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शनिवार, मई 29, 2010

वास्तु एवं वेध दोष (भाग:२)

Vastu evm vedha dosha (bhag:2)


वास्तु एवं वेध दोष (भाग:२)

द्वार वेध

भवन के मुख्य द्वार के सामने कोई वृक्ष हो तो वृक्ष वेध कहलाता हैं। वृक्ष वेध होने से भवन स्वामी को अनचाहे अपमान एवं बदनामी होना पडता हैं।

भवन के मुख्य द्वार के सामने कोई खंभा या स्तम्भ हो तो स्तम्भ वेध कहलाता हैं। स्तम्भ वेध होने से भवन मे निवास कर्ता के लिये पराजय, धनहानि, स्त्रीपीड़ा कारक होता हैं।

भवन के मुख्य द्वार के सामने कोइ अन्य भवन का द्वार या कोना होने से भी द्वार वेध माना जाता हैं। एसी स्थिति होने से भवन स्वामी को विभिन्न प्रकार के कष्टो से पीडित होने का संकेत हैं।

वेध दोष भवन कि ऊंचाई से दोगुनी ऊंचाई तक के क्षेत्र के भीतर होने से अधिक प्रभावी होता हैं, भवन कि ऊंचाई से दोगुनी ऊंचाई से दूर यदि वेधकारक वस्तु होने पर वेध दोष का प्रभाव कम होता जाता हैं।

मुख्य द्वार के सामने यदि कीचड़, नाली या जल निकास स्थान होने से निवास कर्ता को मानसिक कष्ट, अवसाद तथा धनका अभाव हैं।

मुख्य द्वार के सामने यदि हैंड पंप अथवा नल होने से रोग होने कि संभावना होती हैं।

मुख्य द्वार के सामने शिवालय या मंदिर होना अशुभ मानागया हैं, एसी स्थिती होने से निवास कर्ता के कुल कि हानि होती हैं।

मुख्य द्वार के सामने पालतू पशु बांधने हेतु खूंटा रखने को शास्त्र में कील वेध दोष बताया गया हैं।

गुरुवार, मई 27, 2010

गृह प्रवेश एवं वास्तु (भाग:४)

Gruha pravesha evm vastu bhag:4, gruh arambha evm vastu part:4


गृह प्रवेश एवं वास्तु (भाग:४)

मास कि तिथि एवं गृह प्रवेश

द्वितीया, तृतीया, पंचमी, षठी, सप्तमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी एवं पूर्णिमा - इन तिथियों में गृह प्रवेश करने से शुभ फल प्राप्त होता हैं।

प्रतिपदा को गृह प्रवेश करने से घर में दरिद्रता आति हैं।
चतुर्थी को गृह प्रवेश करने से धन का नाश होता हैं।
अष्टमी को गृह प्रवेश करने से उच्चाटन होता हैं।
नवमी को गृह प्रवेश करने से धन-धान्य का नाश होकर अस्त्र शस्त्र से आघात होने कि संभावना अधिक होती हैं।
चतुर्दशी को गृह प्रवेश करने से संतान एवं घर में स्त्री वर्ग का नाश होता हैं।
अमावस्या को गृह प्रवेश करने से सरकार से परेशानी प्राप्त होती हैं।

साप्ताहिक वार एवं गृह प्रवेश

सोम, बुध, गुरु, शुक्र एवं शनि इन वारों मे गृह प्रवेश करने से उत्तम फल कि प्राप्ति होती हैं ।

रविवार और मंगलवार को गृह प्रवेश या भूमि खोदनेका कार्य करने से अनिष्ट होने कि संभावना अधिक होती हैं।

गृहारम्भके समय कठोर वचन बोलना, थूकना और छींकना अशुभ है ।

विश्वंभरी स्तुति

Visvambhari Stuti, Viswambhari Stuti
विश्वंभरी स्तुति

पोस्ट सौजन्य: स्वस्तिक, स्वस्तिक सोफ्टेक इन्डिया
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विश्वंभरी अखिल विश्वतणी जनेता।
विद्या धरी वदनमां वसजो विधाता॥
दुर्बुद्धि दुर करी सद्दबुद्धि आपो।
माम् पाहि ॐ भगवती भव दुःख कापो ॥१॥

भूलो पडि भवरने भटकुं भवानी।
सुझे नहि लगीर कोइ दिशा जवानी॥
भासे भयंकर वळी मनना उतापो।
माम् पाहि ॐ भगवती भव दुःख कापो ॥२॥

आ रंकने उगरवा नथी कोइ आरो।
जन्मांध छु जननी हु ग्रही हाथ तारो॥
ना शुं सुणो भगवती शिशुना विलापो।
माम् पाहि ॐ भगवती भव दुःख कापो ॥३॥

मा कर्म जन्म कथनी करतां विचारु।
आ सृष्टिमां तुज विना नथी कोइ मारु॥
कोने कहुं कठण काळ तणो बळापो।
माम् पाहि ॐ भगवती भव दुःख कापो ॥४॥

हुं काम क्रोध मध मोह थकी भरेलो।
आडंबरे अति धणो मद्थी छकेलो॥
दोषो बधा दूर करी माफ पापो।
माम् पाहि ॐ भगवती भव दुःख कापो ॥५॥

ना शास्त्रना श्रवणनु पयःपान पीधु।
ना मंत्र के स्तुति कथा नथी काइ कीधु॥
श्रद्धा धरी नथी कर्या तव नाम जापो।
माम् पाहि ॐ भगवती भव दुःख कापो ॥६॥

रे रे भवानी बहु भूल थई ज मारी।
आ जिंदगी थई मने अतिशे अकारी॥
दोषो प्रजाळि सधळा तव छाप छापो।
माम् पाहि ॐ भगवती भव दुःख कापो ॥७॥

खाली न कोइ स्थळ छे विण आप धारो।
ब्रह्मांडमां अणु-अणु महीं वास तारो॥
शक्ति न माप गणवा अगणित मापो।
माम् पाहि ॐ भगवती भव दुःख कापो ॥८॥

पापो प्रपंच करवा बधी रीते पूरो।
खोटो खरो भगवती पण हुं तमारो॥
जाडयांधकार करी दूर सुबुद्धि स्थापो।
माम् पाहि ॐ भगवती भव दुःख कापो ॥९॥

शीखे सुणे रसिक छंद ज एक चित्ते।
तेना थकी त्रिविध ताप टळे खचिते॥
बुद्धि विशेष जगदंब तणा प्रतापो।
माम् पाहि ॐ भगवती भव दुःख कापो ॥१०॥

श्री सदगुरु शरनमां रहीने यजुं छुं।
रात्रि दिने भगवती तुजने भजुं छु॥
सदभक्त सेवक तणा परिताप चापो।
माम् पाहि ॐ भगवती भव दुःख कापो ॥११॥

अंतर विषे अधिक उर्मि थतां भवानी।
गाऊ स्तुति तव बळे नमीने मृडानी॥
संसारना सकळ रोग समूळ कापो।
माम् पाहि ॐ भगवती भव दुःख कापो ॥१२॥

सर्व रोगनाशक यंत्र

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सर्व रोगनाशक कवच

मनुष्य अपने जीवन के विभिन्न समय पर किसी ना किसी साध्य या असाध्य रोग से ग्रस्त होता हैं।

उचित उपचार से ज्यादातर साध्य रोगो से तो मुक्ति मिल जाती हैं, लेकिन कभी-कभी साध्य रोग होकर भी असाध्या होजाते हैं, या कोइ असाध्य रोग से ग्रसित होजाते हैं। हजारो लाखो रुपये खर्च करने पर भी अधिक लाभ प्राप्त नहीं हो पाता। डॉक्टर द्वारा दिजाने वाली दवाईया अल्प समय के लिये कारगर साबित होती हैं, एसि स्थिती में लाभा प्राप्ति हेरु व्यक्ति एक डॉक्टर से दूसरे डॉक्टर के चक्कर लगाने को बाध्य हो जाता हैं।
भारतीय ऋषीयोने अपने योग साधना के प्रताप से रोग शांति हेतु विभिन्न यंत्र, मंत्र एवं तंत्र उल्लेख अपने ग्रंथो में कर मानव जीवन को लाभ प्रदान करने का सार्थक प्रयास हजारो वर्ष पूर्व किया था।

बुद्धिजीवो के मत से जो व्यक्ति जीवनभर अपनी दिनचर्या पर नियम, संयम रख कर आहार ग्रहण करता हैं, एसे व्यक्ति को विभिन्न रोग से ग्रसित होने की संभावना कम होती हैं। लेकिन आज के युग में एसे व्यक्ति भी भयंकर रोग से ग्रस्त होते दिख जाते हैं।

क्योकि समग्र संसार काल के अधीन हैं। एवं मृत्यु निश्चित हैं जिसे विधाता के अलावा और कोई टाल नहीं सकता, लेकिन रोग होने कि स्थिती में व्यक्ति रोग दूर करने का प्रयास तो अवश्य कर सकता हैं।

इस लिये यंत्र मंत्र एवं तंत्र के कुशल जानकार द्वारा योग्य मार्गदर्शन लेकर व्यक्ति रोगो से मुक्ति पाने का या उसके प्रभावो को कम करने का प्रयास भी अवश्य कर सकता हैं।

ज्योतिष विद्या के कुशल जानकर काल पुरुषकी गणना कर अनेक रोगो के रहस्य को उजागर कर सकते हैं। ज्योतिष शास्त्र के माध्यम से रोग के मू्लको पकडने मे सहयोग मिलता हैं, जहा आधुनिक चिकित्सा शास्त्र अक्षम होजाता हैं वहा ज्योतिष शास्त्र द्वारा रोग के मूल को पकड कर उसका निदान करना लाभदायक एवं उपायोगी सिद्ध होता हैं।

हर व्यक्ति में लाल रंगकी कोशिकाए पाइ जाती हैं, जिसका विकास क्रम बद्ध तरीके से होता रहता हैं। जब इन कोशिकाओ के क्रम में परिवर्तन होता है या विखंडिन होता हैं तब व्यक्ति के शरीर में स्वास्थ्य संबंधी विकारो उत्पन्न होते हैं। एवं इन कोशिकाओ का संबंध नव ग्रहो के साथ होता हैं। जिस्से रोगो के होने के कारणा व्यक्तिके जन्मांग से दशा-महादशा एवं ग्रहो कि गोचर में स्थिती से प्राप्त होता हैं।

सर्व रोग निवारण कवच एवं महामृत्युंजय यंत्र के माध्यम से व्यक्ति के जन्मांग में स्थित कमजोर एवं पीडित ग्रहो के अशुभ प्रभाव को कम करने का कार्य सरलता पूर्वक किया जासकता हैं।

जेसे व्यक्ति को ब्रह्मांड कि उर्जा एवं पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल प्रभावीत कर्ता हैं ठिक उसी प्रकार कवच एवं यंत्र के माध्यम से ब्रह्मांड कि उर्जा के सकारात्मक प्रभाव से व्यक्ति को सकारात्मक उर्जा प्राप्त होती हैं जिस्से रोग के प्रभाव को कम कर रोग मुक्त करने हेतु सहायता मिलती हैं।

रोग निवारण हेतु महामृत्युंजय मंत्र एवं यंत्र का बडा महत्व हैं। जिस्से हिन्दू संस्कृति का प्रायः हर व्यक्ति परिचित हैं।

कवच के लाभ :
एसा शास्त्रोक्त वचन हैं जिस घर में महामृत्युंजय यंत्र स्थापित होता हैं वहा निवास कर्ता हो नाना प्रकार कि आधि-व्याधि-उपाधि से रक्षा होती हैं।

पूर्ण प्राण प्रतिष्ठित एवं पूर्ण चैतन्य युक्त सर्व रोग निवारण कवच किसी भी उम्र एवं जाति धर्म के लोग चाहे स्त्री हो या पुरुष धारण कर सकते हैं।

जन्मांगमें अनेक प्रकारके खराब योगो और खराब ग्रहो कि प्रतिकूलता से रोग उतपन्न होते हैं। कुछ रोग संक्रमण से होते हैं एवं कुछ रोग खान-पान कि अनियमितता और अशुद्धतासे उत्पन्न होते हैं। कवच एवं यंत्र द्वारा एसे अनेक प्रकार के खराब योगो को नष्ट कर, स्वास्थ्य लाभ और शारीरिक रक्षण प्राप्त करने हेतु सर्व रोगनाशक कवच एवं यंत्र सर्व उपयोगी होता हैं।

आज के भौतिकता वादी आधुनिक युगमे अनेक एसे रोग होते हैं, जिसका उपचार ओपरेशन और दवासे भी कठिन हो जाता हैं। कुछ रोग एसे होते हैं जिसे बताने में लोग हिचकिचाते हैं शरम अनुभव करते हैं एसे रोगो को रोकने हेतु एवं उसके उपचार हेतु सर्व रोगनाशक कवच एवं यंत्र लाभादायि सिद्ध होता हैं।

प्रत्येक व्यक्ति कि जेसे-जेसे आयु बढती हैं वैसे-वसै उसके शरीर कि ऊर्जा होती जाती हैं। जिसके साथ अनेक प्रकार के विकार पैदा होने लगते हैं एसी स्थिती में भी उपचार हेतु सर्व रोगनाशक कवच एवं यंत्र फलप्रद होता हैं।

जिस घर में पिता-पुत्र, माता-पुत्र, माता-पुत्री, या दो भाई एक हि नक्षत्रमे जन्म लेते हैं, तब उसकी माता के लिये अधिक कष्टदायक स्थिती होती हैं। उपचार हेतु महामृत्युंजय यंत्र फलप्रद होता हैं।

जिस व्यक्ति का जन्म परिधि योगमे होता हैं उन्हे होने वाले मृत्यु तुल्य कष्ट एवं होने वाले रोग, चिंता में उपचार हेतु सर्व रोगनाशक कवच एवं यंत्र शुभ फलप्रद होता हैं।


नोट:- पूर्ण प्राण प्रतिष्ठित एवं पूर्ण चैतन्य युक्त सर्व रोग निवारण कवच एवं यंत्र के बारे में अधिक जानकारी हेतु हम से संपर्क करें।


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त्रिखला दोष

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त्रिखला दोष


जिस दंपती को तीन लडकियों के पैदा होने के बाद लडका पैदा हो जाता हैं या तीन लडकों के पैदा होने बाद लडकी पैदा हो जाती हैं तो उसे त्रिखला दोष होता है।

जिस दंपती त्रिखला दोष से युक्त होते हैं उन्हें जीवन में काफी परेशानि एवं संकटो से ग्रस्त देखा गया हैं।

त्रिखला दोष से मुख्य समस्या पारिवारिक मनमुटाव पैदा होता हैं, जिस के फल स्वरुप पारिवार में अलगाव कि स्थिती उत्पन्न होती हैं। इस्के अतिरिक्त दंपती को अपने वैवाहिक जीवन में पूर्ण सुख प्राप्त नहीं हो पाता।

ज्यादातर बच्चों का स्वास्थ्य़ भी खराब रहता हैं जिस्से दंपती बच्चों भी सुख देने में असमर्थ होते हैं।

उपाय:- त्रिखला दोष कि शान्ति हेतु महामृत्युंजय मंत्र-यंत्र का प्रयोग करें।

बुधवार, मई 26, 2010

वास्तु एवं वेध दोष (भाग:१)

Vastu evm vedha dosha (bhag:1)


वास्तु एवं वेध दोष (भाग:१)

वास्तु ग्रंथों में अनेक प्रकार के वेध दोष बताए गए हैं। जिसमें से कुछ वेध दोष तो प्रत्यक्ष होते हैं, जो सरलता से दिखाई देते हैं। और कुछ सरलता से नहीं दिखते। दिखाई देने वाले वेधों की पहचान कर उसका निदान तो आसानी से किया जासकता हैं। लेकिन नहीं दिखाई देने वाले वेधों के दोषो कि पहचान कुशल वास्तु विशेषज्ञ हि कर सकते हैं।

वास्तु सिद्धान्त में वेध दोष एक महत्वपूर्ण दोष मानागया हैं, जिसकी उचित एवं शास्त्रीय जानकारी अति महत्वपूर्ण हैं।

भवन कि दिवारों के कोण एक समान होतो शुभ माना जाता हैं और यदि चारों कोनो में से एक भी छोडा या बडा होतो तो वेध दोष माना जाता हैं।

भवन कि दिवार के कोने चार से ज्यादा होना वेध दोष माना जाता हैं। इस प्रकार के वेध दोष वाले भवन मे निवास कर्ता को आकस्मीक दुर्घटना एवं शस्त्र पीड़ा होने कि संभावना अधिक होती हैं।

मार्ग वेध
यदि सड़क का रास्ता ठीक आपके मुख्या द्वार पर आकर समाप्त होता हओतो मार्ग वेध माना जाता हैं। क्योकि सड़क पर वाहन एवं अन्य जीव के गति करने से अक्सर ऊर्जा का क्षेत्र गतिशील रहता हैं, एवं उस मार्ग की गतिशीलता से उतपन्न होने वाली उर्जा मार्ग से गति करने वाले जीव एवं वाहन कि संख्या और सफ्तार पर निर्भर करती हैं। यदि उर्जा कि गति तिव्र हैं तो निवास स्थान पर उर्जा का आगमन होकर वहा कि सकारात्मक तरंगों को बाधित कर नकारात्मक प्रभाव उतपन्न करती हैं, जिस्से भवन में अशांति और बेचैनी हर समय बनी रहती हैं।

वेध दोष का प्रभाव भवन के मुख्य द्वार के खुले रहने के समय पर निर्भर करता हैं। यदि द्वार अधिक समय तक खुला रहता हैं, तो अधिक नकारात्मक उर्जा प्रवेश करेगे और कम समय के लिये खुल ने से वेह दोष का प्रभाव कम रहता हैं।

भवन के मुख्य द्वार एसा बनाये जिस्से द्वार बंध होने से वायु का आवागम न हो, द्वार बंध होने से वायु का आवागम होने से दोष का प्रभाव तीव्र होते देखे गये हैं।

द्वार दोष कम करने हेतु मुख्य द्वार पर शुभ चिन्ह वाले तोरण या कलश, स्वास्तिक इत्यादि बनवाने से भी यह द्वार दोष कम होता हैं, द्वार के चारों ओर चांदी का अखंडित तार बांध ने से भी मार्ग वेध का प्रभाव कम हो जाता हैं।

शुक्रवार, मई 21, 2010

गृह प्रवेश एवं वास्तु भाग:३

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गृह प्रवेश एवं वास्तु भाग:३

 

 
नक्षत्र एवं गृह प्रवेश
अश्विनी, रोहिणी, मृगशिरा, पुण्य, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाती, अनुराधा, ज्येष्ठा, मूल, उत्तराषाढा़, श्रवण, उत्तराभाद्रपद और रेवती नक्षत्र में गृह प्रवेश श्रेष्ठ माना गया हैं ।


  
मास एवं गृह प्रवेश
चैत्र, ज्येष्ठ, आषाढ़, भाद्रपद, आश्विन, पौष और माघ - मास मे गृह प्रवेश करना माना गया हैं।
वैशाख, श्रावण, कार्तिक, मार्गशीर्श और फाल्गुन - मास में गृह प्रवेश श्रेष्ठ माना गया हैं ।

 
मास के शुक्ल पक्ष में गृह प्रवेश करने से सुख कि प्राप्ति होती हैं और कृष्ण पक्ष में गृह प्रवेश करने से चोर-डाकु द्वारा धन हानि होती हैं।

 
  • चैत्र मास में गृह प्रवेश करने से रोग और शोक उत्पन्न होते हैं ।
  • वैशाख मास में गृह प्रवेश करने से धन, वैभव, संतान एवं आरोग्य की प्राप्ति होती हैं ।
  • ज्येष्ठ मास में गृह प्रवेश करने से मृत्यु तथा विपत्ति प्राप्ति कि आशंका होती हैं ।
  • आषाढ़ मास में गृह प्रवेश करने से वाहन एवं पशु की होने का भय होता हैं ।
  • श्रावण मास में गृह प्रवेश करने से धन एवं मित्रो बढते हैं एवं लाभ प्राप्त होता हैं ।
  • भाद्रपद मास में गृह प्रवेश करने से मित्रों से क्लेश, दरिद्रता तथा विनाश होता हैं ।
  • आश्विन मास में गृह प्रवेश करने से स्त्री नाश, कलह तथा लड़ाई झगडे होता हैं ।
  • कार्तिक मास में गृह प्रवेश करने से संतान,आरोग्य एवं धन की प्राप्ती होती हैं ।
  • मार्गशीर्ष मास में गृह प्रवेश करने से उत्तम उत्तम अन्न एवं धनकी प्राप्ति होती हैं ।
  • पौष मास में गृह प्रवेश करने से चोरों का भय होता हैं ।
  • माघ मास में गृह प्रवेश करने से अग्नि का भय होता हैं ।
  • फाल्गुन मास में गृह प्रवेश करने से धन तथा सुखकी प्राप्ति और वंशकी वृद्धि होती हैं ।

 

वास्तु ग्रन्थों के मत से गृह प्रवेश के लिये आषाढ़ एवं पौषको शुभ और कार्तिकको अशुभ बताया गया है ।

 
*  ईंट - पत्थर के घर में मासदोषका विचार करना चाहिये ।

कच्चे घरो में, घास - फूस एवं लकड़ी के बने घर मास का दोष नहीं लगता ।

रामचन्द्र स्तुति

Ram Stuti , rama chandra stuti
रामचन्द्र स्तुति


नमामि भक्तवत्सलं कृपालु शील कोमलं
भजामि ते पदांबुजं अकामिनां स्वधामदं।
निकाम श्याम सुंदरं भवांबुनाथ मन्दरं
प्रफुल्ल कंज लोचनं मदादि दोष मोचनं॥१॥

प्रलंब बाहु विक्रमं प्रभोडप्रमेय वैभवं
निषंग चाप सायकं धरं त्रिलोक नायकं।
दिनेश वंश मंडनं महेश चाप खंडनं
मुनींद्र संत रंजनं सुरारि वृंद भंजनं॥२॥

मनोज वैरि वंदितं अजादि देव सेवितं
विशुद्ध बोध विग्रहं समस्त दूषणापहं।
नमामि इंदिरा पतिं सुखाकरं सतां गतिं
भजे सशक्ति सानुजं शची पति प्रियानुजं॥३॥

त्वदंघ्रि मूल ये नरा: भजन्ति हीन मत्सरा:
पतंति नो भवार्णवे वितर्क वीचि संकुले।
विविक्त वासिन: सदा भजंति मुक्तये मुदा
निरस्य इंद्रियादिकं प्रयांति ते गतिं स्वकं॥४॥

तमेकमद्भुतं प्रभुं निरीहमीश्वरं विभुं
जगद्गरुं च शाश्व तं तुरीयमेव मेवलं।
भजामि भाव वल्लभं कुयोगिनां सुदुर्लर्भ
स्वभक्त कल्प पादपं समं सुसेव्यमन्वहं॥५॥

अनूप रूप भूपतिं नतोडहमुर्विजा पतिं
प्रसीद मे नमामि ते पदाब्ज भक्ति देहि मे।
पठंति ये स्वतं इदं नरादरेण ते पदं
व्रजंति नात्र संशयं त्वदीय भक्ति संयुता:॥६॥


इस स्तोत्र का नित्य आदरपूर्वक पाठ करने से व्यक्ति को पद कि निसंदेः प्राप्ति होती हैं

रविवार, मई 09, 2010

गृह प्रवेश एवं वास्तु (भाग:२)

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गृह प्रवेश एवं वास्तु (भाग:२)

शास्त्रोक्त मत से गृहारम्भ या गृहप्रवेश हेतु उत्तम समय तब होता हैं जब सूर्य मेष, वृष, कर्क, सिंह, तुला, वृश्चिक, मकर और कुम्भ इन राशियों में से किसी एक मे होता हैं। और गृहारम्भ या गृहप्रवेश अशुभ होता हैं जब सूर्य मिथुन, कन्या, धनु और मीन - इन राशि में होता हैं।

 
  • मेष राशि के सूर्यमें गृहारम्भ करने से शुभ फल प्राप्त होता हैं।
  • वृष राशि के सूर्य में गृहारम्भ करने से धन की वृद्धि होती हैं ।
  • मिथुन राशि के सूर्य में गृहारम्भ करने से परिवार में मृत्यु होती हैं।
  • कर्क राशि के सूर्य में गृहारम्भ करने से शुभ फल प्राप्त होता हैं।
  • सिंह राशि के सूर्य में गृहारम्भ करने से सेवक द्वारा लाभ प्राप्त होता हैं।
  • कन्या राशि के सूर्य में गृहारम्भ करने से परिवार में रोग होता है।
  • तुला राशि के सूर्य में गृहारम्भ करने से सभी सुख प्राप्त होता हैं।
  • वृश्चिक राशि के सूर्य में गृहारम्भ करने से धनकी वृद्धि होती हैं।
  • धनु राशिके सूर्य में गृहारम्भ सम्मान की हानि होती हैं।
  • मकर राशि के सूर्य में गृहारम्भ करने से धन की प्राप्ति होती हैं।
  • कुम्भ राशि के सूर्य में गृहारम्भ करने से रत्न एवं द्रव्य लाभ प्राप्त होता हैं।
  • मीन राशि के सूर्य में गृहारम्भ करने से रोग तथा भय की प्राप्ति होती हैं।

पंच महाभूत तत्व एवं वास्तु (भाग:१)

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पंच महाभूत तत्व एवं वास्तु (भाग:१)

जिस भूमि पर भवन बनकर तैयार हो जाता है वहा पंचभूत का समनवय होता हैं। जिस प्रकार मानव शरीर में जो पंच माहाभूत (आकश, पृथवी, जल, वायु, अग्नि) तत्व समाहित होते हैं , यह पंच माहाभूत तत्व व्यक्ति द्वारा किये गये कर्म के अनुरुप उसका प्रभाव शुभ-अशुभ व्यक्ति के निवास स्थान पर पड़ता हैं। क्योकि मनुष्य एवं बह्याण्ड की संरचना पंच महाभूतों के आधार पर हुई हैं।

यदि प्रकृति के विरूद्ध इन पच महाभूत तत्व का संतुलन बिगड़ जाये तो व्यक्ति द्वारा किये जारहे कर्म गलत दिशामें होते हैं, जिस्से हमारी उर्जा यातो अधिक खर्च होती हैं या उर्जा गलत दिशा में व्यय होक

शरीर में अस्वस्थता पैदा होकर शारीरिक संतुलन को बिगाड़ देती है, जिस्से पारिवारिक कलह, आर्थिक तंगी, मानसिक तनाव, अशांति, रोग इत्यादि अनेक प्रकार कि व्याधि उतपन्न होती है।

इस लिए यह जरूरी है कि हम पंच महाभूत तत्वों का सन्तुलन रखे तो हमे जीवन में सभी प्रकार से सुख शांति एवं समृद्धि सरलता से प्राप्त होती हैं।

भवन निर्माण के बाद पंच तत्वों का गृह में अस्तित्व होता हैं इस लिये यह जरूरी हो जाता हैं कि इन पंच महाभूत तत्वों का सही सन्तुलन बना रहे। अगर यह जरा भी बिगड़ जाए तो भवन मे निवास करने वाला व्यक्ति सुख-शांति से नहीं रह पाएगा।

सोमवार, मई 03, 2010

गृह प्रवेश एवं वास्तु भाग:१

Gruha pravesha evm vastu bhag:1, gruh arambha evm vastu part:1


गृह प्रवेश एवं वास्तु भाग:१

गृहारम्भ और गृह प्रवेश करते समय अपने कुलदेवता, ईष्ट देवता, गणेश, क्षेत्रपाल, वास्तुदेवता और दिक्पतिकी विधिवत् पूजा करनी चहिये ।

विद्वान ब्राह्मण, घर बनाने वाले कारीगर, द्विज और शिल्पी को धन, वस्त्र और अलंकार भेट स्वरुप देकर उन्हे विधिवत् सन्तुष्ट करने से घरमें सदा सुख शांति एवं समृद्धि बनी रहती हैं ।

जिस भवन मे गृहारम्भ या गृहप्रवेश करते समय वास्तुपूजा करता हैं, उस भवन में सर्वदा आरोग्य, पुत्र, धन और धान्य से परिपूर्ण एवं सुखी होता हैं ।

जिस भवन मे बिना वास्तु पूजा कराके गृहारम्भ और गृह प्रवेश होता हैं उस भवन में रहने वाले व्यक्ति नाना प्रकारके रोग, क्लेश और संकटो से संम्मुखिन होते हैं ।

दुर्गाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रम्

दुर्गा अष्टोत्तर नामावली, durgashtottar shatnama stotram, durga ashtottar namavali

दुर्गाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रम्



शतनाम प्रवक्ष्यामि शृणुष्व कमलानने।
यस्य प्रसादमात्रेण दुर्गा प्रीता भवेत् सती॥१॥

सती साध्वी भवप्रीता भवानी भवमोचनी।
आर्या दुर्गा जया चाद्या त्रिनेत्रा शूलधारिणी॥२॥

पिनाकधारिणी चित्रा चण्डघण्टा महातपाः।
मनो बुद्धिरहंकारा चित्तरूपा चिता चितिः॥३॥

सर्वमन्त्रमयी सत्ता सत्यानन्दस्वरूपिणी।
अनन्ता भाविनी भाव्या भव्याभव्या सदागतिः॥४॥

शाम्भवी देवमाता च चिन्ता रत्‍‌नप्रिया सदा।
सर्वविद्या दक्षकन्या दक्षयज्ञविनाशिनी॥५॥

अपर्णानेकवर्णा च पाटला पाटलावती।
पट्टाम्बरपरीधाना कलमञ्जीररञ्जिनी॥६॥

अमेयविक्रमा क्रूरा सुन्दरी सुरसुन्दरी।
वनदुर्गा च मातङ्गी मतङ्गमुनिपूजिता॥७॥

ब्राह्मी माहेश्वरी चैन्द्री कौमारी वैष्णवी तथा।
चामुण्डा चैव वाराही लक्ष्मीश्च  पुरुषाकृतिः॥८॥

विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया नित्या च बुद्धिदा।
बहुला बहुलप्रेमा सर्ववाहनवाहना॥९॥

निशुम्भशुम्भहननी महिषासुरमर्दिनी।
मधुकैटभहन्त्री च चण्डमुण्डविनाशिनी॥१०॥

सर्वासुरविनाशा च सर्वदानवघातिनी।
सर्वशास्त्रमयी सत्या सर्वास्त्रधारिणी तथा॥११॥

अनेकशस्त्रहस्ता च अनेकास्त्रस्य धारिणी।
कुमारी चैककन्या च कैशोरी युवती यतिः॥१२॥

अप्रौढा चैव प्रौढा च वृद्धमाता बलप्रदा।
महोदरी मुक्त केशी घोररूपा महाबला॥१३॥

अग्निज्वाला रौद्रमुखी कालरात्रिस्तपस्विनी।
नारायणी भद्रकाली विष्णुमाया जलोदरी॥१४॥

शिवदूती कराली च अनन्ता परमेश्वरी।
कात्यायनी च सावित्री प्रत्यक्षा ब्रह्मवादिनी॥१५॥

य इदं प्रपठेन्नित्यं दुर्गानामशताष्टकम्।
नासाध्यं विद्यते देवि त्रिषु लोकेषु पार्वति॥१६॥

धनं धान्यं सुतं जायां हयं हस्तिनमेव च।
चतुर्वर्ग तथा चान्ते लभेन्मुक्तिं च शाश्वतीम्॥१७॥

कुमारीं पूजयित्वा तु ध्यात्वा देवीं सुरेश्वरीम्।
पूजयेत् परया भक्त्या पठेन्नामशताष्टकम्॥१८॥

तस्य सिद्धिर्भवेद् देवि सर्वै: सुरवरैरपि।
राजानो दासतां यान्ति राज्यश्रियमवापनुयात्॥१९॥

गोरोचनालक्त ककुङ्कुमेन सिन्दूरकर्पूरमधुत्रयेण।
विलिख्य यन्त्रं विधिना विधिज्ञो भवेत् सदा धारयते पुरारिः॥२०॥

भौमावास्यानिशामग्रे चन्द्रे शतभिषां गते।
विलिख्य प्रपठेत् स्तोत्रं स भवेत् सम्पदां पदम्॥२१॥