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बुधवार, अप्रैल 14, 2010

गणपतिस्तोत्रम्

Ganapati Stotram

गणपतिस्तोत्रम्


सुवर्णवर्णसुन्दरं सितैकदन्तबन्धुरं गृहीतपाशकाङ्कुशं वरप्रदाभयप्रदम्।
चतुर्भुजं त्रिलोचनं भुजङ्गमोपवीतिनं प्रफुल्लवारिजासनं भजामि सिन्धुराननम्॥

किरीटहारकुण्डलं प्रदीप्तबाहुभूषणं प्रचण्डरत्‍‌नकङ्कणं प्रशोभिताङ्घियष्टिकम्।
प्रभातसूर्यसुन्दराम्बरद्वयप्रधारिणं सरत्‍‌नहेमनूपुरप्रशोभिताङ्घ्रिपङ्कजम्॥

सुवर्णदण्डमण्डितप्रचण्डचारुचामरं गृहप्रदेन्दुसुन्दरं युगक्षणप्रमोदितम्।
कवीन्द्रचित्तरञ्जकं महाविपत्तिभञ्जकं षडक्षरस्वरूपिणं भजे गजेन्द्ररूपिणम्॥

विरिञ्चविष्णुवन्दितं विरूपलोचनस्तुतं गिरीशदर्शनेच्छया समर्पितं पराम्बया।
निरन्तरं सुरासुरै: सपुत्रवामलोचनै: महामखेष्टकर्मसु स्मृतं भजामि तुन्दिलम्॥

मदौघलुब्धचञ्चलालिमञ्जुगुञ्जितारवं प्रबुद्धचित्तरञ्जकं प्रमोदकर्णचालकम्।
अनन्यभक्तिमानवं प्रचण्डमुक्तिदायं नमामि नित्यमादरेण वक्रतुण्डनायकम्॥

दारिद्रयविद्रावणमाशु कामदं स्तोत्रं पठेदेतदजस्त्रमादरात्।
पुत्री कलत्रस्वजनेषु मैत्री पुमान् भवेदेकवरप्रसादात्॥

इस स्तोत्रा का प्रतिदिन पाठ करने से गणेशजी की कृपा से उसे संतान लाभम स्त्री प्रति, मित्र एवं स्वजनो से एवं परिवार में प्रेम भाव बढता हैं।

मन्द्दात्मकं मारुतिस्तोत्रम्

 manddatmakam maruti stotram

 मन्द्दात्मकं मारुतिस्तोत्रम्



नमो वायुपुत्राय भीमरूपाय धीमते।
नमस्ते रामदूताय कामरूपाय श्रीमते॥

मोह शोकविनाशाय सीताशोकविनाशिने।
भगनशोकवनायास्तु दग्धलङ्काय वाग्मिने॥

गतिनिर्जितवाताय लक्ष्मणप्राणदाय च।
वनौकसां वरिष्ठाय वशिने वनवासिने॥

तत्त्‍‌वज्ञानसुधासिन्धुनिमगनय महीयते।
आञ्जनेयाय शूराय सुग्रीवसचिवाय ते॥

जन्ममृत्युभयघनय सर्वकष्टहराय च।
नेदिष्ठाय प्रेतभूतपिशाचभयहारिणे॥

यातनानाशनायास्तु नमो मर्कटरूपिणे।
यक्षराक्षसशार्दूलसर्पवृश्चिकभीहृते॥

महाबलाय वीराय चिरंजीविन उद्धते।
हारिणे वज्रदेहाय चोल्लङ्घितमहाब्धये॥

बलिनामग्रगण्याय नमो न: पाहि मारुते।
लाभदोऽसि त्वमेवाशु हनुमन् राक्षसान्तक॥

यशो जयं च मे देहि शत्रून् नाशय नाशय।
स्वाश्रितानामभयदं य एवं स्तौति मारुतिम्।

हानि: कुतो भवेत्तस्य सर्वत्र विजयी भवेत्॥



इस स्तोत्रका प्रतिदिन पाठ करने से मृत्यु , यक्ष, राक्षस, सिंह, सर्प, बिच्छू भूत, प्रेत और पिशाच इत्यादि भयका नाश होकर उसकी समस्त पीड़ा का निराकरण होता हैं। उसे समस्त कार्यो मे विजय प्राप्त होती हैं

राधाकृत गणेशस्तोत्रम्

Radha krut ganesh stotram

राधाकृत गणेशस्तोत्रम्


श्रीराधिकोवाच:

परम् धाम परम् ब्रह्म परेशम् परमीश्वरम्। विघन्निघन्करम् शान्तम् पुष्टम् कान्तमनन्तकम्॥

सुरासुरेन्द्रै: सिद्धैन्द्रै: स्तुतम् स्तौमि परात्परम्। सुरपद्मदिनेशम् च गणेशम् मङ्गलायनम्॥
इदम् स्तोत्रम् महापुण्यम् विघन्शोकहरम् परम्। य: पठेत् प्रातरुत्थाय सर्वविघनत् प्रमुच्यते॥



इस स्तोत्र का प्रति दिन पाठ करने से मनुष्य के सारे विघ्नो एवं शोको का नाश होता हैं।

अधिक मास (15 Apr- 14 May

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अधिक मास (15 Apr- 14 May)
 
हिन्दु पंचागों के अनुसार एक वर्ष १२ मास का होता हैं लेकिन यह विक्रम संवत् 2067 में 2 बैशाख मास होंगे।

इस लिये यह वर्ष १२ वर्ष कि जगह १३ मास का होगा। एवं यह अधिक मास 15 अप्रैल से प्रारंभ होकर 14 मई तक रहेगा। इस्से पूर्व २ वैशाख माह एक साथ में सन १९७२ में एवं सन १९९१ वर्ष में थे।
 
धार्मिक द्रष्टि से देखे तो इस अधिक मास का विशेष महत्व हमारे धर्म शास्त्रो में बताया गया हैं। अधिक मास के दौरान किसी भी तरह के शुभ कार्य प्रतिबंधित माने जाते रहते हैं लेकिन धार्मिक अनुष्ठान जेसे इष्ट आराधना, जप, तप करने से विशेष लाभदायी सिद्ध होते देखा गया हैं।
 
जिस मास के दोनो पक्ष (शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष) में सूर्य की संक्रांति का अभाव होता हैं, उसे अधिक मास कहा जाता हैं। सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में होने वाले परिवर्तन को संक्रांति कहाजाता हैं। एवं जिस मास में सूर्य का राशि-परिवर्तन नहीं होता है तो उस मास को अधिकमास (मलमास एवं पुरुषोत्तम मास) कहा जाता हैं।
  • अधिक मास में सांसारिक कर्म जैसे विवाह, गृहारंभ, गृह-प्रवेश, मुंडन, यज्ञोपवीत, व्यापार का शुभारंभ, नववधू का प्रवेश, देव प्रतिष्ठा, यज्ञ, भूमि, आभूषण, वस्त्र, गाडी खरीदना आदि को वर्जित माना गया हैं।
  • अधिक मास में निष्काम भाव से पूजा-अर्चना, सत्संग, भजन-कीर्तन, तीर्थयात्रा और दान आदि करने से अत्याधिक लाभ कि प्राप्ति होती हैं।

मंगलवार, अप्रैल 06, 2010

ज्योतिष एवं रोग

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ज्योतिष एवं रोग


ज्योतिष द्रष्टि कोण के अनुसार व्यक्ति को अपने पूर्व जन्म में अर्जित किये गये पाप कर्मों के आधार पर उसे फल प्राप्त होता हैं, जो उसे समय समय पर विभिन्न रोगों के रूप में व्यक्ति के शरीर में उत्पन्न होतें हैं ।

जन्मान्तर कृतम् पापम् व्याधिरुपेण बाधते
तच्छान्तिरौष धैर्दानर्जपहोम सुरार्चनै :   
                                                              (हरित सहिंता )
                                                                 

भावार्थ:- व्यक्ति को अपने पूर्व जन्म में किया गया पाप कर्म ही व्याधि के रूप में उसके शरीर में उत्पन्न हो कर उसके लिय६ए कष्ट कारक होता हैं और औषध, दान ,जप ,होम व देवपूजा से रोग की शांति होती हैं

ज्योतिष के साथ हि आयुर्वेद में भी कर्मदोष को ही रोग की उत्पत्ति का कारण माना गया हैं
भारतिय परंपरा में व्यक्ति कि द्वारा किये गये कर्म के तीन भेद माने गए हैं ;

संचित कर्म

प्रारब्ध कर्म

क्रियमाण कर्म

आयुर्वेद के मत से संचित कर्म ही कर्म जन्य रोगों के कारण होते हैं जिसके एक हिस्से को व्यक्ति प्रारब्ध के रूप में भोगता हैं।

वर्तमान समय में किए जाने वाला कर्म ही क्रियमाण कर्म हैं । वर्तमान काल में अन-उचित आहार विहार के कारण भी मानवशरीर में रोग उत्पन्न होते हैं ।

हमारे यहा तो प्राचिन काल से हि विद्वान ऋषि मुनि एवं आचार्यो का मत हैं कि कुष्ठ रोग, उदर रोग गुदा रोग, पागलपन, पंगुता, भगन्दर, प्रमेह, द्रष्टि हिनता, अर्श, देह में कंपन, श्रवण व वाणी दोष के रोग व्यक्ति द्वारा किये गये परस्त्री गमन, ब्रह्म हत्या, दूसरे के धन का हरण, बालक-स्त्री-निर्दोष एवं असहाय व्यक्ति की हत्या आदि दुष्कर्मों के प्रभाव से उत्पन्न होते हैं। इसलिये मानव द्वारा इस जन्म या पूर्व जन्म में किया गया पापकर्म ही रोगों का कारण होता है । तभी तो ऐसे मनुष्य भी कभी-कभी असाध्य रोगों का शिकार हो कर जीवन भर कष्ट भोगतें रहते हैं।

शुक्रवार, अप्रैल 02, 2010

भूमि का शुद्धि करण

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भूमि का शुद्धि करण


 
किसी भी भूमि पर भवन निर्माण करने से पूर्व उसका शुद्धि करण करना वास्तु ग्रंथो में आवश्यक बताया गया हैं।

 

 
सम्मार्जनोपाञ्ञनेन सेकेनोल्लेखनेन च।
गवां च परिवासेन भूमिः शुद्धयाति पञ्चभिः॥ (मनुस्मृति ५।१२५)

 
अर्थातः :-  भूमि का शुद्धि करण सम्मार्जन (झाड़ना- भूमि के सतह कि मिट्टी को झाडकर शुद्ध करना), लीपना ( गोबर आदिसे लीप कर भूमि को शुद्ध करना) , सींचना ( गोमूत्र, गंगाजल आदिसे सीच कर भूमि को शुद्ध करना), खोदना ( ऊपरकी कुछ मिट्टी खोदकर निकाल कर भूमि को शुद्ध करना ) और गौ सेवा ( एक दिन और रात गाय को लाकर उसे ठहराकर उस कि सेवा कर भूमि को शुद्ध करना) - इस प्रकार से भूमि का शुद्धि करण होता हैं ।

 

 यदि भूमि को खोदने पर उसमे से गाय कि हड्डी निकले तो राजभय होता हैं।
 
यदि मानव कि हड्डी निकले तो संतान का नाश होता हैं।

यदि बकरी कि हड्डी निकले तो अग्नि का भय होता हैं।

यदि घोड़े कि हड्डी निकले तो रोग भय होता हैं।

यदि गधे या ऊँटका कि हड्डी निकले तो धन संपदा कि हानि होती हैं।

यदि श्वान (कुत्ते) कि हड्डी निकले तो गृह में रहने वालो के मध्य कलह एवं सदस्यो का नाश होता हैं।

 

हड्डी यदि एक पुरुष कि उच्चता के अनुपात के भीतर निकले तो हि दोष होता हैं। यदि पुरुष कि उच्चता के अनुपात के नीचे से मिले तो उस भूमि पर दोष नहि लगता।

 

 

 
उपाय :-  भवन निर्माण हेतु किसी भी भूमि पर भवन बनाने से पूर्व उस जगह कि एक पुरुष कि उच्चता के अनुपात कि मिट्टी को खोद कर उसमे नई मिट्टी को शुद्धिकरण कर भरवा दि जाये तो वह भूमि भवन निर्माण हेतु अति उत्तम होती हैं।

गुरुवार, अप्रैल 01, 2010

ग्रह एवं रोग भाग:१

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ग्रह एवं रोग भाग:१


हमारे ऋषि-मुनि और ज्योतिषाचार्योने बडी ही सरलता से हर बीमारी का संबंध ग्रहो के साथ होने का उल्लेख ज्योतिष ग्रंथो मे किया हैं।

व्यक्ति की जन्म कुंडली में जन्म समय में स्थित ग्रहो कि स्थिती, ग्रहोकि महादशा, अंतर दशा एवं ग्रहो के वर्तमान समय के ग्रहो की स्थिति से व्यक्ति के स्वास्थ्य एवं रोग का आंकलन होता हैं।

आपने प्रायः देखा होगा स्वस्थ व्यक्ति भी कभी-कभी अचानक बीमार पड़ जाता हैं। जो दरसल खान-पान में बरती गई कोई लापरवाही हो सकती हैं। कभी-कभी व्यक्ति को आनुवांशिक यानी माता-पितासे प्राप्त रोग हो सकते है।

ज्योतिष विद्वान के मत से व्यक्ति के जन्म समय पर ग्रहों कि स्थिति एवं प्रभाव से व्यक्ति को उम्र के किस मोड़ पर उसे कोनसी बीमारी हो यह सुनिश्चित कर सकते हैं। यदि समय से पहले पता चल जाये व्यक्ति कब किस रोग से पीडि़त हो सकता हैं, तो पहले से सचेत होकर रोग का से बचाव हेतु या उसका निदान किया जा सकता हैं। क्योकि समय से पूर्व रोग के बारे में पता चलने से व्यक्ति खान-पान में परहेज कर बीमारी को कम करने या टालने का प्रयास कर सकता हैं।

जन्म कुंडली मे रोग का निर्णय कुंडली के छठे भाव में स्थित ग्रह, छठे भाव के स्वामी कि स्थिति छठे भाव पर ग्रह कि द्रष्टि, छठे भाव का कारक ग्रह के आधार पर जान सकते हैं, कि भविष्य में जातक किस रोग से पीडित हो सकता हैं।

कुछ मुख्य बातों को समझ कर आप किसी भी व्यक्ति कि जन्म कुंडली से होने वाले रोगों के बारे में सचेत कर सकते हैं। वैसे भी आकाश में भ्रमण करते सभी ग्रह और नक्षत्र रोग उत्पन्न कर सकते हैं। कौन-सा ग्रह किस प्रकार के रोग का कारण होता हैं उसके बारे में विस्तार से जाने।

(क्रमशः.........)