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गुरुवार, अगस्त 07, 2014

पुत्रदा (पवित्रा) एकादशी व्रत की पौराणिक कथा Pausha Putrada Ekadashi

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पुत्रदा (पवित्रा) एकादशी व्रत की पौराणिक कथा
लेख साभार: गुरुत्व ज्योतिष मासिक ई-पत्रिका (अगस्त-2014)
श्रावण : शुक्ल पक्ष
एक बार युधिष्ठिर भगवान श्रीकृष्ण से पूछते हैं, हे भगवान! श्रावण शुक्ल एकादशी का क्या नाम है? इसमें किस देवता की पूजा की जाती है और इसका व्रत करने से क्या फल मिलता है ?" व्रत करने की विधि तथा इसका माहात्म्य कृपा करके कहिए। भगवान श्रीकृष्ण कहने लगे कि इस एकादशी का नाम पुत्रदा एकादशी है। अब आप शांतिपूर्वक इस व्रतकी कथा सुनिए। इसके सुनने मात्र से ही वाजपेयी यज्ञ / अनन्त यज्ञ का फल मिलता है।
द्वापर युग के आरंभ में महिष्मति नाम की एक नगरी थी, जिसमें महिष्मती नाम का राजा राज्य करता था, लेकिन पुत्रहीन होने के कारण राजा को राज्य सुखदायक नहीं लगता था। उसका मानना था कि जिसके संतान न हो, उसके लिए यह लोक और परलोक दोनों ही दु:खदायक होते हैं। पुत्र सुख की प्राप्ति के लिए राजा ने अनेक उपाय किए परंतु राजा को पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई।
वृद्धावस्था आती देखकर राजा ने प्रजा के प्रतिनिधियों को बुलाया और कहा- हे प्रजाजनों! मेरे खजाने में अन्याय से उपार्जन किया हुआ धन नहीं है। न मैंने कभी देवताओं तथा ब्राह्मणों का धन छीना है। किसी दूसरे की धरोहर भी मैंने नहीं ‍ली, प्रजा को पुत्र के समान पालता रहा। मैं अपराधियों को पुत्र तथा बाँधवों की तरह दंड देता रहा। कभी किसी से घृणा नहीं की। सबको समान माना है। सज्जनों की सदा पूजा करता हूँ। इस प्रकार धर्मयुक्त राज्य करते हुए भी मेरे पु‍त्र नहीं है। सो मैं अत्यंत दु:ख पा रहा हूँ, इसका क्या कारण है?
राजा महिष्मती की इस बात को विचारने के लिए मं‍त्री तथा प्रजा के प्रतिनिधि वन को गए। वहाँ बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों के दर्शन किए। राजा की उत्तम कामना की पूर्ति के लिए किसी श्रेष्ठ तपस्वी मुनि को खोजते-फिरते रहे। एक आश्रम में उन्होंने एक अत्यंत वयोवृद्ध धर्म के ज्ञाता, बड़े तपस्वी, परमात्मा में मन लगाए हुए निराहार, जितेंद्रीय, जितात्मा, जितक्रोध, सनातन धर्म के गूढ़ तत्वों को जानने वाले, समस्त शास्त्रों के ज्ञाता महात्मा लोमश मुनि को देखा, जिनका कल्प के व्यतीत होने पर एक रोम गिरता था।
सबने जाकर ऋषि को प्रणाम किया। उन लोगों को देखकर मुनि ने पूछा कि आप लोग किस कारण से आए हैं? नि:संदेह मैं आप लोगों का हित करूँगा। मेरा जन्म केवल दूसरों के उपकार के लिए हुआ है, इसमें संदेह मत करो।
लोमश ऋषि के ऐसे वचन सुनकर सब लोग बोले- हे महर्षे! आप हमारी बात जानने में ब्रह्मा से भी अधिक समर्थ हैं। अत: आप हमारे इस संदेह को दूर कीजिए। महिष्मति पुरी का धर्मात्मा राजा महिष्मती प्रजा का पुत्र के समान पालन करता है। फिर भी वह पुत्रहीन होने के कारण दु:खी है।
उन लोगों ने आगे कहा कि हम लोग उसकी प्रजा हैं। अत: उसके दु:ख से हम भी दु:खी हैं। आपके दर्शन से हमें पूर्ण विश्वास है कि हमारा यह संकट अवश्य दूर हो जाएगा क्योंकि महान पुरुषों के दर्शन मात्र से अनेक कष्ट दूर हो जाते हैं। अब आप कृपा करके राजा के पुत्र होने का उपाय बतलाएँ।
यह वार्ता सुनकर ऐसी करुण प्रार्थना सुनकर लोमश ऋषि नेत्र बन्द करके राजा के पूर्व जन्मों पर विचार करने लगे और राजा के पूर्व जन्म का वृत्तांत जानकर कहने लगे कि यह राजा पूर्व जन्म में एक निर्धन वैश्य था। निर्धन होने के कारण इसने कई बुरे कर्म किए। यह एक गाँव से दूसरे गाँव व्यापार करने जाया करता था। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन वह दो दिन से भूखा-प्यासा था मध्याह्न के समय, एक जलाशय पर जल पीने गया। उसी स्थान पर एक तत्काल की प्रसूता हुई प्यासी गौ जल पी रही थी।
राजा ने उस प्यासी गाय को जलाशय से जल पीते हुए हटा दिया और स्वयं जल पीने लगा, इसीलिए राजा को यह दु:ख सहना पड़ा। एकादशी के दिन भूखा रहने से वह राजा हुआ और प्यासी गौ को जल पीते हुए हटाने के कारण पुत्र वियोग का दु:ख सहना पड़ रहा है। ऐसा सुनकर सब लोग कहने लगे कि हे ऋषि! शास्त्रों में पापों का प्रायश्चित भी लिखा है। अत: जिस प्रकार राजा का यह पाप नष्ट हो जाए, आप ऐसा उपाय बताइए।
लोमश मुनि कहने लगे कि श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी को जिसे पुत्रदा एकादशी भी कहते हैं, तुम सब लोग व्रत करो और रात्रि को जागरण करो तो इससे राजा का यह पूर्व जन्म का पाप नष्ट हो जाएगा, साथ ही राजा को पुत्र की अवश्य प्राप्ति होगी। राजा के समस्त दुःख नष्‍ट हो जायेंगे। "लोमश ऋषि के ऐसे वचन सुनकर मंत्रियों सहित सारी प्रजा नगर को वापस लौट आई और जब श्रावण शुक्ल एकादशी आई तो ऋषि की आज्ञानुसार सबने पुत्रदा एकादशी का व्रत और जागरण किया।

इसके पश्चात द्वादशी के दिन इसके पुण्य का फल राजा को मिल गया। उस पुण्य के प्रभाव से रानी ने गर्भ धारण किया और नौ महीने के पश्‍चात् ही उसके एक अत्यन्त तेजस्वी पुत्ररत्‍न पैदा हुआ ।
इसलिए हे राजन! इस श्रावण शुक्ल एकादशी का नाम पुत्रदा पड़ा। अत: संतान सुख की इच्छा रखने वाले मनुष्य को चाहिए के वे विधिपूर्वक श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करें। इसके माहात्म्य को सुनने से मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है और इस लोक में संतान सुख भोगकर परलोक में स्वर्ग को प्राप्त होता है।
कथा का उद्देश्य : पाप करते समय हम यह नहीं सोचते कि हम क्या कर रहे है, लेकिन शास्‍त्रों से विदित होता है कि हमारे द्वारा किया गये गये छोटे या बडे पाप से हमें कष्‍ट भोगना पड़ता है, अतः हमें पाप से बचना चाहिए। क्योंकि पाप के कारण पीछले जन्म में किया गया कर्म का फल दूसरे जन्म में भी भोगना पड़ सकता हैं। इस लिए हमें चाहिए कि सत्यव्रत का पालन कर ईश्‍वरमें पूर्ण आस्था एवं निष्‍ठा रखे और यह बात सदैव ध्यान रखे कि किसी की भी आत्मा को गल्ती से भी कष्ट ना हो।
  लेख साभार: गुरुत्व ज्योतिष मासिक ई-पत्रिका (अगस्त-2014)



पुत्रदा एकादशी व्रत 07-अगस्त-2014 (गुरुवार) Pausha Putrada Ekadashi

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पुत्रदा एकादशी व्रत 07-अगस्त-2014 (गुरुवार)
लेख साभार: गुरुत्व ज्योतिष मासिक ई-पत्रिका (अगस्त-2014)
पौराणिक कालसे ही हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का विशेष धार्मिक महत्व रहा है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुत्रदा एकादशी अथवा पवित्रा एकादशी भी कहते हैं। एकादशी के दिन भगवान विष्णु के दिन कामना पूर्ति के लिए व्रत-पूजन किया जाता है।
इस वर्ष पुत्रदा एकादशी 07-अगस्त-2014 गुरुवार के दिन है, गुरुवार को भगवान विष्णु के पूजन हेतु श्रेष्ठ माना जाता हैं और इस वर्ष पुत्रदा एकादशी और गुरुवार का संयोग एक साथ हो रहा हैं, जो विद्वानों के मतानुशार अति उत्तम हैं। ज्योतिष गणना के अनुशार इस वर्ष 07-अगस्त-2014 सूर्योदय के समय कर्क लग्न होगा, लग्नेश नीच चंद्रमा की पंचम भाव में मंगल के घर में स्थिती भी संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वालो के लिए उत्तम मानी गई हैं। उसी के साथ ही इस दिन किया गया धार्मिक पूजन-व्रत इत्यादि आध्यात्मिक कार्य शुभ ग्रहों के प्रभाव से शीघ्र एवं विशेष फल प्रदान करने वाला सिद्ध होगा क्योकि उच्च का गुरु षष्ठेश एवं भाग्येश हो कर लग्न गृह में स्थित होकर पंचम भाव (संतान गृह), सप्तम भाव (जीवन साथी) एवं नवम भाव(भाग्य भाग) को देख रहा हैं। गुरु के साथ सूर्य स्थित हैं जो आध्यात्मिक कार्यों में वृद्धि का संकेत देता हैं। सूर्य के साथ बुध का बुधादित्य योग भी विशेष शुभदाय माना गया हैं। पुत्र कारक ग्रह वक्री केतु के पंचम भाव पर शुभ दृष्टी संतान प्राप्ति हेतु सहायक रहेगी। किन्तु मंगल+शनि की युति संकेत दे रही हैं की संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपत्तियों को विशेष सावधानी अवश्य रखनी, किसी भी तरह की लापरवाही, मनमुटाव इत्यादि से विपरित परिणाम संभव हैं।
संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपत्तियों को पुत्रदा एकादशी व्रत का नियम पालन दशमी तिथि (6 अगस्त 2014, बुधवार) की रात्रि से ही शुरु करें शुद्ध चित्त से ब्रह्मचर्य का पालन करें। गुरुवार के दिन सुबह जल्दी उठकर नित्यकर्म से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण कर भगवान विष्णु की प्रतिमा के सामने बैठकर व्रत का संकल्प करें। व्रत हेतु उपवास रखें अन्न ग्रहण नहीं करें, एक या दो समय फलाहार कर सकते हैं।
तत्पश्चयात भगवान विष्णु का पूजन पूर्ण विधि-विधान से करें। (यदि स्वयं पूजन करने में असमर्थ हों तो किसी योग्य विद्वान ब्राह्मण से भी पूजन करवा सकते हैं।) भगवान विष्णु को शुद्ध जल से स्नान कराए। फिर पंचामृत से स्नान कराएं स्नान के बाद केवल पंचामृत के चरणामृत को व्रती (व्रत करने वाला) अपने और परिवार के सभी सदस्यों के अंगों पर छिड़के और उस चरणामृत को पीए। तत पश्चयात पुनः शुद्ध जल से स्नान कराकर प्रतिमाक स्वच्छ कपड़े से पोछलें। इसके बाद भगवान को गंध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि पूजन सामग्री अर्पित करें।
विष्णु सहस्त्रनाम का जप करें एवं पुत्रदा एकादशी व्रत की कथा सुनें। रात को भगवान विष्णु की मूर्ति के समीप शयन करें और दूसरे दिन अर्थात द्वादशी 8- अगस्त-2014 जुलाई, शुक्रवार के दिन विद्वान ब्राह्मणों को भोजन कराकर व सप्रेम दान-दक्षिणा इत्यादि देकर उनका आशीर्वाद प्राप्त करें। इस प्रकार पवित्रा एकादशी व्रत करने से योग्य संतान की प्राप्ति होती है।
विशेष सूचना: पुत्र प्राप्ति का तात्पर्य केवल उत्तम संतान की प्राप्ति समझे। क्योकि, उपरोक्त वर्णित पुत्र प्राप्ति एकादशी से संबंधित सभी जानकारी शास्त्रोक्त वर्णित हैं, अतः व्रत से केवल पुत्र संतान की प्राप्ति हो ऐसा नहीं हैं इस व्रत से उत्तम संतान की प्राप्ति होती हैं, चाहे वह संतान पुत्र हो या कन्या। आज के आधुनिक युग में पुत्र संतान व कन्या संतान में कोई विशेष फर्क नहीं रहा हैं। कन्या या महिलाएं भी पुत्र या पुरुष के समान ही सबल एवं शक्तिशाली हैं। अतः केवल पुत्र संतान की कामना करना व्यर्थ हैं। अतः केवल उत्तम संतान की कामना से व्रत करे। जानकार एवं विद्वानों के अनुभव के अनुशार पीछले कुछ वर्षो में उन्हें अपने अनुशंधान से यह तथ्य मिले हैं की केवल पुत्र कामना से की गई अधिकतर साधानाएं, व्रत-उपवास इत्यादि उपायों से दंपत्ति को पुत्र की जगह उत्तम कन्य संतान की प्राप्ति हुवी हैं, और वह कन्या संतान पुत्र संतान से कई अधिक बुद्धिमान एवं माता-पिता का नाम समाज में रोशन करने वाली रही हैं। संभवत इस युग में नारीयों की कम होती जनसंख्या के कारण इश्वरने भी अपने नियम बदल लिये होंगे इस लिए पुत्र कामना के फलस्वरुप उत्तम कन्या संतान की प्राप्ति हो रही होगी।
लेख साभार: गुरुत्व ज्योतिष मासिक ई-पत्रिका (अगस्त-2014)


गुरुवार, जुलाई 31, 2014

नाग पंचमी का धार्मिक महत्व (नाग पंचमी 1 अगस्त 2014) Nag Panchami Ka Dharmik Mahatva

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नाग पंचमी का धार्मिक महत्व

लेख साभार: गुरुत्व ज्योतिष मासिक ई-पत्रिका (अगस्त-2014)

नाग पंचमी व्रत श्रावण शुक्ल पंचमीको किया जाता है । लेकिन लोकाचार व संस्कृति- भेद के कारण नाग पंचमी व्रत को किसी जगह कृष्णपक्षमें भी किया जाता है । इसमे परविद्धा युक्त पंचमी ली जाती है । पौराणिक मान्यता के अनुशार इस दिन नाग-सर्प को दूधसे स्त्रान और पूजन कर दूध पिलाने से व्रती को पुण्य फल की प्राप्ति होती हैं। अपने घर के मुख्य द्वार के दोनों ओर गोबरके सर्प बनाकर उनका दही, दूर्वा, कुशा, गन्ध, अक्षत, पुष्प, मोदक और मालपुआ इत्यादिसे पूजन कर ब्राह्मणोंको भोजन कराकर एकभुक्त व्रत करनेसे घरमें सर्पोंका भय नहीं होता है । 
सर्पविष दूर करने हेतु निम्न निम्नलिखित मंत्र का जप करने का विधान हैं। 
"ॐ कुरुकुल्ये हुं फद स्वाहा।"

नाग पंचमी की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुशार प्राचीन काल में किसी नगर के एक सेठजी के सात पुत्र थे। सातों पुत्रों के विवाह हो चुके थे। सबसे छोटे पुत्र की पत्नी श्रेष्ठ चरित्र की विदुषी और सुशील थी, लेकिन उसका कोई भाई नहीं था।

एक दिन बड़ी बहू ने घर लीपने के लिए पीली मिट्टी लाने हेतु सभी बहुओं को साथ चलने को कहा तो सभी बहू उस के साथ मिट्टी खोदने के औजार लेकर चली गई और किसी स्थान पर मिट्टी खोदने लगी, तभी वहां एक सर्प निकला, जिसे बड़ी बहू खुरपी से मारने लगी। यह देखकर छोटी बहू ने बड़ी बहू को रोकते हुए कहा  "मत मारो इस सर्प को? यह बेचारा निरपराध है।"

छोटी बहू के कहने पर बड़ी बहू ने सर्प को नहीं मारा और सर्प एक ओर जाकर बैठ गया। तब छोटी बहू ने सर्प से कहा "हम अभी लौट कर आती हैं तुम यहां से कहीं जाना मत" इतना कहकर वह सबके साथ मिट्टी लेकर घर चली गई और घर के कामकाज में फँसकर सर्प से जो वादा किया था उसे भूल गई।

उसे दूसरे दिन वह बात याद आई तो सब बहूओं को साथ लेकर वहाँ पहुँची और सर्प को उस स्थान पर बैठा देखकर बोली "सर्प भैया नमस्कार!" सर्प ने कहा तू भैया कह चुकी है, इसलिए तुझे छोड़ देता हूं, नहीं तो झूठे वादे करने के कारण तुझे अभी डस लेता। छोटी बहू बोली भैया मुझसे भूल हो गई, उसकी क्षमा माँगती हूं, तब सर्प बोला- अच्छा, तू आज से मेरी बहिन हुई और मैं तेरा भाई हुआ। तुझे जो मांगना हो, माँग ले। वह बोली- भैया! मेरा कोई नहीं है, अच्छा हुआ जो तू मेरा भाई बन गया।

कुछ दिन व्यतीत होने पर वह सर्प मनुष्य का रूप धरकर उसके घर आया और बोला कि "मेरी बहिन को बुला दो, मैं उसे लेने आया हूँ" सबने कहा कि इसके तो कोई भाई नहीं था! तो वह बोला- मैं दूर के रिश्ते में इसका भाई हूँ, बचपन में ही बाहर चला गया था। उसके विश्वास दिलाने पर घर के लोगों ने छोटी को उसके साथ भेज दिया। उसने मार्ग में बताया कि "मैं वहीं सर्प हूँ, इसलिए तू डरना नहीं और जहां चलने में कठिनाई हो वहां मेरा हाथ पकड़ लेना। उसने कहे अनुसार ही किया और इस प्रकार वह उसके घर पहुंच गई। वहाँ के धन-ऐश्वर्य को देखकर वह चकित हो गई।

वह सर्प परिवार अके साथ आनंद से रहने लगी। एक दिन सर्प की माता ने उससे कहा "मैं एक काम से बाहर जा रही हूँ, तू अपने भाई को ठंडा दूध पिला देना। उसे यह बात ध्यान न रही और उससे गलति से गर्म दूध पिला दिया, जिसमें उसका मुहँ बुरी तरह जल गया। यह देखकर सर्प की माता बहुत क्रोधित हुई। परंतु सर्प के समझाने पर माँ चुप हो गई। तब सर्प ने कहा कि बहिन को अब उसके घर भेज देना चाहिए। तब सर्प और उसके पिता ने उसे भेट स्वरुप बहुत सा सोना, चाँदी, जवाहरात, वस्त्र-भूषण आदि देकर उसके घर पहुँचा दिया।

साथ लाया ढेर सारा धन देखकर बड़ी बहू ने ईर्षा से कहा तुम्हारां भाई तो बड़ा धनवान है, तुझे तो उससे और भी धन लाना चाहिए। सर्प ने यह वचन सुना तो सब वस्तुएँ सोने की लाकर दे दीं। यह देखकर बड़ी बहू की लालच बढ़ गई उसने फिर कहा "इन्हें झाड़ने की झाड़ू भी सोने की होनी चाहिए" तब सर्प ने झाडू भी सोने की लाकर रख दी।

सर्प ने अपने बहिन को हीरा-मणियों का एक अद्भुत हार दिया था। उसकी प्रशंसा उस देश की रानी ने भी सुनी और वह राजा से बोली कि "सेठ की छोटी बहू का हार यहाँ आना चाहिए।" राजा ने मंत्री को हुक्म दिया कि उससे वह हार लेकर शीघ्र उपस्थित हो मंत्री ने सेठजी से जाकर कहा कि "महारानीजी ने छोटी बहू का हार मंगवाया हैं, तो वह हार अपनी बहू से लेकर मुझे दे दो"। सेठजी ने डर के कारण छोटी बहू से हार मंगाकर दे दिया।

छोटी बहू को यह बात बहुत बुरी लगी, उसने अपने सर्प भाई को याद किया और आने पर प्रार्थना की- भैया ! रानी ने मेरा हार छीन लिया है, तुम कुछ ऐसा करो कि जब वह हार उसके गले में रहे, तब तक के लिए सर्प बन जाए और जब वह मुझे लौटा दे तब वह पुनः हीरों और मणियों का हो जाए। सर्प ने ठीक वैसा ही किया। जैसे ही रानी ने हार पहना, वैसे ही वह सर्प बन गया। यह देखकर रानी चीख पड़ी और रोने लगी।

यह देख कर राजा ने सेठ के पास खबर भेजी कि छोटी बहू को तुरंत भेजो। सेठजी डर गए कि राजा न जाने क्या करेगा? वे स्वयं छोटी बहू को साथ लेकर उपस्थित हुए। राजा ने छोटी बहू से पूछा "तुने क्या जादू किया है, मैं तुझे दण्ड दूंगा।" छोटी बहू बोली "राजन ! धृष्टता क्षमा कीजिए" यह हार ही ऐसा है कि मेरे गले में हीरों और मणियों का रहता है और दूसरे के गले में सर्प बन जाता है। यह सुनकर राजा ने वह सर्प बना हार उसे देकर कहा- अभी पहनकर दिखाओ। छोटी बहू ने जैसे ही उसे पहना वैसे ही हीरों-मणियों का हो गया।

यह देखकर राजा को उसकी बात का विश्वास हो गया और उसने प्रसन्न होकर उसे भेट में बहुत सी मुद्राएं भी पुरस्कार में दीं। छोटी वह अपने हार और भेट सहित घर लौट आई। उसके धन को देखकर बड़ी बहू ने ईर्षा के कारण उसके पति को सिखाया कि छोटी बहू के पास कहीं से धन आया है। यह सुनकर उसके पति ने अपनी पत्नी को बुलाकर कहा सच-सच बताना कि यह "धन तुझे कौन देता है?" तब वह सर्प को याद करने लगी।

तब उसी समय सर्प ने प्रकट होकर कहा यदि मेरी धर्म बहिन के आचरण पर संदेह प्रकट करेगा तो मैं उसे डंस लूँगा। यह सुनकर छोटी बहू का पति बहुत प्रसन्न हुआ और उसने सर्प देवता का बड़ा सत्कार किया। मान्यता हैं की उसी दिन से नागपंचमी का त्योहार मनाया जाता है और स्त्रियाँ सर्प को भाई मानकर उसकी पूजा करती हैं।

गुरुत्व ज्योतिष ई पत्रीका अगस्त 2014 में प्रकशित लेख GURUTVA JYOTISH AUGUST-2014

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गुरुत्व ज्योतिष ई पत्रीका अगस्त -2014 में प्रकशित लेख
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी विशेष
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अनुक्रम
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी विशेषांक में पढे़
नाग पंचमी का धार्मिक महत्व
7
पुत्रदा एकादशी व्रत 07-अगस्त-2014 (गुरुवार
9
पुत्रदा (पवित्रा) एकादशी व्रत की पौराणिक कथा
12
अजा (जया) एकादशी व्रत की पौराणिक कथा
14
हिन्दू संस्कृति में कृष्ण जन्माष्टमी व्रत का महत्व
15
कृष्ण जन्माष्टमी व्रत की पौराणिक कथा
17
भारतीय संस्कृति में राखी पूर्णिमा का महत्व
21
राखी पूर्णिमा से जुडि पौराणिक कथाएं
23
कृष्ण के मुख में ब्रह्मांड दर्शन
25
शंख ध्वनि से रोग भगाएं !
26
कृष्ण स्मरण का आध्यात्मिक महत्व
29
श्री कृष्ण का नामकरण संस्कार
30
श्रीकृष्ण चालीसा
31
विप्रपत्नीकृत श्रीकृष्णस्तोत्र
32
प्राणेश्वर श्रीकृष्ण मंत्र
33
ब्रह्मा रचित कृष्णस्तोत्र
34
श्रीकृष्णाष्टकम्
35
मनोकामना पूर्ति हेतु विभिन्न कृष्ण मंत्र
36
कृष्ण मंत्र
37
पर्यूषण महापर्व का महत्व
38
श्री नवकार मंत्र (नमस्कार महामंत्र)
39
देवदर्शन स्तोत्रम्
40
भगवान महावीर की माता त्रिशला के अद्भुत स्वप्न
41
विभिन्न चमत्कारी जैन मंत्र
43
जैन धर्म के चौबीस तीर्थंकारों के जीवन का
47
श्री मंगलाष्टक स्तोत्र (जैन)
48
अथ नवग्रह शांति स्तोत्र (जैन)
48
महावीराष्टक-स्तोत्रम्
49
महावीर चालीसा
50
जब महावीर ने एक ज्योतिषी को कहां तुम्हारी
51
गौतम केवली महाविद्या (प्रश्नावली)
52
शीघ्र कामना पूर्ति हेतु इष्ट पूजन में करे सही
56
कहीं आपकी कुंडली में ऋणग्रस्त होने के योग
58
हमारे उत्पाद
सर्व कार्य सिद्धि कवच
11
मंत्र सिद्ध स्फटिक श्री यंत्र
16
श्रीकृष्ण बीसा यंत्र / कवच
28
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34
मंत्र सिद्ध दुर्लभ सामग्री/मंत्र सिद्ध माला
37
विद्या प्राप्ति हेतु सरस्वती कवच और यंत्र
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60
मंत्र सिद्ध पारद प्रतिमा
62
मंत्र सिद्ध गोमति चक्र
63
हमारे विशेष यंत्र/ विभिन्न लक्ष्मी यंत्र
64
सर्वसिद्धिदायक मुद्रिका
65
द्वादश महा यंत्र
66
पुरुषाकार शनि यंत्र /शनि तैतिसा यंत्र
73
नवरत्न जड़ित श्री यंत्र
74
वाहन दुर्घटना नाशक मारुति यंत्र/ श्री हनुमान यंत्र 
75
विभिन्न देवताओं के यंत्र
76
राशि रत्न
78
मंत्र सिद्ध रूद्राक्ष
79
जैन धर्मके विशिष्ट यंत्रो की सूची81
81
घंटाकर्ण महावीर सर्व सिद्धि महायंत्र
82
अमोघ महामृत्युंजय कवच
83
सर्व रोगनाशक यंत्र/कवच
91
मंत्र सिद्ध कवच सूचि
93
YANTRA LIST
94
Gemstone Price List
96
सूचना
97
स्थायी लेख
संपादकीय
4
अगस्त 2014 मासिक पंचांग
69
अगस्त 2014  मासिक व्रत-पर्व-त्यौहार
74
अगस्त 2014 -विशेष योग
87
दैनिक शुभ एवं अशुभ समय ज्ञान तालिका
87
दिन-रात के चौघडिये
88
दिन-रात  कि होरा
89
ग्रह चलन अगस्त -2014
90

 GURUTVAJYOTISH E-MAGAZINE AUGUST-2014


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