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सोमवार, जुलाई 26, 2010

वैद्यनाथ अष्टकम्

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पोस्ट सौजन्य: स्वस्तिक

॥वैद्यनाथाष्टकम्॥

श्रीरामसौमित्रिजटायुवेद षडाननादित्य कुजार्चिताय।
श्रीनीलकण्ठाय दयामयाय श्रीवैद्यनाथाय नमःशिवाय॥१॥

गङ्गाप्रवाहेन्दु जटाधराय त्रिलोचनाय स्मर कालहन्त्रे।
समस्त देवैरभिपूजिताय श्रीवैद्यनाथाय नमः शिवाय॥२॥

भक्तःप्रियाय त्रिपुरान्तकाय पिनाकिने दुष्टहराय नित्यम्।
प्रत्यक्षलीलाय मनुष्यलोके श्रीवैद्यनाथाय नमः शिवाय॥३॥

प्रभूतवातादि समस्तरोग प्रनाशकर्त्रे मुनिवन्दिताय।
प्रभाकरेन्द्वग्नि विलोचनाय श्रीवैद्यनाथाय नमः शिवाय॥४॥

वाक् श्रोत्र नेत्राङ्घ्रि विहीनजन्तोः वाक्श्रोत्रनेत्रांघ्रिसुखप्रदाय।
कुष्ठादिसर्वोन्नतरोगहन्त्रे श्रीवैद्यनाथाय नमः शिवाय॥५॥

वेदान्तवेद्याय जगन्मयाय योगीश्वरद्येय पदाम्बुजाय।
त्रिमूर्तिरूपाय सहस्रनाम्ने श्रीवैद्यनाथाय नमः शिवाय॥६॥

स्वतीर्थमृद्भस्मभृताङ्गभाजां पिशाचदुःखार्तिभयापहाय।
आत्मस्वरूपाय शरीरभाजां श्रीवैद्यनाथाय नमः शिवाय॥७॥
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय स्रक्गन्ध भस्माद्यभिशोभिताय।
सुपुत्रदारादि सुभाग्यदाय श्रीवैद्यनाथाय नमः शिवाय॥८॥
वालाम्बिकेश वैद्येश भवरोगहरेति च।
जपेन्नामत्रयं नित्यं महारोगनिवारणम्॥९॥

॥इति श्री वैद्यनाथाष्टकम्॥

चन्द्रशेखर अष्टकम्

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पोस्ट सौजन्य: स्वस्तिक
॥ चन्द्रशेखराष्टकं ॥

चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर पाहिमाम् ।
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ १॥

रत्नसानुशरासनं रजतादिशृङ्गनिकेतनं
सिञ्जिनीकृतपन्नगेश्वरमच्युताननसायकम् ।
क्षिप्रदघपुरत्रयं त्रिदिवालयैभिवन्दितं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ २॥

पञ्चपादपपुष्पगन्धपदाम्बुजदूयशोभितं
भाललोचनजातपावकदग्धमन्मथविग्रह।म् ।
भस्मदिग्धकलेवरं भवनाशनं भवमव्ययं
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ ३॥

मत्त्वारणमुख्यचर्मकृतोत्तरीमनोहरं
पङ्कजासनपद्मलोचनपुजिताङ्घ्रिसरोरुहम् ।
देवसिन्धुतरङ्गसीकर सिक्तशुभ्रजटाधरं
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ ४॥

यक्षराजसखं भगाक्षहरं भुजङ्गविभूषणं
शैलराजसुता परिष्कृत चारुवामकलेवरम् ।
क्ष्वेडनीलगलं परश्वधधारिणं मृगधारिणं
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ ५॥

कुण्डलीकृतकुण्डलेश्वरकुण्डलं वृषवाहनं
नारदादिमुनीश्वरस्तुतवैभवं भुवनेश्वरम् ।
अन्धकान्धकामा श्रिता मरपादपं शमनान्तकं
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ ६॥

भषजं भवरोगिणामखिलापदामपहारिणं
दक्षयज्ञर्विनाशनं त्रिगुणात्मकं त्रिविलोचनम् ।
भुक्तिमुक्तफलप्रदं सकलाघसङ्घनिवर्हनं
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ ७॥

भक्त वत्सलमचिञ्तं निधिमक्षयं हरिदम्वरं
सर्वभूतपतिं परात्पर प्रमेयमनुत्तमम् ।
सोमवारिज भूहुताशनसोमपानिलखाकृतिं
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ ८॥

विश्वसृष्टिविधालिनं पुनरेव पालनतत्परं
संहरन्तमपि प्रपञ्चम शेषलोकनिवासिनम् ।
क्रिडयन्तमहर्निशं गणनाथयूथ समन्वितं
चन्द्रशेखर चन्द्रशेकर चन्द्रशेकर रक्षमाम् ॥ ९॥

मृत्युभीतमृकण्डसूनुकृतस्तव शिव सन्निधौ
यत्र कुत्र च पठेन्नहि तस्य मृत्युभयं भवेत् ।
पूर्णमायुररोगितामखिलाथ सम्पदमादरं
चन्द्रशेखर एव तस्य ददाति मुक्तिमयत्नतः ॥ १०॥

॥ इति श्री चन्द्रशेखराष्टकम् संपूर्णम् ॥

दरिद्रता निवारक शिव स्तोत्र

दरिद्रता निवारण हेतु शिव स्तोत्र, daridrata nivaran hetu shiva stotra, daridrata nivarak shiva strotra, shiv stotra For Poverty Ending

॥दारिद्र्य दहन शिवस्तोत्रं॥

विश्वेश्वराय नरकार्णव तारणाय कणामृताय शशिशेखरधारणाय।
कर्पूरकान्तिधवलाय जटाधराय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय॥१॥

गौरीप्रियाय रजनीशकलाधराय कालान्तकाय भुजगाधिपकङ्कणाय।
गंगाधराय गजराजविमर्दनाय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय॥२॥

भक्तिप्रियाय भवरोगभयापहाय उग्राय दुर्गभवसागरतारणाय।
ज्योतिर्मयाय गुणनामसुनृत्यकाय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय॥३॥

चर्मम्बराय शवभस्मविलेपनाय भालेक्षणाय मणिकुण्डलमण्डिताय।
मंझीरपादयुगलाय जटाधराय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय॥४॥

पञ्चाननाय फणिराजविभूषणाय हेमांशुकाय भुवनत्रयमण्डिताय।
आनन्दभूमिवरदाय तमोमयाय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय॥५॥

भानुप्रियाय भवसागरतारणाय कालान्तकाय कमलासनपूजिताय।
नेत्रत्रयाय शुभलक्षण लक्षिताय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय॥६॥

रामप्रियाय रघुनाथवरप्रदाय नागप्रियाय नरकार्णवतारणाय।
पुण्येषु पुण्यभरिताय सुरार्चिताय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय॥७॥

मुक्तेश्वराय फलदाय गणेश्वराय गीतप्रियाय वृषभेश्वरवाहनाय।
मातङ्गचर्मवसनाय महेश्वराय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय॥८॥

वसिष्ठेन कृतं स्तोत्रं सर्वरोगनिवारणं। सर्वसंपत्करं शीघ्रं पुत्रपौत्रादिवर्धनम्।
त्रिसंध्यं यः पठेन्नित्यं स हि स्वर्गमवाप्नुयात्॥९॥

॥इति वसिष्ठ विरचितं दारिद्र्यदहनशिवस्तोत्रं सम्पूर्णम्॥

फल: एसा शास्रोक्त वचन हैं जो व्यक्ति श्रद्धा भाव से तीनोकाल सुबह, संध्या एवं रात्री के समय दारिद्र्य दहन शिवस्तोत्रं का पाठ करते उनके दुख एवं सर्व रोग का निवारण होकर उसे, संपत्ति एवं संतान लाभ प्राप्त होता हैं।

शिव अष्टकम्

शिव अष्टक, shiv Ashtak, Shiv ashtakam

शिवाष्टकं

प्रभुं प्राणनाथं विभुं विश्वनाथं जगन्नाथनाथं सदानन्दभाजाम् ।
भवद्भव्यभूतेश्वरं भूतनाथं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ १॥

गले रुण्डमालं तनौ सर्पजालं महाकालकालं गणेशाधिपालम् ।
जटाजूटभङ्गोत्तरङ्गैर्विशालं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ २॥

मुदामाकरं मण्डनं मण्डयन्तं महामण्डल भस्मभूषधरंतम् ।
अनादिह्यपारं महामोहहारं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ३॥

तटाधो निवासं महाट्टाट्टहासं महापापनाशं सदासुप्रकाशम् ।
गिरीशं गणेशं महेशं सुरेशं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ४॥

गिरिन्द्रात्मजासंग्रहीतार्धदेहं गिरौ संस्थितं सर्वदा सन्नगेहम् ।
परब्रह्मब्रह्मादिभिर्वन्ध्यमानं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ५॥

कपालं त्रिशूलं कराभ्यां दधानं पदाम्भोजनम्राय कामं ददानम् ।
बलीवर्दयानं सुराणां प्रधानं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ६॥

शरच्चन्द्रगात्रं गुणानन्द पात्रं त्रिनेत्रं पवित्रं धनेशस्य मित्रम् ।
अपर्णाकलत्रं चरित्रं विचित्रं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ७॥

हरं सर्पहारं चिता भूविहारं भवं वेदसारं सदा निर्विकारम् ।
श्मशाने वदन्तं मनोजं दहन्तं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ८॥

स्तवं यः प्रभाते नरः शूलपाणे पठेत् सर्वदा भर्गभावानुरक्तः ।
स पुत्रं धनं धान्यमित्रं कलत्रं विचित्रं समासाद्य मोक्षं प्रयाति ॥ ९॥

॥ इति शिवाष्टकम् संपूर्णम्॥

सोमवार व्रत कथा

Somvar Vrat Katha

सोमवार व्रत कथा


विदित हो कि कैलाश के उत्तर में निषध पर्वत के शिखर पर स्वयं प्रभा नामक एक विशाल पुरी थी जिसमें धन वाहन नामक एक गणविराज रहते थे। समय अनुसार उन्हे आठ पुत्र और अंत में एक कन्या उत्पन्न हुई जिसका नाम गंधर्व सेना था। वह अत्यन्त रूपवती थी और उसे अपने रूप का बहुत अभिमान था। वह कहा करती थी कि संसार में कोई गंधर्व या देवी मेरे रूप के करोड़वे अंश के समान भी नहीं है। एक दिन एक आकाशचरीगण नायक ने उसकी बात सुनी तो उसे शाप दे दिया 'तुम रूप के अभिमान' में गंधर्वो और देवताओं का अपमान करती हो अत: तुम्हारे शरीर में कोढ़ हो जायेगा। शाप सुन कर कन्या भयभीत हो गयी और दया की भीख मांगने लगी। उसकी बिनती सुन कर गणनायक को दया आ गयी और उन्होंने कहा हिमालय के वन में गोश्रृंग नाम के श्रेष्ठ मुनी रहते है। वे तुम्हारा उपकार करेगे। ऐसा कह कर गणनायक चला गया। गंधर्व सेना व छोड़ कर अपने पिता के पास आई और अपने कुष्ट होने के कारण तथा उससे मुक्ति का उपाय बताया। माता पिता उसे तत्क्षण लेकर हिमालय पर्वत पर गए और गोश्रृंग का दर्शन करके स्तुति करने लगे। मुनि के पूछने पर उन्होंने कहा कि मेरे बेटी को कोढ़ हो गया है कृपया इसकी शांति का कोई उपाय बताएं।

मुनि ने कहा कि समुद्र के समीप भगवान सोमनाथ विराजमान है। वहां जाकर सोमवार व्रत द्वारा भगवान शंकर की आराधना करो। ऐसा करने से पुत्री का रोग दूर हो जायेगा। मुनि के वचन सुन कर धनवाहन अपनी पुत्री के साथ प्रभास क्षेत्र में जाकर सोमनाथ के दर्शन किए और पूरे विधि विधान के साथ सोमवार व्रज करते हुए भगवान शंकर की आराधना किए उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शंकर भगवान ने उस कन्या के रोगों को दूर किया और उन्हे अपनी भक्ति भी दान में दिया। आज भी लोग शिव जी को प्रसन्न करने के लिए इस व्रत को पूरी निष्ठा एवं भक्ति के साथ करते है और शिव कि कृपा को प्राप्त करते है।

श्रावण सोमवार व्रत कैसे करें?

shravan somavar vrat kese kare

श्रावण सोमवार व्रत कैसे करें?


श्रावण सोमवार के व्रत में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना करने का विधान हैं।
विद्वानो के अनुसार श्रावण सोमवार का व्रत-पूजन-विधि इस प्रकार हैं।

श्रावण सोमवार के दिव व्रत करने वाले व्यक्ति को सूर्योदय के समय से व्रत प्रारंभ कर लेना चाहिये एवं दिन में एक बार सात्विक भोजन करना चाहिए। व्रत के दिन शिव पार्वति कि पूजा अर्चना के उपरांत व्रत कि समाप्ति से पूर्व सोमवार व्रत की कथा सुनने का विधान हैं।

श्रावण सोमवार को ब्रह्म मुहूर्त में उठ कर।
पूरे घर की साफ-सफाई कर स्नान इत्यादि से निवृत्त हो कर।
पूरे घर में गंगा जल छिड़कें।
घर में पूजा स्थान पर भगवान शिव की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।

पूजन कि सारी तैयारी होने के बाद निम्न मंत्र से संकल्प लें-

'मम क्षेमस्थैर्यविजयारोग्यैश्वर्याभिवृद्धयर्थं सोमव्रतं करिष्ये'

इसके पश्चात निम्न मंत्र से ध्यान करें-

'ध्यायेन्नित्यंमहेशं रजतगिरिनिभं चारुचंद्रावतंसं रत्नाकल्पोज्ज्वलांग परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्‌।
पद्मासीनं समंतात्स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं विश्वाद्यं विश्ववंद्यं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम्‌॥


ध्यान के पश्चात 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र से शिवजी का तथा 'ॐ नमः शिवायै' मंत्र से पार्वतीजी का षोडशो उपचार से पूजन करना चाहिये।

पूजन के पश्चात श्रावण सोमवार व्रत कथा सुनें।
तत्पश्चात आरती कर प्रसाद बाटदे।
इसकें पश्चयात हि भोजन या फलाहार ग्रहण करना चाहिये ।


श्रावण सोमवार व्रत का फल
सोमवार व्रत उपरोक्त विधि से करने पर भगवान शिव तथा माता पार्वती कि कृपा बनी रहती हैं।
व्यक्ति का जीवन सुख समृद्धि एवं एश्वर्य युक्त होकर व्यक्ति के समस्त संकटो नाश हो जाते हैं।

श्रावण मास प्रथम सोमवार (26-7-2010)

Shravan masa pratham somavar vrat ke labha (26-7-2010), shravan mah pratham somavar vrat (26/07/2010) श्रावण मास के प्रथम सोमवार व्रत के लाभ 26/ जुलाई /2010

श्रावण मास प्रथम सोमवार व्रत के लाभ





इस वर्ष श्रावण मास के प्रथन सोमवार को कार्य सिद्धि योग बनरहा हैं, जिस कारण इस दिन व्रत करने से श्रावण सोमवार व्रत के फल में नक्षत्रो के प्रभाव से विशेष वृद्धि होती हैं। अतः इस श्रावण के प्रथन सोमवार को व्रत करने से मनुष्य को अपने कार्य में सफलता प्राप्त करने हेतु एवं अपनी विभिन्न समस्याओं से छुटकारा प्राप्त करने हेतु व्रत करने से उत्तम फल कि प्राप्ति होती हैं।

प्रथन सोमवार को व्रत करने से होने वाले लाभ:

व्यक्ति को स्थिर लक्ष्मी कि प्राप्ति होती हैं।, कार्य व्यवसाय में वृद्धि होती हैं।, नई नौकरी प्राप्ति कि संभावनाए बढजाती हैं एवं पदौन्नती (प्रमोशन) कि संभावनाए बढती हैं।, कर्ज (ऋण)मुक्ति हेतु व्रत करने से भी लाभ प्राप्त होता हैं।

रविवार, जुलाई 25, 2010

गुर्वष्टकम्


aadha shankaracharya krut gurvashtakam

आद्य शंकराचार्य कृत गुर्वष्टकम्

शरीरं सुरूपं तथा वा कलत्रं,
यशश्चारु चित्रं धनं मेरु तुल्यम्।
मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥१॥

कलत्रं धनं पुत्र पौत्रादिसर्वं,
गृहो बान्धवाः सर्वमेतद्धि जातम्।
मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥२॥

षड़ंगादिवेदो मुखे शास्त्रविद्या,
कवित्वादि गद्यं सुपद्यं करोति।
मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥३॥

विदेशेषु मान्यः स्वदेशेषु धन्यः,
सदाचारवृत्तेषु मत्तो न चान्यः।
मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥४॥

क्षमामण्डले भूपभूपलबृब्दैः,
सदा सेवितं यस्य पादारविन्दम्।
मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥५॥

यशो मे गतं दिक्षु दानप्रतापात्,
जगद्वस्तु सर्वं करे यत्प्रसादात्।
मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥६॥

न भोगे न योगे न वा वाजिराजौ,
न कन्तामुखे नैव वित्तेषु चित्तम्।
मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥७॥

अरण्ये न वा स्वस्य गेहे न कार्ये,
न देहे मनो वर्तते मे त्वनर्ध्ये।
मनश्चेन लग्नं गुरोरघ्रिपद्मे,
ततः किं ततः किं ततः किं ततः किम्॥८॥

गुरोरष्टकं यः पठेत्पुरायदेही,
यतिर्भूपतिर्ब्रह्मचारी च गेही।
लमेद्वाच्छिताथं पदं ब्रह्मसंज्ञं,
गुरोरुक्तवाक्ये मनो यस्य लग्नम्॥९॥

॥इति श्रीमद आद्य शंकराचार्यविरचितम् गुर्वष्टकम् संपूर्णम्॥



भावार्थ:

(१) यदि शरीर रूपवान हो, पत्नी भी रूपसी हो और सत्कीर्ति चारों दिशाओं में विस्तरित हो, सुमेरु पर्वत के तुल्य अपार धन हो, किंतु गुरु के श्रीचरणों में यदि मन आसक्त न हो तो इन सारी उपलब्धियों से क्या लाभ?

(२) यदि पत्नी, धन, पुत्र-पौत्र, कुटुंब, गृह एवं स्वजन, आदि प्रारब्ध से सर्व सुलभ हो किंतु गुरु के श्रीचरणों में यदि मन आसक्त न हो तो इस प्रारब्ध-सुख से क्या लाभ?

(३) यदि वेद एवं ६ वेदांगादि शास्त्र जिन्हें कंठस्थ हों, जिनमें सुन्दर काव्य निर्माण की प्रतिभा हो, किंतु उनका मन यदि गुरु के श्रीचरणों के प्रति आसक्त न हो तो इन सदगुणों से क्या लाभ?

(४) जिन्हें विदेशों में समान आदर मिलता हो, अपने देश में जिनका नित्य जय-जयकार से स्वागत किया जाता हो और जिसके समान दूसरा कोई सदाचारी भक्त नहीं, यदि उनका भी मन गुरु के श्रीचरणों के प्रति आसक्त न हो तो सदगुणों से क्या लाभ?

(५)जिन महानुभाव के चरण कमल भूमण्डल के राजा-महाराजाओं से नित्य पूजित रहते हों, किंतु उनका मन यदि गुरु के श्रीचरणों के प्रति आसक्त न हो तो इस सदभाग्य से क्या लाभ?

(६) दानवृत्ति के प्रताप से जिनकी कीर्ति चारो दिशा में व्याप्त हो, अति उदार गुरु की सहज कृपा दृष्टि से जिन्हें संसार के सारे सुख-एश्वर्य हस्तगत हों, किंतु उनका मन यदि गुरु के श्रीचरणों में आसक्तभाव न रखता हो तो इन सारे एशवर्यों से क्या लाभ?

(७) जिनका मन भोग, योग, अश्व, राज्य, स्त्री-सुख और धन भोग से कभी विचलित न होता हो, फिर भी गुरु के श्रीचरणों के प्रति आसक्त न बन पाया हो तो मन की इस अटलता से क्या लाभ?

(८) जिनका मन वन या अपने विशाल भवन में, अपने कार्य या शरीर में तथा अमूल्य भण्डार में आसक्त न हो, पर गुरु के श्रीचरणों में भी वह मन आसक्त न हो पाये तो इन सारी अनासक्त्तियों का क्या लाभ?

(९) जो यति, राजा, ब्रह्मचारी एवं गृहस्थ इस गुरु अष्टक का पठन-पाठन करता है और जिसका मन गुरु के वचन में आसक्त है, वह पुण्यशाली शरीरधारी अपने इच्छितार्थ एवं ब्रह्मपद इन दोनों को संप्राप्त कर लेता है यह निश्चित है

गुरु स्तोत्रम्

श्री गुरु स्तोत्रम्

पार्वती उवाच
गुरुर्मन्त्रस्य देवस्य धर्मस्य तस्य एव वा ।
विशेषस्तु महादेव ! तद् वदस्व दयानिधे ॥

महादेव उवाच
जीवात्मनं परमात्मनं दानं ध्यानं योगो ज्ञानम्।
उत्कल काशीगंगामरणं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं॥१॥

प्राणं देहं गेहं राज्यं स्वर्गं भोगं योगं मुक्तिम्।
भार्यामिष्टं पुत्रं मित्रं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं॥२॥

वानप्रस्थं यतिविधधर्मं पारमहंस्यं भिक्षुकचरितम्।
साधोः सेवां बहुसुखभुक्तिं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं॥३॥

विष्णो भक्तिं पूजनरक्तिं वैष्णवसेवां मातरि भक्तिम्।
विष्णोरिव पितृसेवनयोगं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं॥४॥

प्रत्याहारं चेन्द्रिययजनं प्राणायां न्यासविधानम्।
इष्टे पूजा जप तपभक्तिर्न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं॥५॥

काली दुर्गा कमला भुवना त्रिपुरा भीमा बगला पूर्णा।
श्रीमातंगी धूमा तारा न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं॥६॥

मात्स्यं कौर्मं श्रीवाराहं नरहरिरूपं वामनचरितम्।
नरनारायण चरितं योगं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं॥७॥

श्रीभृगुदेवं श्रीरघुनाथं श्रीयदुनाथं बौद्धं कल्क्यम्।
अवतारा दश वेदविधानं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं॥८॥

गंगा काशी कान्ची द्वारा मायाऽयोध्याऽवन्ती मथुरा।
यमुना रेवा पुष्करतीर्थ न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं॥९॥

गोकुलगमनं गोपुररमणं श्रीवृन्दावन-मधुपुर-रटनम्।
एतत् सर्वं सुन्दरि ! मातर्न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं॥१०॥

तुलसीसेवा हरिहरभक्तिः गंगासागर-संगममुक्तिः।
किमपरमधिकं कृष्णेभक्तिर्न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं॥११॥

एतत् स्तोत्रम् पठति च नित्यं मोक्षज्ञानी सोऽपि च धन्यम् |
ब्रह्माण्डान्तर्यद्-यद् ध्येयं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं॥१२॥

|| वृहदविज्ञान परमेश्वरतंत्रे त्रिपुराशिवसंवादे श्रीगुरोःस्तोत्रम् ||

भावार्थ:
माता पार्वती ने कहा हे दयानिधि शंभु ! गुरुमंत्र के देवता अर्थात् गुरुदेव एवं उनका आचारादि धर्म क्या है - इस बारे विस्तार से बताये।
महादेव ने कहा जीवात्मा-परमात्मा का ज्ञान, दान, ध्यान, योग पुरी, काशी या गंगा तट पर मृत्यु - इन सबमें से कुछ भी गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, गुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं॥१॥
प्राण, शरीर, गृह, राज्य, स्वर्ग, भोग, योग, मुक्ति, पत्नी, इष्ट, पुत्र, मित्र - इन सबमें से कुछ भी गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, गुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं॥२॥
वानप्रस्थ धर्म, यति विषयक धर्म, परमहंस के धर्म, भिक्षुक अर्थात् याचक के धर्म - इन सबमें से कुछ भी गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, गुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं॥३॥
भगवान विष्णु की भक्ति, उनके पूजन में अनुरक्ति, विष्णु भक्तों की सेवा, माता की भक्ति, श्रीविष्णु ही पिता रूप में हैं, इस प्रकार की पिता सेवा - इन सबमें से कुछ भी गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, गुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं॥४॥
प्रत्याहार और इन्द्रियों का दमन, प्राणायाम, न्यास-विन्यास का विधान, इष्टदेव की पूजा, मंत्र जप, तपस्या व भक्ति - इन सबमें से कुछ भी गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, गुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं॥५॥
काली, दुर्गा, लक्ष्मी, भुवनेश्वरि, त्रिपुरासुन्दरी, भीमा, बगलामुखी (पूर्णा), मातंगी, धूमावती व तारा ये सभी मातृशक्तियाँ भी गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, गुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं॥६॥
भगवान के मत्स्य, कूर्म, वाराह, नरसिंह, वामन, नर-नारायण आदि अवतार, उनकी लीलाएँ, चरित्र एवं तप आदि भी गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, गुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं॥७॥
भगवान के श्री भृगु, राम, कृष्ण, बुद्ध तथा कल्कि आदि वेदों में वर्णित दस अवतार गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, गुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं॥८॥
गंगा, यमुना, रेवा आदि पवित्र नदियाँ, काशी, कांची, पुरी, हरिद्वार, द्वारिका, उज्जयिनी, मथुरा, अयोध्या आदि पवित्र पुरियाँ व पुष्करादि तीर्थ भी गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, गुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं॥९॥
हे सुन्दरी ! हे मातेश्वरी ! गोकुल यात्रा, गौशालाओं में भ्रमण एवं श्री वृन्दावन व मधुपुर आदि शुभ नामों का रटन - ये सब भी गुरुदेव से बढ़कर नहीं है,गुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं॥१०॥
तुलसी की सेवा, विष्णु व शिव की भक्ति, गंगा सागर के संगम पर देह त्याग और अधिक क्या कहूँ परात्पर भगवान श्री कृष्ण की भक्ति भी गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, गुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं॥११॥
इस स्तोत्र का जो नित्य पाठ करता है वह आत्मज्ञान एवं मोक्ष दोनों को पाकर धन्य हो जाता है | निश्चित ही समस्त ब्रह्माण्ड मे जिस-जिसका भी ध्यान किया जाता है, उनमें से कुछ भी गुरुदेव से बढ़कर नहीं है, गुरुदेव से बढ़कर नहीं हैं॥१२॥
उपरोक्त गुरुस्तोत्र वृहद विज्ञान परमेश्वरतंत्र मं त्रिपुरा-शिव संवाद में वर्णित हैं।

मंगलवार, जुलाई 20, 2010

शयनी एकादशी (21-July-2010)

shayanee ekadashee vrat, shayani ekadashi vrata, sayani ekadashi, sayanee ekadashi, shayani akadashi

हरि शयनी एकादशी व्रत, देव शयनी एकादशी व्रत

आषाढ़ मास में शुक्लपक्ष की एकादशी को शयनी एकादशी (हरि शयनी एकादशी, देव शयनी एकादशी) भी कहा जाता हैं।

शयनी एकादशी व्रत को शास्त्रों में पुण्य, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करनेवाली, सब पापों को हरनेवाली होती हैं। शयनी एकादशी का व्रत उत्तम फल प्रदान करने वाला होता हैं ।

जो व्यक्ति आषाढ़ शुक्लपक्ष कि‘शयनी एकादशी’ के दिन भगवान विष्णु का पूर्ण भक्ति-भाव से पूजन तथा एकादशी का उत्तम व्रत करता हैं, उस व्यक्ति को तीनों लोकों और तीनों ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनो देवताओं का पूजन करने के बराबर फल प्राप्त होता हैं।

जो व्यक्ति सर्व प्रकार के भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली सर्व पापहरने वाली एकादशी के उत्तम व्रत का पालन करता है, वह व्यक्ति सबसे नीम्न दर्जेके कर्म करने वाला होने पर भी विष्णु कि कृपा प्राप्ति हे उसे संसार के समस्त भौतिक सुखो कि प्राप्ति स्वतः होने लगती हैं।

व्रत विधान में दीपदान कर के पलाश के पत्तो पर भोजन और व्रत करते हुए संपूर्ण चातुरमास व्यतीत करना चाहिये एसा करने से श्री विष्णु कि विशेष कृपा प्राप्त होती हैं।

बुधवार, जुलाई 14, 2010

काल भैरव अष्टकं

काल भैरव अष्टक


कालभैरवाष्टकम्

देवराजसेव्यमानपावनांघ्रिपङ्कजं व्यालयज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम् ।
नारदादियोगिवृन्दवन्दितं दिगंबरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ १॥

भानुकोटिभास्वरं भवाब्धितारकं परं नीलकण्ठमीप्सितार्थदायकं त्रिलोचनम् ।
कालकालमंबुजाक्षमक्षशूलमक्षरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ २॥

शूलटंकपाशदण्डपाणिमादिकारणं श्यामकायमादिदेवमक्षरं निरामयम् ।
भीमविक्रमं प्रभुं विचित्रताण्डवप्रियं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ३॥

भुक्तिमुक्तिदायकं प्रशस्तचारुविग्रहं भक्तवत्सलं स्थितं समस्तलोकविग्रहम् ।
विनिक्वणन्मनोज्ञहेमकिङ्किणीलसत्कटिं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ४॥

धर्मसेतुपालकं त्वधर्ममार्गनाशनं कर्मपाशमोचकं सुशर्मधायकं विभुम् ।
स्वर्णवर्णशेषपाशशोभितांगमण्डलं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ५॥

रत्नपादुकाप्रभाभिरामपादयुग्मकं नित्यमद्वितीयमिष्टदैवतं निरंजनम् ।
मृत्युदर्पनाशनं करालदंष्ट्रमोक्षणं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ६॥

अट्टहासभिन्नपद्मजाण्डकोशसंततिं दृष्टिपात्तनष्टपापजालमुग्रशासनम् ।
अष्टसिद्धिदायकं कपालमालिकाधरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ७॥

भूतसंघनायकं विशालकीर्तिदायकं काशिवासलोकपुण्यपापशोधकं विभुम् ।
नीतिमार्गकोविदं पुरातनं जगत्पतिं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ८॥

फल श्रुति॥

कालभैरवाष्टकं पठंति ये मनोहरं ज्ञानमुक्तिसाधनं विचित्रपुण्यवर्धनम् ।
शोकमोहदैन्यलोभकोपतापनाशनं प्रयान्ति कालभैरवांघ्रिसन्निधिं नरा ध्रुवम् ॥

॥इति कालभैरवाष्टकम् संपूर्णम् ॥

मंगलवार, जुलाई 06, 2010

विश्वनाथ अष्टक

विश्वनाथ अष्टकं, viswanath astakam, vishvanath astak, vishwa natha ashtakm,

विश्वनाथाष्टकम्

गङ्गातरंगरमणीयजटाकलापं
गौरीनिरन्तरविभूषितवामभागम्।
नारायणप्रियमनंगमदापहारं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्॥१॥

वाचामगोचरमनेकगुणस्वरूपं
वागीशविष्णुसुरसेवितपादपीठम्।
वामेनविग्रहवरेणकलत्रवन्तं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्॥२॥

भूताधिपं भुजगभूषणभूषितांगं
व्याघ्राजिनांबरधरं जटिलं त्रिनेत्रम्।
पाशांकुशाभयवरप्रदशूलपाणिं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्॥३॥

शीतांशुशोभितकिरीटविराजमानं
भालेक्षणानलविशोषितपंचबाणम्।
नागाधिपारचितभासुरकर्णपूरं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्॥४॥

पंचाननं दुरितमत्तमतङ्गजानां
नागान्तकं दनुजपुंगवपन्नगानाम्।
दावानलं मरणशोकजराटवीनां
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्॥५॥

तेजोमयं सगुणनिर्गुणमद्वितीयं
आनन्दकन्दमपराजितमप्रमेयम्।
नागात्मकं सकलनिष्कलमात्मरूपं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्॥६॥

रागादिदोषरहितं स्वजनानुरागं
वैराग्यशान्तिनिलयं गिरिजासहायम्।
माधुर्यधैर्यसुभगं गरलाभिरामं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्॥७॥

आशां विहाय परिहृत्य परस्य निन्दां
पापे रतिं च सुनिवार्य मनः समाधौ।
आदाय हृत्कमलमध्यगतं परेशं
वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्॥८॥

वाराणसीपुरपतेः स्तवनं शिवस्य
व्याख्यातमष्टकमिदं पठते मनुष्यः।
विद्यां श्रियं विपुलसौख्यमनन्तकीर्तिं
सम्प्राप्य देहविलये लभते च मोक्षम्॥९॥

विश्वनाथाष्टकमिदं यः पठेच्छिवसन्निधौ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते॥१०॥

॥इति श्रीविश्वनाथाष्टकं संपूर्णम्॥

सोमवार, जुलाई 05, 2010

महालक्ष्मी कवच

Mahalakxmi kawach, Mahalakshmi Kavach,

महालक्ष्मी कवच

नारायण उवाच

सर्व सम्पत्प्रदस्यास्य कवचस्य प्रजापतिः।
ऋषिश्छन्दश्च बृहती देवी पद्मालया स्वयम्॥१॥

धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोगः प्रकीर्तितः।
पुण्यबीजं च महतां कवचं परमाद्भुतम्॥२॥

ॐ ह्रीं कमलवासिन्यै स्वाहा मे पातु मस्तकम्।
श्रीं मे पातु कपालं च लोचने श्रीं श्रियै नमः॥३॥

ॐ श्रीं श्रियै स्वाहेति च कर्णयुग्मं सदावतु।
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै स्वाहा मे पातु नासिकाम्॥४॥

ॐ श्रीं पद्मालयायै च स्वाहा दन्तं सदावतु।
ॐ श्रीं कृष्णप्रियायै च दन्तरन्ध्रं सदावतु॥५॥

ॐ श्रीं नारायणेशायै मम कण्ठं सदावतु।
ॐ श्रीं केशवकान्तायै मम स्कन्धं सदावतु॥६॥

ॐ श्रीं पद्मनिवासिन्यै स्वाहा नाभिं सदावतु।
ॐ ह्रीं श्रीं संसारमात्रे मम वक्षः सदावतु॥७॥

ॐ श्रीं श्रीं कृष्णकान्तायै स्वाहा पृष्ठं सदावतु।
ॐ ह्रीं श्रीं श्रियै स्वाहा मम हस्तौ सदावतु॥८॥

ॐ श्रीं निवासकान्तायै मम पादौ सदावतु।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं श्रियै स्वाहा सर्वांगं मे सदावतु॥९॥

प्राच्यां पातु महालक्ष्मीराग्नेय्यां कमलालया।
पद्मा मां दक्षिणे पातु नैर्ऋत्यां श्रीहरिप्रिया॥१०॥

पद्मालया पश्चिमे मां वायव्यां पातु श्रीः स्वयम्।
उत्तरे कमला पातु ऐशान्यां सिन्धुकन्यका॥११॥

नारायणेशी पातूर्ध्वमधो विष्णुप्रियावतु।
संततं सर्वतः पातु विष्णुप्राणाधिका मम॥१२॥

इति ते कथितं वत्स सर्वमन्त्रौघविग्रहम्।
सर्वैश्वर्यप्रदं नाम कवचं परमाद्भुतम्॥१३॥

सुवर्णपर्वतं दत्त्वा मेरुतुल्यं द्विजातये।
यत् फलं लभते धर्मी कवचेन ततोऽधिकम्॥१४॥

गुरुमभ्यर्च्य विधिवत् कवचं धारयेत् तु यः।
कण्ठे वा दक्षिणे वाहौ स श्रीमान् प्रतिजन्मनि॥१५॥

अस्ति लक्ष्मीर्गृहे तस्य निश्चला शतपूरुषम्।
देवेन्द्रैश्चासुरेन्द्रैश्च सोऽत्रध्यो निश्चितं भवेत्॥१६॥

स सर्वपुण्यवान् धीमान् सर्वयज्ञेषु दीक्षितः।
स स्नातः सर्वतीर्थेषु यस्येदं कवचं गले॥१७॥

यस्मै कस्मै न दातव्यं लोभमोहभयैरपि।
गुरुभक्ताय शिष्याय शरणाय प्रकाशयेत्॥१८॥

इदं कवचमज्ञात्वा जपेल्लक्ष्मीं जगत्प्सूम्।
कोटिसंख्यं प्रजप्तोऽपि न मन्त्रः सोद्धिदायकः॥१९॥

 (गणपतिखण्ड ३८।६४-८२)

गुरुवार, जुलाई 01, 2010

बोलते हैं हस्ताक्षर (भाग -३)

signaBolate hain hastakshar Bhag-3 (Part -3)


बोलते हैं हस्ताक्षर (भाग -३)

* अनुसंधानो में देखा गया हैं कि जो व्यक्ति सीघा लिखते हैं वह भविष्य में गोते लगाने से वर्तमान में जीनेमें अधिक विश्वास करते हैं। एसी लिखावट वाले यक्ति बडे आत्म-विश्वासी होते हैं, उनकी स्वतंत्र सोच के कारण निर्णय लेने की क्षमता गजब कि होती हैं एवं तर्कशास्त्र में विशेष रुचि रखते हैं।

* जिस व्यक्ति कि लिखावट का झुकाव दायीं तरफ होता हैं वह व्यक्ति बहिर्मुखी होते हैं, जिस कारण, सामाजिक प्रवृत्ति और व्यवहार कुशलता का विशेष गुण इनमें सरलता से देखने मिलजाता हैं। अपने कार्यो की प्रशंसा की विशेष चाह रखते हैं। एसे व्यक्ति अधिक कर्मशील होने से अपनए भविष्य को उज्ज्वल बनाने की चिंता के कारण व्यक्ति में सदा कुछ न कुछ क्रियात्मक कार्य करते हुए आगे बढते रहने की इच्छा रहती हैं। भावनात्मक प्रवृत्ति के कारण अन्य लोगों के प्रति संवेदनशील होते हैं तथा उनके बीच रहना भी पसंद करते हैं।

*जिस व्यक्ति कि लिखावट का झुकाव बायीं ओर होता है वह व्यक्ति शांत स्वाभाव के होते हैं। उनमें अकेला जीवन बिताने कि इच्छा अधिक रहती हैं। एसे व्यक्ति थोडे संवेदनशील होते हैं जिस वजह से लोग उन्हें डरपोक समझते हैं। व्यक्ति अपनी सोच एवं परिस्थिओं के कारण व्यक्ति हमेशा अपने आपमें खोया रहता हैं जिस्से वह सरलता से बाहर नहीं निकल पाते जिसके कारण आसानी से मित्र नहीं बना पाते हैं।

*जिस व्यक्ति कि लिखावट बार-बार बदते रहते हैं वह व्यक्ति अस्थिर मानसिकता वाले होते हैं। एसे व्यक्ति अधिक धन का अपव्यय करने वाले, थोडे लापरवाह, हर जगह अपनी मर्जि चलाने वाले, जिद्दी किस्म के होते हैं। लोग इन पर शीघ्र विश्वास नहीं कर पाते यदि कोइ कर ले तो उनका विश्वार बरकरार रखने में भी यह असमर्थ होते हैं। मानसिक चिंता हर समय लगी रहती हैं। इनका व्यवसाय या नौकरी में बार बार परिवर्तन होते रहते हैं।