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बुधवार, जून 30, 2010

वाल्मीकि कृत गणेश स्तवन

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गणेश स्तवन

श्री आदि कवि वाल्मीकि उवाच

चतु:षष्टिकोटयाख्यविद्याप्रदं त्वां सुराचार्यविद्याप्रदानापदानम्।
कठाभीष्टविद्यार्पकं दन्तयुग्मं कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि॥

स्वनाथं प्रधानं महाविघन्नाथं निजेच्छाविसृष्टाण्डवृन्देशनाथम्।
प्रभुं दक्षिणास्यस्य विद्याप्रदं त्वां कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि॥

विभो व्यासशिष्यादिविद्याविशिष्टप्रियानेकविद्याप्रदातारमाद्यम्।
महाशाक्तदीक्षागुरुं श्रेष्ठदं त्वां कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि॥

विधात्रे त्रयीमुख्यवेदांश्च योगं महाविष्णवे चागमाञ्ा् शंकराय।
दिशन्तं च सूर्याय विद्यारहस्यं कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि॥

महाबुद्धिपुत्राय चैकं पुराणं दिशन्तं गजास्यस्य माहात्म्ययुक्तम्।
निजज्ञानशक्त्या समेतं पुराणं कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि॥

त्रयीशीर्षसारं रुचानेकमारं रमाबुद्धिदारं परं ब्रह्मपारम्।
सुरस्तोमकायं गणौघाधिनाथं कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि॥

चिदानन्दरूपं मुनिध्येयरूपं गुणातीतमीशं सुरेशं गणेशम्।
धरानन्दलोकादिवासप्रियं त्वां कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि॥

अनेकप्रतारं सुरक्ताब्जहारं परं निर्गुणं विश्वसद्ब्रह्मरूपम्।
महावाक्यसंदोहतात्पर्यमूर्ति कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि॥

इदं ये तु कव्यष्टकं भक्तियुक्तास्त्रिसंध्यं पठन्ते गजास्यं स्मरन्त:।
कवित्वं सुवाक्यार्थमत्यद्भुतं ते लभन्ते प्रसादाद् गणेशस्य मुक्तिम्॥

॥इति श्री वाल्मीकि कृत श्रीगणेश स्तोत्र संपूर्णम्॥


फल: जो व्यक्ति श्रद्धा भाव से तीनोकाल सुबह संध्या एवं रात्री के समय वाल्मीकि कृत श्रीगणेश का स्तवन करते उन्हे सभी भओतिक सुखो कि प्राप्ति होकर उसे मोक्ष को प्राप्त कर लेता हैं, एसा शास्रोक्त वचन हैं ।

मंगलवार, जून 29, 2010

संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत 30-Jun-2010

संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत 30-Jun-2010

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ऋणमोचक मंगल स्तोत्र

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ऋणमोचक मंगल स्तोत्र

श्रीगणेशाय नमः

मङ्गलो भूमिपुत्रश्च ऋणहर्ता धनप्रदः।
स्थिरासनो महाकयः सर्वकर्मविरोधकः ॥१॥

लोहितो लोहिताक्षश्च सामगानां कृपाकरः।
धरात्मजः कुजो भौमो भूतिदो भूमिनन्दनः॥२॥

अङ्गारको यमश्चैव सर्वरोगापहारकः।
व्रुष्टेः कर्ताऽपहर्ता च सर्वकामफलप्रदः॥३॥

एतानि कुजनामनि नित्यं यः श्रद्धया पठेत्।
ऋणं न जायते तस्य धनं शीघ्रमवाप्नुयात्॥४॥

धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम्।
कुमारं शक्तिहस्तं च मङ्गलं प्रणमाम्यहम्॥५॥

स्तोत्रमङ्गारकस्यैतत्पठनीयं सदा नृभिः।
न तेषां भौमजा पीडा स्वल्पाऽपि भवति क्वचित्॥६॥

अङ्गारक महाभाग भगवन्भक्तवत्सल।
त्वां नमामि ममाशेषमृणमाशु विनाशय॥७॥

ऋणरोगादिदारिद्रयं ये चान्ये ह्यपमृत्यवः।
भयक्लेशमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा॥८॥

अतिवक्त्र दुरारार्ध्य भोगमुक्त जितात्मनः।
तुष्टो ददासि साम्राज्यं रुश्टो हरसि तत्ख्शणात्॥९॥

विरिंचिशक्रविष्णूनां मनुष्याणां तु का कथा।
तेन त्वं सर्वसत्त्वेन ग्रहराजो महाबलः॥१०॥

पुत्रान्देहि धनं देहि त्वामस्मि शरणं गतः।
ऋणदारिद्रयदुःखेन शत्रूणां च भयात्ततः॥११॥

एभिर्द्वादशभिः श्लोकैर्यः स्तौति च धरासुतम्।
महतिं श्रियमाप्नोति ह्यपरो धनदो युवा॥१२॥

॥इति श्री ऋणमोचक मङ्गलस्तोत्रम् सम्पूर्नम्॥

सोमवार, जून 28, 2010

व्रत (उपवास) एवं ज्योतिष

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उपवास एवं ज्योतिष

पोस्ट सौजन्य: स्वस्तिक

व्यक्ति कि जन्म कुंडली के अनुसार जो ग्रह पीडा कारक या के दुःख दायी हो, तो ग्रहो से संबंधित वार के अनुशार व्रत करना चाहिये। ग्रह से संबंधित वार का व्रत करने से ग्रह अपना अशुभ प्रभाव दूर कर शुभ प्रभाव देने हेतु मजबूर जाते हैं, जैसे दुष्ट से दुष्ट व्यक्ति को यदि हम दो हाथ जोड कर प्रणाम कर दे तो उसका भी हृदय परिवर्तन हो जाता हैं। थिक उसी प्रकार यदि प्रतिकूल ग्रहो के दुष्ट प्रभाव को उस ग्रह कि पूजा-अर्चना, मंत्र जाप या व्रत उपवास करने से ग्रहो के भी अशुभ प्रभाव स्वतः दूर हो जाते हैं।

रविवार का व्रत
रविवार का व्रत सूर्य ग्रह को प्रसन्न करने हेतु किया जाता हैं। सूर्य का व्रत करने से हडीया मजबूत होती हैं, पेट संबंधी सभी रोगो का विनाश होता हैं, आंखो कि रोशनी बढती हैं, व्यक्ति का साहर एवं क्षमता में वृद्धि होकर उसका यश चारों और बढता हैं। रविवार का व्रत करने से सूर्य के प्रभाव में आने वाले सभी व्यवसाय एवं वस्तुओ से लाभ प्राप्त होता हैं।

सोमवार का व्रत
सोमवार का व्रत चंद्र ग्रह को प्रसन्न करने हेतु किया जाता हैं। जिस्से व्यक्तिने फेफडे के रोग, दमा, मानसिक रोग से मुक्ति मलती हैं।
व्यक्तिनी चंलता दूर होती हैं, नशे कि लत छुडाने हेतु लाभ प्राप्त होता हैं, स्त्रीओं में मासिक रक्त-स्त्राव कि पीडा कम होती हैं। सोमवार का व्रत शिव को प्रिय हैं इस लिये अविवाहित लडकीयो कें १६ सोमवार का व्रत करने से उत्तम वर कि प्राप्ति होती हैं। सोमवार का व्रत करने से चंद्र के प्रभाव में आने वाले सभी व्यवसाय एवं वस्तुओ से लाभ प्राप्त होता हैं।

मंगलवार का व्रत
मंगल का व्रत मंगल ग्रह को प्रसन्न करने हेतु किया जाता हैं। जिस का व्यक्ति स्वभाव उग्र या हिंसात्मक, अधिक गुस्से वाला हो उनके मंगलवार का व्रत करने से मन शांत होता हैं। मंगलवार का व्रत गणपतीजी, हनुमानजी को प्रसन्न करने हेतु भी किया जाता हैं। मंगलवार का व्रत करने से भूत-प्रेत बाधा दूर होती हैं, व्यक्ति के सभी संकट दूर होजाते हैं। अविवाहित लडको के व्रत करने से
उसकि बुद्धि और बल का विकास होता हैं। मंगलवार का व्रत करने से मंगल के प्रभाव में आने वाले सभी व्यवसाय एवं वस्तुओ से लाभ प्राप्त होता हैं।

बुधवार का व्रत
बुधवार का व्रत बुध ग्रह को प्रसन्न करने हेतु किया जाता हैं। बुधवार का व्रत व्यवसाय करने वालो हेतु लाभदायी होता हैं। बुधवार का व्रत गणेश जी एवं मां दुर्गा कि कृपा प्राप्ति हेतु किया जाता हैं। इस व्रत के करने से बुद्धिका विकास होता हैं, इस दिन व्रत के साथ दुर्गा सप्तशतीका पाठ करने से मनोवांछित फल कि प्राप्ति होती हैं। बुधवार का व्रत करने से बुध के प्रभाव में आने वाले सभी व्यवसाय एवं वस्तुओ से लाभ प्राप्त होता हैं।

गुरुवार का व्रत
गुरुवार का व्रत बृहस्पति ग्रह को प्रसन्न करने हेतु किया जाता हैं। गुरुवार का व्रत करने से धन - संपत्ति कि प्राप्ति होती हैं घर में सुख-शांति और समृद्धि बढती हैं। लडकी के विवाह में आरही बाधाएं दूर होती हैं। गुरुवार का व्रत करने से बृहस्पति के प्रभाव में आने वाले सभी व्यवसाय एवं वस्तुओ से लाभ प्राप्त होता हैं।

शुक्रवार का व्रत
शुक्रवार का व्रत शुक्र ग्रह को प्रसन्न करने हेतु किया जाता हैं। शुक्रवार का व्रत करने से व्यक्ति के सौंदर्य में वृद्धि होती हैं, गुप्त रोगोमें लाभ होता हैं, भोग-विलास कि चिज वस्तु में वृद्धि होती हैं। शुक्रवार का व्रत करने से शुक्र के प्रभाव में आने वाले सभी व्यवसाय एवं वस्तुओ से लाभ प्राप्त होता हैं।

शनिवार का व्रत
शनिवार का व्रत शनि ग्रह को प्रसन्न करने हेतु किया जाता हैं। शनिवार का व्रत करने से संपत्ति में वृद्धि होती हैं, खोया हुवा धन पूनः प्राप्त होता हैं। शिक्षा प्राप्ति में आरहे बाधा विघ्न दूर होते हैं। पेटा और पैर के रोग में लाभ प्राप्त होता हैं, पूराने रोग भी थिक होजाते हैं। शनिवार का व्रत करने से शनि के प्रभाव में आने वाले सभी व्यवसाय एवं वस्तुओ से लाभ प्राप्त होता हैं।

इस प्रकार ग्रहो के शुभ प्राभाव से निश्चिंत लाभ प्राप्त हो्ता हैं इस में जरा भी संदेह नहीं हैं, पूर्ण आस्था एवं विश्वास से किया गया व्रत अधिक प्रभाव शाली होते हैं।

  • व्रत के दिन सुबह या रात्री एक समय सात्विक भोजन करें।
  • कुछ व्रत में फलाहार कर सकते हैं एवं दूध-चाय-कोफी पीसकते हैं।
  • ब्रह्मचर्य का पालन करें।
  • नशे से परहेज करें।

चित्र एवं वास्तु भाग:१

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चित्र एवं वास्तु भाग:१

भवनो में चित्रों का उपयोग अति प्राचीन काल से चला आरहा हैं। वास्तु शास्त्र के विद्वानो ने भवन में चित्रो कि सही दिशा का चुनाव करने से शुभा फलो कि प्राप्ति होती हैं, कई चित्रो में एवं अशुभा प्रभावो को कम करने में भी समर्थ होते हैं। वास्तु शास्त्र के प्राचीन ग्रंथों में चित्रों के माध्यम से वास्तु के अनेक दोषों को दूर करने हेतु उपाय बताये गये हैं।

उचित जानकारी के अभाव में लोग अपनी इच्छा के अनुसार कहीं भी किसी भी प्रकर के चित्र लगा लेते हैं, जिस्से विपरीत परिणाम प्राप्त होते देखे गये है।

भवन को वास्तु दोषों से मुक्त रखने हेतु कौन से चित्र कहां लगाने से शुभ-अशुभा होता हैं उसे जान ना अति आवश्यक हैं।


  • धन प्राप्ति हेतु भवन में लक्ष्मी कि से खुले पैरो वाला फोटो लगाये।

  • जिनका मन हमेशा अशांत रहता हो उसे उत्तर पूर्व में बगुले का चित्र लगाना चाहिए, जो ध्यान की मुद्रा में हो।

  • भवन में देवी-देवता के चित्र लगान शुभा होता हैं।

  • देवी-देवता के पासमें अपने स्वर्गीय परिजनों के फोटो नहीं लगाने चाहिए।

  • स्वर्गीय परिजनों के फोटो लगाने हेतु पूर्व या उत्तर दिशा की दीवारों का प्रयोग करना चाहिए।

  • अध्ययन कक्ष में सरस्वती माता एवं गुरुजनों के चित्र लगाना शुभ होता हैं।

  • गुरु-संतो-ऋषि मुनि के आदर्शवादी चित्र आपकी बेठक से पीछे लगाने से साहस कि वृद्धि होती हैं।

  • पर्वत के चित्र भी आपकी पीठ के पीछे लगाये।

  • जल, जलाशय, झरने का चित्र उत्तर पूर्व में शुभ होता हैं।

  • परिवार में कलह होने पर सभी सदस्यो कि एक साथ खिची हुइ फोटो नैऋत्य कोण में लगाये।

  • भवन में युद्ध, लड़ाई-झगड़े, हिंसक पशु-पक्षियों के चित्र व मूर्तियाँ नहीं रखना चाहिए, इस्से भवन में क्लेश बढता हैं।

  • भयानक चित्र , पेंटिंग या मूर्ति आदि नहीं लगाने से छोटे बच्चे भय ग्रस्त होते देखा गया हैं।

शनिवार, जून 19, 2010

धनवंतरि स्तोत्रम्

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॥ धनवंतरि स्तोत्रम्॥

ॐ शंखम् चक्रम् जलौकाम् दधदमृतघटम् चारुदोर्भिश्चतु्र्भिः
सूक्ष्मस्वच्छातिहृद्यांशुक परिविलसन्मौलिमंभोजनेत्रम्।

कालाम्भोदोज्ज्वलान्गम् कटितटविलस्च्चारुपीताम्बराढयम्
वन्दे धनवंतरिं तं निखिलगदवनप्रौढदावाग्निलीलम्॥

॥इति श्री धनवंतरि स्तोत्रम् संपूर्णम्॥

हस्त रेखा एवं रोग (भाग:2)

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हस्त रेखा एवं रोग (भाग:2)

* हृदय रेख पर काला बिंदु होना, या आयु रेखा पर नीला धब्बा हो, या हाथ में स्वास्थ्य रेखाटूटी-फूटी हो, या मस्तक रेखा के मध्य में काला धब्बा हो तो व्यक्ति को ज्वर से पीड़ा होती हैं।
* यदि चंद्र पर्वत पर गहरी धारियां हों, या मस्तक रेखा धुमावदार या टूटी हुई हो, या मस्तक रेखा पर क्रॉस का चिन्ह हो, या मस्तक रेखा का शनि पर्वत के निकट अंत होती हों , तो व्यक्ति की मानसिक बीमारी से ग्रसित होता हैं।
* मस्तक रेखा शनि पर्वत के नीचे टूट कर खत्म होती हो, चंद्र पर्वत पर टेढी-मेढी रेखाए हों, हृदय रेखा जंजीर के समान हों कर अस्पष्ट हो, तो व्यक्ति
को पथरी रोग होने कि संभावना रहती हैं।
* यदि हथेली कि रेखाएं पीली हो, या गुरु पर्वत अधिक उन्नत हुआ हो, या नख लंबे एवं काले हो,मस्तक रेखा और शनि पर्वत के नीचे कि रेखा जंजीरनुमा हो, तीनों मुख्य रेखाओं को कोई रेखा काट रही हो, तो व्यक्ति को क्षय रोग एवं फेफड़ों से संबंधित रोग हो जाता हैं।
* शनि पर्वत पर जाली हो, या कोई रेखा आयु रेखा एवं मस्तक रेखा को काटकर जाली को छुती हो, या चंद्रमा पर्वत पर क्रॉस हो, चंद्रमा पर्वत पर अस्त-व्यस्त रेखाएं हों, स्वास्थ्य रेख धुमती हुइ शुक्र पर्वत से जुडती हुइ कोई रेखा आयु रेखा को काटकर मस्तक रेखा को काटती हुई हृदय रेखा से मिलती हो, तो व्यक्ति मधुमेह से पीड़ित रहता हैं।
* यदि हथेली अधिक पतली एवं लंबी हो, अंगुलियां भी अधिक लचीली हो, या हथेली से थोडि बड़ी हो, या मस्तक रेखा तथा हृदय रेखा के बीच में अधिक अंतर हो, ग्रह पर्वतों की मुडने वाली ऊर्ध्वागामी रेखाएं अधिक हो, तो व्यक्ति मस्तक ज्वर से पीड़ित होता हैं।
* यदि चंद्र पर्वत काफी उन्नत हो चंद्र पर्वत के नीचे का भाग पर काफी रेखाएं हों, आयु रेखा को छुती हुई कोई रेखा चंद्र पर्वत की ओर जा रही हो, तो व्यक्ति व्यक्ति को मूत्र संबंधी बीमारियां पीड़ित करती हैं।