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मंगलवार, नवंबर 02, 2010

शास्त्रोक्त विधान से दीपावली पूजन

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शास्त्रोक्त विधान से दीपावली पूजन



हमारे धर्मशास्त्रो में कार्तिक मास में दीप दान का विशेष महत्व बताया गया है। दीपावली में दीपदान का विशेष महत्व बताया हैं।

श्रीपुष्करपुराण के अनुशार:

तुलायाम् तिलतैलेन सायंकाले समागते।
आकाशदीपम् यो दद्यान्मासमेकम् हरिम् प्रति।
महतीम् श्रियमाप्नोति रूपसौभाग्यसम्पदम्।।
अर्थात: जो व्यक्ति कार्तिक मास में संध्या समय भगवान श्री हरि(विष्णु) के नाम से तिल के तेल का दीप जलाता हैं, उसे अतुल लक्ष्मी, रूप, सौभाग्य और संपत्ति कि प्राप्ति होती हैं।

देवर्षि नारदजी के अनुसार दीपावली पर्व द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी, अमावस्या और प्रतिपदा तक 5 दिन मनाना चाहिए। दीपावली पर्व प्रत्येक दिन अलग-अलग प्रकार कि पूजा का विधान हैं।

गोवत्स द्वादशी
कार्तिक मास कि द्वादशी को गोवत्स द्वादशी के दिन दूध देने वाली गाय को उसके बछड़े सहित स्नान कराकर वस्त्र ओढ़ा कर गले में पुष्पमाला पहनाना, उसके सींग मँढ़ाना, चंदन का तिलक करना तथा ताँबे के पात्र में सुगन्ध, अक्षत, पुष्प, तिल और जल का मिश्रण कर निम्न मंत्र से गौ के चरणों का प्रक्षालन करना चाहिए।

क्षीरोदार्णवसम्भूते सुरासुरनमस्कृते।
सर्वदेवमये मातर्गृहाणार्घ्यं नमो नमः।।
अर्थात: समुद्र-मंथन के समय क्षीर सागर से उत्पन्न देवताओं तथा दानवों द्वारा नमस्कार कि गई सर्व देवस्वरूपिणी माता। आपको बार-बार नमस्कार हैं। आप मेरे द्वारा दिये हुए इस अर्घ्य को स्वीकार करो।

इस दिन पूजन के बाद गाय को उड़द के बड़े खिला कर प्रार्थना करने का विधान हैं।

सुरभि त्वं जगन्मातर्देवी विष्णुपदे स्थिता।
सर्वदेवमये ग्रासं मया दत्तमिमं ग्रस।।
ततः सर्वमये देवि सर्वदेवैरलङ्कृते।
मातर्ममाभिलाषितं सफलं कुरु नन्दिनी।।
अर्थात: हे जगदम्बे, हे स्वर्ग वासिनी देवी, हे सर्व देवमयी, मेरे द्वारा अर्पित इस अन्न को ग्रहण करो। हे समस्त देवताओं द्वारा अलंकृत माता नंदिनी मेरा मनोरथ पूर्ण करो।
इसके बाद रात्र के समय इष्ट, ब्राह्मण, गौ, घर के वृद्धजनों कि आरती उतारने का विधान हैं।

त्रयोदशी (धनतेरस)
कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को धनतेरस के रुप में मनाया जाता हैं। शास्त्रो में उल्लेख मिलता हैं कि भगवान धन्वंतरी ने समुद्र-मंथन के दौरान प्रकट होकर दुःखी जनों के रोगनिवारणार्थ आयुर्वेद का प्राकट्य किया था।

धनतेरस के दिन संध्या के समय घर और आंगन में हाथ में जलता हुआ दीप लेकर निचे दिये मंत्र से भगवान यमराज कि प्रसन्नता हेतु इस मंत्र के साथ दीपदान करने का विधान हैं।

मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन श्यामया सह।
त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम।।
अर्थात: त्रयोदशी के दिन दीपदान से पाश और दंडधारी मृत्यु तथा काल के अधिपति देव भगवान यम, देवी श्यामासहित मुझ पर प्रसन्न हों।

नरक चतुर्दशी
कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को नरक चतुर्दशी के रुप में मनाया जाता हैं। इस दिन चतुर्मुखी दीप का दान करने का विधान हैं। मान्यता हैं, दीप दान से नरक भय से मुक्ति मिलती हैं! नरक चतुर्दशी कि रात को एक चार मुख (चार बत्ती) वाला दीप जलाकर निचे दिये मंत्र से दीपदान करने का विधान हैं।

दत्तो दीपश्चतुर्दश्यां नरकप्रीतये मया।
चतुर्वर्तिसमायुक्तः सर्वपापापनुत्तये।।
आज चतुर्दशी के दिन नरक के अभिमानी देवता कि प्रसन्नता के लिए एवं समस्त पापों के विनाश के लिए मैं चार मुख वाला चौमुखा दीप अर्पित करता हूँ।

दीपावली
कार्तिक अमावस्या को दीपावली के रुप में मनाया जाता हैं। इस दिन प्रातः उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर जप-तप करने से अन्य दिनों की अपेक्षा कई गुना अधिक लाभ प्राप्त होता हैं। दीपावली के दिन पहले से ही स्वच्छ किये गृह को सुसज्जित कर भगवान नारायण के साथ मां लक्ष्मी कि मूर्ति या चित्र कि स्थापना कर उनका विधिवत पूजन करने का विधान हैं।

प्रतिपदा
कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को अन्नकूट दिवस के रुप में मनाया जाता हैं। इस दिन गाय को सजाकर, उनकी पूजा करके निचे दिये मंत्र उच्चारण करने का विधान हैं।

लक्ष्मीर्या लोकपालानां धेनुरूपेण संस्थिता।
घृतं वहति यज्ञार्थे मम पापं व्यपोहतु।।
अर्थात: धेनुरूप में स्थित जो लोकपालों कि साक्षात लक्ष्मी हैं तथा जो यज्ञ के लिए घी देती हैं, वह गाय माता मेरे पापों का नाश करे।

मां लक्ष्मी के चमत्कार कि महिमा

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मां लक्ष्मी के चमत्कार कि महिमा


       पौराणिक काल कि बात हैं, एक दिन लक्ष्मी जी से उनकी बड़ी बहन ज्येष्ठा ने कहा, लक्ष्मी बहुत दिनों से एक बात मेरे मस्तिष्क में उठ रही हैं। मैं सोच रही हूँ कि तुमसे पूछूं या नहीं। लक्ष्मीजी ने कहा ऐसी क्या बात हैं बहन? मन में जो कुछ भी प्रश्न हैं, आप निःसंकोच पूछो। वैसे भी बुद्धिमानी उसी में हैं कि किसी भी बात को मन में न रखकर उसका समाधान कर लेना।

       ज्येष्ठा ने कहा मैं अक्सर यही सोचती रहती हूँ कि हम दोनों सगी बहनें हैं, सुंदरता में हम दोनों बराबर हैं, फिर भी लोग तुम्हारा आदर करते हैं और मैं जहाँ भी जाती हूँ, वहाँ के माहोल में उदासी छा जाती हैं। बार-बार मुझे लोगों कि घृणा और क्रोध का शिकार होना पड़ता हैं। ऐसा क्यों?

       लक्ष्मी जी ने हँसते हुवे कहा, सगी बहन या समान सुंदरता होने से ही आदर नहीं मिलता। आदर पाने के लिये हमें स्वयं भी कुछ करना चाहिए। लोग मेरा आदर इसलिए करते हैं क्योंकि मैं उनके घर में प्रवेश करते ही सुख के साधन जुटा देती हूँ। इस लिये सम्पत्ति और वैभव से आनंदित होकर लोग मेरा उपकार मानते हैं, मेरी पूजा करते हैं। और तुम जिसके यहाँ भी जाती हो, उसको ग़रीबी, रोग और कष्ट प्राप्त होता हैं। इसी लिये लोग तुमसे घृणा करते हैं। कोई आदर नहीं करता। आदर पाने के लिये दूसरों को सुख पहुँचाओ। ज्येष्ठा को लक्ष्मी जी कि यह बात चुभ गई। ज्येष्ठा को लगा कि लक्ष्मी को अपनी महिमा का अभिमान हो गया हैं।

       ज्येष्ठाने क्रोध से तिलमिलाते हुवे कर कहा, लक्ष्मी तुम मुझसे छोटी हो अवस्था में भी और प्रभाव हर बात तुम मुझसे छोटी हो। तुमहें मुझे उपदेश देने कि आवश्यकता नहीं हैं। यदि तुम्हें अपने वैभव का अहंकार हैं तो मेरे पास भी अपना एक प्रभाव हैं। मैं जब अपनी पर आ जाऊँ तो तुम्हारे करोड़पति भक्त को भी पल भर में भिखारी बना सकती हूँ। ज्येष्ठा कि बात पर लक्ष्मी जी को हँसी आ गई और कहने लगीं, बहन तुम बड़ी हो, इसलिए कुछ भी कह लो। लेकिन जहाँ तक प्रभाव कि बात है, मैं तुमसे कम नहीं हूँ। जिसको तुम भिखारी बनाओगी, उसे मैं दूसरे दिन भिखारी से फिर राजा बना दूँगी। मेरी महिमा का अभी तुम्हें पता ही कहाँ हैं। और तुम्हें भी मेरी महिमा का पता ही नहीं है। जिसकी तुम सहायता करोगी, उसे मैं दाने−दाने के लिए भी मोहताज कर दूँगी। देखो बहन दाने-दाने के लिए तो तुम उसे मोहताज कर सकती हो जिससे मैं रूठ जाऊँ। जिसके सिर पर मेरा हाथ न हो, उसका तुम कुछ भी बिगाड़ सकती हो। परंतु जिस पर मेरी कृपा द्रष्टि हैं, जिसे मेंरा वरदान प्राप्त हैं उसका कोई बाल भी बांका नहीं कर सकता।

       अगर तुम अपना प्रभाव दिखाने को इतनी ही उतावली हो रही हो तो कल अपना प्रभाव दिखाकर देख लेना। बोलो, कहाँ चलें? दूर क्यों जाएँ, पास ही अनुराधापुर गांव हैं। उसमें एक ब्राह्मण रहता हैं दीनानाथ। वह रोज मंदिर में पूजा करने जाता हैं और मेरा परम भक्त हैं। उसी पर हमें अपनी−अपनी महिमा दिखानी हैं। लक्ष्मी जी कि इस बात पर ज्येष्ठा को ताव आ गया। उन्होंने हाथ झटककर कहा, ठीक है, ठीक हैं। देख लेना, कल तुम्हारा सिर कैसें झुक जाएगा। कहकर वह चली गई।

       लक्ष्मी जी वहीं खड़ी बहन ज्येष्ठा के क्रोध ओर अहंकार पर मुस्कराती रहीं। दूसरे दिन दोनों बहनें अनुराधापुर के विष्णु मंदिर में वेश बदल कर पहुँचीं। साधारण स्त्रियों कि तरह वे दोनों मंदिर के द्वार पर बैठ गईं। स्थानिय लोगों ने दोनों को देखा अवश्य, किंतु किसी ने उनकी ओर कोई ख़ास ध्यान नहीं दिया। ध्यान देने वाली कोई ख़ास बात भी नहीं थी । वह मंदिर था और वहाँ हर रोज दीन दुःखी आते−जाते रहते थे।

       थोड़ी देर बाद वहाँ दीनानाथ पंडित आया। दोनों बहनों कि नजरें उस पर जम गईं। पूजा करके जब दीनानाथ लौटने लगा तो ज्येष्ठा ने कहा, लक्ष्मी वह तुम्हारा भक्त आ रहा हैं। बन पड़े तो उसकी कोई सहायता करो। हाँ, करती हूँ। कहकर लक्ष्मी जी ने एक पोला बांस दीनानाथ के रास्ते में रख दिया जिसमें सोने कि मोहरें भरी हुई थीं। ज्येष्ठा ने बांस को छूकर कहा, अब तुम मेरा प्रभाव भी देख लो। पूजा करके लौट रहे दीनानाथ ने रास्ते में पड़ा हुआ वह बांस का टुकड़ा उठा लिया। उसने विचार किया कि वह किसी काम आ जाएगा। घर में सौ ज़रूरतें होती हैं।

       अभी वह पंडित कुछ ही आगे बढ़ा था कि उसे रास्ते में एक लड़का मिला। लड़के ने पहले दीनानाथ पंडित से राम−राम कि, फिर बड़ी ही नम्रता से बोला, पंडित जी मुझे अपनी चारपाई के लिए बिल्कुल ऐसा ही बांस चाहिए। दादा जी ने यह कहकर भेजा हैं कि जाओ, बाज़ार से ले आओ। ऐसा बांस पंडित जी कहाँ मिलेगा? दीनानाथ ने कहा, मैंने इसे मोल देकर नहीं लिया। रास्ते में पड़ा था; सो उठा लाया। लो, तुम्हें ज़रूरत है तो तुम ही रख लो। वैसे बाज़ार में एक रुपये से कम का नहीं हैं। लड़के ने चवन्नी देते हुए कहा, मगर मेरे पास तो यह चवन्नी ही हैं, पंडित जी। अभी तो आप इसे ही रखिए, बाकी बारह आने शाम को दे जाऊँगा। पंडित जी खुश थे कि बिना किसी महेनत के एक रुपया कमा लिया। दीनानाथ पंडित ने चवन्नी लेकर बांस लड़के को दे दिया और वह चवन्नी अपनी डोलची में रख दी।

       मंदिर के पास खड़ी दोनों बहनें यह सारी लीला देख रही थीं। ज्येष्ठा ने कहा, लक्ष्मी देखा तुमने? तुम्हारी इतनी सारी सोने कि मोहरें मात्र एक चवन्नी में बिक गईं। और आगे देखती जाओं यह चवन्नी भी तुम्हारे भक्त के पास नहीं रूकेगी। चलो, उसके पीछे चलते हैं और देखते हैं कि क्या होता हैं। दोनों बहने दीनानाथ के पीछे−पीछे चलने लगीं। एक तालाब के पास दीनानाथ ने डोलची रख दी और कमल के फूल तोड़ने लगा। उसी बीच एक चरवाहे का लड़का आया और डोलची में रखी हुई चवन्नी लेकर भाग गया। दीनानाथ पंडित को पता ही नहीं चला। फूल तोड़कर वह अपने घर जाने लगा। इतने में वही लड़का आता हुआ दिखाई दिया जिसने चवन्नी देकर उससे बांस ले लिया था। करीब आकर वह बोला, पंडित जी यह बांस तो बहुत वज़नी हैं। दादाजी ने कहा हैं कि कोई हल्का बांस चाहिए। इसकी चारपाई ठीक न होगी। यह लीजिए, आप अपना बांस वापस ले लीजिए। कहकर उसने बांस पंडित जी के हवाले कर दिया।

       दीनानाथ ने बांस ले लिया। चवन्नी वापस करने के लिये डोलची में हाथ डाला तो देखा चवन्नी तो डोलची में हैं नहीं। तब उसने कहा, बेटा, चवन्नी तो कहीं गिर गई। तुम मेरे साथ घर चलो, वहाँ से तुम्हें दूसरी दे दूँगा। इस समय मेरे पास एक भी पैसा नहीं हैं। पंडित जी तब आप जाइए। मैं शाम को आकर घर से ले लूँगा। यह कहकर लड़का अपनी राह लौट गया। बांस फिर से पंडित जी के ही पास आ गया और लक्ष्मी जी हौले से मुस्कराईं। उनको इस प्रकार मुस्कराते देखकर ज्येष्ठा मन ही मन में जल उठीं। वह बोलीं, 'अभी तो खेल शुरू ही हुआ हैं।

       देखती चलो मैं इसे कैसे नाच नचाती हूँ। दीनानाथ पंडित बेचारा इन सब बातों से बेख़बर अपनी ही धुन में आगे बढ़ा चला जा रहा था। आगे चलकर गाँव का एक अहीर मिला। उसने दीनानाथ पंडित को चवन्नी वापस करते हुए बताया, पंडित जी मेरा लड़का आपकी डोलची से यह चवन्नी उठा लाया था। वह बड़ा ही शैतान हैं। मैं आपकी वही चवन्नी लौटाने आया हूँ। हो सके तो उस शैतान को माफ कर दीजिएगा। दीनानाथ पंडित ने आशीर्वाद देकर चवन्नी ले ली और प्रसन्न मन से उस लड़के को पुकारने लगा जो शाम को घर आकर चवन्नी लेने कि बात कहकर लौटा जा रहा था। आवाज़ सुनकर लड़का लौट आया। अपनी चवन्नी वापस पाकर वह भी प्रसन्न हो गया। दीनानाथ पंडित निश्चिंत मन से घर कि ओर बढ़ने लगा। उसके एक हाथ में पूजा कि डोलची थी और दूसरे में वही लम्बा बांस।

       राह चलते दीनानाथ पंडित सोच रहा था, यह बांस तो काफ़ी वज़नी हैं। वज़नी हैं तो मजबूत भी होगा, क्योंकि ठोस हैं। इसे दरवाजे के छप्पर में लगा दूँगा। ज्येष्ठा को उसके विचार पर क्रोध आ गया। लक्ष्मी जी के प्रभाव से दीनानाथ पंडित को लाभ होता देख वह मन ही मन बुरी तरह जली जा रहीं थीं। जब उन्होंने देखा कि पंडित का घर क़रीब आ गया है तो कोई उपाय न पाकर उन्होंने दीनानाथ को मारने डालने का विचार किया। उन्होंने कहा, लक्ष्मी धन−सम्पत्ति तो मैं छीन ही लेती हूँ, अब तुम्हारे भक्त के प्राण भी ले लूँगी। देखो, वह किस तरह तड़प−तड़प कर मरता हैं।

       इतना कहकर ज्येष्ठा तुरंत साँप बनकर दीनानाथ कि ओर दौड़ पड़ीं। लक्ष्मी जी को तनिक भी घबराहट नहीं हुई। वह उसी तरह खड़ी मुस्कराती रहीं। साँप देख कर सहसा दीनानाथ पंडित चौंक पड़ा। साँप फन उठाए उसकी ओर झपट रहा था। प्राण तो सभी को प्रिय होते हैं। उपाय रहते कोई अपने को संकट में नहीं पड़ने देता। दीनानाथ ने पगडंडी वाला रास्ता छोड़ दिया और एक ओर को भागने लगा। लेकिन साँप बनी ज्येष्ठा उसे भला कहाँ छोड़ने वाली थीं। वह तो उस ग़रीब के प्राणों कि प्यासी हो चुकी थीं। वह भी दीनानाथ के आगे−पीछे, दाएं−बाएं बराबर दौड़ती ही रहीं। दीनानाथ घबरा गया। उसने हाथ जोड़कर कहा, नाग देवता मैंने तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ा। शांति से अपनी राह लौट जाओ। आखिर क्यों मुझ ग़रीब के पीछे पड़े हो? व्यर्थ में किसी ब्राह्मण को सताना अच्छी बात नहीं है।

       लेकिन वह नाग तो ज्येष्ठा का रूप था, जो दीनानाथ पंडित को किसी भी तरह डसना चाहता था। प्रार्थना पर कुछ भी ध्यान न देकर वह साँप एक बारगी फुफकारता हुआ झपट पड़ा। जब दीनानाथ ने देख लिया कि बिना संघर्ष किए अब जान नहीं बचेगी तो उसने प्राण−रक्षा के लिए भरपूर जोर लगाकर वही बांस साँप के ऊपर दे मारा। धरती से टकराते ही बांस के दो टुकड़े हो गए और उसके भीतर भरी हुईं सोने कि मोहरें खन−खनाकर बिखर गईं, जैसे लक्ष्मी हँस रही हो।

       दीनानाथ पंडित के मुँह से हैरतपूर्ण चीख−सी निकली, अरे थोड़ी देर के लिए वह ठगा−सा खड़ा आँखें फाड़े, उन मोहरों कि ओर देखता रहा। एक पल के लिए तो वह साँप को भूल ही गया था। कुछ पल बाद जैसे उसे झटका−सा लगा। साँप का ध्यान आते ही उसने उसकी ओर गरदन घुमायी, तो देखा कि बांस कि चोट से साँप कि कमर टूट गयी हैं और वह लहूलुहान अवस्था में झाड़ी कि ओर भागा जा रहा हैं।

       दूसरे क्षण वह मोहरों पर लोट गया और कहने लगा, तेरी जय हो लक्ष्मी माता! जीवन−भर का दारिद्रय आज दूर हो गया। तेरी महिमा कौन जान सकता हैं। चलो, अब घर में बैठकर तुम्हारी पूजा−आरती करूँगा। और फिर जल्दी−जल्दी उसने सारी मोहरें अंगोछे में बाँध दीं और लम्बे−लम्बे कदमों से घर कि ओर चल दिया।

       पीछे एक पेड़ कि छाया में खड़ी लक्ष्मी अपनी बहन ज्येष्ठा से मुस्कराकर पूछ रहीं थीं, कहो बहन सच बताना, बड़प्पन कि थाह मिली कि अभी नहीं? बड़प्पन किसी को कुछ देने में ही है, उससे छीनने में नहीं।

       ज्येष्ठा ने कोई उत्तर नहीं दिया। वह चुपचाप उदास खड़ी रहीं। लक्ष्मी जी ने उनका हाथ पकड़कर कहा, फिर भी, हम दोनों बहनें हैं। जहाँ रहेंगीं, साथ ही रहेंगीं। आओ, अब चलें।

सोमवार, नवंबर 01, 2010

माहालक्ष्मी कि उत्पत्ति कैसे हुई?

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माहालक्ष्मी कि उत्पत्ति
धर्म शास्त्रो के मत अनुशार लक्ष्मी कि उत्पत्ति के विषय में अनेक कथाएं प्रचलित हैं। उन प्राचीन कथाओं में समुद्र मंथन के दौरान मां महालक्ष्मी कि उत्पत्ति मानी जाती हैं। विभिन्न ग्रंथो में लक्ष्मी समुद्र मंथन कि कथाओं में अंतर देखने को मिलता हैं। परंतु मूलतः सब कथाओं में अंतर होने के उपरांत भी अधिकतर समान हैं।

प्रजापत्य कल्प के अनुशार:
भगवान ब्रह्मा ने रुद्र रूप को ही स्वयंभु मनु और स्त्री रूप में सतरूपा को प्रकट किया और उसके बाद प्रियव्रत उत्तानपाद, प्रसूति और आकूति नाम कि संतानों को जन्म दिया। फिर आकूति का विवाह रुचि से और प्रसूति का विवाह दक्ष से किया गया। दक्ष ने प्रसूति से 24 कन्याओं को जन्म दिया। इसके नाम श्रद्धा, लक्ष्मी, पुष्टि, धुति, तुष्टि, मेधा, क्रिया, बुद्धि, लज्जा, वपु, शान्ति, ऋद्धि, और कीर्ति इत्यादी हैं।

विष्णु पुराण के अनुशार:
एक बार घूमते हुए दुर्वासा ने अपरूपा विद्याधरी के पास एक बहुत सुन्दर माला देखी। वह गन्धित माला थी। ऋषि ने उस माला को अपने जटाओं पर धारण करने के लिए मांगा और प्राप्त कर लिया। दुर्वासा ने सोचा कि यह माला प्रेम के कारण प्राप्त कर वे कामातुर हो उठे। अपने काम के आवेग को रोकने के लिए इधर-उधर घूमते-घूमते स्वर्ग लोक पहुंचे। वहां उन्होंने अपने सिर से माला हटाकर इन्द्र को दे दी। इन्द्र ने उस माला को ऐरावत के गले में डाल दिया और ऐरावत से वह माला धरती पर गिर गई और पैरों से कुचली गई। दुर्वासा ने जब यह देखा कि उसकी माला की यह दुर्गति हुई तो वह क्रोधित हुए और उन्होंने इन्द्र को श्रीहीन होने का शाप दिया। जब इन्द्र ने यह सुना तो भयभीत होकर ऋषि के पास आये पर उनका शाप लौट नहीं सकता था। इसी शाप के कारण असुरों ने इन्द्र और देवताओं को स्वर्ग से बाहर निकाल दिया। देवता ब्रह्मा जी की शरण में गये और उनसे अपने कष्ट के विषय में कहा।

        ब्रह्मा जी देवताओं को लेकर विष्णु के पास गये और उनसे सारी बात कही तब विष्णु ने देवताओं को दानव से सुलह करके समुद्र मंथन करने की सलाह दी और स्वयं भी सहायता का आश्वासन दिया। उन्होंने बताया कि समुद्र मंथन से उन्हें लक्ķ्मी और अमृत पुनः प्राप्त होगा। अमृत पीकर वे अजर और अमर हो जाएंगे। देवताओं ने भगवान विष्णु की बात सुनकर समुद्र मंथन का आयोजन किया। उन्होंने अनेक औषधियां एकत्रित की और समुद्र में डाली। फिर मंथन किया गया।

        मंथन के लिये जाते हुए समुद्र के चारों ओर बड़े जोर की आवाज उठ रही थी। इस बार के मंथन से देवकार्यों की सिद्धि के लिये साक्षात् सुरभि कामधेनु प्रकट हुईं। उन्हें काले, श्वेत, पीले, हरे तथा लाल रंग की सैकड़ों गौएँ घेरे हुए थीं। उस समय ऋषियों ने बड़े हर्ष में भरकर देवताओं और दैत्यों से कामधेनु के लिये याचन की और कहा आप सब लोग मिलकर भिन्न-भिन्न गोत्रवाले ब्राह्मणों को कामधेनु सहित इन सम्पूर्ण गौओं का दान अवश्य करें। ऋषियों के याचना करने पर देवताओं और दैत्यों ने भगवान् शंकर की प्रसन्नता के लिये वे सब गौएँ दान कर दीं तथा यज्ञ कर्मों में भली-भाँति मन को लगाने वाले उन परम मंगलमय महात्मा ऋषियों ने उन गौओं का दान स्वीकार किया। तत्पश्चात सब लोग बड़े जोश में आकर क्षीरसागर को मथने लगे। तब समुद्र से कल्पवृक्ष, पारिजात, आम का वृक्ष और सन्तान- ये चार दिव्य वृक्ष प्रकट हुए।

        उन सबको एकत्र रखकर देवताओं ने पुन: बड़े वेग से समुद्र मंथन आरम्भ किया। इस बार के मंथन से रत्नों में सबसे उत्तम रत्न कौस्तुभ प्रकट हुआ, जो सूर्यमण्डल के समान परम कान्तिमान था। वह अपने प्रकाश से तीनों लोकों को प्रकाशित कर रहा था। देवताओं ने चिंतामणि को आगे रखकर कौस्तुभ का दर्शन किया और उसे भगवान विष्णु की सेवा में भेंट कर दिया। तदनन्तर, चिन्तामणि को मध्य में रखकर देवताओं और दैत्यों ने पुन: समुद्र को मथना आरम्भ किया। वे सभी बल में बढ़े-चढ़े थे और बार-बार गर्जना कर रहे थे। अब की बार उसे मथे जाते हुए समुद्र से उच्चै:श्रवा नामक अश्व प्रकट हुआ। वह समस्त अश्वजाति में एक अद्भुत रत्न था। उसके बाद गज जाति में रत्न भूत ऐरावत प्रकट हुआ। उसके साथ श्वेतवर्ण के चौसठ हाथी और थे। ऐरावत के चार दाँत बाहर निकले हुए थे और मस्तक से मद की धारा बह रही थी। इन सबको भी मध्य में स्थापित करके वे सब पुन: समुद्र मथने लगे। उस समय उस समुद्र से मदिरा, भाँग, काकड़ासिंगी, लहसुन, गाजर, अत्यधिक उन्मादकारक धतूर तथा पुष्कर आदि बहुत-सी वस्तुएँ प्रकट हुईं। इन सबको भी समुद्र के किनारे एक स्थान पर रख दिया गया। तत्पश्चात वे श्रेष्ठ देवता और दानव पुन: पहले की ही भाँति समुद्र-मंथन करने लगे। अब की बार समुद्र से सम्पूर्ण दशों दिशाओं में दिव्य प्रकाश व्याप्त हो गया उस दिव्य प्रकाश से देवी महालक्ष्मी प्रकट हुईं। इसलिए लक्ष्मी को समुद्र की पुत्री के रूप में जाना जाता है।

        महालक्ष्मी ने देवता, दानव, मानव सम्पूर्ण प्राणियों की ओर दृष्टिपात किया। माता महालक्ष्मी की कृपा-दृष्टि पाकर सम्पूर्ण देवता उसी समय पुनः श्रीसम्पन्न हो गये। वे तत्काल राज्याधिकारी के शुभ लक्षणों से सम्पन्न दिखायी देने लगे।

लक्ष्मी की उत्पत्ति
सृष्टि रचना के विषय में ज्ञान प्राप्त करते हुवे भीष्म ने पुलस्त्य ऋषि से प्रश्न किया ऋषि श्रेष्ठ, लक्ष्मी की उत्पत्ति के विषय में आप मुझे विस्तार से बताइए। क्योंकि इस विषय में कथा अनेक हैं। यह सुनकर पुलस्त्य ऋषि बोले कि महर्षि भृगु कि पत्नी ख्याति के गर्भ से एक त्रिलोकसुन्दरी कन्या उत्पन्न हुई। वह समस्त शुभ लक्षणों से सुशोभित थी। इसलिए उसका नाम लक्ष्मी रखा गया।

धन के देवता कुबेर के जन्म कि कथा

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धन के देवता कुबेर के जन्म कि कथा

लेख साभार: गुरुत्व ज्योतिष पत्रिका (नवम्बर – 2010)
http://gurutvajyotish.blogspot.com/

       पूर्व जन्म में कुबेर गुणनिधि नामक वेदज्ञ ब्राह्मण थे। गुणनिधि को शास्त्रों का पूर्ण न था और गुणनिधि प्रतिदिन देव वंदन, पितृ पूजा, अतिथि सेवा नियमित रुपसे करते थे। गुणनिधि सभी प्राणियों के प्रति दया, सेवा एवं मैत्री का भाव रखते थे। गुणनिधि बड़े धर्मात्मा थे, परंतु कुसंगति में पड़कर धीरे-धीरे मति भ्रम के कारण गुणनिधि के सारें अच्छे गुण अवगुणों में परिवर्तित गयें। गुणनिधि के इस अवगुणों से उनके पिता अज्ञात थे परंतु उनकी माता इस सभी कार्यो से भली प्रकार से परिचित थी परंतु उन्होने पुत्र मोहके कारण यह बात अपने पति को नहीं बताई। जिसके फल स्वरुप गुणनिधि ने अपनी सारी पैतृक संपति का नाश करदिया।

       एक दिन किसी प्रकार गुणनिधि के पिता को उनके दुष्कर्मो का पता चला और उन्होंने गुणनिधि कि माता से अपनी संपति व गुणनिधि के बारे में जानकारी चाही। गुणनिधि पिता के क्रोध एवं भय से घर छोड़कर भाग कर वन में चले गए। वन में इधर-उधर भटकने के बाद गुणनिधि ने संध्या समय एक शिव मंदिर देखा। उस दिन शिवरात्री थी इसलिये शिव मंदिर में शिव भक्त शिवरात्रि का पूजन और प्रसाद के साथ शिव पूजा का विधि-विधान कर रहे थे।

       घर से भागने एवं वन में भटकने के कारण गुणनिधि पूरे दिन भूख-प्यास से परेशान था, इस कारण प्रसाद आदि खाद्य वस्तुओं को देखने पर गुणनिधि कि भूख और ज्यादा बढ़ गई। गुणनिधि वहीं पास में छुपकर पूजन देखते रहे एवं सोच रहे थे कि इन लोगों को नींद आने पर प्रसाद चुराकर अपनी भूख शांत करलूंगा। रात्रि काल में शिव भक्तों के सो जाने के पश्चयात गुणनिधि ने एक कपड़े कि बती जलाकर फल-पकवानों को लेकर भाग ही रहेथे कि उनका पैर एक सोए हुए पुजारी के पैर से टकरा गया और वह पुजारी चोर-चोर चिल्लाने लगे। चोर-चोर कि आवाज सुनकर अन्य पास में सोयें हुवे सभी सेवक जाग गए एवं गुणनिधि पर बाण छोड़ा, जिससे उसी समय गुणनिधि के प्राण निकल गए।

       यमदूत जब गुणनिधि को लेकर जाने लगे तो भगवान शंकर कि आज्ञा से उनके गणों ने वहां पहुंचकर गुणनिधि यमदूतों से छीन कर गुणनिधि को शिवलोक में ले आये। भगवान शंकर ने गुणनिधि के उसदिन भूखे रहने को व्रत-उपवास, रात्रि जागरण, पूजा-दर्शन तथा प्रकाश के निमित जलाए गए वस्त्र कि बती को आरती मानकर उस पर प्रसन्न हो गए और उसे अपना शिवत्व प्रदान किया। पुन: जन्म धारण कर गुणनिधि कुबेर के नाम से प्रसिद्ध हुए।

       शास्त्र पुराणों में कुबेर के पिता विश्रवा एवं पितामह प्रजापति पुलस्त्य होने का उल्लेख मिलता हैं। कुबेर कि माता भारद्वाज ऋषि कि कन्या इड़विड़ा हैं, कुबेर कि सौतेली माता का नाम केशिनी हैं। रावण, कुंभकरण और विभीषण कुबेर के सौतेले भाई हैं। कुबेर कि पत्नी का नाम भद्रा हैं। कुबेर के दो पुत्र नाल कुबेर और मणीग्रीव। कैलाश पर स्थित अलकापुरी राज्य में निवास करते हैं।

       कुबेर कि सभा में सर्वोच्च रत्न जडि़त सिंहासन पर महाराज कुबेर विराजते हैं। रंभा, उर्वशी, मेनका, मिश्र केशी आदि अप्सराएं किन्नर, यज्ञ और गंधर्वगण तथा ब्रह्मर्षि देवर्षि तथा ऋषिगण उनकी सभा में विराजते हैं।

       कुबेर कि सेवा में यक्ष एवं राक्षस हर समय उपस्थित रहते हैं। कुबेर ने नर्मदा के कावेरी तट पर सौ वर्षो तक घोर तपस्या कि जिससे प्रसन्न होकर शिवजी ने कुबेर को यक्षों का अधिश्वर बना दिया

       कुबेर ने जिस स्थान पर तपस्या कि उस स्थान का नाम कुबेर तीर्थ पड़ा, जहां कुबेर को अनेक वरदान प्राप्त हुवे। रूद्र के साथ मित्रता, धन का स्वामित्व, दिक्पालत्व एवं नल कुबेर नामक पुत्र आदि वर प्राप्त होते ही धन एवं नव निधियों का स्वामीत्व कुबेर को प्राप्त हुवां। उस स्थान पर आकर मरूद्गणों ने कुबेर का अभिषेक किया, पुष्पक विमान भेट देकर कुबेर को यक्षों का राजा बना दिया। उस स्थान पर राज्यश्री के रूप में साक्षात महालक्ष्मी नित्य वास करती हैं। राजाधिराज धनाध्यक्ष कुबेर अपनी सभा में बैठकर अपने वैभव(धन) एवं निधियों का दान करते हैं।

       इसलिए कुबेर कि पूजा-अर्चना से उनकी प्रसन्नता प्राप्त कर मनुष्य वैभव(धन) प्राप्त कर लेता हैं। धन त्रयोदशी एवं दीपावली पर कुबेर विशेष पूजा-अर्चना कि जाती हैं जो शीघ्र फल प्रादान करने वाली मानी जाती हैं।

धनतेरस कि अनोखी कथा

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धनतेरस कि अनोखी कथा


          भारत में धनतेरस पर्व से संबंघित लोकप्रिय कथा प्रचलित है। पुराने जमाने में एक राजा हिम हुए। उनके यहां पुत्र हुआ, तो उसकी जन्म-कुंडली बनवाई गई। ज्योतिषियों ने कुंडली का विश्लेषण कर के कहा कि राजकुमार अपनी शादी के चौथे दिन सांप के काटने से मर जाएगा। इस पर राजा चिंतित रहने लगे। राजकुमार की उम्र 16 साल की हुई, तो उसकी शादी एक सुंदर, सुशील और समझदार राजकुमारी से कर दी गई। राजकुमारी मां लक्ष्मी की परम भक्त थीं। राजकुमारी को भी अपने पति पर आने वाली विपत्ति के विषय में पता चल गया।

          राजकुमारी काफी दृढ़ इच्छाशक्ति वाली थीं। उसने चौथे दिन का इंतजार पूरी तैयारी के साथ किया। जिस रास्ते से सांप के आने की आशंका थी, वहां सोने-चांदी के सिक्के और हीरे-जवाहरात आदि बिछा दिए गए। पूरे घर को रोशनी से जगमगा दिया गया। कोई भी कोना खाली नहीं छोड़ा गया अर्थात सांप के कमरे में आने के लिए कोई रास्ता अंधेरा नहीं छोड़ा गया। इतना ही नहीं, राजकुमारी ने अपने पति को जगाए रखने के लिए उसे पहले कहानी सुनाई और फिर गीत गाने लगी।

          इसी दौरान जब मृत्यु के देवता यमराज ने सांप का रूप धारण करके कमरे में प्रवेश करने की कोशिश की, तो रोशनी की वजह से उनकी आंखें चुंधिया गईं। इस कारण सांप दूसरा रास्ता खोजने लगा और रेंगते हुए उस जगह पहुंच गया, जहां सोने तथा चांदी के सिक्के रखे हुए थे। डसने का मौका न मिलता देख, विषधर भी वहीं कुंडली लगाकर बैठ गया और राजकुमारी के गाने सुनने लगा। इसी बीच सूर्य देव ने दस्तक दी, यानी सुबह हो गई। यम देवता वापस जा चुके थे। इस तरह राजकुमारी ने अपनी पति को मौत के पंजे में पहुंचने से पहले ही छुड़ा लिया। यह घटना जिस दिन घटी थी, वह धनतेरस का दिन था, इसलिए इस दिन को 'यमदीपदान' भी कहते हैं।
इस दिन पूरी रात घर के बाहर दीप जलाकर रखते हैं ताकि मृत्यु के देवता यमराज को घर में प्रवेश करने से रोका जा सके।

विष्णु का धनवंतरि अवतार
धनतेरस से संबंधित लोगों के बीच एक और कथा भी प्रचलित हैं। जब सुर और असुर मिलकर सागर मंथन कर रहे थे, तो कई बहुमूल्य चीजों की प्राप्ति हुई। इनमें सबसे अहम था अमृत। यह अमृत कलश धनवंतरि के हाथों में था। धनवंतरि को यूं तो देवताओं का वैद्य कहते हैं, पर उनमें भगवान विष्णु का अंश भी मौजूद था। धनतेरस के दिन धनवंतरि की उत्पत्ति होने के कारण हम धनतेरस मनाते हैं।

दीपावली में लक्ष्मी के साथ गणेश आराधना क्यों ?

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दीपावली में लक्ष्मी के साथ गणेश आराधना क्यों ?


         भारतीय धार्मिक एवं संस्कृतिक मान्यता के अनुशार लक्ष्मीजी के साथ श्री विष्णु कि पूजा होनी चाहिए। किन्तुं दीपावली पूजन में मां लक्ष्मी के साथ गणेशजी कि पूजा क्यों कि जाती हैं।

         धन कि देवी लक्ष्मी हैं जो धन, समृद्धि एवं ऐश्वर्य प्रदान करती हैं। लेकिन बिना बुद्धि के धन, समृद्धि एवं ऐश्वर्य व्यर्थ हैं। इसके पीछे मुख्य कारण हैं की भगवान श्री गणेश समस्त विघ्नों को टालने वाले हैं, दया एवं कृपा के महासागर हैं, एवं तीनो लोक के कल्याण हेतु भगवान गणपति सब प्रकार से योग्य हैं। समस्त विघ्न बाधाओं को दूर करने वाले गणेश विनायक हैं। अतः बुद्धि कि प्राप्ति के लिये बुद्धि और विवेक के अधिपति देवता गणेश का पूजन करने का विधान हैं। गणेशजी समस्त सिद्धियों को देने वाले देवता माना गया है। क्योकि समस्त सिद्धियाँ भगवान गणेश में वास करती हैं। इस लिये लक्ष्मी जी के साथ में श्री गणेश जी कि आराधना आवश्यक हैं।

ब्रह्मवैवर्तपुराण में उल्लेख हैं
भगवान् विष्णु ने स्वयं गणेश जी को वरदान दिया कि
सर्वाग्रे तव पूजा मया दत्ता सुरोत्तम।
सर्वपूज्यश्च योगीन्द्रो भव वत्सेत्युवाच तम्।।
(गणपतिखं. 13 2)
भावार्थ:सुरश्रेष्ठ! मैंने सबसे पहले तुम्हारी पूजा कि है, अतः वत्स! तुम सर्वपूज्य तथा योगीन्द्र हो जाओ।

ब्रह्मवैवर्त पुराण में ही एक अन्य प्रसंगान्तर्गत माता पार्वती ने गणेश महिमा का बखान करते हुए परशुराम से कहा
त्वद्विधं लक्षकोटिं हन्तुं शक्तो गणेश्वरः।
जितेन्द्रियाणां प्रवरो नहि हन्ति मक्षिकाम्।।
तेजसा कृष्णतुल्योऽयं कृष्णांश्च गणेश्वरः।
देवाश्चान्ये कृष्णकलाः पूजास्य पुरतस्ततः।।
(ब्रह्मवैवर्तपु., गणपतिख., 44 26-27)
भावार्थ: जितेन्द्रिय पुरूषों में श्रेष्ठ गणेश तुममें जैसे लाखों-करोड़ों जन्तुओं को मार डालने की शक्ति है; परन्तु तुमने मक्खी पर भी हाथ नहीं उठाया। श्रीकृष्ण के अंश से उत्पन्न हुआ वह गणेश तेज में श्रीकृष्ण के ही समान है। अन्य देवता श्रीकृष्ण की कलाएँ हैं। इसीसे इसकी अग्रपूजा होती है।

लिंगपुराण के अनुसार (105 15-27)
शिव ने अपने पुत्र को आशीर्वाद दिया कि जो तुम्हारी पूजा किये बिना पूजा पाठ, अनुष्ठान इत्यादि शुभ कर्मों का अनुष्ठान करेगा, उसका मंगल भी अमंगल में परिणत हो जायेगा। जो लोग फल की कामना से ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र अथवा अन्य देवताओं की भी पूजा करेंगे, किन्तु तुम्हारी पूजा नहीं करेंगे, उन्हें तुम विघ्नों द्वारा बाधा पहुँचाओगे।

         इस सभी कारण से मां लक्ष्मी के साथ में गणेशजी का पूजन करने का विधान हैं। लक्ष्मी प्राप्ति के बाद में उसे स्थिर करने हेतु बुद्धि कि आवश्यकता होती हैं। लक्ष्मी के साथ गणेश के पूजन से संबंध में अनेकों कथाएं प्रचलित हैं। कुछ लोकप्रिय कथाएं यहा प्रस्तुत हैं।

शास्त्रोक्त कथा:
विष्णु धाम में भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी विराजमान होकर आपस में वार्तालाप कर रहे थे, बात-बात में अहं के कारण लक्ष्मी जी बोल उठे कि मैं सभी लोक में सब से अधिक पूजनीय एवं सबसे श्रेष्ठ हुं। लक्ष्मी जी को इस प्रकार अपनी अहं से स्वयं कि प्रशंसा करते देख भगवान विष्णु जी को अच्छा नहीं लगा। उनका अहं दूर करने के लिए उन्होंने कहा तुम सर्व संपन होते हुए भी आज तक माँ का सुख प्राप्त नहीं कर पाई। इस बात को सुन कर लक्ष्मीजी को बहुत दुःखी होगई और वो अपनी पीड़ा सुनांने के लिये माता पार्वती के पास गयीं और उनसे विनती कि वो अपने पुत्र कार्तिकेय और गणेशजी में से किसे एक पुत्र को उनहें दत्तक पुत्र के रूप में प्रदान कर दें। लक्ष्मीजी कि पीडा देख कर पार्वतीजी ने गणेश जी को लक्ष्मीजी को दत्तक पुत्र के रूप में देने का स्वीकार कर लिया। पार्वतीजी से गणेश जी को पुत्र के रूप पाकर लक्ष्मीजी नें हर्षित होते हुवे कहां मैं अपनी सभी सिद्धियां, सुख अपने पुत्र गणेश जी को प्रदान करती हूँ। इस के साथ साथ में मेरी पुत्री के समान प्रिय रिध्धि और सिध्धि जो के ब्रह्मा जी कि पुत्रियाँ हैं , उनसे गणेशजी का विवाह करने का वचन देती हूँ यदि सम्पूर्ण त्रिलोकों में जो व्यक्ति , श्री गणेश जी कि पूजा नहीं करेगा वरन उनकी निंदा करेगा मैं उनसे कोसों दूर रहूँगी जब भी मेरी पूजा होगी उसके साथ हिं गणेश कि भी पूजा अवश्य होगी।

अन्य कथा:
प्राचिन काल में एक संन्यासी ने देवी लक्ष्मी को कड़ी तपस्या द्वारा प्रसन्न कर के समस्त सुख सुविधा से जीवन व्यतीत करने का वरदान मांगा। लक्ष्मी तथास्तु कह कर अंतर्ध्यान हो गयीं। वरदान प्राप्ति के बाद संन्यासी वहां के राजदरबार में जाकर राजा के पास पहुंच कर एक झटके में राजमुकुट को नीचे गिरा दिया। संन्यासी का यह कार्य देख कर राजा का चेहरा गुस्से से लाल हो उठा। उसी क्षण राजा ने देखा कि राजमुकुट से एक बिच्छू बाहर निकल रहा हैं। यह देख राजा के मन में संन्यासी के प्रति श्रद्धा भाव जाग गया, राजाने संन्यासी को अपना मंत्री बनने के लिए आग्रह किया। संन्यासी तो यही चाहते थे। संन्यासी ने तुरंत राजा का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। संन्यासी के परामर्श से राज कार्य सुचारु रुप से चलने लगा।

         एक दिन संन्यासी ने राजदरबार में उपस्थित सबको बाहर निकल जाने को कहा। संन्यासी पर विश्वास रखते हुए राजा एवं अन्य सब दरबारी वहां से निकल कर एक मैदान में पहुंच गये और तब राजमहल कि दीवारें ढह गयीं। यह द्रश्य देख कर राजा कि आस्था संन्यासी पर ऐसी जमी, कि समस्त राजकार्य उस संन्यासी के आदेश पर होने लगा। समय के साथ संन्यासी को स्वयं पर घमंड होने लगा। राजमहल के भीतर भगवान गणेश कि एक मूर्ति स्थापित थी। घमंड में चूर संन्यासी ने सेवकों को गणेश मूर्ति वहां से हटाने का आदेश दिया, क्योंकि उसके विचार में वह मूर्ति राजपरिसर कि शोभा बिगाड़ रही थी।

         अगले दिन संन्यासी ने राजा से कहा कि वह फौरन अपनी पोशाक उतार दें, क्योंकि उसमें नाग है। राजा को संन्यासी पर अगाध विश्वास था। इसलिए, दरबारियों कि परवाह करते हुए, उन्होनें अपनी पोशाक उतार दी, परंतु उसमें से कोई नाग नहीं निकला। यह देख कर राजा को संन्यासी पर बहुत गुस्सा आया और उसे कैद में रखने का आदेश दे दिया।

         कैदियों कि भांति कुछ दिन गुजारने पर संन्यासी का घमंड उतर गया। संन्यासीने पुनः देवी लक्ष्मी कि आराधना शुरू कर दी। लक्ष्मी ने स्वप्न में उसे दर्शन देते हुए बताया, कि तुम्हारी एसी दुर्दशा गणेश जी का अपमान करने कि वजह से हुई हैं। गणेश बुद्धि के देवता हैं, अतः उनको नाराज करने से तुम्हारी बुद्धि भ्रष्ट हो गयी हैं। अब संन्यासी ने पश्चाताप करते हुए गणेश भगवान से क्षमा मांगी। अगले दिन राजा ने स्वयं वहां पहुंच कर उसे मुक्त कर दिया और पुनः मंत्री पद पर बहाल कर दिया। संन्यासी ने गणेश कि मूर्ति को पूर्व स्थान पर स्थापित करवा दिया तथा उनके साथ-साथ लक्ष्मी कि पूजा शुरू कि, ताकि धन एवं बुद्धि दोनों साथ-साथ रहें। माना जाता हैं, तभी से दीवाली पर देवी लक्ष्मी के साथ गणेश जी का पूजन करने कि प्रथा आरंभ हुई।