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बुधवार, जून 30, 2010

वाल्मीकि कृत गणेश स्तवन

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गणेश स्तवन

श्री आदि कवि वाल्मीकि उवाच

चतु:षष्टिकोटयाख्यविद्याप्रदं त्वां सुराचार्यविद्याप्रदानापदानम्।
कठाभीष्टविद्यार्पकं दन्तयुग्मं कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि॥

स्वनाथं प्रधानं महाविघन्नाथं निजेच्छाविसृष्टाण्डवृन्देशनाथम्।
प्रभुं दक्षिणास्यस्य विद्याप्रदं त्वां कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि॥

विभो व्यासशिष्यादिविद्याविशिष्टप्रियानेकविद्याप्रदातारमाद्यम्।
महाशाक्तदीक्षागुरुं श्रेष्ठदं त्वां कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि॥

विधात्रे त्रयीमुख्यवेदांश्च योगं महाविष्णवे चागमाञ्ा् शंकराय।
दिशन्तं च सूर्याय विद्यारहस्यं कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि॥

महाबुद्धिपुत्राय चैकं पुराणं दिशन्तं गजास्यस्य माहात्म्ययुक्तम्।
निजज्ञानशक्त्या समेतं पुराणं कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि॥

त्रयीशीर्षसारं रुचानेकमारं रमाबुद्धिदारं परं ब्रह्मपारम्।
सुरस्तोमकायं गणौघाधिनाथं कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि॥

चिदानन्दरूपं मुनिध्येयरूपं गुणातीतमीशं सुरेशं गणेशम्।
धरानन्दलोकादिवासप्रियं त्वां कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि॥

अनेकप्रतारं सुरक्ताब्जहारं परं निर्गुणं विश्वसद्ब्रह्मरूपम्।
महावाक्यसंदोहतात्पर्यमूर्ति कविं बुद्धिनाथं कवीनां नमामि॥

इदं ये तु कव्यष्टकं भक्तियुक्तास्त्रिसंध्यं पठन्ते गजास्यं स्मरन्त:।
कवित्वं सुवाक्यार्थमत्यद्भुतं ते लभन्ते प्रसादाद् गणेशस्य मुक्तिम्॥

॥इति श्री वाल्मीकि कृत श्रीगणेश स्तोत्र संपूर्णम्॥


फल: जो व्यक्ति श्रद्धा भाव से तीनोकाल सुबह संध्या एवं रात्री के समय वाल्मीकि कृत श्रीगणेश का स्तवन करते उन्हे सभी भओतिक सुखो कि प्राप्ति होकर उसे मोक्ष को प्राप्त कर लेता हैं, एसा शास्रोक्त वचन हैं ।

मंगलवार, जून 29, 2010

संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत 30-Jun-2010

संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत 30-Jun-2010

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ऋणमोचक मंगल स्तोत्र

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ऋणमोचक मंगल स्तोत्र

श्रीगणेशाय नमः

मङ्गलो भूमिपुत्रश्च ऋणहर्ता धनप्रदः।
स्थिरासनो महाकयः सर्वकर्मविरोधकः ॥१॥

लोहितो लोहिताक्षश्च सामगानां कृपाकरः।
धरात्मजः कुजो भौमो भूतिदो भूमिनन्दनः॥२॥

अङ्गारको यमश्चैव सर्वरोगापहारकः।
व्रुष्टेः कर्ताऽपहर्ता च सर्वकामफलप्रदः॥३॥

एतानि कुजनामनि नित्यं यः श्रद्धया पठेत्।
ऋणं न जायते तस्य धनं शीघ्रमवाप्नुयात्॥४॥

धरणीगर्भसम्भूतं विद्युत्कान्तिसमप्रभम्।
कुमारं शक्तिहस्तं च मङ्गलं प्रणमाम्यहम्॥५॥

स्तोत्रमङ्गारकस्यैतत्पठनीयं सदा नृभिः।
न तेषां भौमजा पीडा स्वल्पाऽपि भवति क्वचित्॥६॥

अङ्गारक महाभाग भगवन्भक्तवत्सल।
त्वां नमामि ममाशेषमृणमाशु विनाशय॥७॥

ऋणरोगादिदारिद्रयं ये चान्ये ह्यपमृत्यवः।
भयक्लेशमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा॥८॥

अतिवक्त्र दुरारार्ध्य भोगमुक्त जितात्मनः।
तुष्टो ददासि साम्राज्यं रुश्टो हरसि तत्ख्शणात्॥९॥

विरिंचिशक्रविष्णूनां मनुष्याणां तु का कथा।
तेन त्वं सर्वसत्त्वेन ग्रहराजो महाबलः॥१०॥

पुत्रान्देहि धनं देहि त्वामस्मि शरणं गतः।
ऋणदारिद्रयदुःखेन शत्रूणां च भयात्ततः॥११॥

एभिर्द्वादशभिः श्लोकैर्यः स्तौति च धरासुतम्।
महतिं श्रियमाप्नोति ह्यपरो धनदो युवा॥१२॥

॥इति श्री ऋणमोचक मङ्गलस्तोत्रम् सम्पूर्नम्॥

सोमवार, जून 28, 2010

व्रत (उपवास) एवं ज्योतिष

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उपवास एवं ज्योतिष

पोस्ट सौजन्य: स्वस्तिक

व्यक्ति कि जन्म कुंडली के अनुसार जो ग्रह पीडा कारक या के दुःख दायी हो, तो ग्रहो से संबंधित वार के अनुशार व्रत करना चाहिये। ग्रह से संबंधित वार का व्रत करने से ग्रह अपना अशुभ प्रभाव दूर कर शुभ प्रभाव देने हेतु मजबूर जाते हैं, जैसे दुष्ट से दुष्ट व्यक्ति को यदि हम दो हाथ जोड कर प्रणाम कर दे तो उसका भी हृदय परिवर्तन हो जाता हैं। थिक उसी प्रकार यदि प्रतिकूल ग्रहो के दुष्ट प्रभाव को उस ग्रह कि पूजा-अर्चना, मंत्र जाप या व्रत उपवास करने से ग्रहो के भी अशुभ प्रभाव स्वतः दूर हो जाते हैं।

रविवार का व्रत
रविवार का व्रत सूर्य ग्रह को प्रसन्न करने हेतु किया जाता हैं। सूर्य का व्रत करने से हडीया मजबूत होती हैं, पेट संबंधी सभी रोगो का विनाश होता हैं, आंखो कि रोशनी बढती हैं, व्यक्ति का साहर एवं क्षमता में वृद्धि होकर उसका यश चारों और बढता हैं। रविवार का व्रत करने से सूर्य के प्रभाव में आने वाले सभी व्यवसाय एवं वस्तुओ से लाभ प्राप्त होता हैं।

सोमवार का व्रत
सोमवार का व्रत चंद्र ग्रह को प्रसन्न करने हेतु किया जाता हैं। जिस्से व्यक्तिने फेफडे के रोग, दमा, मानसिक रोग से मुक्ति मलती हैं।
व्यक्तिनी चंलता दूर होती हैं, नशे कि लत छुडाने हेतु लाभ प्राप्त होता हैं, स्त्रीओं में मासिक रक्त-स्त्राव कि पीडा कम होती हैं। सोमवार का व्रत शिव को प्रिय हैं इस लिये अविवाहित लडकीयो कें १६ सोमवार का व्रत करने से उत्तम वर कि प्राप्ति होती हैं। सोमवार का व्रत करने से चंद्र के प्रभाव में आने वाले सभी व्यवसाय एवं वस्तुओ से लाभ प्राप्त होता हैं।

मंगलवार का व्रत
मंगल का व्रत मंगल ग्रह को प्रसन्न करने हेतु किया जाता हैं। जिस का व्यक्ति स्वभाव उग्र या हिंसात्मक, अधिक गुस्से वाला हो उनके मंगलवार का व्रत करने से मन शांत होता हैं। मंगलवार का व्रत गणपतीजी, हनुमानजी को प्रसन्न करने हेतु भी किया जाता हैं। मंगलवार का व्रत करने से भूत-प्रेत बाधा दूर होती हैं, व्यक्ति के सभी संकट दूर होजाते हैं। अविवाहित लडको के व्रत करने से
उसकि बुद्धि और बल का विकास होता हैं। मंगलवार का व्रत करने से मंगल के प्रभाव में आने वाले सभी व्यवसाय एवं वस्तुओ से लाभ प्राप्त होता हैं।

बुधवार का व्रत
बुधवार का व्रत बुध ग्रह को प्रसन्न करने हेतु किया जाता हैं। बुधवार का व्रत व्यवसाय करने वालो हेतु लाभदायी होता हैं। बुधवार का व्रत गणेश जी एवं मां दुर्गा कि कृपा प्राप्ति हेतु किया जाता हैं। इस व्रत के करने से बुद्धिका विकास होता हैं, इस दिन व्रत के साथ दुर्गा सप्तशतीका पाठ करने से मनोवांछित फल कि प्राप्ति होती हैं। बुधवार का व्रत करने से बुध के प्रभाव में आने वाले सभी व्यवसाय एवं वस्तुओ से लाभ प्राप्त होता हैं।

गुरुवार का व्रत
गुरुवार का व्रत बृहस्पति ग्रह को प्रसन्न करने हेतु किया जाता हैं। गुरुवार का व्रत करने से धन - संपत्ति कि प्राप्ति होती हैं घर में सुख-शांति और समृद्धि बढती हैं। लडकी के विवाह में आरही बाधाएं दूर होती हैं। गुरुवार का व्रत करने से बृहस्पति के प्रभाव में आने वाले सभी व्यवसाय एवं वस्तुओ से लाभ प्राप्त होता हैं।

शुक्रवार का व्रत
शुक्रवार का व्रत शुक्र ग्रह को प्रसन्न करने हेतु किया जाता हैं। शुक्रवार का व्रत करने से व्यक्ति के सौंदर्य में वृद्धि होती हैं, गुप्त रोगोमें लाभ होता हैं, भोग-विलास कि चिज वस्तु में वृद्धि होती हैं। शुक्रवार का व्रत करने से शुक्र के प्रभाव में आने वाले सभी व्यवसाय एवं वस्तुओ से लाभ प्राप्त होता हैं।

शनिवार का व्रत
शनिवार का व्रत शनि ग्रह को प्रसन्न करने हेतु किया जाता हैं। शनिवार का व्रत करने से संपत्ति में वृद्धि होती हैं, खोया हुवा धन पूनः प्राप्त होता हैं। शिक्षा प्राप्ति में आरहे बाधा विघ्न दूर होते हैं। पेटा और पैर के रोग में लाभ प्राप्त होता हैं, पूराने रोग भी थिक होजाते हैं। शनिवार का व्रत करने से शनि के प्रभाव में आने वाले सभी व्यवसाय एवं वस्तुओ से लाभ प्राप्त होता हैं।

इस प्रकार ग्रहो के शुभ प्राभाव से निश्चिंत लाभ प्राप्त हो्ता हैं इस में जरा भी संदेह नहीं हैं, पूर्ण आस्था एवं विश्वास से किया गया व्रत अधिक प्रभाव शाली होते हैं।

  • व्रत के दिन सुबह या रात्री एक समय सात्विक भोजन करें।
  • कुछ व्रत में फलाहार कर सकते हैं एवं दूध-चाय-कोफी पीसकते हैं।
  • ब्रह्मचर्य का पालन करें।
  • नशे से परहेज करें।

चित्र एवं वास्तु भाग:१

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चित्र एवं वास्तु भाग:१

भवनो में चित्रों का उपयोग अति प्राचीन काल से चला आरहा हैं। वास्तु शास्त्र के विद्वानो ने भवन में चित्रो कि सही दिशा का चुनाव करने से शुभा फलो कि प्राप्ति होती हैं, कई चित्रो में एवं अशुभा प्रभावो को कम करने में भी समर्थ होते हैं। वास्तु शास्त्र के प्राचीन ग्रंथों में चित्रों के माध्यम से वास्तु के अनेक दोषों को दूर करने हेतु उपाय बताये गये हैं।

उचित जानकारी के अभाव में लोग अपनी इच्छा के अनुसार कहीं भी किसी भी प्रकर के चित्र लगा लेते हैं, जिस्से विपरीत परिणाम प्राप्त होते देखे गये है।

भवन को वास्तु दोषों से मुक्त रखने हेतु कौन से चित्र कहां लगाने से शुभ-अशुभा होता हैं उसे जान ना अति आवश्यक हैं।


  • धन प्राप्ति हेतु भवन में लक्ष्मी कि से खुले पैरो वाला फोटो लगाये।

  • जिनका मन हमेशा अशांत रहता हो उसे उत्तर पूर्व में बगुले का चित्र लगाना चाहिए, जो ध्यान की मुद्रा में हो।

  • भवन में देवी-देवता के चित्र लगान शुभा होता हैं।

  • देवी-देवता के पासमें अपने स्वर्गीय परिजनों के फोटो नहीं लगाने चाहिए।

  • स्वर्गीय परिजनों के फोटो लगाने हेतु पूर्व या उत्तर दिशा की दीवारों का प्रयोग करना चाहिए।

  • अध्ययन कक्ष में सरस्वती माता एवं गुरुजनों के चित्र लगाना शुभ होता हैं।

  • गुरु-संतो-ऋषि मुनि के आदर्शवादी चित्र आपकी बेठक से पीछे लगाने से साहस कि वृद्धि होती हैं।

  • पर्वत के चित्र भी आपकी पीठ के पीछे लगाये।

  • जल, जलाशय, झरने का चित्र उत्तर पूर्व में शुभ होता हैं।

  • परिवार में कलह होने पर सभी सदस्यो कि एक साथ खिची हुइ फोटो नैऋत्य कोण में लगाये।

  • भवन में युद्ध, लड़ाई-झगड़े, हिंसक पशु-पक्षियों के चित्र व मूर्तियाँ नहीं रखना चाहिए, इस्से भवन में क्लेश बढता हैं।

  • भयानक चित्र , पेंटिंग या मूर्ति आदि नहीं लगाने से छोटे बच्चे भय ग्रस्त होते देखा गया हैं।

शनिवार, जून 19, 2010

धनवंतरि स्तोत्रम्

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॥ धनवंतरि स्तोत्रम्॥

ॐ शंखम् चक्रम् जलौकाम् दधदमृतघटम् चारुदोर्भिश्चतु्र्भिः
सूक्ष्मस्वच्छातिहृद्यांशुक परिविलसन्मौलिमंभोजनेत्रम्।

कालाम्भोदोज्ज्वलान्गम् कटितटविलस्च्चारुपीताम्बराढयम्
वन्दे धनवंतरिं तं निखिलगदवनप्रौढदावाग्निलीलम्॥

॥इति श्री धनवंतरि स्तोत्रम् संपूर्णम्॥

हस्त रेखा एवं रोग (भाग:2)

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हस्त रेखा एवं रोग (भाग:2)

* हृदय रेख पर काला बिंदु होना, या आयु रेखा पर नीला धब्बा हो, या हाथ में स्वास्थ्य रेखाटूटी-फूटी हो, या मस्तक रेखा के मध्य में काला धब्बा हो तो व्यक्ति को ज्वर से पीड़ा होती हैं।
* यदि चंद्र पर्वत पर गहरी धारियां हों, या मस्तक रेखा धुमावदार या टूटी हुई हो, या मस्तक रेखा पर क्रॉस का चिन्ह हो, या मस्तक रेखा का शनि पर्वत के निकट अंत होती हों , तो व्यक्ति की मानसिक बीमारी से ग्रसित होता हैं।
* मस्तक रेखा शनि पर्वत के नीचे टूट कर खत्म होती हो, चंद्र पर्वत पर टेढी-मेढी रेखाए हों, हृदय रेखा जंजीर के समान हों कर अस्पष्ट हो, तो व्यक्ति
को पथरी रोग होने कि संभावना रहती हैं।
* यदि हथेली कि रेखाएं पीली हो, या गुरु पर्वत अधिक उन्नत हुआ हो, या नख लंबे एवं काले हो,मस्तक रेखा और शनि पर्वत के नीचे कि रेखा जंजीरनुमा हो, तीनों मुख्य रेखाओं को कोई रेखा काट रही हो, तो व्यक्ति को क्षय रोग एवं फेफड़ों से संबंधित रोग हो जाता हैं।
* शनि पर्वत पर जाली हो, या कोई रेखा आयु रेखा एवं मस्तक रेखा को काटकर जाली को छुती हो, या चंद्रमा पर्वत पर क्रॉस हो, चंद्रमा पर्वत पर अस्त-व्यस्त रेखाएं हों, स्वास्थ्य रेख धुमती हुइ शुक्र पर्वत से जुडती हुइ कोई रेखा आयु रेखा को काटकर मस्तक रेखा को काटती हुई हृदय रेखा से मिलती हो, तो व्यक्ति मधुमेह से पीड़ित रहता हैं।
* यदि हथेली अधिक पतली एवं लंबी हो, अंगुलियां भी अधिक लचीली हो, या हथेली से थोडि बड़ी हो, या मस्तक रेखा तथा हृदय रेखा के बीच में अधिक अंतर हो, ग्रह पर्वतों की मुडने वाली ऊर्ध्वागामी रेखाएं अधिक हो, तो व्यक्ति मस्तक ज्वर से पीड़ित होता हैं।
* यदि चंद्र पर्वत काफी उन्नत हो चंद्र पर्वत के नीचे का भाग पर काफी रेखाएं हों, आयु रेखा को छुती हुई कोई रेखा चंद्र पर्वत की ओर जा रही हो, तो व्यक्ति व्यक्ति को मूत्र संबंधी बीमारियां पीड़ित करती हैं।

शुक्रवार, जून 18, 2010

कोर्ट-केश एवं ज्योतिष (भाग:२)

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कोर्ट-केश एवं ज्योतिष (भाग:२)

पोस्ट सौजन्य: चिंतन जोशि, स्वस्तिक,


न्यायालय क्षेत्र कोनसा होगा ?
जन्म कुन्डली या प्रश्न कुन्डली में शनि कि स्थिती से व्यक्ति उच्च न्यायालय में जायगा या नीचें कि अदालत में जायेगा इसका पता लगाने हेतु शनि कि उच्च एवं नीच भावों में स्थिती से लगाया जाता हैं यदि शनि उच्च है तो न्याय उच्च नयायालय से प्राप्त होने के योग बनाता हैं एवं नीचस्थ हैं तो नीचे कि नयायालय में न्याय प्राप्ति हेतु चक्कर लगाना पडता हैं।

नोट:यदि शनि पर मित्र ग्रहो के अधिक प्रभाव में होतो मामला ग्राम-पंचायत, पुलिस थाना या आपस में हि सुलझ जाते देखे गये हैं।



वकील केसा मिलेगा ?
जन्म कुन्डली या प्रश्न कुन्डली के माध्यम से न्याय प्राप्ति हेतु वकील केसा मिलेगा? इसका पता भी लगाय जासकता हैं।
जन्म कुन्डली या प्रश्न कुन्डली में शनि एवं केतु के यदि अच्छि स्थिती में होतो वकील उत्तम मिलता हैं एवं न्याय शीध्र प्राप्त होने के योग प्रबल बनते हैं। और यदि शनि एवं केतु खराब स्थिती में हो, तो शनि एवं केतु कि स्थिती जब तक अनुकूल नहीं होती तब तक या तो वकिल बार-बार बदलने पडते हैं यातो परेशान करते रेहते हैं।


जज केसा होगा?
जन्म कुन्डली या प्रश्न कुन्डली में गुरु (बृहस्पति) कोन से भाव में स्थित होकर कितना बलशाली हैं. कौन से ग्रहो पर गुरु द्रष्टि डाल रहा और हैं और गुरु किन ग्रहो से द्रष्ट हैं जज का अंतिम निर्णय उसी के अनुरुप प्रदान होता हैं।

(क्रमश: ......)

अधिक जानकारी हेतु या उपाय जानने हेतु आप हमसे संपर्क कर सकते हैं।

GURUTVA KARYALAY
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पंच महाभूत तत्व एवं वास्तु (भाग:२)

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पंच महाभूत तत्व एवं वास्तु (भाग:२)

पृथ्वी तत्व
पृथ्वी भी सौरमण्डल के अन्य ग्रहों मे से एक हैं। सौरमण्डल के सभी ग्रह सूर्य के अंश हैं, सभी ग्रह कि उत्पत्ति सूर्य से टूटने के बाद हुई हैं, उसी प्रकार पृथ्वी कि उत्पत्ति भी सूर्य के अंश से टूटकर लाखों वर्ष पूर्व हुई हैं। पृथ्वी एवं सौरमण्डल के अन्य सभी ग्रह सूर्य से टूट कर उसके इर्द-र्गिद घुमते हुए धीरे-धीरे सूर्य से दूर होते गयें एवं धीरे-धीरे ठंडे होते गएं। पृथ्वी सूर्य के चक्कर काटने के साथ-साथ अपनी निश्चित धुरी पर 23 डिग्री मे निरंतर घूम रही हैं। पृथ्वी पर पानी, गुरूत्वाकर्षण शक्ति तथा दक्षिण-उत्तर ध्रुविय तरंगे पृथ्वी पर एवं पृथ्वी से थोडी दूर तक सभी जीव-निर्जीव वस्तुओं को प्रभावित करती हैं। परंतु अन्य सभी ग्रहो से विपरीत पृथ्वी पर लम्बे समय तक रसायनिक क्रियाओ के फल स्वरूप पृथ्वी पर प्राकृतिक स्थलों, पर्वतों, नदियों व मैदानों आदि का जन्म हुआ, जिस्से धीरे-धीरे पृथ्वी पर जीव विकसीत होने लगे जो अन्य किसी ग्रह पर जीव के अधिक विकसीत होने के पुख्ता सबुन न होकर अभी तक सिर्फ रहस्य का विषय बन कर रह गया हैं।

इन सभी ग्रहो में सिर्फ और सिर्फ पृथ्वी ही जीवनदायिनी और पालनहार हैं। पृथ्वी कि इसी अद्वितिय क्षमता के कारण आज पृथ्वी पर जीव के निवास हेतु भवन निर्माण का कार्य होता हैं, वास्तु सिद्धांत के अनुशार पंच माहाभूत तत्व के महत्व पूर्ण तत्व पृथ्वी तत्व के बिना भवन निर्माण संभव नही हो सकता। इस लिये वास्तु के प्राचीन ग्रन्थों मे पृथ्वी की महवत्ता को ध्यान में रख कर भवन निर्माण करने पर जोर दियागया हैं।

इस लिये हमारी संस्कृति में धरति को मां कहाजाता हैं क्योकि यह समारा भरण पोषण एवं पालन करती हैं इसी लिये गृह निर्माण से पूर्व सर्व प्रथम भूमि पूजन करने का विधान हैं।



जल तत्व
जल ही जीवन है इस बात से हर कोई परिचित हैं, क्योकि हर कोइ जानता हैं हर जीव किसी ना किसी रुप से जल तत्व से जुडा हुवा हैं एवं बगैर जल के किसी जीव का अस्तित्व लम्बे समय तक नहीं रह सकता इसी प्रकार वास्तु भी पूर्णतः जल तत्व से जुडा हुवा हैं, एवं मनुष्य को अत्याधिक प्रभावित करता हैं।
सृष्टि का मुख्य आधार जलचक्र ही हैं। सागर, नदियों, नहरों, तालाबो इत्यादि का जल वाष्प बनकर वायुमंडल से होते हुए आकाश में बादल के रूप मे निर्मित होकर वर्षा के स्वरुप में पूनः जल रूप में पृथ्वी पर आ जाता हैं। इसी कारण से जीवन चक्र कायम हैं।
विज्ञान का मुख्य सिद्धात में पानी कि संज्ञा H2O हैं, अर्थांत पानी में हाइड्रोजन के २ अणु एवं ओक्सीजन के एक अणु होते हैं, एवं ओक्सीजन के माध्यम से प्रायः सभी जीव श्वास के माध्यम से ओक्सीजन लेते हैं। इसी लिये उसे प्राण वायु कहा जाता क्योकि यह हमे जीवीत रखता हैं।
मानव शरीर भी इन पंच महाभूत तत्वो से हि बना हैं, इसमे से कोइ एक तत्व का संतुलन बिगड जाये तो शरीर मे रोग उत्पन्न होजाते हैं, हालांकि सभी पंच तत्वो को एज दूसरे से मिलकर हि प्रभावशाली होते हैं, सभी तत्व यदि अलग-अलग हो तो उनका कोइ महत्व नहीं रह जाता। जल मानव जीवन हेतु अत्यंत आवश्यक तत्व हैं इसी लिये आदिकाल से पृथ्वी कि सारी संस्कृतिया कि उत्पत्ती एवं विकास जल के किनारे हि हुवा हैं।
वास्तु सिद्धांत के अनुशार जल तत्व को भवन निर्माण एवं भवन निवास में हेतु इसके सन्तुलन को ध्यान मे रखना जरूरी हैं।

संवत्सर एवं युगफल

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संवत्सर एवं युगफल

शास्त्र के अनुशार साठ संवत्सरोमें बारह युग होते हैं और एक युग पांच वर्षका होता हैं एवं साठ (60) वर्ष अर्थात् संवत्सरोंमें बारह युग कहे हैं ॥

  1. प्रथम युगमें जन्म लेनेसे मनुष्य मदिरा मांस प्रेमी करने वाला, सदा पराई स्त्रीमें रत रहने वाला, कवि, कारीगरीकी विद्या जानने वाला और चतुर होता हैं।

  2. दूसरे युगमें जन्म लेनेसे मनुष्य सर्वदा वाणिज्य कर्ममें व्यवहार करने वाला, धर्मवान्, अच्छे पुरुषोंकी संगति करने वाला, धनका अधिक लोभी और पापी होता हैं।

  3. तीसरे युगमें जन्म लेनेसे मनुष्य भोगी, दानी, उपकार करने वाला, ब्राह्मण और देवताओं को पूजने वाला तेजवान् और धनवान् होता हैं।

  4. चौथे युगमें जन्म लेनेसे मनुष्य बाग, खेतकी प्राप्ति करने वाला, औषधीको सेवन करने वाला रोगी और धातुवादमें घननाश करनेवाला होता हैं।

  5. पांचवे युगमें जन्म लेनेसे मनुष्य पुत्रवान्, धनवान्, इन्द्रियों को जीतने वाला और पिता-माताका प्रिय होता हैं।

  6. छठे युगमें जन्म लेनेसे मनुष्य सदा नीच शत्रुओं से पीडित, पशु प्रेम, पत्थरसे चोट पाने वाला और भयसे पीडित होता हैं।

  7. सातवें युगमें जन्म लेनेसे मनुष्य बहुत प्रिय मित्रों युक्त, व्यापार में कपट करने वाला, जल्दी चलने वाला तथा कामी होता हैं।

  8. आठवें युगमें उत्पन्न होनेसे मनुष्य सदा पापकर्म करने वाला, असंतोषी, व्याधि दुःखसे युक्त और दूसरों की हिंसा करने वाला होता हैं।

  9. नवम युगमें जन्म लेनेसे मनुष्य बावडी, कुंआ तलाब तथा देवदीक्षा और अभ्यागत में रुचि रखने वाला राजा के समान होता हैं। 

  10. दशम युगमें जन्म लेनेसे मनुष्य राज अधिकारी, मंत्री, स्थानप्राप्ति करनेवाला, बहुत सुखी, सुंदर वेष एवं रुपवाला, और दानी होता हैं।

  11. जिसका जन्म ग्यारहवें युगमें हो वह मनुष्य बुद्धिमान्, सुंदर शीलवान्, देवताओं को मानने वाला और युद्धमें निपूर्ण होता हैं।

  12. बारहवें युगमें जन्म लेने वाला मनुष्य तेजस्वी, प्रसन्न चित्तवाला, मनुष्योमें श्रेष्ठ खेती व वाणिज्य कर्म करनेवाला होता हैं।

गुरुवार, जून 17, 2010

वास्तु एवं शिलान्यास

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वास्तु एवं शिलान्यास
  • भूमि पर शिलान्यास सर्व प्रथम आग्नेय कोणमें करना शुभ होता हैं।
  • आग्नेय कोणमें में शिलान्यास करने के बाद अन्य सभी निर्माण प्रदक्षिणा क्रमसे (घडि कि दिशा में, (क्लोक वाईज) शुभ माना गया हैं।
  • दक्षिण में गृह निर्माण कि समाप्ति होने से भवन स्वामी के धनका नाश, स्त्री में विकार उत्पन्न होने लगते हैं एवं पुत्र संतान कि आयु क्षीण होती हैं।
  • आकाश में ध्रुव तारे को देखकर अथवा स्मरण कर नींव रखनी अति शुभ होती हैं।
  • मध्याह, मध्य रात्रि तथा सन्ध्या कालमें शिलान्यास हेतु नींव नहीं रखनी चाहिये। मध्याह्ल तथा मध्य रात्रिमें शिलान्यास करनेसे व्यक्ति के धन एवं स्वास्थय का नाश होता हैं।
  • शिलान्यास हेतु चौकोर एवं अखण्ड शिला लेनी शुभ होती हैं। ।
  • अधिक लम्बी,अधिक छोटी, असमान समतल वाली, काले रंग की एवं टूटी-फूटी शिला लेने से अशुभ तथा भय कि प्राप्ति होती हैं ।

मंगलवार, जून 15, 2010

एकदन्त शरणागति स्तोत्रम्

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एकदन्त शरणागति स्तोत्रम्

एकदन्तम् शरणम् व्रजाम:

देवर्षय ऊचु:

सदात्मरूपं सकलादिभूतममायिनं सोऽहमचिन्त्यबोधम्।
अनादिमध्यान्तविहीनमेकं तमेकदन्तं शरणं व्रजाम:॥

अनन्तचिद्रूपमयं गणेशमभेदभेदादिविहीनमाद्यम्।
हृदि प्रकाशस्य धरं स्वधीस्थं तमेकदन्तं शरणं व्रजाम:॥

समाधिसंस्थं हृदि योगिनां यं प्रकाशरूपेण विभातमेतम्।
सदा निरालम्बसमाधिगम्यं तमेकदन्तं शरणं व्रजाम:॥

स्वबिम्बभावेन विलासयुक्तां प्रत्यक्षमायां विविधस्वरूपाम्।
स्ववीर्यकं तत्र ददाति यो वै तमेकदन्तं शरणं व्रजाम:॥

त्वदीयवीर्येण समर्थभूतस्वमायया संरचितं च विश्वम्।
तुरीयकं ह्यात्मप्रतीतिसंज्ञं तमेकदन्तं शरणं व्रजाम:॥

त्वदीयसत्ताधरमेकदन्तं गुणेश्वरं यं गुणबोधितारम्।
भजन्तमत्यन्तमजं त्रिसंस्थं तमेकदन्तं शरणं व्रजाम:॥

ततस्त्वया प्रेरितनादकेन सुषुप्तिसंज्ञं रचितं जगद् वै।
समानरूपं ह्युभयत्रसंस्थं तमेकदन्तं शरणं व्रजाम:॥

तदेव विश्वं कृपया प्रभूतं द्विभावमादौ तमसा विभान्तम्।
अनेकरूपं च तथैकभूतं तमेकदन्तं शरणं व्रजाम:॥

ततस्त्वया प्रेरितकेन सृष्टं बभूव सूक्ष्मं जगदेकसंस्थम्।
सुसात्ति्‍‌वकं स्वपन्मनन्तमाद्यं तमेकदन्तं शरणं व्रजाम:॥

तदेव स्वपन् तपसा गणेश सुसिद्धरूपं विविधं बभूव।
सदैकरूपं कृपया च तेऽद्य तमेकदन्तं शरणं व्रजाम:॥

त्वदाज्ञया तेन त्वया हृदिस्थं तथा सुसृष्टं जगदंशरूपम्।
विभिन्नजाग्रन्मयमप्रमेयं तमेकदन्तं शरणं व्रजाम:॥

तदेव जाग्रद्रजसा विभातं विलोकितं त्वत्कृपया स्मृतेन।
बभूव भिन्न च सदैकरूपं तमेकदन्तं शरणं व्रजाम:॥

सदेव सृष्टिप्रकृतिस्वभावात्तदन्तरे त्वं च विभासि नित्यम्।
धिय: प्रदाता गणनाथ एकस्तमेकदन्तं शरणं व्रजाम:॥

त्वदाज्ञया भान्ति ग्रहाश्च सर्वे प्रकाशरूपाणि विभान्ति खे वै।
भ्रमन्ति नित्यं स्वविहारकार्यास्तमेकदन्तं शरणं व्रजाम:॥

त्वदाज्ञया सृष्टिकरो विधाता त्वदाज्ञया पालक एकविष्णु:।
त्वदाज्ञया संहरको हरोऽपि तमेकदन्तं शरणं व्रजाम:॥

यदाज्ञया भूमिजलेऽत्र संस्थे यदाज्ञयाप: प्रवहन्ति नद्य:।
स्वतीर्थसंस्थश्च कृत: समुद्रस्तमेकदन्तं शरणं व्रजाम:॥

यदाज्ञया देवगणा दिविस्था ददन्ति वै कर्मफलानि नित्यम्।
यदाज्ञया शैलगणा: स्थिरा वै तमेकदन्तं शरणं व्रजाम:।

यदाज्ञया देवगणा दिविस्था ददन्ति वै कर्मफलानि नित्यम्।
यदाज्ञया शैलगणा: स्थिरा वै तमेकदन्तं शरणं व्रजाम:॥

यदाज्ञया शेषधराधरो वै यदाज्ञया मोहप्रदश्च काम:।
यदाज्ञया कालधरोऽर्यमा च तमेकदन्तं शरणं व्रजाम:॥

यदाज्ञया वाति विभाति वायुर्यदाज्ञयागि‌र्न्जठरादिसंस्थ:।
यदाज्ञयेदं सचराचरं च तमेकदन्तं शरणं व्रजाम:॥

यदन्तरे संस्थितमेकदन्तस्तदाज्ञया सर्वमिदं विभाति।
अनन्तरूपं हृदि बोधकं यस्तमेकदन्तं शरणं व्रजाम:॥

सुयोगिनो योगबलेन साध्यं प्रकुर्वते क: स्तवनेन स्तौति।
अत: प्रणामेन सुसिद्धिदोऽस्तु तमेकदन्तं शरणं व्रजाम:॥

गृत्समद उवाच

एवं स्तुत्वा गणेशानं देवा: समुनय: प्रभुम्।
तृष्णीं भावं प्रपद्यैव ननृतुर्हर्षसंयुता:॥

स तानुवाच प्रीतात्मा देवर्षीणां स्तवेन वै।
एकदन्तो महाभागो देवर्षीन् भक्तवत्सल:॥

एकदन्त उवाच

स्तोत्रेणाहं प्रसन्नोऽस्मि सुरा: सर्षिगणा: किल।
वरदोऽहं वृणुत वो दास्यामि मनसीप्सितम्॥

भवत्कृतं मदीयं यत् स्तोत्रं प्रीतिप्रदं च तत्।
भविष्यति न संदेह: सर्वसिद्धिप्रदायकम्॥

यं यमिच्छति तं तं वै दास्यामि स्तोत्रपाठत:।
पुत्रपौत्रादिकं सर्व कलत्रं धनधान्यकम्॥

गजाश्वादिकमत्यन्तं राज्यभोगादिकं ध्रुवम्।
भुक्तिं मुक्तिं च योगं वै लभते शान्तिदायकम्॥

मारणोच्चाटनादीनि राजबन्धादिकं च यत्।
पठतां श्रृण्वतां नृणां भवेच्च बन्धहीनता॥

एकविंशतिवारं य: श्लोकानेवैकविंशतीन्।
पठेच्च हृदि मां स्मृत्वा दिनानि त्वेकविंशतिम्॥

न तस्य दुर्लभं किञ्चत् त्रिषु लोकेषु वै भवेत्।
असाध्यं साध्येन्म‌र्त्य: सर्वत्र विजयी भवेत्॥

नित्यं य: पठति स्तोत्रं ब्रह्मभूत: स वै नर:।
तस्य दर्शनत: सर्वे देवा: पूता भवन्ति च॥
  • प्रतिदिन इस इक्कीस श्लोकों का इक्कीस दिनों तक प्रतिदिन इक्कीस बार पाठ करता हैं उसे सर्वत्र विजय प्राप्त होती हैं।
  • इस स्तोत्र के पाठ से व्यक्ति को सर्व इच्छीत वस्तु कि प्राप्ति होती हैं। पुत्र-पौत्र आदि, कलत्र, धन-धान्य, उत्तम वाहन एवं समस्त भौतिक सुख साधनो एवं शांति कि प्राप्ति होती हैं।
  • अन्य द्वारा किये जाने वाले मारण, उच्चाटन और मोहन आदि प्रयोग से व्यक्ति कि रक्षा होती हैं।

विद्या प्राप्ति के विलक्षन उपाय भाग:3

Vidya Prapti ke Vilakshan Upay (Totke / Totake) (Bhag-3 / Part-3)




विद्या प्राप्ति के विलक्षन उपाय भाग:३

कई बच्चों को घंटो-घंटो पढाई करने के उपरांत भी स्मरण नहीं रहता। परिक्षा में उत्तर देते समय उसने पढा हुआ भूल जाते हैं। एसी स्थिती में बच्चे के साथ माता पिता भी परेशान रहते हैं कि इतना पढने के उपरांत बच्चे को याद नहि रह पाता? इसका कारण काया हैं? और उपाय क्या हैं? यदि बच्चा पढाई नही करता तो अलग बात होजाती हैं, परंतु पढने के पश्चयार भी याद नहीं रहे तो इस मे बच्चा करे तो क्या करें? यह सबसे बडीं समस्या हो जाती हैं।

एसी स्थिती में विद्या प्राप्ति हेतु एवं स्मरण शक्ति बढाने हेतु जो बच्चे +10 से उपर के क्लास में पढते हैं उनके लिये हैं।

प्रयोग 1:
रात्री 8-9 बजे भोजन कर 30-45 मिनिट पश्चयात बायीं (Left) करवट लेकर ढाई घंटे के लिये सोजाये, पुनः दाई (Right) करवट लेकर ढाई घंटे के लिये सोजाये, तत पश्चयात उठकर हाथ मुह धोकर सीधे बैठ कर पढाई शुरु कर दें, एसा नियमित करने से अविश्वसनिय लाभ प्राप्त होता हैं। यह एक अनुभूत प्रयोग हैं


प्रयोग 2:
रात्री 8-9 बजे भोजन कर 30-45 मिनिट पश्चयात सोजाए, रात्री को 2 बजे या 2.30 बजे उठकर हाथ मुह धोकर सीधे बैठ कर पढाई शुरु करदें इस्से अपने आप पढाई में मन लगने लगेगा।


प्रयोग करने से लाभ:
वर्तमान समय में बच्चे दिन से लेकर रात्री 2-3-4 बजे तक पढाई करते रहते हैं, और सुबह 5-6-7 बजें उठ कर फ़िर से पढाई करना शुरु करदेते हैं जिस्से पर्याप्त नींद न मिलने के कारण बच्चें को पढाई बोझ लगने लगती हैं। एवं जितना चाहे पढले बच्चा परिणाम अनूकुल नहीं मिलपाता।

इसका कारण अती सरल हैं। दिन भर कि थकावट के कारण, अपने दैनिक कार्य से विपरित बेठकर पढाई करने के कारण एवं पर्याप्त नींद नहीं मिलने के कारण पढाइ के समय मन नहीं लग पाता। घर में अन्य सदस्यो के आवागमन के कारण बच्चें पढाई में एकाग्रता नहीं होने के कारण भी एक ही विषय को बार-बार लगातार पढते रहना पडता हैं इस मे समय कि खपत अधिक होती हैं, जिस्से बच्चे तनाव सा महसूस करते हैं।

कुछ बच्चे सुबह जल्द उठ कर पढाई करतें हैं एसी स्थिती में सुबह 5-6 बजे पढाई के लिये बेठने पर कुछ समय के लिये एकाग्रता रह पाती हैं पश्चयात घर वालो के जागने पर एकाग्रता कम होने लगती हैं।

इस लिये रात्री 8-9 बजे सोकर 2- 2.30 बजे उठने पर पढाई करने हेतु अधिक समय मिलजाता हैं एवं वातावरण में शांति होने के कारण एकाग्रता लंबे समय तक बनी रहती हैं।

सोमवार, जून 14, 2010

अंगारकी वरदविनायक चतुर्थी- 15-June-2010

Angaraki Varad vinayak chaturthi Vrat गणेश चतुर्थी,

अंगारकी वरद विनायक चतुर्थी- 15-जुन-2010

अधिक जानकारे हेतु यहां क्लिक करें

>> अंगारकी वरदविनायक चतुर्थी,


>> http://gurutvakaryalay.blogspot.com/2010/02/blog-post_1765.html

कोर्ट-केश एवं ज्योतिष (भाग:१)

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कोर्ट-केश एवं ज्योतिष (भाग:१)

पोस्ट सौजन्य:  चिंतन जोशि, स्वस्तिक,

आजके युग में कुछ व्यक्ति को न्याय प्राप्त करने हेतु या स्वयं द्वारा किये गये कार्य अथवा अन्य झुठे मामलो के कारन कोर्ट के चक्कर बार-बार लगाने पडते हैं। न्याय प्राप्त होने तक कुछ मामलो में व्यक्ति को महिनो कि जगह सालो लग जाते हैं कोर्ट के चक्कर लगाते लगाते? लेकिन केश खत्म होने का नाम नहीं लेते। एसे में व्यक्ति अनेको प्रकार कि आशंका से ग्रस्त हो कर अशांति से सम्मुखीन हो जाता हैं।
न्याय के नजरिये से देखे तो अक्सर यही सुन्ने में आता हैं, देर सवेर हि सही जीत हमेसा सच्चाई कि हि होती हैं..... क्या यह वाक्य सब पर लागू होते हैं? नहीं ना? कभी कभी कुछ बेगुनाह लोग भी समय कि विवशता के अधिन होकर परेशानी उठाते देखे जाते हैं।
यदि एसे मामलो को बौधिक द्रष्टी कोण से विचार करें तो हमारी मानसिकता कुछ एसी होती हैं कि अगर किसी व्यक्ति को किसी प्रकार का छल या फ़रेब के कारणा न्यायालय से न्याय नही प्राप्त होता, तो ईश्वर शक्तिया अपने द्वारा उसे सजा देती हैं, यह कितना सत्य हैं यह तो सबका अपना अपना एक नजरीया होता हैं। लेकिन वास्तविकता सबके लिये समान हो यह जरुरी नहीं हैं।
वास्तविकता चाहे जो हो ज्योतिष के मूल सिद्धांत के आधार पर गणना कर कोर्ट से संबंधिक सभी प्रकार कि समस्या का उत्तर प्राप्त हो सकता हैं, एवं विभिन्न संस्कृति में मंत्र-यंत्र-तंत्र के प्रयोगो से शीघ्र सफलता प्राप्त करने हेतु अनेको उपाय उपलब्ध हैं।


स्वयं के कोर्ट में जाने का कारण?
  • स्वयं के कोर्ट में जाने का कारण जन्म कुन्डली या प्रश्न कुन्डली में लग्न और लगनेश के स्थान से पता किया जाता है, लगनेश पर
  • जब शुभ या अशुभ ग्रह अपना प्रभाव डाल रहे हों, उसमे से जो ग्रह अपना अशुभ प्रभाव देता हैं, वही कारण स्वयं के न्यायालय में जाने का कारण होता है।

 विरोधि पक्ष कि हार जित का निर्णय?

  • जन्म कुन्डली या प्रश्न कुन्डली में सप्तम स्थान विरोधि पक्ष का होता हैं।
  • यदि कुन्डली मे सप्तम भाव का स्वामी बलवान हो, तो विरोधि पक्ष कि जित होती हैं।
  • यदि कुन्डली मे सप्तम भाव का स्वामी कमजोर हो, तो विरोधि पक्ष को पराजय मिलती हैं।
  • जब सप्तम भाव का स्वामी का प्रभाव जिस राशि एवं ग्रहों पर होता हैं, विरोधि पक्ष उन स्थानो पर अपना अशुभ प्रभाव देता हैं।                                           
(क्रमश: ......)
 
 
अधिक जानकारी हेतु या उपाय जानने हेतु आप हमसे संपर्क कर सकते हैं।


GURUTVA KARYALAY


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रविवार, जून 13, 2010

पति-पत्नी में कलह निवारण हेतु

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पति-पत्नी में कलह निवारण हेतु


यदि परिवारों में सुख सुविधा के समस्त साधान होते हुए भी छोटी-छोटी बातो में पति-पत्नी के बिच मे कलह होता रहता हैं, तो निम्न मंत्र का जाप करने से पति-पत्नी के बिचमें शांति का वातावरण बनेगा


मंत्र -
 धं धिं धुम धुर्जते पत्नी वां वीं बूम वाग्धिश्वरि।
क्रं क्रीं क्रूं कालिका देवी शं षीम शूं में शुभम कुरु॥

यदि पत्नी यह प्रयोग कर रही हैं तो पत्नी की जगह पति शब्द का उच्चारण करे

प्रयोग विधि –

  •  प्रातः स्नान इत्यादी से निवृत्त हो कर के दूर्गा या मां काली देवी के चित्र पर लाल पुष्प भेटा कर  धूप-दीप जला के सिद्ध स्फटिक माला से 21 दिन तक 108 बार जाप करे लाभा प्राप्त होता हैं।
  • शीध्र लाभ प्राप्ति हेतु प्रयोग करने से पूर्व मां के मंदिर में अपनी समर्थता के अनुशार अर्थ या वस्त्र भेट करें।
  • लाभ प्राप्ति के पश्चयात माला को जल प्रवाह कर दें।

यदि आप इस  प्रयोग विधि करने में असमर्थ हैं?, तो आप हमसे संपर्क कर अन्य उपाय जान सकते हैं।

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शुक्रवार, जून 11, 2010

गणेश कवचम्

Ganesh Kavacham, Ganesh kawacham

गणेश कवचम्

संसारमोहनस्यास्य कवचस्य प्रजापतिः।
ऋषिश्छन्दश्च बृहती देवो लम्बोदर: स्वयम्॥

धर्मार्थकाममोक्षेषु विनियोग: प्रकीर्तितः।
सर्वेषां कवचानां च सारभूतमिदं मुने॥

ॐ गं हुं श्रीगणेशाय स्वाहा मे पातु मस्तकम्।
द्वात्रिंशदक्षरो मन्त्रो ललाटं मे सदावतु॥

ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं गमिति च संततं पातु लोचनम्।
तालुकं पातु विघनेश: संततं धरणीतले॥

ॐ ह्रीं श्रीं क्लीमिति च संततं पातु नासिकाम्।
ॐ गौं गं शूर्पकर्णाय स्वाहा पात्वधरं मम॥

दन्तानि तालुकां जिह्वां पातु मे षोडशाक्षरः॥
ॐ लं श्रीं लम्बोदरायेति स्वाहा गण्डं सदावतु।

ॐ क्लीं ह्रीं विघन्नाशाय स्वाहा कर्ण सदावतु॥

ॐ श्रीं गं गजाननायेति स्वाहा स्कन्धं सदावतु।
ॐ ह्रीं विनायकायेति स्वाहा पृष्ठं सदावतु॥

ॐ क्लीं ह्रीमिति कङ्कालं पातु वक्ष:स्थलं च गम्।
करौ पादौ सदा पातु सर्वाङ्गं विघन्निघन्कृत्॥

प्राच्यां लम्बोदर: पातु आगनेय्यां विघन्नायकः।
दक्षिणे पातु विघनेशो नैर्ऋत्यां तु गजाननः॥

पश्चिमे पार्वतीपुत्रो वायव्यां शंकरात्मजः॥
कृष्णस्यांशश्चोत्तरे च परिपूर्णतमस्य च॥

ऐशान्यामेकदन्तश्च हेरम्ब: पातु चो‌र्ध्वतः।
अधो गणाधिप: पातु सर्वपूज्यश्च सर्वतः॥

स्वप्ने जागरणे चैव पातु मां योगिनां गुरुः।

इति ते कथितं वत्स सर्वमन्त्रौघविग्रहम्।
संसारमोहनं नाम कवचं परमाद्भुतम्॥

श्रीकृष्णेन पुरा दत्तं गोलोके रासमण्डले।
वृन्दावने विनीताय मह्यं दिनकरात्मजः॥

मया दत्तं च तुभ्यं च यस्मै कस्मै न दास्यसि।
परं वरं सर्वपूज्यं सर्वसङ्कटतारणम्॥

गुरुमभ्य‌र्च्य विधिवत् कवचं धारयेत्तु यः।
कण्ठे वा दक्षिणे बाहौ सोऽपि विष्णुर्न संशयः॥

अश्वमेधसहस्त्राणि वाजपेयशतानि च।
ग्रहेन्द्रकवचस्यास्य कलां नार्हन्ति षोडशीम्॥

इदं कवचमज्ञात्वा यो भजेच्छंकरात्मजम्।
शतलक्षप्रजप्तोऽपि न मन्त्र: सिद्धिदायकः॥

॥ इति श्री गणेश कवच संपूर्णम्॥

सोमवार, जून 07, 2010

हस्त रेखा एवं रोग (भाग:1)

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हस्त रेखा एवं रोग (भाग:1)

व्यक्ति कि हथेली में विभिन्न प्रकार कि रेखाऎ, पर्वत एवं उन पर उभर कर आने वाले तरह तरह के चिह्न के बदलाव से व्यक्ति को होने वाली बीमारियों का अंदाजा लगाया जासकता हैं।

हर ग्रह के कुछ निश्चित चिह्न होते हैं। इन चिह्नो का प्रभाव हथेली में ग्रह के पर्वत पर होंने के अनुरुप  शुभ-अशुभ फल कि प्राप्ति होती हैं।

* हमे शक्ति प्रदान करने वाली सूर्य रेखा एवं स्वास्थ्य रेखा सूर्य पवर्त के समीप पाई जाती हैं।

* यदि हथेली में शनि एवं सूर्य का संबंध हो जाए तो व्यक्ति कब्ज से पीडा होती हैं।

* जिस व्यक्ति के हाथ में हृदय रेखा कमजोर होती हैं एवं भाग्य रेखा एकदम स्पष्ट हो, आयु रेखा से जुडी हुई कोई रेखा कनिष्ठिका के तीसरे पर्व तक जाती हो, या मंगल पर्वत पर क्रॉस का चिह्न हो, या उभरे हुए चंद्र पर्वत पर झंडे का चिह्न हो तो व्यक्ति बदहजमी, अपच, गैस इत्यादि रोग से पीड़ित होता हैं।

* जिस व्यक्ति के हाथ में गोल घेरे का ग्रहों के पर्वतों पर होना शुभ माना गया हैं, लेकिन गोल घेरे का रेखाओं पर होना अत्यंत अशुभ माना गया हैं। यदि गोल घेरे का हृदय रेखा पर होने से व्यक्ति को आंखो कि समस्या हो सकती हैं। मंगल पर्वत पर गोल घेरा होने से भी नेत्र संबंधित पीडा होती देखी गई हैं।

* जिस व्यक्ति के हाथ में शनि पर्वत पर या आयु रेखा के अंत में क्रॉस या जालीदार रेखा का होना व्यक्ति को असाध्य रोग होने का संकेत देती हैं।

* जिस व्यक्ति के हाथ में स्वास्थ्य रेखा टूटी फूटी हो, या हृदय रेखा और मस्तक रेखा एक दूसरे समीप आ गई हो तो व्यक्ति को श्वास रोग होने की आशंका अधिक रहती हैं।

* जिस व्यक्ति के हाथ में आयु रेखा, हृदय रेखा और मस्तक रेखा के अंत में जालीदार रेखाएं हों या पर्वतों पर जालीदार रेखाएं हों, क्रॉस का चिह्न हो, हथेली पर काले या नीले रंग के धब्बे या बिंदु हों, नाखून गहरे नीले रंग के हों, नाखून टूटने वाले हों या अस्वाभाविक आकर के हों, या अंगुलियां मुड़ी हुई हों, या हथेली कि त्वचा नरम हो, हाथ हमेशा भीगा हुआ सा रहता हों, तो व्यक्ति जीवन भर किसी न किसी रोग से पीडित होकर अस्वस्थ रहता हैं।

* जिस व्यक्ति के हाथ में आयु रेखा, हृदय रेखा और मस्तक रेखा तीनों एक जगह मिली हुई हो, या अंगुलियों के नाखूनों में खड़ी रेखाए हो, या नखून किनारों से टूटे हुए हों, नाखूनों के मूल पर चन्द्रमा काले रंगके हो या विलुप्त होगये हो, या शनि पर्वत पर जालीदार चिह्न का होना, व्यक्ति को गठिया रोग होने का संकेत देता हैं।

* जिस व्यक्ति के हाथ में आयु रेखा पर क्रॉस होना किसी दुर्घटना ग्रस्त होने का संकेत होता हैं।

* आयु रेखा के अंत में काला धब्बा होना गंभीर चोट लगने का सूचक हैं।

* जिस व्यक्ति के हाथ में आयु रेखा पर काला बिंदु हो तो यह किसी बड़े रोग की सूचना देता हैं।

* जिस व्यक्ति के हाथ में आयु रेखा अंत में दो मुखी हो जाए तो, व्यक्ति को मधुमेह होने का संकेत होता हैं।

* जिस व्यक्ति के हाथ में आयु रेखा चौड़ी हो, या उसका रंग पीला हो, या जंजीरनुमा हो तो व्यक्ति का स्वास्थ्य हर समय खराब रहता हैं।

* आयु रेखा का अचानक टूट जाना व्यक्ति की किसी बीमारी के कारभ अचनाक मृत्यु का संकेत माना गया हैं।

गुरुवार, जून 03, 2010

आईना एवं वास्तु

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आईना एवं वास्तु

  • आईने से हर समय एक प्रकार कि ऊर्जा निकल कर बाहार आती रहती हैं। इस उर्जा का प्रभाव दिशा कि अनुरुप सकारात्मक एवं नाकारात्मक दोनो हो सकते हैं। अतः घर मे आइना सही स्थान का चुनाव कर लगाये ।

  • यदि उचित स्थान पर आईना लगा हो, तो घर कि नकारात्मक उर्जा दूर होकर घर में सकारात्मक उर्जा का आगमन होता हैं। और गलत स्थान पर आईना लगा होतो घर में नकारात्मक उर्जा के प्रवेश से अनेक प्रकार कि समस्याए होसकती हैं।

  • वास्तु सिद्धान्त के अनुशार शयन कक्ष में आईना लगाना वर्जित हैं। क्योकिं पलंग के सम्मुख आईना लगाने से पति-पत्नी के आपसी संबंधों में तनाव हो सकता हैं, एवं पत्नी के स्वास्थ्य में भी गिरावट आ सकती हैं। यदि शयन कक्ष मे आईना आवश्यक हो तो सोते समय आईने के नकारात्मक प्रभाव को कम करने हेतु आईने को ढककर या उसे आलमारी के अंदर की ओर लगवाए।

  • एक और मत हैं कि यदि शयन कक्ष के आईने में दंपति का प्रतिबिंब दिखाई दे तो दोनो के बिच मे तीसरा व्यक्ति आता हैं, और पति या पत्नी के अन्य स्त्री-पुरुष के साथमें सम्पर्क स्थापीत होने कि प्रबल संभावना बनी रहती हैं

  • ड्रेसिंग टेबल पर यदि आईना रखना होतो उसे रुम के पूर्व या उत्तर में इस प्रकार लगाये जिस्से बाल सवारते समय बाल दक्षिण या पश्चिम दिशा कि और गिरे। यदि बाल सवारते समय बाल पूर्व या उत्तर में गिरे तो स्त्री वर्ग के लिये अधिक अनिष्ट कारी होता हैं, और परिवार में विभिन्न रोग उत्पन्न होते देखे गये हैं।

  • कभी भी घर में दो आइने आमने-सामने नहीं लगाने चाहिये इस्से परेशानी बढती रहती हैं।

  • बच्चे कि पढाई करने वाली मेज(टेबल) पर आईना नहीं रखना चहीये, पढाई करने वाली मेज(टेबल) पर शीशा रखने से मानसिक अशांति होती हैं। पढाई मे मन नहीं लगता।

  • व्यवसायिक प्रतिष्ठान या ऒफिस में भी आइने का प्रयोग उचित दिशा मे और कम से कम मात्रा में प्रयोग करे, जिस्से व्यवसायिक प्रतिष्ठान या ऒफिस का वातावरण सकारात्मक उर्जा से प्रवाहित रहें।