को वास्तु का खयाल नही रहता।

लेकिन कोन्ट्राक्टर या आर्किटेक्ट के बनाये हुवे प्लान पर मकानों को सुंदरता प्रदान करने हेतु भवन को अनियमित आकार को महत्व देने लगे हैं। इन सब कारण मकान बनाते समय जाने-अनजाने वास्तु सिद्धांतों की अवहेलना हो जाती हैं। इस्से वास्तु दोष लगता हैं।

वास्तु दोष के कारण घर के अंदर नकारात्मक ऊर्जा से घर में असंतुलन की स्थिति पैदा होती रेहती है। इस कारण वहां रहने वालों के शारीरिक व मानसिक रोग उत्पन्न होने लगते हैं।

वास्तु सिद्धान्त में सभी दिशा अपना अलग प्रभाव रखती हैं, इस लिये दिशाओ के अनुरुप भवन निर्माण करने से अत्याधिक सुफल प्राप्त होते देखे गये हैं। प्राकृतिक उर्जा का प्रमुख एवं अद्भुत स्तोत्र सूर्य हैं, वास्तु के अनुरुप भवन बनाते समय इस बात का खास ध्यान रखा जात हैं।

सूर्य से प्राप्त सकारात्मक ऊर्जा के स्त्रोत का सर्व श्रेष्ठ उपयोग करने में वास्तुशास्त्र हमारे लिये विशेष मार्गदर्शक हैं।

शयन और वास्तु सिद्धांत

Shayan aur Vastu, Sayan or Vastu

शयन और वास्तु सिद्धांत



सर्वदा पूर्व या दक्षिणकी तरफ सिर करके सोना चाहिये आयु की वृद्धि होती हैं, उत्तर या पश्चिमकी तरफ सिर करके सोने से आयु क्षीण होती हैं तथा शरीर में रोग उत्पन्न होते हैं।

नोत्तराभिमुखः सुप्यात् पश्चिमाभिमुखो न च ॥
                                                                     (लघुव्यास स्मृति २ । ८८)

उत्तरे पश्चिमे चैव न स्वपेद्धि कदाचन् ॥
स्वप्रादायुःक्षयम् याति ब्रह्महा पुरुषो भवेत् ।
न कुर्वीत ततः स्वप्रं शस्तम् च पूर्वदक्षिणम् ॥
                                                                         ( पदम पुरण, सृष्टि ५१। १२५ - १२६ )


पूर्व की तरफ सिर करके सोनेसे व्यक्ति को विद्या प्राप्त होती हैं ।
दक्षिण की तरफ सिर करके सोने से धन तथा आयुकी वृद्धि होती हैं ।
पश्चिम की तरफ सिर करके सोने से प्रबल चिन्ता होती हैं ।
उत्तर की तरफ सिर करके सोनेसे धन, यश, आयु की हानि तथा मृत्यु प्राप्त होती हैं,
अर्थात् आयु क्षीण हो जाती हैं।


प्राकशिरः शयने विद्याद्धनमायुश्च दक्षिणो ।
पश्चिमे प्रबला चिन्ता हानिमृत्युरथोत्तरे ॥
                                                            ( आचारमयूखः विश्वकर्मप्रकाश )

शास्त्रमें उल्लेख हैं कि अपने घरमें पुर्व की तरफ सिर करके, ससुरालमें दक्षिण की तरफ सिर करके और परदेश(विदेश)में पश्चिम की तरफ सिर करके सोये, परंतु उत्तर की तरफ सिर करके कभी न सोये -

स्वगेहे प्राक्छिराः सुप्याच्छ्वशुरे दक्षिणाशिराः ।
प्रत्यक्छिराः प्रवासे तु नोदक्सुप्यात्कदाचन ॥
                                                   ( आचारमयूख; विश्वकर्मप्रकाश १० । ४५ )


भारतीय संस्कृति में एसी मान्य ता हैं, की जिस घर मे निवास करते हो उस घर के मुख्य द्वार की और सिर या पैर कर के शयन करने से अशुभ प्रभाव प्राप्त होता हैं। क्योकि मरणासत्र व्यक्तिका सिर मुख्य द्वार की तरफ रखा जात हैं।

धन - सम्पत्ति इच्छा रखने वाले वाले व्यक्ति को अन्न, गौ, गुरु, अग्नि और देवता के शयन स्थान के ऊपर नहीं सोना चाहिये ।

अर्थांत: अन्न रखने वाले भण्डार गृह, गौ-शाला, गुरु के शयन स्थान, पाकशाला(रसोई गृह) और मंदिर के ऊपर शयन या शयन कक्ष नहीं बनाना चाहिये ।

सोमवार, फ़रवरी 01, 2010

संकष्टी चतुर्थी व्रत

Sankashti Chaturthi Vrat, Vinayak Chaturthi
संकष्टी चतुर्थी व्रत

इस दिन श्री विघ्नेश्वर गणेश जी की पूजा-अर्चना और व्रत करने से व्यक्ति के समस्त संकट दूर होते हैं, इस लिये इसे संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। इस बार मंगलवार के दिन चतुर्थी होने से उसे अंगारकी चतुर्थी के नाम से जाना जाता हैं। गणेश पुराणमें उल्लेख हैं की भूमिपुत्र मंगल के कठोर तप से प्रसन्न होकर गणेश जी ने उन्हें इच्छित वरदान देकर मंगलवार की चतुर्थी को सर्व संकट नाशक होने की शक्ति प्रदान की।
अंगारकी संकष्टी चतुर्थी के दिन व्रत एवं उपवास रखकर गणेश जी की विधि-विधान से विशेष पूजा करने से अधिक लाभ प्राप्त होता हैं।
चतुर्थी के दिन एक समय रात्री को चंद्र उदय होने के पश्च्यात चंद्र दर्शन करके भोजन करे तो अति उत्तम रेहता हैं।
रात में चंद्रमा के उदय हो जाने पर चंद्र देख कर गणपति जी का ध्यान करते हुए निम्न श्लोक पढकर अ‌र्घ्यदें-
गणेशाय नमस्तुभ्यं सर्वसिद्धिप्रदायक।
संकष्ट हरमेदेव गृहाणाघ्र्यनमोऽस्तुते॥१॥
कृष्णपक्षेचतुथ्र्यातुसम्पूजितविधूदये।
क्षिप्रंप्रसीददेवेश गृहाणाघ्र्यनमोऽस्तुते॥२॥
भावार्थ: सब सिद्धियों के प्रदाता श्रीगणेश जी ! आपको मेरा नमस्कार है। संकटों का हरण करने वाले देव! आप मेरे द्वारा अ‌र्घ्यग्रहण कीजिए, आपको मेरा नमस्कार है। कृष्णपक्ष की चतुर्थी को चन्द्रोदय होने पर पूजित देवेश! आप मेरे द्वारा अ‌र्घ्यग्रहण कीजिए, आपको मेरे नमस्कार है।

पश्च्यात इस श्लोक से चतुर्थी तिथि की अधिष्ठात्री देवी को अ‌र्घ्य प्रदान करें-

तिथीनामुत्तमेदेवि गणेशप्रियवल्लभे।
सर्वसंकटनाशायगृहाणाघ्र्यनमोऽस्तुते॥

तिथियों में गणेश जी को सर्वाधिक प्रिय देवि! आपको मेरा नमस्कार है। आप मेरे समस्त संकटों को नष्ट करने के लिए अ‌र्घ्यस्विकार करें।

शास्तोक्त वचन हैं जो व्यक्ति अंगारकीचतुर्थी के व्रत को विधिवत करता हैं। उसे साल भर की चतुर्थीयोंका फल प्राप्त हो जाता है। व्यक्ति को अपने कार्य मे किसी प्रकार के बाधा-विघ्न नहीं आते। एवं उसके घरे में गणेश जी के साथ मे रिद्धि-सिद्धि का वास होता हैं।

यदि आप समर्थ हैं तो प्राण प्रतिष्ठित गणेश जी की प्रतिमा(मूर्ति) स्थापित कर के विधि-विधान से पूजा करने से विशेष लाभ प्राप्त होता हैं।

मंत्र सिद्ध गणेश प्रतिमा या चतुर्थी व्रत  के संबंध मे अधिक जानकारी हेतु गुरुत्व कार्यालय में संपर्क करें।