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शनिवार, अप्रैल 09, 2011

मानसिक तनाव दूर करने हेतु वास्तु उपाय भाग:1

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वास्तु: मानसिक अशांति निवारण उपाय भाग:1
आज की भागदौड़ से भरी जिंदगी मैं हर व्यक्ति अपने काम में व्यस्त हैं।
जिस कारण से अधिकतर लोग मानसिक शांति से ग्रस्त होते है। व्यस्ता एवं भौतिकता से भरी दिनचार्या में व्यक्ति के पास अपने स्वयं के लिए भी वक्त ही नहीं होता है। यदि आप इस तरह की परेशानी से ग्रस्त हैं और आप मानसिक कष्ट तनाव इत्यादी से मुक्ति चाहते हैं, तो इस वास्तु सुझावो को जीवन में अवश्य आजमाकर देख ले आपको निश्चित लाभ प्राप्त होगा।
* अपने शयन कक्ष में रात में झूठे बर्तन न रखें। सोने से पूर्व बर्तनो को साफ करले। इससे स्त्री वर्ग का स्वास्थ्य प्रभावित होता हैं व धन का अभाव बना रहता हैं।
* मानसिक तनाव हो, जाए तो कमरे में शुद्ध घी का दीपक जला  कर रखें।
* शयन कक्ष में झाड़ू इत्यादि सफाई की सामग्री न रखें। इससे व्यर्थ की चिंता रहेगी।
* यदि मानसिक तनाव अधिक हो जाएं तो, तकिए के नीचे लाल चंदन रखकर सोएं लाभ प्राप्त होगा।
* सुबह-संध्या पूजन में घी और कपूरका दिप अवश्य जलाये। जिससे निवास स्थान या व्यवसायिक स्थानो से नकारात्मक उर्जा दूर होती हैं।
* शास्त्रोक्त नियमो के अनुशार संध्या समय अर्थात धूप-दिप के समय सोना, खाना, स्नान करना वर्जित माना गया हैं। अतः इन कार्यो को करने से त्यागदे।
*  संध्या समय अर्थात धूप-दिप के समय हाथ-पैर धो सकते हैं।
* धूप-दिप के समय अपने निवास स्थान या व्यवसायिक स्थानो पर सुगंधित व पवित्र अगरबत्ति, धुप इत्यादि अवश्य करें।
क्रमशः........

रविवार, अप्रैल 03, 2011

चैत्र नवरात्रि घट स्थापना मुहूर्त, विधि-विधान (4 अप्रैल 2011)

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चैत्र नवरात्रि घट स्थापना मुहूर्त, विधि-विधान (4 अप्रैल 2011)

चैत्र शुक्ल प्रतिपदा अर्थात हिंदू नव वर्ष का पहला दिन। इसी दिन से ही वासंतिक नवरात्र का प्रारंभ हो जाता हैं जो चैत्र शुक्ल नवमी को समाप्त होते हैं, इन नौ दिनों देवि दुर्गा की विशेष आराधना करने का विधान हमारे शास्त्रो में बताया गया हैं। पारंपरिक पद्धति के अनुशास नवरात्रि के पहले दिन घट अर्थात कलश की स्थापना करने का विधान हैं। इस कलश में ज्वारे(अर्थात जौ और गेहूं ) बोया जाता है।

घट स्थापनकी शास्त्रोक्त विधि इस प्रकार हैं।
घट स्थापना चैत्र प्रतिपदा के दिन कि जाती हैं। विद्वानो के मत से अमावस्यायुक्त प्रतिपदा में घट स्थापन, पूजन इत्यादि नहीं करना चाहिए। अतः घट स्थापना अगले दिन सुबह ही करना श्रेष्ठ होता हैं।
घट स्थापना हेतु चित्रा नक्षत्र और वैधृतियोग को वर्जित माना गया हैं। यदि ऎसे योग बन रहे हो, तो घट स्थापना दोपहर में अभिजित मुहूर्त या अन्य शुभ मुहूर्त में करना उत्तम रहता हैं।

घट स्थापना हेतु सर्वप्रथम स्नान इत्यादि के पश्चयात गाय के गोबर से पूजा स्थल का लेपन करना चाहिए। घट स्थापना हेतु शुद्ध मिट्टी से वेदी का निर्माण करना चाहिए, फिर उसमें जौ और गेहूं बोएं तथा उस पर अपनी इच्छा के अनुसार मिट्टी, तांबे, चांदी या सोने का कलश स्थापित करना चाहिए। यदि पूर्ण विधि-विधान से घट स्थापना करना हो तो पंचांग पूजन (अर्थात गणेश-अंबिका, वरुण, षोडशमातृका, सप्तघृतमातृका, नवग्रह आदि देवों का पूजन) तथा पुण्याहवाचन (मंत्रोंच्चार) विद्वान ब्राह्मण द्वारा कराएं अथवा अमर्थता हो, तो स्वयं करें।

पश्चयात देवी की मूर्ति स्थापित करें तथा देवी प्रतिमाका षोडशोपचारपूर्वक पूजन करें। इसके बाद श्रीदुर्गासप्तशती का संपुट अथवा साधारण पाठ करना चाहिए। पाठ की पूर्णाहुति के दिन दशांश हवन अथवा दशांश पाठ करना चाहिए।

घट स्थापना के साथ दीपक की स्थापना भी की जाती है। पूजा के समय घी का दीपक जलाएं तथा उसका गंध, चावल, व पुष्प से पूजन करना चाहिए।
पूजन के समय इस मंत्र का जप करें-
भो दीप ब्रह्मरूपस्त्वं ह्यन्धकारनिवारक।
इमां मया कृतां पूजां गृह्णंस्तेज: प्रवर्धय।।

4 अप्रैल 2011 को घट स्थापना हेतु मुहूर्त
सुबह 9.30 बजे से 10.30 तक
दोपहर 3: 30 से संश्या 5: 20 तक
यह मुहूर्त घट स्थापना के लिए विशेष शुभ हैं।

यदि इस समय घट स्थापना संभव न हो, तो नीचे वर्णित चौघडि़ए के अनुसार भी घट स्थापन कर सकते हैं।

अमृत- सुबह 06.00 से 07.30 बजे तक
शुभ- सुबह 09.00 से 10.30 बजे तक
लाभ- दोपहर 03.00 से 04.30 बजे तक

नवरात्र व्रतकथा

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नवरात्र व्रतकथा

प्राचीन काल में चैत्र वंशी सुरथ नामक एक राजा राज करते थे। एक बार उनके शत्रुओं ने आक्रमण कर दिया और उन्हें युद्ध में हरा दिया। राजा को बलहीन देखकर उसके दुष्ट मंत्रियों ने राजा की सेना और खजाना अपने अघिकार में ले लिया। जिसके परिणाम स्वरूप राजा सुरथ दुखी और निराश होकर वन की ओर चले गए और वहां महर्षि मेधा के आश्रम में निवास करने लगे।

एक दिन आश्रम में राजा की भेंट समाघि नामक एक वैश्य से हुई, जो अपनी स्त्री और पुत्रों के दुर्व्यवहार से अपमानित होकर वहां निवास कर रहा था।

समाघि ने राजा को बताया कि वह अपने दुष्ट स्त्री और पुत्र आदिकों से अपमानित होने के बाद भी उनका मोह नहीं छोड़ पा रहा है। उसके चित्त को शान्ति नहीं मिल पा रही है। इधर राजा का मन भी उसके अधीन नहीं था। राज्य, धनादि की चिंता अभी भी उसे बनी हुई थी, जिससे वह बहुत दुखी थे। तदान्तर दोनों महर्षि मेधा के पास गए।

महर्षि मेधा यथायोग्य सम्भाष्ण करके दोनों से वार्ता आरंभ की। उन्होने बताया "यद्यपि हम दोनों अपने स्वजनों से अत्यंत अपमानित और तिरस्कृत होकर यहाँ आए हैं, फिर भी उनके प्रति हमारा मोह नहीं छूटता । इसका क्या कारण है?

महर्षि मेधा ने कहा मन शक्ति के अधीन होता है। आदिशक्ति भगवती के दो रूप हैं- विद्या और अविद्या। विद्या मन का स्वरूप है तथा अविद्या अज्ञान का स्वरूप है। अविद्या मोह की जननी है किंतु लोग मां भगवती को संसार का आदि कारण मानकर भक्ति करते हैं, मां भगवती उन्हें जीवन मुक्त कर देती है।" राजा सुरध ने पूछा- भगवन वह देवी कौन सी है, जिसको आप महामाया कहते हैं?
हे ब्रह्मन्। वह कैसे उत्पन्न हुई। और उसका क्या कार्य है? उसके चरित्र कौन कौन से हैं?
प्रभो ! उसका प्रभाव, स्वरूप आदि के बारे में हमे विस्तार में बताइए।

महर्षि मेधा बोले - राजन्! वह देवी तो नित्यास्वरूप है, उनके द्वारा यह संसार रचा गया है। तब भी उसकी उत्पत्ति अनेक प्रकार से होती है, जिसे मैं बताता हूं। संसार को जलमय करके जब भगवान विष्णु यागनिद्रा का आश्रय लेकर, शेषशय्या पर सो रहे थे, तब मधु-कैटभ नाम के असुर उनके कानों के मैल से प्रकट हुए और वह श्री ब्रह्माजी को मारने के लिए तैयार हो गए। उनके इस भयानक रूप को देखकर ब्रह्माजी ने अनुमान लगा लिया कि भगवान विष्णु के सिवाय मेरा कोई रक्षक नहीं है। किन्तु विडम्बना यह थी कि भगवान विष्णु सो रहे थे। तब उन्होंने श्री भगवान को जगाने के लिए उनके नेत्रों में निवास करने वाली योगनिद्रा की स्तुति की।

तब सभीगुण अघिष्ठात्री देवी योगनिद्रा भगवान विष्णु के नेत्र, नसिका, मुख, बाहु और ह्वदय से निकलकर ब्रह्मा जी के सामने खड़ी हो गई। योगनिद्रा के निकलते ही श्रीहरि तुरंत जाग उठे। उन्हें देखकर राक्षस क्रोघित हो उठे और युद्ध के लिए उनकी तरफ दौड़े। भगवान विष्णु और उन राक्षसों में पाँच हजार वर्षो तक युद्ध हुआ। अंत में दोनों राक्षसों ने भगवान की वीरता देख कर उन्हें वर माँगने को कहा।

भगवान ने कहा यदि तुम मुझ पर प्रसन्न हो तो अब मेरे हाथों मर जाओ। बस, इतना ही वर में तुम से माँगता हूँ।

महर्षि मेधा बोले - इस तरह से जब वह धोखे में आ गए और अपने चारों ओर जल ही जल देखा तो भगवान से कहने लगे कि जहां जल न हो, उसी जगह हमारा वध कीजिए।
तथास्तु कहकर भगवान श्री हरि ने उन दोनो को अपनी जांघ पर लिटा कर सिर काट डाले।

महर्षि मेधा बोले इस तरह से यह देवी श्री ब्रह्माजी की स्तुति करने पर प्रकट हुई थी, अब तुम से उनके प्रभाव का वर्णन करता हूं, जिसको ध्यान से सुनो - प्राचीन काल में देवताओं के स्वामी इंद्र और असुरों के स्वामी महिषासुर के बीच पूरे सौ वर्षो तक युद्ध हुआ था। इस युद्ध में देवताओं की सेना परास्त हो गई और इस प्रकार देवताओं को जीत महिषासुर इन्द्र बन बैठा हारे हुए देवता श्री ब्रह्माजी को साथ लेकर भगवान शंकर व विष्णु जी के पास गए और अपनी हार का सारा वृतांत उन्हें कह सुनाया। उन्होने महिषासुर के वध की प्रथना के उपाय की प्रर्थना की। साथ ही राज्य वापस पाने के लिए उनकी कृपा की स्तुति की।

देवताओं की बातें सुनकर भगवान विष्णु और शंकर जी को देवताओं पर बड़ा गुस्सा आया। गुस्से से भरे हुए भगवान विष्णु के मुख से बड़ा भारी तेज निकला और उसी प्रकार का तेज भगवान शंकर, ब्रह्मा आदि देवताओं के मुख से प्रकट हुआ, जिससे दसों दिशाएं जलने लगी। अंत में यही तेज एक देवी के रूप में परिवर्तित हो गया।

देवी ने सभी देवताओं से आयुध, शक्ति तथा आभूषण प्राप्त कर उच्च स्वर में गगनभेदी गर्जना की। जिससे समस्त विश्व में हलचल मच गई पृथ्वी, पर्वत आदि डोल गए। क्रोघित महिषासुर दैत्य सेना लेकर इस सिंहनाद की ओर दौड़ा। उसने देखा कि देवी की प्रभा से तीनों लोक प्रकाशित हो रहे हैं। महिषासुर ने अपना समस्त बल और छल लगा दिया परंतु देवी के सामने उसकी एक न चली। अंत में वह देवी के हाथों मारा गया। आगे चलकर यही देवी शुम्भ-निशुम्भ नामक असुरों का वध करने के लिए गौरी देवी के शरीर से उत्पन्न हुई।

उस समय देवी हिमालय पर विचर रहीं थी। जब शुम्भ-निशुम्भ के सेवकों ने उस परम मनोहर रूप वाली जगदंबा देवी को देखा और तुरन्त अपने स्वामी के पास जाकर कहा कि "हे महाराज ! दुनिया के सारे रत्न आपके अघिकार में हैं। वे सब आपके यहाँ शोभा पाते हैं। ऎसे ही एक स्त्री रत्न को हमने हिमालय की पहाडियों में देखा है। आप हिमालय को प्रकाशित करने वाली दिव्य क्रांति युक्त इस देवी का वरण कीजिए। यह सुनकर दैत्यराज शुम्भ ने सुग्रीव को अपना दूत बनाकर देवी के पास अपना विवाह प्रस्ताव भेजा। देवी ने प्रस्ताव को ना मानकर कहा जो मुझसे युद्ध में जीतेगा। मैं उससे विवाह करूँगी। यह सुनकर असुरेन्द्र के क्रोध का पारावार न रहा और उसने अपने सेनापति धूम्रलोचन को देवी के केशों से पकड़कर लाने का आदेश दिया। इस पर धूम्रलोचन साठ हजार राक्षसों की सेना साथ लेकर देवी से युद्ध के लिए वहाँ पहुँचा और देवी को ललकारने लगा। देवी ने सिर्फ अपनी हुंकार से ही उसे भस्म कर दिया और देवी के वाहन सिंह ने बाकी असुर सेना का संहार कर दिया।

इसके बाद चण्ड मुण्ड नामक दैत्यों को एक बड़ी सेना के साथ युद्ध के लिए भेजा गया। जब असुर देवी को तलवारें लेकर उनकी ओर बढ़े तब देवी ने काली का विकराल रूप धारण कर उन पर टूट पड़ी। कुछ ही देर में सम्पूर्ण सेना को नष्ट कर दिया। फिर देवी ने "हूँ" शब्द कहकर चण्ड का सिर काट दिया और मुण्ड को यमलोक पहुँचा दिया। तब से देवी काली की संसार में चामुंडा के नाम से ख्याति होने लगी।

महर्षि मेधा ने आगे बताया - चण्ड मुण्ड और सारी सेना के मारे जाने की खबर सुनकर असुरों के राजा शुम्भ ने अपनी सम्पूर्ण सेना को युद्ध के लिए तैयार होने की आज्ञा दी। शुम्भ की सेना को अपनी ओर आता देखकर देवी ने अपने धनुष की टंकार से पृथ्वी और आकाश के बीच का भाग गुंजा दिया। ऎसे भयंकर शब्द सुनकर राक्षसी सेना ने देवी और सिंह को चारों ओर से घेर लिया। उस समय दैत्यों के नाश के लिए और देवताओं के हित के लिए समस्त देवताओं की शक्तियाँ उनके शरीर से निकलकर उन्हीं के रूप में आयुधों से सजकर दैत्यों से युद्ध करने के लिए प्रस्तुत हो गई। इन देव शक्तियों से घिरे हुए भगवान शंकर ने देवी से कहा मेरी प्रसन्नता के लिए तुम शीघ्र ही इन असुरों को मारो।

इसके पश्चयात् देवी के शरीर से अत्यंत उग्र रूप वाली और सैंकड़ों गीदडियों के समान आवाज करने वाली चण्डिका शक्ति प्रकट हुई। उस अपराजिता देवी ने भगवान शंकर को अपना दूत बनाकर शुम्भ, निशुम्भ के पास इस संदेश के साथ भेजा जो तुम्हे अपने जीवित रहने की इच्छा हो तो त्रिलोकी का राज्य इन्द्र को दे दो, देवताओं को उनका यज्ञ भाग मिलना आरंभ हो जाए और तुम पाताल को लौट जाओ, किन्तु यदि बल के गर्व से तुम्हारी लड़ने की इच्छा हो तो फिर आ जाओ, तुम्हारे माँस से मेरी योनियाँ तृप्त होंगी।"

चूंकि उस देवी ने भगवान शंकर को दूत के कार्य में नियुक्त किया था, इसलिए वह संसार में शिवदूती के नाम से विख्यात हुई। मगर दैत्य भला कहां मानने वाले थे। वे तो अपनी शक्ति के मद में चूर थे। उन्होने देवी की बात अनसुनी कर दी और युद्ध को तत्पर हो उठे। देखते ही देखते पुन: युद्ध छिड़ गया। किंतु देवी के समक्ष असुर कब तक ठहर सकते थे। कुछ ही देर में देवी ने उनके अस्त्र, शस्त्रों को काट डाला। जब बहुत से दैत्य काल के मुख में समा गए तो महादैत्य रक्तबीज युद्ध के लिए आगे बढ़ा। उसके शरीर से रक्त की बूंदे पृथ्वी पर जैसे ही गिरती थीं। तुरंत वैसे ही शरीर वाला दैत्य पृथ्वी पर उत्पन्न हो जाता था। यह देखकर देवताओं को भय हुआ, देवताओं को भयभीत देखकर चंडिका ने काली से कहा "हे चामुण्डे" तुम अपने मुख को फैलाओ और मेरे शस्त्राघात से उत्पन्न हुए रक्त बिन्दुओं तथा रक्त बिन्दुओं से उत्पन्न हुए महाअसुरों को तुम अपने इस मुख से भक्षण करती हुई रणभूमि में विचरो। इस प्रकार उस दैत्य का रक्त क्षीण हो जाएगा और वह स्वयं नष्ट हो जाएगा। इस प्रकार अन्य दैत्य उत्पन्न नहीं होंगे।

काली के इस प्रकार कहकर चण्डिका देवी ने रक्तबीज पर अपने त्रिशुल से प्रहार किया और काली देवी ने अपने मुख में उसका रक्त ले लिया। चण्डिका ने उस दैत्य को बज्र, बाण, खड्म इत्यादि से मार डाला। महादैत्य रक्तबीज के मरते ही देवता अत्यंत प्रसन्न हुए और माताएं उन असुरों का रक्त पीने के पश्चयात उद्धत होकर नृत्य करने लगीं। रक्तबीज के मारे जाने पर शुम्भ व निशुम्भ को बड़ा क्रोध आया और अपनी बहुत बड़ी सेना लेकर महाशक्ति से युद्ध करने चल दिए। महापराक्रमी शुम्भ भी अपनी सेना सहित मातृगणों से युद्ध करने के लिए आ पहुँचा। किन्तु शीघ्र ही सभी दैत्य मारे गए और देवी ने शुम्भ निशुम्भ का संहार कर दिया। सारे संसार में शांति छा गई और देवता गण हर्षित होकर देवी की वंदना करने लगे।

इन सब उपाख्यानों को सुनकर मेधा ऋषि ने राजा सुरध तथा वणिक समाघि से देवी स्तुवन की विघिवत व्याख्या की, जिसके प्रभाव से दोनों नदी तट पर जाकर तपस्या में लीन हो गए। तीन वर्ष बाद दुर्गा माता ने प्रकट होकर दोनों को आशीर्वाद दिया। इस प्रकार वणिक तो संसारिक मोह से मुक्त होकर आत्मचिंतन में लग गया तथा राजा ने शत्रुओं को पराजित कर अपना खोया हुआ राज वैभव पुन: प्राप्त कर लिया।

चैत्र नवरात्र में देवी आराधना से सुख प्राप्ति

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चैत्र नवरात्र में देवी आराधना से सुख प्राप्ति

देवी भागवत के आठवें स्कंध में देवी उपासना का विस्तार से वर्णन है। देवी का पूजन-अर्चन-उपासना-साधना इत्यादि के पश्चयात दान देने पर लोक और परलोक दोनों सुख देने वाले होते हैं।

• प्रतिपदा तिथि के दिन देवी का षोडशेपचार से पूजन करके नैवेद्य के रूप में देवी को गाय का घृत (घी) अर्पण करना चाहिए। मां को चरणों चढ़ाये गये घृत को ब्राम्हणों में बांटने से रोगों से मुक्ति मिलती है।
• द्वितीया तिथि के दिन देवी को चीनी का भोग लगाकर दान करना चाहिए। चीनी का भोग लागाने से व्यक्ति दीर्घजीवी होता हैं।
• तृतीया तिथि के दिन देवी को दूध का भोग लगाकर दान करना चाहिए। दूध का भोग लागाने से व्यक्ति को दुखों से मुक्ति मिलती हैं।
• चतुर्थी तिथि के दिन देवी को मालपुआ भोग लगाकर दान करना चाहिए। मालपुए का भोग लागाने से व्यक्ति कि विपत्ति का नाश होता हैं।
• पंचमी तिथि के दिन देवी को केले का भोग लगाकर दान करना चाहिए। केले का भोग लागाने से व्यक्ति कि बुद्धि, विवेक का विकास होता हैं। व्यक्ति के परिवारीकसुख समृद्धि में वृद्धि होती हैं।
• षष्ठी तिथि के दिन देवी को मधु (शहद, महु, मध) का भोग लगाकर दान करना चाहिए। मधु का भोग लागाने से व्यक्ति को सुंदर स्वरूप कि प्राप्ति होती हैं।
• सप्तमी तिथि के दिन देवी को गुड़ का भोग लगाकर दान करना चाहिए। गुड़ का भोग लागाने से व्यक्ति के समस्त शोक दूर होते हैं।
• अष्टमी तिथि के दिन देवी को श्रीफल (नारियल) का भोग लगाकर दान करना चाहिए। गुड़ का भोग लागाने से व्यक्ति के संताप दूर होते हैं।

नवमी तिथि के दिन देवी को धान के लावे का भोग लगाकर दान करना चाहिए। धान के लावे का भोग लागाने से व्यक्ति के लोक और परलोक का सुख प्राप्त होता हैं।

गुप्त सप्तशती पाठ

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गुप्त सप्तशती पाठ


संपूर्ण श्री दुर्गा सप्तशती के मंत्रो का पाठ करने से साधक को जो फल प्राप्त होता है, वैसा ही कल्याणकारी फल प्रदान करने वाला गुप्त सप्तशती के मंत्रो का पाठ हैं।
गुप्त सप्तशती में अधिकतर मंत्र बीजों के होने से यह साधकों के लिए अमोघ फल प्रदान करने में समर्थ हैं।
गुप्त सप्तशती के पाठ का क्रम इस प्रकार हैं।
प्रारम्भ में कुञ्जिका स्तोत्र उसके बाद गुप्त सप्तशती उसके पश्चयात स्तवन का पाठ करे।

कुञ्जिका-स्तोत्र
पूर्व-पीठिका-ईश्वर उवाच:
श्रृणु देवि, प्रवक्ष्यामि कुञ्जिका-मन्त्रमुत्तमम्।
येन मन्त्रप्रभावेन चण्डीजापं शुभम् भवेत्॥१॥
न वर्म नार्गला-स्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्।
न सूक्तम् नापि ध्यानम् च न न्यासम् च न चार्चनम्॥२॥
कुञ्जिका-पाठ-मात्रेण दुर्गा-पाठ-फलं लभेत्।
अति गुह्यतमम् देवि देवानामपि दुर्लभम्॥३॥
गोपनीयम् प्रयत्नेन स्व-योनि-वच्च पार्वति।
मारणम् मोहनम् वश्यम् स्तम्भनोच्चाटनादिकम्।
पाठ-मात्रेण संसिद्धिः कुञ्जिकामन्त्रमुत्तमम्॥४॥
अथ मन्त्र
ॐ श्लैं दुँ क्लीं क्लौं जुं सः ज्वलयोज्ज्वल ज्वल प्रज्वल-प्रज्वल प्रबल-प्रबल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा

इति मन्त्र
इस कुञ्जिका मन्त्र का दस बार जप करना चाहिए। इसी प्रकार स्तव-पाठ के अन्त में पुनः इस मन्त्र का दस बार जप कर कुञ्जिका स्तोत्र का पाठ करना चाहिए।
कुञ्जिका स्तोत्र मूल-पाठ
नमस्ते रुद्र-रूपायै, नमस्ते मधु-मर्दिनि।
नमस्ते कैटभारी च, नमस्ते महिषासनि॥
नमस्ते शुम्भहंत्रेति, निशुम्भासुर-घातिनि।
जाग्रतं हि महा-देवि जप-सिद्धिं कुरुष्व मे॥
ऐं-कारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रति-पालिका॥
क्लीं-कारी कामरूपिण्यै बीजरूपा नमोऽस्तु ते।
चामुण्डा चण्ड-घाती च यैं-कारी वर-दायिनी॥
विच्चे नोऽभयदा नित्यं नमस्ते मंत्ररूपिणि॥
धां धीं धूं धूर्जटेर्पत्नी वां वीं वागेश्वरी तथा।
क्रां क्रीं श्रीं मे शुभं कुरु, ऐं ॐ ऐं रक्ष सर्वदा।।
ॐ ॐ ॐ-कार-रुपायै, ज्रां-ज्रां ज्रम्भाल-नादिनी।
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि, शां शीं शूं मे शुभं कुरु॥
ह्रूं ह्रूं ह्रूं-काररूपिण्यै ज्रं ज्रं ज्रम्भाल-नादिनी।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवानि ते नमो नमः॥7॥

मन्त्र:
अं कं चं टं तं पं यं शं बिन्दुराविर्भव, आविर्भव, हं सं लं क्षं मयि जाग्रय-जाग्रय, त्रोटय-त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा॥
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा, खां खीं खूं खेचरी तथा॥
म्लां म्लीं म्लूं दीव्यती पूर्णा, कुञ्जिकायै नमो नमः॥
सां सीं सप्तशती-सिद्धिं, कुरुष्व जप-मात्रतः॥
इदं तु कुञ्जिका-स्तोत्रं मंत्र-जाल-ग्रहां प्रिये।
अभक्ते च न दातव्यं, गोपयेत् सर्वदा श्रृणु॥
कुंजिका-विहितं देवि यस्तु सप्तशतीं पठेत्।
न तस्य जायते सिद्धिं, अरण्ये रुदनं यथा॥
॥इति श्रीरुद्रयामले गौरीतंत्रे शिवपार्वतीसंवादे कुंजिकास्तोत्रं संपूर्णम्॥

गुप्त-सप्तशती
ॐ ब्रीं-ब्रीं-ब्रीं वेणु-हस्ते, स्तुत-सुर-बटुकैर्हां गणेशस्य माता।
स्वानन्दे नन्द-रुपे, अनहत-निरते, मुक्तिदे मुक्ति-मार्गे॥
हंसः सोहं विशाले, वलय-गति-हसे, सिद्ध-देवी समस्ता।
हीं-हीं-हीं सिद्ध-लोके, कच-रुचि-विपुले, वीर-भद्रे नमस्ते॥१॥

ॐ हींकारोच्चारयन्ती, मम हरति भयं, चण्ड-मुण्डौ प्रचण्डे।
खां-खां-खां खड्ग-पाणे, ध्रक-ध्रक ध्रकिते, उग्र-रुपे स्वरुपे॥
हुँ-हुँ हुँकांर-नादे, गगन-भुवि-तले, व्यापिनी व्योम-रुपे।
हं-हं हंकार-नादे, सुर-गण-नमिते, चण्ड-रुपे नमस्ते॥२॥

ऐं लोके कीर्तयन्ती, मम हरतु भयं, राक्षसान् हन्यमाने।
घ्रां-घ्रां-घ्रां घोर-रुपे, घघ-घघ-घटिते, घर्घरे घोर-रावे॥
निर्मांसे काक-जंघे, घसित-नख-नखा, धूम्र-नेत्रे त्रि-नेत्रे।
हस्ताब्जे शूल-मुण्डे, कुल-कुल ककुले, सिद्ध-हस्ते नमस्ते॥३॥

ॐ क्रीं-क्रीं-क्रीं ऐं कुमारी, कुह-कुह-मखिले, कोकिलेनानुरागे।
मुद्रा-संज्ञ-त्रि-रेखा, कुरु-कुरु सततं, श्री महा-मारि गुह्ये॥
तेजांगे सिद्धि-नाथे, मन-पवन-चले, नैव आज्ञा-निधाने।
ऐंकारे रात्रि-मध्ये, स्वपित-पशु-जने, तत्र कान्ते नमस्ते॥४॥

ॐ व्रां-व्रीं-व्रूं व्रैं कवित्वे, दहन-पुर-गते रुक्मि-रुपेण चक्रे।
त्रिः-शक्तया, युक्त-वर्णादिक, कर-नमिते, दादिवं पूर्व-वर्णे॥
ह्रीं-स्थाने काम-राजे, ज्वल-ज्वल ज्वलिते, कोशिनि कोश-पत्रे।
स्वच्छन्दे कष्ट-नाशे, सुर-वर-वपुषे, गुह्य-मुण्डे नमस्ते॥५॥

ॐ घ्रां-घ्रीं-घ्रूं घोर-तुण्डे, घघ-घघ घघघे घर्घरान्याङि्घ्र-घोषे।
ह्रीं क्रीं द्रूं द्रोञ्च-चक्रे, रर-रर-रमिते, सर्व-ज्ञाने प्रधाने॥
द्रीं तीर्थेषु च ज्येष्ठे, जुग-जुग जजुगे म्लीं पदे काल-मुण्डे।
सर्वांगे रक्त-धारा-मथन-कर-वरे, वज्र-दण्डे नमस्ते॥६॥

ॐ क्रां क्रीं क्रूं वाम-नमिते, गगन गड-गडे गुह्य-योनि-स्वरुपे।
वज्रांगे, वज्र-हस्ते, सुर-पति-वरदे, मत्त-मातंग-रुढे॥
स्वस्तेजे, शुद्ध-देहे, लल-लल-ललिते, छेदिते पाश-जाले।
किण्डल्याकार-रुपे, वृष वृषभ-ध्वजे, ऐन्द्रि मातर्नमस्ते॥७॥

ॐ हुँ हुँ हुंकार-नादे, विषमवश-करे, यक्ष-वैताल-नाथे।
सु-सिद्धयर्थे सु-सिद्धैः, ठठ-ठठ-ठठठः, सर्व-भक्षे प्रचण्डे॥
जूं सः सौं शान्ति-कर्मेऽमृत-मृत-हरे, निःसमेसं समुद्रे।
देवि, त्वं साधकानां, भव-भव वरदे, भद्र-काली नमस्ते॥८॥
ब्रह्माणी वैष्णवी त्वं, त्वमसि बहुचरा, त्वं वराह-स्वरुपा।
त्वं ऐन्द्री त्वं कुबेरी, त्वमसि च जननी, त्वं कुमारी महेन्द्री॥
ऐं ह्रीं क्लींकार-भूते, वितल-तल-तले, भू-तले स्वर्ग-मार्गे।
पाताले शैल-श्रृंगे, हरि-हर-भुवने, सिद्ध-चण्डी नमस्ते॥९॥

हं लं क्षं शौण्डि-रुपे, शमित भव-भये, सर्व-विघ्नान्त-विघ्ने।
गां गीं गूं गैं षडंगे, गगन-गति-गते, सिद्धिदे सिद्ध-साध्ये॥
वं क्रं मुद्रा हिमांशोर्प्रहसति-वदने, त्र्यक्षरे ह्सैं निनादे।
हां हूं गां गीं गणेशी, गज-मुख-जननी, त्वां महेशीं नमामि॥१०॥

स्तवन
या देवी खड्ग-हस्ता, सकल-जन-पदा, व्यापिनी विशऽव-दुर्गा।
श्यामांगी शुक्ल-पाशाब्दि जगण-गणिता, ब्रह्म-देहार्ध-वासा॥
ज्ञानानां साधयन्ती, तिमिर-विरहिता, ज्ञान-दिव्य-प्रबोधा।
सा देवी, दिव्य-मूर्तिर्प्रदहतु दुरितं, मुण्ड-चण्डे प्रचण्डे॥१॥

ॐ हां हीं हूं वर्म-युक्ते, शव-गमन-गतिर्भीषणे भीम-वक्त्रे।
क्रां क्रीं क्रूं क्रोध-मूर्तिर्विकृत-स्तन-मुखे, रौद्र-दंष्ट्रा-कराले॥
कं कं कंकाल-धारी भ्रमप्ति, जगदिदं भक्षयन्ती ग्रसन्ती-
हुंकारोच्चारयन्ती प्रदहतु दुरितं, मुण्ड-चण्डे प्रचण्डे॥२॥

ॐ ह्रां ह्रीं हूं रुद्र-रुपे, त्रिभुवन-नमिते, पाश-हस्ते त्रि-नेत्रे।
रां रीं रुं रंगे किले किलित रवा, शूल-हस्ते प्रचण्डे॥
लां लीं लूं लम्ब-जिह्वे हसति, कह-कहा शुद्ध-घोराट्ट-हासैः।
कंकाली काल-रात्रिः प्रदहतु दुरितं, मुण्ड-चण्डे प्रचण्डे॥३॥

ॐ घ्रां घ्रीं घ्रूं घोर-रुपे घघ-घघ-घटिते घर्घराराव घोरे।
निमाँसे शुष्क-जंघे पिबति नर-वसा धूम्र-धूम्रायमाने॥
ॐ द्रां द्रीं द्रूं द्रावयन्ती, सकल-भुवि-तले, यक्ष-गन्धर्व-नागान्।
क्षां क्षीं क्षूं क्षोभयन्ती प्रदहतु दुरितं चण्ड-मुण्डे प्रचण्डे॥४॥

ॐ भ्रां भ्रीं भ्रूं भद्र-काली, हरि-हर-नमिते, रुद्र-मूर्ते विकर्णे।
चन्द्रादित्यौ च कर्णौ, शशि-मुकुट-शिरो वेष्ठितां केतु-मालाम्॥
स्त्रक्-सर्व-चोरगेन्द्रा शशि-करण-निभा तारकाः हार-कण्ठे।
सा देवी दिव्य-मूर्तिः, प्रदहतु दुरितं चण्ड-मुण्डे प्रचण्डे॥५॥
ॐ खं-खं-खं खड्ग-हस्ते, वर-कनक-निभे सूर्य-कान्ति-स्वतेजा।
विद्युज्ज्वालावलीनां, भव-निशित महा-कर्त्रिका दक्षिणेन॥
वामे हस्ते कपालं, वर-विमल-सुरा-पूरितं धारयन्ती।
सा देवी दिव्य-मूर्तिः प्रदहतु दुरितं चण्ड-मुण्डे प्रचण्डे॥६॥

ॐ हुँ हुँ फट् काल-रात्रीं पुर-सुर-मथनीं धूम्र-मारी कुमारी।
ह्रां ह्रीं ह्रूं हन्ति दुष्टान् कलित किल-किला शब्द अट्टाट्टहासे॥
हा-हा भूत-प्रभूते, किल-किलित-मुखा, कीलयन्ती ग्रसन्ती।
हुंकारोच्चारयन्ती प्रदहतु दुरितं चण्ड-मुण्डे प्रचण्डे॥७॥

ॐ ह्रीं श्रीं क्रीं कपालीं परिजन-सहिता चण्डि चामुण्डा-नित्ये।
रं-रं रंकार-शब्दे शशि-कर-धवले काल-कूटे दुरन्ते॥
हुँ हुँ हुंकार-कारि सुर-गण-नमिते, काल-कारी विकारी।
त्र्यैलोक्यं वश्य-कारी, प्रदहतु दुरितं चण्ड-मुण्डे प्रचण्डे॥८॥

वन्दे दण्ड-प्रचण्डा डमरु-डिमि-डिमा, घण्ट टंकार-नादे।
नृत्यन्ती ताण्डवैषा थथ-थइ विभवैर्निर्मला मन्त्र-माला॥
रुक्षौ कुक्षौ वहन्ती, खर-खरिता रवा चार्चिनि प्रेत-माला।
उच्चैस्तैश्चाट्टहासै, हह हसित रवा, चर्म-मुण्डा प्रचण्डे॥९॥

ॐ त्वं ब्राह्मी त्वं च रौद्री स च शिखि-गमना त्वं च देवी कुमारी।
त्वं चक्री चक्र-हासा घुर-घुरित रवा, त्वं वराह-स्वरुपा॥
रौद्रे त्वं चर्म-मुण्डा सकल-भुवि-तले संस्थिते स्वर्ग-मार्गे।
पाताले शैल-श्रृंगे हरि-हर-नमिते देवि चण्डी नमस्ते॥१०॥

रक्ष त्वं मुण्ड-धारी गिरि-गुह-विवरे निर्झरे पर्वते वा।
संग्रामे शत्रु-मध्ये विश विषम-विषे संकटे कुत्सिते वा॥
व्याघ्रे चौरे च सर्पेऽप्युदधि-भुवि-तले वह्नि-मध्ये च दुर्गे।
रक्षेत् सा दिव्य-मूर्तिः प्रदहतु दुरितं मुण्ड-चण्डे प्रचण्डे॥११॥

इत्येवं बीज-मन्त्रैः स्तवनमति-शिवं पातक-व्याधि-नाशनम्।
प्रत्यक्षं दिव्य-रुपं ग्रह-गण-मथनं मर्दनं शाकिनीनाम्॥
इत्येवं वेद-वेद्यं सकल-भय-हरं मन्त्र-शक्तिश्च नित्यम्।
मंत्राणां स्तोत्रकं यः पठति स लभते प्रार्थितां मन्त्र-सिद्धिम्॥१२॥

चं-चं-चं चन्द्र-हासा चचम चम-चमा चातुरी चित्त-केशी।
यं-यं-यं योग-माया जननि जग-हिता योगिनी योग-रुपा॥
डं-डं-डं डाकिनीनां डमरुक-सहिता दोल हिण्डोल डिम्भा।
रं-रं-रं रक्त-वस्त्रा सरसिज-नयना पातु मां देवि दुर्गा॥१३॥

चैत्र नवरात्र व्रत के लाभ

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हिन्दु संसकृति के अनुशार नववर्ष का शुभारंभ चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि से होता है।
इस दिन से वसंतकालीन नवरात्र की शुरुआत होती हैं।

विद्वानो के मतानुशार चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की समाप्ति के साथ भूलोक के परिवेश में एक विशेष परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगता हैं जिसके अनेक स्तर और स्वरूप होते हैं।

इस दौरान ऋतुओं के परिवर्तन के साथ नवरात्रों का तौहार मनुष्य के जीवन में बाह्य और आंतरिक परिवर्तन में एक विशेष संतुलन स्थापित करने में सहायक होता हैं। जिस तरह बाह्य जगत में परिवर्तन होता है उसी प्रकार मनुष्य के शरीर में भी परिवर्तन होता है। इस लिये नवरात्र उत्सव को आयोजित करने का उद्देश्य होता हैं की मनुष्य के भीतर में उपयुक्त परिवर्तन कर उसे बाह्य परिवर्तन के अनुकूल बनाकर उसे स्वयं के और प्रकृति के बीच में संतुलन बनाये रखना हैं।

नवरात्रों के दौरान किए जाने वाली पूजा-अर्चना, व्रत इत्यादि से पर्यावरण की शुद्धि होती हैं। उसीके साथ-साथ मनुष्य के शरीर और भावना की भी शुद्धि हो जाती हैं। क्योकि व्रत-उपवास शरीर को शुद्ध करने का पारंपरिक तरीका हैं जो प्राकृतिक-चिकित्सा का भी एक महत्वपूर्ण तत्व है। यही कारण हैं की विश्व के प्रायः सभी प्रमुख धर्मों में व्रत का महत्व हैं। इसी लिए हिन्दू संस्कृति में युगो-युगो से नवरात्रों के दौरान व्रत करने का विधान हैं। क्योकी व्रत के माध्यम से प्रथम मनुष्य का शरीर शुद्ध होता हैं, शरीर शुद्ध होतो मन एवं भावनाएं शुद्ध होती हैं। शरीर की शुद्धि के बिना मन व भाव की शुद्धि संभव नहीं हैं। चैत्र नवरात्रों के दौरान सभी प्रकार के व्रत-उपवास शरीर और मन की शुद्धि में सहायक होते हैं।

नवरात्रों में किये गये व्रत-उपवास का सीधा असर हमारे अच्छे स्वास्थ्य और रोगमुक्ति के लिये भी सहायक होता हैं। बड़ी धूम-धाम से किया गया नवरात्रों का आयोजन हमें सुखानुभूति एवं आनंदानुभूति प्रदान करता हैं।

मनुष्य के लिए आनंद की अवस्था सबसे अच्छी अवस्था हैं। जब व्यक्ति आनंद की अवस्था में होता हैं तो उसके शरीर में तनाव उत्पन्न करने वाले सूक्ष्म कोष समाप्त हो जाते हैं और जो सूक्ष्म कोष उत्सजिर्त होते हैं वे हमारे शरीर के लिए अत्यंत लाभदायक होते हैं। जो हमें नई व्याधियों से बचाने के साथ ही रोग होने की दशा में शीघ्र रोगमुक्ति प्रदान करने में भी सहायक होते हैं।

नवरात्र में दुर्गासप्तशती को पढने या सुनने से देवी अत्यन्त प्रसन्न होती हैं एसा शास्त्रोक्त वचन हैं। सप्तशती का पाठ उसकी मूल भाषा संस्कृत में करने पर ही पूर्ण प्रभावी होता हैं।

व्यक्ति को श्रीदुर्गासप्तशती को भगवती दुर्गा का ही स्वरूप समझना चाहिए। पाठ करने से पूर्व
श्रीदुर्गासप्तशती कि पुस्तक का इस मंत्र से पंचोपचारपूजन करें-

नमोदेव्यैमहादेव्यैशिवायैसततंनम:।
नम: प्रकृत्यैभद्रायैनियता:प्रणता:स्मताम्॥

जो व्यक्ति दुर्गासप्तशतीके मूल संस्कृत में पाठ करने में असमर्थ हों तो उस व्यक्ति को सप्तश्लोकी दुर्गा को पढने से लाभ प्राप्त होता हैं। क्योकि सात श्लोकों वाले इस स्तोत्र में श्रीदुर्गासप्तशती का सार समाया हुवा हैं।

जो व्यक्ति सप्तश्लोकी दुर्गा का भी न कर सके वह केवल नर्वाण मंत्र का अधिकाधिक जप करें।

देवी के पूजन के समय इस मंत्र का जप करे।

जयन्ती मङ्गलाकाली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधानमोऽस्तुते॥

देवी से प्रार्थना करें-

विधेहिदेवि कल्याणंविधेहिपरमांश्रियम्।
रूपंदेहिजयंदेहियशोदेहिद्विषोजहि॥

अर्थातः हे देवि! आप मेरा कल्याण करो। मुझे श्रेष्ठ सम्पत्ति प्रदान करो। मुझे रूप दो, जय दो, यश दो और मेरे काम-क्रोध इत्यादि शत्रुओं का नाश करो।

विद्वानो के अनुशार सम्पूर्ण नवरात्रव्रत के पालन में जो लोगों असमर्थ हो वह नवरात्र के सात रात्री,पांच रात्री, दों रात्री और एक रात्री का व्रत भी करके लाभ प्राप्त कर सकते हैं। नवरात्र में नवदुर्गा की उपासना करने से नवग्रहों का प्रकोप शांत होता हैं।