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मंगलवार, मार्च 01, 2011

महाशिवरात्रि आध्यात्मिक आस्था का महापर्व हैं।

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महाशिवरात्रि आध्यात्मिक आस्था का महापर्व हैं।


हिन्दु धर्म में महाशिवरात्रि को हर्ष और उल्हास का महा पर्व माना जाता हैं।
शिव का व्यक्तित्व हर साधारण व्यक्ति की भावनाओं का प्रतीक है। सदियों से भारत में महाशिवरात्रि उत्सव को पूर्ण आस्था और आध्यात्मिकता के साथ सृष्टि के रचनाकर देव महादेव को आभर प्रकट करते हुए उनकी विशेष कृपा प्राप्त करने का विधान हैं। दार्शनिक चिंताधारा से देखे तो मानव जीवन के कल्याण लिये एवं मानवता को जोड़ ने हेतु।

हजारो वर्षो से भारतीय जीवन शैलि स्वाभाविक-अस्वाभाविक रूप से प्रकृति से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध रखती हैं। भारतीय संस्कृति में शिव को सर्वव्यापी पूर्ण ब्रह्म के रूप में समावेष किया गया हैं।
भारतीय संस्कृति मे शिव जी को पिता और उनकी पत्नि पार्वती जी को मां मान कर उनकी आराधना परिवार, समाज एवं विश्व के कल्याण हेतु की जाती हैं। प्रकृति की भेट बेल पत्र द्वारा शिवलिंग पर अभिषेक कर शिव के समीप अपने कार्य या कामना पूर्ति हेतु प्राथना की जाति हैं। जिस्से व्यक्ति अपने कल्याण कर अपनी हिंसक प्रवृति, क्रोध, अहंकार आदि बूरे कर्मो पर अंकुश लगाने में समर्थ हो सकें।

हिंदू संस्कृति में शिव को प्रसन्न करने हेतु शिवरात्रि पर्व पर शिवलिंग की विशेष पूजा-अर्चना की परम्परा हैं। इसि लिये शिवरात्रि पर देश-विदेश के सभी शिव मंदिरों में विभिन्न प्रकार से धार्मिक एवं आध्यात्मिक भावना के साथ पूजा, अर्चना, व्रत एव उपासना की जाती हैं। क्योकि शिव स्वयं विष पान करके सृष्टि को अमृत पान कराते हैं। इसी प्रकार शिवरात्रि का महापर्व संसार से बूराईयों को मिटाकर विश्व को सुख, स्मृद्धि, प्रेम एवं शांति फेलाने का हैं।

महाशिवरात्रि व्रत कथा
एक बार पार्वती ने भगवान शिवजी से पूछा, ऐसा कौन सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत अथवा पूजन हैं, जिससे मृत्यु लोक के प्राणी आपकी कृपा सरल ही प्राप्त कर लेते हैं?
प्रश्न के उत्तर में शिवजी ने पार्वती को शिवरात्रि व्रत का विधान बताकर यह कथा सुनाई-
एक गाँव में एक शिकारी रहता था। पशुओं को मार करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। शिकारी एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन शिकारी साहूकार का ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधवश साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी।

शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया। अपनी दिनचर्या की भाँति वह जंगल में शिकार के लिए निकला, लेकिन दिनभर बंदीगृह में बंधक रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। उस बेल-वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढँका हुआ था। शिकारी को शिवलिंग का पता न चला। पड़ाव बनाते समय उसने बेल वृक्ष की टहनियाँ तोड़ कर नीचे फेकदी शिकारी ने जो टहनियाँ तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए।

एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुँची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, 'मैं गर्भिणी हूँ। शीघ्र ही प्रसव करूँगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं अपने बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे सामने प्रस्तुत हो जाऊँगी, तब तुम मुझे मार लेना।' शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी झाड़ियों में लुप्त हो गई। कुछ ही देर बाद एक और मृगी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, 'हे पारधी ! मैं थोड़ी देर पहले ही ऋतु से निवृत्त हुई हूँ। कामातुर विरहिणी हूँ। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूँ। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊँगी।'

शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर न लगाई, वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, 'हे पारधी! मैं इन बच्चों को पिता के हवाले करके लौट आऊँगी। इस समय मुझे मत मार।' शिकारी हँसा और बोला, 'सामने आए शिकार को छोड़ दूँ, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूँ। मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे।'

उत्तर में मृगी ने फिर कहा, 'जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी, इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान माँग रही हूँ। हे पारधी! मेरा विश्वास कर मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूँ।'

मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के आभाव में बेलवृक्ष पर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्व करेगा।

शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला,' हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि उनके वियोग में मुझे एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन मृगियों का पति हूँ। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण जीवनदान देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे सामने उपस्थित हो जाऊँगा।'

मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटना-चक्र घूम गया। उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, 'मेरी तीनों पत्नियाँ जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएँगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूँ।'

उपवास, रात्रि जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गए। भगवान शिव की अनुकम्पा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा।

थोड़ी ही देर बाद मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आँसुओं की झड़ी लग गई। उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया।

देव लोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहा था। घटना की परिणति होते ही देवी-देवताओं ने पुष्प वर्षा की। तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए।

गुरुवार, जुलाई 01, 2010

बोलते हैं हस्ताक्षर (भाग -३)

signaBolate hain hastakshar Bhag-3 (Part -3)


बोलते हैं हस्ताक्षर (भाग -३)

* अनुसंधानो में देखा गया हैं कि जो व्यक्ति सीघा लिखते हैं वह भविष्य में गोते लगाने से वर्तमान में जीनेमें अधिक विश्वास करते हैं। एसी लिखावट वाले यक्ति बडे आत्म-विश्वासी होते हैं, उनकी स्वतंत्र सोच के कारण निर्णय लेने की क्षमता गजब कि होती हैं एवं तर्कशास्त्र में विशेष रुचि रखते हैं।

* जिस व्यक्ति कि लिखावट का झुकाव दायीं तरफ होता हैं वह व्यक्ति बहिर्मुखी होते हैं, जिस कारण, सामाजिक प्रवृत्ति और व्यवहार कुशलता का विशेष गुण इनमें सरलता से देखने मिलजाता हैं। अपने कार्यो की प्रशंसा की विशेष चाह रखते हैं। एसे व्यक्ति अधिक कर्मशील होने से अपनए भविष्य को उज्ज्वल बनाने की चिंता के कारण व्यक्ति में सदा कुछ न कुछ क्रियात्मक कार्य करते हुए आगे बढते रहने की इच्छा रहती हैं। भावनात्मक प्रवृत्ति के कारण अन्य लोगों के प्रति संवेदनशील होते हैं तथा उनके बीच रहना भी पसंद करते हैं।

*जिस व्यक्ति कि लिखावट का झुकाव बायीं ओर होता है वह व्यक्ति शांत स्वाभाव के होते हैं। उनमें अकेला जीवन बिताने कि इच्छा अधिक रहती हैं। एसे व्यक्ति थोडे संवेदनशील होते हैं जिस वजह से लोग उन्हें डरपोक समझते हैं। व्यक्ति अपनी सोच एवं परिस्थिओं के कारण व्यक्ति हमेशा अपने आपमें खोया रहता हैं जिस्से वह सरलता से बाहर नहीं निकल पाते जिसके कारण आसानी से मित्र नहीं बना पाते हैं।

*जिस व्यक्ति कि लिखावट बार-बार बदते रहते हैं वह व्यक्ति अस्थिर मानसिकता वाले होते हैं। एसे व्यक्ति अधिक धन का अपव्यय करने वाले, थोडे लापरवाह, हर जगह अपनी मर्जि चलाने वाले, जिद्दी किस्म के होते हैं। लोग इन पर शीघ्र विश्वास नहीं कर पाते यदि कोइ कर ले तो उनका विश्वार बरकरार रखने में भी यह असमर्थ होते हैं। मानसिक चिंता हर समय लगी रहती हैं। इनका व्यवसाय या नौकरी में बार बार परिवर्तन होते रहते हैं।