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शनिवार, अक्टूबर 15, 2011

करवा चौथ व्रत कथा और पूजन-विधि(15-अक्टूबर-2011)


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करवा चौथ व्रत (15-अक्टूबर-2011)
लेख साभार: गुरुत्व ज्योतिष पत्रिका (अक्टूबर-2011)
कार्तिक मास कि चतुर्थी के दिन विवाहित महिलाओं द्वारा करवा चौथ का व्रत किया जाता है।  करवा का अर्थात मिट्टी के जल-पात्र कि पूजा कर चंद्रमा को अर्ध्य देने का महत्व हैं। इसीलिए यह व्रत करवा चौथ नाम से जाना जाता हैं।  इस दिन पत्नी अपने पति की दीर्घायु के लिये  मंगलकामना और स्वयं के अखंड सौभाग्य रहने कि कामना  करती हैं। करवा चौथ के पूरे दिन पत्नी द्वारा उपवास रखा जाता हैं। इस दिन रात्रि को जब आकाश में चंद्रय उदय से पूर्व सोलह सृंगार कर चंद्र निकलने कि प्रतिक्षा करती हैं। व्रत का समापन चंद्रमा को अर्ध्य  देने के साथ ही उसे छलनी से देखा जाता हैं, उसके बाद पति के चरण स्पर्श कर उनसे आशीर्वाद प्राप्त करती हैं। ऐसी मान्यता है कि इस व्रत को करने से महिलाएं अखंड सौभाग्यवती होती हैं, उसका पति दीर्घायु होता हैं। GURUTVA KARYALAY | GURUTVA JYOTISH
यदि इस व्रत को पालन करने वाली पत्नी अपने पति के प्रति मर्यादा से,  विनम्रता से,  समर्पण के भाव से रहे और पति भी अपने समस्त कर्तव्य एवं धर्म का पालन सुचारु रुप से पालन करें, तो एसे दंपत्ति के जीवन में सभी सुख-समृद्धि से भरा जाता हैं। GURUTVA KARYALAY | GURUTVA JYOTISH
कथा :  एसी मान्यता हैं, कि भगवान श्रीकृष्ण ने द्रोपदी को यह व्रत का महत्व बताया था। पांडवों के वनवास के दौरान अर्जुन तप करने के लिए इंद्रनील पर्वत पर चले गए। बहुत दिन बीत जाने के बाद भी जब अर्जुन नहीं लौटे तो द्रोपदी को चिंता होने लगी। जब श्रीकृष्ण ने द्रोपदी को चिंतित देखा तो फौरन चिंता का कारण समझ गए। फिर भी श्रीकृष्ण ने द्रोपदी से कारण पूछा तो उसने यह चिंता का कारण श्रीकृष्ण के सामने प्रकट कर दिया। तब श्रीकृष्ण ने द्रोपदी को करवाचौथ व्रत करने का विधान बताया।  द्रोपदी ने श्रीकृष्ण से व्रत का विधि-विधान जान कर व्रत किय और उसे व्रत का फल मिला, अर्जुन सकुशल पर्वत पर तपस्या पूरी कर शीघ्र लौट आए। GURUTVA KARYALAY | GURUTVA JYOTISH
पूजन-विधि:  करवा चौथ के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर स्नान के स्वच्छ कपडे पहन कर करवा की पूजा-आराधना कर उसके साथ  शिव-पार्वती कि पूजा का  विधान हैं। क्योकि माता पार्वती नें कठिन तपस्या कर के शिवजी को प्राप्त कर अखंड सौभाग्य प्राप्त किया था। इस लिये शिव-पार्वती कि पूजा कि जाती हैं। GURUTVA KARYALAY | GURUTVA JYOTISH
करवा चौथ के दिन चंद्रमा कि पूजा का धार्मिक और ज्योतिष दोनों ही द्रष्टि से महत्व है।
छांदोग्य उपनिषद् के अनुशार जो चंद्रमा में पुरुषरूपी ब्रह्मा कि उपासना करता है, उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं, उसे जीवन में किसी प्रकार का कष्ट नहीं होता। उसे लंबी और पूर्ण आयु कि प्राप्ति होती हैं। GURUTVA KARYALAY | GURUTVA JYOTISH
ज्योतिष दृष्टि से चंद्रमा मन का कारक देवता हैं। अतः चंद्रमा चंद्रमा कि पूजा करने से मन की चंचलता पर नियंत्रित रहता हैं।  चंद्रमा के शुभ होने पर  से मन प्रसन्नता रहता हैं और मन से अशुद्ध विचार दूर होकर मन में शुभ विचार उत्पन्न होते हैं। क्योकि शुभ विचार ही मनुष्य को अच्छे कर्म करने हेतु प्रेरित करते हैं। स्वयं के द्वारा किये गई गलती या एवं अपने दोषों का स्मरण कर पति, सास-ससुर और बुजुर्गो के चरणस्पर्श इसी भाव के साथ करें कि इस साल ये गलतियां फिर नहीं हों। GURUTVA KARYALAY | GURUTVA JYOTISH
GURUTVA KARYALAY | GURUTVA JYOTISH

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OCT-2011

मंगलवार, अक्टूबर 11, 2011

लक्ष्मी कृपा हेतु उत्तम हैं कोजागरी पूर्णिमा

मां लक्ष्मी, धन प्राप्ति, शरद पूर्णिमा, सोना-चाँदी, चांदी, लक्ष्मी जी को खीर का भोग,
कोजागरी पूर्णिमा (11-अक्टूबर-2011)
आश्विन मास की पूर्णिमा को 'कोजागर व्रत' रखा जाता हैं। इस लिये इस पूर्णिमा को कोजागरी पूर्णिमा भी कहा जाता है। GURUTVA KARYALAY |  GURUTVA JYOTISH
इस दिन व्यक्ति विधिपूर्वक स्नान करके व्रत-उपवास रखने का विधान हैं। इस दिन श्रद्धा भाव से ताँबे या मिट्टी के कलश पर वस्त्र से ढँकी हुई स्वर्णमयी लक्ष्मी की प्रतिमा को स्थापित किया जाता हैं। फिर लक्ष्मी जी कि भिन्न-भिन्न उपचारों से पूज-अर्चना करने का विधान हैं। सायंकाल में चन्द्रोदय होने पर सोने, चाँदी अथवा मिट्टी के घी से भरे हुए दीपक जलाने कि परंपरा हैं। GURUTVA KARYALAY |  GURUTVA JYOTISH
इस दिन घी मिश्रित खीर को पात्रों में डालकर उसे चन्द्रमा की चाँदनी में रखा जाता हैं। एक प्रहर (३ घंटे) खीर को चाँदनी में रखनेके बाद में उसे लक्ष्मीजी को सारी खीर अर्पण कि जाती हैं। तत्पश्चात भक्तिपूर्वक सात्विक ब्राह्मणों को खीर का भोजन कराएँ और उनके साथ ही मांगलिक गीत गाकर तथा मंगलमय कार्य करते हुए रात्रि जागरण किया जाता हैं। GURUTVA KARYALAY |  GURUTVA JYOTISH
मान्यता हैं कि पूर्णिमा कि मध्यरात्रि में देवी महालक्ष्मी अपने हाथो में वर और अभय वरदान लिए भूलोक में विचरती हैं। इस दिन जो भक्तजन जाग रहा होता हैं उसे माता लक्ष्मी धन-संपत्ति प्रदान करती हैं। GURUTVA KARYALAY |  GURUTVA JYOTISH


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OCT-2011

सोमवार, अक्टूबर 10, 2011

शरद पूर्णिमा आरोग्य प्राप्ति हेतु उत्तम हैं।

सरद पूर्णीमा2011,  Sharad Purnima (Harvest moon) good for Health recovery 2011 ,
शरद पूर्णिमा (11-अक्टूबर-2011)

लेख साभार: गुरुत्व ज्योतिष पत्रिका (अक्टूबर-2011)

हिंदू पंचांग के अनुसार पूरे वर्ष में बारह पूर्णिमा आती हैं। पूर्णिमा के दिन चंद्रमा अपने पूर्ण आकार में होता है। पूर्णिमा पर चंद्रमा का अतुल्य सौंदर्य देखते ही बनता है। विद्वानो के अनुसार पूर्णिमा के दिन चंद्रमा पूर्ण आकार में होने के कारण वर्ष में आने वाली सभी पूर्णिमा पर्व के समान हैं। लेकिन इन सभी पूर्णिमा में आश्विन मास कि पूर्णिमा सबसे श्रेष्ठ मानी गई है। यह पूर्णिमा शरद ऋतु में आने के कारण इसे शरद पूर्णिमा भी कहते हैं। शरद ऋतु की इस पूर्णिमा को पूर्ण चंद्र का अश्विनी नक्षत्र से संयोग होता है। अश्विनी जो नक्षत्र क्रम में प्रथम नक्षत्र हैं, जिसके स्वामी अश्विनीकुमार है। GURUTVA KARYALAY | GURUTVA JYOTISH
कथा के अनुशार च्यवन ऋषि को आरोग्य का पाठ और औषधि का ज्ञान अश्विनीकुमारों ने ही दिया था। यही ज्ञान आज हजारों वर्ष बाद भी हमारे पास अनमोल धरोहर के रूप में संचित है। अश्विनीकुमार आरोग्य के स्वामी हैं और पूर्ण चंद्रमा अमृत का स्रोत। यही कारण है कि ऐसा माना जाता है कि इस पूर्णिमा को ब्रह्मांड से अमृत की वर्षा होती है। GURUTVA KARYALAY | GURUTVA JYOTISH
खीर का भोग GURUTVA KARYALAY | GURUTVA JYOTISH
शरद पूर्णिमा की रात में गाय के दूध से बनी खीर को चंद्रमा कि चांदनी में रखकर उसे प्रसाद-स्वरूप ग्रहण किया जाता है। पूर्णिमा की चांदनी में 'अमृत' का अंश होता है, इस लिये मान्यता यह है कि ऐसा करने से चंद्रमा की अमृत की बूंदें भोजन में आ जाती हैं जिसका सेवन करने से सभी प्रकार की बीमारियां आदि दूर हो जाती हैं। आयुर्वेद के ग्रंथों में भी इसकी चांदनी के औषधीय महत्व का वर्णन मिलता है। रखकर दूध से बनी खीर को चांदनी के में असाध्य रोगों की दवाएं खिलाई जाती है। GURUTVA KARYALAY | GURUTVA JYOTISH
शरद पूर्णिमा की कथा: GURUTVA KARYALAY | GURUTVA JYOTISH
एक साहुकार के दो पुत्रियाँ थी। दोनो पुत्रियाँ शरद पुर्णिमा का व्रत रखती थी। परन्तु बडी पुत्री पूरा व्रत करती थी और छोटी पुत्री अधुरा व्रत करती थी। परिणाम यह हुआ कि छोटी पुत्री की सन्तान पैदा होते ही मर जाती थी। उसने पंडितो से इसका कारण पूछा तो उन्होने बताया की तुम पूर्णिमा का अधूरा व्रत करती थी जिसके कारण तुम्हारी सन्तान पैदा होते ही मर जाती हैं। पूर्णिमा का पुरा विधिपुर्वक करने से तुम्हारी सन्तान जीवित रह सकती हैं। उसने पंतिडतो कि सलाह पर पूर्णिमा का पूरा व्रत विधिपूर्वक किया। उसके लडका हुआ परन्तु शीघ्र ही मर गया । उसने लडके को लकडी के पट्टे पर लिटाकर ऊपर से कपडा ढक दिया। फिर बडी बहन को बुलाकर लाई और बैठने के लिए वही पट्टा दे दिया। बडी बहन जब पीढे पर बैठने लगी जो उसका घाघरा बच्चे का छू गया, बच्चा घाघरा छुते ही रोने लगा। बडी बहन बोली तुम मुझे कंलक लगाना चाहती थी। मेरे बैठने से यह मर जाता तब छोटी बहन बोली यह तो पहले से मरा हुआ था। तेरे ही भाग्य से यह पुनः जीवित हो गया हैं । तेरे पुण्य से ही यह अभी जीवित हुआ हैं। उसके बाद से शरद पुर्णिमा का पूरा व्रत करने का प्रचलन चल निकला। GURUTVA KARYALAY | GURUTVA JYOTISH
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OCT-2011

बुधवार, अक्टूबर 05, 2011

मां सिद्धिदात्री के पूजन से ऋद्धि, सिद्धि कि प्राप्ति होती हैं।

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नवम् सिद्धिदात्री
लेख साभार: गुरुत्व ज्योतिष पत्रिका (अक्टूबर-2010)



नवरात्र के  नौवें दिन मां के सिद्धिदात्री स्वरूप का पूजन करने का विधान हैं।
देवी  सिद्धिदात्री का स्वरूप कमल आसन पर विराजित, चार भुजा वाला, दाहिनी तरफ के नीचे वाले हाथ में चक्र, ऊपर वाले हाथ में गदा, बाई तरफ से नीचे वाले हाथ में शंख और ऊपर वाले हाथ में कमल पुष्प सुशोभित रहते हैं।

मंत्र : सिद्धगंधर्वयक्षाद्यैरसुरैररमरैरपि। सेव्यमाना सदा भूयात सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।

ध्यान:-
वन्दे वांछितमनरोरार्थेचन्द्रार्घकृतशेखराम्।
कमलस्थिताचतुर्भुजासिद्धि यशस्वनीम्॥
स्वर्णावर्णानिर्वाणचक्रस्थितानवम् दुर्गा त्रिनेत्राम।
शंख, चक्र, गदा पदमधरा सिद्धिदात्रीभजेम्॥
पटाम्बरपरिधानांसुहास्यानानालंकारभूषिताम्।
मंजीर, हार केयूर, किंकिणिरत्नकुण्डलमण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वदनापल्लवाधराकांत कपोलापीनपयोधराम्।
कमनीयांलावण्यांक्षीणकटिंनिम्ननाभिंनितम्बनीम्॥

स्तोत्र:-
कंचनाभा शंखचक्रगदामधरामुकुटोज्वलां। स्मेरमुखीशिवपत्नीसिद्धिदात्रीनमोअस्तुते॥
पटाम्बरपरिधानांनानालंकारभूषितां। नलिनस्थितांपलिनाक्षींसिद्धिदात्रीनमोअस्तुते॥
परमानंदमयीदेवि परब्रह्म परमात्मा। परमशक्ति,परमभक्तिसिद्धिदात्रीनमोअस्तुते॥
विश्वकतींविश्वभर्तीविश्वहतींविश्वप्रीता। विश्वर्चिताविश्वतीतासिद्धिदात्रीनमोअस्तुते॥
भुक्तिमुक्तिकारणीभक्तकष्टनिवारिणी। भवसागर तारिणी सिद्धिदात्रीनमोअस्तुते।।
धर्माथकामप्रदायिनीमहामोह विनाशिनी। मोक्षदायिनीसिद्धिदात्रीसिद्धिदात्रीनमोअस्तुते॥

कवच:-
ओंकार: पातुशीर्षोमां, ऐं बीजंमां हृदयो। हीं बीजंसदापातुनभोगृहोचपादयो॥ ललाट कर्णोश्रींबीजंपातुक्लींबीजंमां नेत्र घ्राणो। कपोल चिबुकोहसौ:पातुजगत्प्रसूत्यैमां सर्व वदनो॥

मंत्र-ध्यान-कवच- का विधि-विधान से पूजन करने वाले व्यक्ति का निर्वाण चक्र जाग्रत होता हैं। सिद्धिदात्री के पूजन से व्यक्ति कि समस्त कामनाओं कि पूर्ति होकर उसे ऋद्धि, सिद्धि कि प्राप्ति होती हैं। पूजन से यश, बल और धन कि प्राप्ति कार्यो में चले आ रहे बाधा-विध्न समाप्त हो जाते हैं। व्यक्ति को यश, बल और धन कि प्राप्ति होकर उसे मां कि कृपा से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष कि भी प्राप्ति स्वतः हो जाती हैं।

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OCT-2010

मंगलवार, अक्टूबर 04, 2011

मां महागौरी का पूजन धन, वैभव और सुख-शांति प्रदान करता हैं।

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अष्टम महागौरी
लेख साभार: गुरुत्व ज्योतिष पत्रिका (अक्टूबर-2010)

नवरात्र के  आठवें दिन मां के महागौरी स्वरूप का पूजन करने का विधान हैं। महागौरी स्वरूप उज्जवल, कोमल, श्वेतवर्णा तथा श्वेत वस्त्रधारी हैं। महागौरी मस्तक पर चन्द्र का मुकुट धारण किये हुए हैं। कान्तिमणि के समान कान्ति वाली देवी जो अपनी चारों भुजाओं में क्रमशः शंख, चक्र, धनुष और बाण धारण किए हुए हैं, उनके कानों में रत्न जडितकुण्डल झिलमिलाते रहते हैं। महागौरीवृषभ के पीठ पर विराजमान हैं। महागौरी गायन एवं संगीत से प्रसन्न होने वाली 'महागौरी' माना जाता हैं।

मंत्र:
श्वेते वृषे समरूढ़ा श्वेताम्बराधरा शुचि:। महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा।।

ध्यान:-
वन्दे वांछित कामार्थेचन्द्रार्घकृतशेखराम्।
सिंहारूढाचतुर्भुजामहागौरीयशस्वीनीम्॥
पुणेन्दुनिभांगौरी सोमवक्रस्थितांअष्टम दुर्गा त्रिनेत्रम।
वराभीतिकरांत्रिशूल ढमरूधरांमहागौरींभजेम्॥
पटाम्बरपरिधानामृदुहास्यानानालंकारभूषिताम्।
मंजीर, कार, केयूर, किंकिणिरत्न कुण्डल मण्डिताम्॥
प्रफुल्ल वदनांपल्लवाधरांकांत कपोलांचैवोक्यमोहनीम्।
कमनीयांलावण्यांमृणालांचंदन गन्ध लिप्ताम्॥

स्तोत्र:-
सर्वसंकट हंत्रीत्वंहिधन ऐश्वर्य प्रदायनीम्।
ज्ञानदाचतुर्वेदमयी,महागौरीप्रणमाम्यहम्॥
सुख शांति दात्री, धन धान्य प्रदायनीम्।
डमरूवाघप्रिया अघा महागौरीप्रणमाम्यहम्॥
त्रैलोक्यमंगलात्वंहितापत्रयप्रणमाम्यहम्।
वरदाचैतन्यमयीमहागौरीप्रणमाम्यहम्॥

कवच:-
ओंकार: पातुशीर्षोमां, हीं बीजंमां हृदयो। क्लींबीजंसदापातुनभोगृहोचपादयो॥ ललाट कर्णो,हूं, बीजंपात महागौरीमां नेत्र घ्राणों। कपोल चिबुकोफट् पातुस्वाहा मां सर्ववदनो॥

मंत्र-ध्यान-कवच- का विधि-विधान से पूजन करने वाले व्यक्ति का सोमचक्र जाग्रत होता हैं। महागौरी के पूजन से व्यक्ति के समस्त पाप धुल जाते हैं। महागौरी के पूजन करने वाले साधन के लिये मां अन्नपूर्णा के समान, धन, वैभव और सुख-शांति प्रदान करने वाली एवं  संकट से मुक्ति दिलाने वाली देवी महागौरी हैं।

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OCT-2011

सोमवार, अक्टूबर 03, 2011

मां कालरात्रि के पूजन से शत्रु भय एवं दुष्ट शक्तियों का नाश होता हैं

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सप्तम कालरात्रि
लेख साभार: गुरुत्व ज्योतिष पत्रिका (अक्टूबर-2010)

नवरात्र के  सातवें दिन मां के कालरात्रि स्वरूप का पूजन करने का विधान हैं। कालरात्रि देवी के शरीर का रंग घने अंधकार कि तरह एकदम काला हैं, सिर के बाल फैलाकर रखने वाली हैं।
कालरात्रि का स्वरुप तीन नेत्र वाला एवं गले में चमकने वाली माला धारण करने वाली हैं। कालरात्रि कि आंखों से अग्नि की वर्षा होती है एवं नासिका के श्वास में अग्नि की भंयकर ज्वालाएं निकलती रहती हैं। कालरात्रि के ऊपर उठे हुए दाहिने हाथ के वरमुद्रासे सभी मनुष्यो को वर प्रदान करती हैं। दाहिनी तरफ का नीचे वाला हाथ अभयमुद्रामें हैं। एक हाथ से शत्रुओं की गर्दन पकडे हुए हैं, दूसरे हाथ में खड्ग-तलवार शस्त्र से शत्रु का नाश करने वाली कालरात्रि विकट रूप में अपने वाहन गर्दभ(गधे) विराजमान हैं।

मंत्रः
एक वेधी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता। लम्बोष्ठी कणिर्काकणी तैलाभ्यक्तशरीरिणी।।
वामपदोल्लसल्लोहलताकण्टक भूषणा। वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयंकरी।।

ध्यान:-
करालवदनां घोरांमुक्तकेशींचतुर्भुताम्। कालरात्रिंकरालिंकादिव्यांविद्युत्मालाविभूषिताम्॥
दिव्य लौहवज्रखड्ग वामाघो‌र्ध्वकराम्बुजाम्। अभयंवरदांचैवदक्षिणोध्र्वाघ:पाणिकाम्॥
महामेघप्रभांश्यामांतथा चैपगर्दभारूढां। घोरदंष्टाकारालास्यांपीनोन्नतपयोधराम्॥
सुख प्रसन्न वदनास्मेरानसरोरूहाम्। एवं संचियन्तयेत्कालरात्रिंसर्वकामसमृद्धिधदाम्॥

स्तोत्र:-
हीं कालरात्रि श्रींकराली चक्लींकल्याणी कलावती। कालमाताकलिदर्पध्नीकमदींशकृपन्विता॥
कामबीजजपान्दाकमबीजस्वरूपिणी। कुमतिघनीकुलीनार्तिनशिनीकुल कामिनी॥
क्लींहीं श्रींमंत्रवर्णेनकालकण्टकघातिनी। कृपामयीकृपाधाराकृपापाराकृपागमा॥

कवच:-
ॐ क्लींमें हदयंपातुपादौश्रींकालरात्रि। ललाटेसततंपातुदुष्टग्रहनिवारिणी॥ रसनांपातुकौमारी भैरवी चक्षुणोर्मम
हौपृष्ठेमहेशानीकर्णोशंकरभामिनी। वर्जितानितुस्थानाभियानिचकवचेनहि। तानिसर्वाणिमें देवी सततंपातुस्तम्भिनी॥

मंत्र-ध्यान-कवच- का विधि-विधान से पूजन करने वाले व्यक्ति का भानु चक्र जाग्रत होता हैं। कालरात्रि के पूजन से अग्नि भय, आकाश भय, भूत पिशाच इत्यादी शक्तियां कालरात्रि देवी के स्मरण मात्र से ही भाग जाते हैं,  कालरात्रि का स्वरूप देखने में अत्यंत भयानक होते हुवे भी सदैव शुभ फल देने वाला होता हैं, इस लिये कालरात्रि को शुभंकरी के नामसे भी जाना जाता हैं।  कालरात्रि शत्रु एवं दुष्टों का संहार कर ने वाली देवी हैं।

OCT-2010