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गुरुवार, मार्च 11, 2010

ललिता पंचरत्नम्‌

lalita panchratnam

॥ ललिता पंचरत्नम्‌ ॥

प्रातः स्मरामि ललितावदनारविन्दं बिम्बाधं पृथुल-मौक्तिक-शोभिनासम्‌।
आकर्णदीर्घनयनं मणिकुण्डलाढ्यं मन्दस्मितं मृगमदोज्ज्वल-भालदेशम्‌॥१॥

प्रातर्भजामि ललिताभुजकल्पवल्लीं रक्तांगुलीय-लसदंगुलि-पल्लवाढ्याम्‌।
माणिक्य-हेम-बलयांगद-शोभमानां पुण्ड्रेक्षु-चाप-कुसुमषु-सृणीर्दधानाम्‌॥२॥

प्रातर्नमामि ललिताचरणारविन्दं भक्तेष्टदाननिरतं भवसिन्धुपोतम्‌।
पद्मासनादि-सुरनायक-पूजनीयं पद्मांकुश-ध्वज-सुदर्शन-लांछनाढ्यम्‌॥३॥

प्रातः स्तुवे परशिवां ललितां भवानीं त्रय्यन्तवेद्यविभवां करुणानवद्याम्‌।
विश्वस्य सृष्टि-विलय-स्थितिहेतुभूतां विद्येश्वरीं निगमवांगमनसाविदूराम्‌॥४॥

प्रातर्वदामि ललिते तव पुण्यनाम- कामेश्वरीति कमलेति महेश्वरीति।
श्रीशाम्भवीति जगतां जननी परेति वाग्देवतेति वचसा त्रिपुरेश्वरीति॥५॥

यः श्लोकपंचकमिदं ललिताम्बिकायाः सौभाग्यदं सुललितं पठति प्रभाते।
तस्मै ददाति ललिता झटिति प्रसन्ना विद्यां श्रियं विमलसौख्यमनन्तकीर्तिम्‌॥६॥

॥ इति श्री ललितापंचरत्नम् सम्पूर्णम्‌॥

विन्ध्येश्वरी स्तोत्र

Vindhyeshvari stotra, Vindhya chal vasini devi stotram,  विन्ध्याचल् वासिनी देवी स्तोत्र

॥ विन्ध्येश्वरी स्तोत्र ॥

निशुम्भ शुम्भ गर्जनी, प्रचण्ड मुण्ड खण्डिनी।
बनेरणे प्रकाशिनी, भजामि विन्ध्यवासिनी॥

त्रिशूल मुण्ड धारिणी, धरा विघात हारिणी।
गृहे-गृहे निवासिनी, भजामि विन्ध्यवासिनी॥

दरिद्र दुःख हारिणी, सदा विभूति कारिणी।
वियोग शोक हारिणी, भजामि विन्ध्यवासिनी॥

लसत्सुलोल लोचनं, लतासनं वरप्रदं।
कपाल-शूल धारिणी, भजामि विन्ध्यवासिनी॥

कराब्जदानदाधरां, शिवाशिवां प्रदायिनी।
वरा-वराननां शुभां भजामि विन्ध्यवासिनी॥

कपीन्द्न जामिनीप्रदां, त्रिधा स्वरूप धारिणी।
जले-थले निवासिनी, भजामि विन्ध्यवासिनी॥

विशिष्ट शिष्ट कारिणी, विशाल रूप धारिणी।
महोदरे विलासिनी, भजामि विन्ध्यवासिनी॥

पुंरदरादि सेवितां, पुरादिवंशखण्डितम्‌।
विशुद्ध बुद्धिकारिणीं, भजामि विन्ध्यवासिनीं॥

॥ इति श्री विन्ध्येश्वरी स्तोत्र सम्पूर्णम् ॥

बुधवार, मार्च 10, 2010

मीनाक्षी स्तोत्रम्‌

Minakshi Stotram, minaxi stotra, minakshi stotra
॥मीनाक्षीस्तोत्रम्‌॥

श्रीविद्ये शिववामभागनिलये श्री राजराजार्चिते
श्रीनाथादिगुरुस्वरूपविभवे चिन्तामणीपीठिके।
श्रीवाणीगिरिजानुतांगघ्रिकमले श्रीशाम्भवि श्रीशिवे
मध्याह्ने मलयध्वजाधिपसुते मां पाहि मीनाम्बिके॥१॥

चक्रस्थेऽचपले चराऽचरजगन्नाथे जगत्पूजिते
आर्तालीवरदे नताभयकरे वक्षोजभारान्विते।
विद्ये वेदकलापमौलिविदिते विद्युल्लताविग्रहे
मातः पूर्णसुधारसार्द्रहृदये मां पाहि मीनाम्बिके॥१॥

कोटीरांगदरत्नकुण्डलधरे कोदण्डबाणाचिंते
कोकाकार-कुचद्वयोपरिलसत्‌प्रालम्बहाराचिंते।
शिंजन्नूपुर-पादसारसमणी-श्रीपादुकालंकृते
मद्दारिद्य्रभुजंगारुडखगे मां पाहि मीनाम्बिके॥३॥

ब्रह्मेशाच्युतगीयमानचरिते प्रेतासनान्तः स्थिते
पाशोदंकशचापबाणकलिते बालेन्दुचूडांचिंते।
बाले बालकुरंगलोलनयने बालार्ककोट्युज्ज्वले
मुद्राराधितदैवते मुनिसुते मां पाहि मीनाम्बिके॥४॥

गंधर्वामर-यक्ष-पन्नगनुते गंगाधरालिगिंते
गायत्रीगरुडासने कमलजे सुश्यामले सुस्थिते।
खातीते खलदारुपावकशिखे खद्योतकीट्युज्ज्वले
मन्वाराधितदैवते मुनिसुते मां पाहि मीनाम्बिके॥५॥

नादे नारदतुम्बुराद्यविनुते नादान्तनादात्मिके
नित्ये नीललतात्मिके निरुपमे नीवारशूकोपमे।
कान्ते कामकले कंदम्बनिलये कामेश्वरांकस्थिते
मद्विद्ये मदभीष्टकल्पलतिके मां पाहि मीनाम्बिके॥६॥

वीणानादनिमीलितार्धनयने विस्रस्तचूलीभरे
ताम्बूलारुणपल्लवाधरयुते ताटंकहारान्विते।
श्यामे चन्द्रकलावतंसकलिते कस्तूरिकफालिके
पूर्णे पूर्णकलाभिरामवदने मां पाहि मीनाम्बिके॥७॥

शब्दब्रह्ममयी चराचरमयी ज्योतिर्मयी वांमयी
नित्यानन्दमयी निरंजनमयी तत्वंमयी चिन्मयी।
तत्वातीतमयी परात्परमयी मायामयी श्रीमयी
सर्वश्वर्यमयी सदाशिवमयी मां पाहि मीनाम्बिके!॥८॥

॥ इति श्री मीनाक्षीस्तोत्रम् सम्पूर्णम्‌॥

मंगलवार, मार्च 09, 2010

दुर्गा सिद्धमन्त्र स्तोत्रम्‌

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॥दुर्गासिद्धमन्त्रस्तोत्रम्‌॥

विश्वेश्वरि! त्वं परिपासि विश्वं
विश्वात्मिका धारयसीह विश्वम्‌।
विश्वेशवन्धा भवती भवन्ति
विश्वाश्चया ये त्वयि भक्तिनम्राः॥१॥

देवि! प्रपन्नार्ति हरे! प्रसीद
प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य।
प्रसीद विश्वेश्वरि! पाहि विश्वं
त्वमीश्वरी देवि! चराऽचरस्य॥२॥

दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तोः
स्वस्थैः स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
दारिद्य्र-दुःखभय हारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता॥३॥

विद्याः समस्तास्तव देवि! भेदाः
स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु।
त्वयैकया पूरितमम्बयैत्‌
का ते स्तुतिः स्तव्यपरा परोक्तिः॥४॥

त्वं वैष्णवी शक्तिरनन्तवीर्या
विश्वस्य बीजं परमाऽसि माया।
सम्मोहितं देवि! समस्तमेतत्‌
त्वं वै प्रसन्ना भुविमुक्तिहेतुः॥५॥

सर्वमंगल-मांगल्ये शिवेसर्वार्थसाधिके!।
शरण्ये त्रयम्बके! गौरि! नारायणि! नमोऽस्तुते॥६॥

शरणागत-दीनार्त-परित्राण-परायणे!
सर्वस्यार्तिंहरे देवि! नारायणि! नमोऽस्तुते॥७॥

॥ इति श्री दुर्गासिद्धमन्त्रस्तोत्रं सम्पूर्णम्‌॥

धन प्राप्ति और वास्तु सिद्धांत(भाग:१)

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धन प्राप्ति और वास्तु सिद्धांत(भाग:१)
आज के भौतिक युग में हर कार्य धन के उपर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुपसे निर्भर करता हैं इस लिये प्रत्येक व्यक्ति कि यही इच्छा होती हैं कि उसके पास अपार धन दौलत एवं जीवन उपयोगी सारी सुख सुविधाए उप्लब्ध हो जो एक समृद्ध व्यक्ति के पास में होती हैं, एवं उसकी समृद्धि एवं उन्नति दिन प्रतिदिन बढती जाए।

आप अपने घर में धन एवं बहुमूल्य आभूषण, जवाहरात इत्यादि कि सुरक्षा हेतु अलमारी या कैश बोक्स रखते हैं, जिस्से धन सुरक्षित रहे और उसमे बढ़त होती रहें। इसके लिये वास्तु से संबंधित धन संचय हेतु कुछ उपाय।

वास्तु के अनुशार धन एवं बहु मूल्य सामग्री को उत्तर दिशा में रखे। उत्तर दिशा में कुबेर का वास होता हैं। एवं कुबेर धन के देवता हैं एवं उत्तर दिशा पर उनका प्रभाव रहता हैं। इस लिये अपने व्यवसाय स्थान या घर में धन को सुरक्षित रखने हेतु उत्तर दिशा का चुनाव करें।

उत्तर - व्यवसाय स्थान या घर में अलमारी को उत्तर दिशा के कमरे में उसे दक्षिण दिशा की दीवार से सटाकर एसे रखे कि उसका मुख उत्तर कि तरफ रहे या आपका मुख अलमारी खोलते या बंध करते समय दक्षिण दिशा कि और रहें। उत्तर कि और खुलने वाली अलमारी एवं कैश बोक्स में रखे गये धन एवं आभूषण कि निरंतर वृद्धि होती रहती हैं।

पूर्व - पूर्व कि और खुलने वाली अलमारी एवं कैश बोक्स में धन रखने से उसमें बढ़ोतरी होती रहती है। लेकिन उत्तर को सर्व श्रेष्ठ मानागया हैं।

दक्षिण - दक्षिण कि और खुलने वाली अलमारी एवं कैश बोक्स में धन रखने से धन एवं आभूषण जो हैं उसमे में कमी आजाति हैं क्योकि एसी स्थिति मे अलमारी या कैश बोक्स होने से आमदनी से खर्चा अधिक होता हैं एवं संचय किये गये धन में भी कमी आजाती हैं। एवं व्यक्ति पर कर्ज चढ जाता हैं।

पश्चिम - पश्चिम कि और खुलने वाली अलमारी एवं कैश बोक्स में धन रखने से धन एवं आभूषण रखने से उस घर मे धन कडी मेहनत से कभी कभार प्राप्त होता हैं एवं टिक पाता हैं, अन्य था अन्य संबंधि या मित्र वर्ग से सहायता से प्राप्त होने वाला धन भी टिकता नहीं हैं।

दुर्गापदुद्धारस्तवराज

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॥ दुर्गापदुद्धारस्तवराजः ॥

नमस्ते शरण्ये शिवे सानुकम्पे नमस्ते जगद्वयापिके विश्वरूपे।
नमस्ते जगद्वन्द्य-पादारविन्दे नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥१॥

नमस्ते जगच्चिन्त्यमानस्वरूपे नमस्ते महायोगिनि ज्ञानरूपे।
नमस्ते नमस्ते सदानन्दरूपे नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥२॥

अनाथस्य दीनस्य तृष्णातुरस्य भयार्तस्य भीतस्य बद्धस्य जन्तोः।
त्वमेका गतिर्देवि निस्तारकर्त्री नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥३॥

अरण्ये रणे दारुणे शत्रुमध्येऽनले सागरे प्रान्तरे राजगेहे।
त्वमेका गतिर्देवि निस्तारनौका नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥४॥

अपारे महादुस्तरेऽत्यन्तघोरे बिपत्सागरे मज्जतां देहभाजाम्‌।
त्वमेका गतिर्देविनिस्तारहेतुर्नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥५॥

नमश्चण्डिके चण्डदुर्दण्डलीला-समुत्खण्डिताखण्डिताशेषशत्री।
त्वमेका गतिर्देवि निस्तारबीज नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥६॥

त्मेवाघभावाधृतासत्यवादीर्न जाताजितक्रोधनात्‌क्रोधनिष्ठा।
इडा पिंगला त्वं सुषुम्णा च नाडी नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥७॥

नमो देवि दुर्गे शिवे भीमनादे सरस्वत्यरुन्धत्यमोघस्वरूपे।
विभूतिः शची कालरात्रिःसतिस्त्वं नमस्ते जगत्तारिणि त्राहि दुर्गे॥८॥

शरणमसि सुराणां सिद्धविद्याधराणां मुनि-मनुज-पशूना दस्युभिस्त्रासितानाम्‌।
नृपतिगृहगतानां व्याधिभिः पीडितानां त्वमसि शरणमेका देवि दुर्गे प्रसीद॥९॥

इदं स्तोत्रं मया प्रोक्तमापदुद्धारहेतुकम्‌।
त्रिसन्ध्यमेकसन्ध्यं वा पठनाद् घोर संकटात्‌॥१०॥

मुच्यते नाऽत्र सन्देहो भुवि स्वर्गे रसातले।
स सर्वं वा श्लोकमेकं वा यः पठेद् भक्तिमान सदा॥११॥

स सर्वं दुष्कृतं त्यक्त्वा प्राप्नोति परमं पदम्‌।
पठनादस्य देवेशि किं न सिध्यति भूतले॥१२॥

स्तवराजमिमं देवि संक्षेपात्‌कथितं मया॥१३॥

॥ इति श्री दुर्गापदुद्वारस्तवराजः सम्पूर्णः ॥

भूमि परीक्षण और वास्तु भाग: ५

Bhoomi Parikshan aur vastu bhaga :5 , Bhumi Pareekshan or Vastu Part: 5

भूमि परीक्षण और वास्तु भाग: ५

एक हाथ गहरा गड्ढा खोदकर उसे चारों और अच्छी तरह लीप - पोतकर स्वच्छ करदें । फिर एक मिट्टी के चौ मुखे दिप में घी भरकर उसमें चारों दिशाओंकी ओर मुख करके चार बत्तियाँ जला दें और उसी गड्ढेमें दिये को रख दें ।
यदि पूर्व दिशाकी बत्ती अधिक समयतक जलती रहे तो वह भूमि ब्राह्मणके लिये शुभ होती हैं।
यदि उत्तर दिशाकी बत्ती अधिक समयतक जलती रहे तो वह भूमि क्षत्रियके लिये शुभ होती हैं।
यदि पश्चिम दिशाकी बत्ती अधिक समयतक जलती रहे तो वह भूमि वैश्यके लिये शुभ होती हैं।
यदि दक्षिण दिशाकी बत्ती अधिक समयतक जलती रहे तो वह भूमि शूद्रके लिये शुभ होती हैं।