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शनिवार, मार्च 19, 2011

श्रीकृष्ण –पूतनावध (होली से जुड़ी पौराणिक कथा-भाग:3)

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श्रीकृष्ण –पूतनावध (होली से जुड़ी पौराणिक कथा-भाग:3)

श्रीकृष्ण-पूतनावध:
पूराणिक कथा के अनुशार जब कंस को आकाशवाणी द्वारा पता चला कि वासुदेव और देवकी के आठवें पुत्र से उसका विनाशक होगा। तब कंस ने वसुदेव तथा देवकी को कारागार में डाल दिया। कारागार में देवकी ने सात पुत्रों को जन्म दिया जिसे कंस ने मार दिया। देवकी के गर्भ में आठवें पुत्र के रूप में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ।

वासुदेव ने रात में ही श्रीकृष्ण को गोकुल में नंद और यशोदा के यहां पहुंचा दिया और उनकी नवजात कन्या को अपने साथ लेते आए। कंस उस कन्या को मार नहीं सका। तब आकाशवाणी हुई कि कंस को मारने वाले तो गोकुल में जन्म ले चुका है। अब कंस ने उस दिन गोकुल में जन्मे सभी शिशुओं की हत्या करने का काम राक्षसी पूतना को सौंपा। वह सुंदर नारी का रूप बनाकर शिशुओं को विष का स्तनपान कराने गई। लेकिन श्रीकृष्ण ने राक्षसी पूतना का वध कर दिया। यह फाल्गुन पूर्णिमा का दिन था अत: पूतनावध की खुशी में होली मनाई जाने लगी।
राधा और श्रीकृष्ण:
होली का त्यौहार राधा और श्रीकृष्ण की पवित्र प्रेम के रुप में भी मनाया जाता है। प्राचिन काल से श्रीकृष्ण की लीला में एक-दूसरे पर रंग डालने की प्रथा चली आरही हैं। इस लिये आज भी मथुरा और वृन्दावन की होली राधा और श्रीकृष्ण के प्रेम रंग में डूबी हुई प्रतित होती है। आज भी बरसाने और नंदगाँव में लठमार होली होती हैं जो पूरे विश्व में प्रसिद्ध हैं।

शिव पार्वती और कामदेव (होली से जुड़ी पौराणिक कथा-भाग:2)

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शिव पार्वती और कामदेव (होली से जुड़ी पौराणिक कथा-भाग:2)


शिव पुराण के अनुसार हिमालय की पुत्री पार्वती शिव से विवाह हेतु कठोर तप कर रही थी और शिव भी तपस्या में लीन थे। इंद्र का भी शिव-पार्वती विवाह में स्वार्थ छिपा था कि ताड़कासुर का वध शिव-पार्वती के पुत्र द्वारा होना था। इसी वजह से इंद्र ने कामदेव को शिव की तपस्या भंग करने भेजा, परंतु शिव ने क्रोधित हो कामदेव को भस्म कर दिया। शिव की तपस्या भंग होने के बाद देवताओं ने शिव को पार्वती से विवाह के राजी कर लिया। इस कथा के आधार पर होलीका दहन में काम की भावना को प्रतीकत्मक रूप से जला कर सच्चे प्रेम पर विजय के रुपमें उत्सव मनाया जाता हैं।

प्रहलाद और होलिका (होली से जुड़ी पौराणिक कथा-भाग:1)

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प्रहलाद और होलिका (होली से जुड़ी पौराणिक कथा-भाग:1)

प्रहलाद और होलिका:
पौराणिक मान्यता के अनुशार होलीका उत्सव का प्रारंभ प्रहलाद और होलिका के जीवन से जुड़ा है। हमारे प्राचिन धर्म ग्रंथो में से एक विष्णु पुराण में प्रहलाद और होलिका की कथा का उल्लेख मिलता हैं। हिरण्यकश्यप ने तपस्या कर वरदान प्राप्त कर लिया। अब हिरण्यकश्यप न तो अस्त्र-शस्त्र, मानव-पशु उसे पृथ्वी, आकाश, पाताल लोक में मार सकते थे।

वरदान के बल से हिरण्यकश्यपने देव-दानव-मानव आदि लोकों को जीत लिया और भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना बंद करा दी। परंतु हिरण्यकश्यप अपने पुत्र प्रहलाद को नारायण की भक्ति करना बंध नहीं कर सका। जिसके कारण हिरण्यकश्यप ने भगवान विष्णु के परम भक्त प्रहलाद को बहुत सी यातनाएँ दीं। पंरतुप्रहलाद ने विष्णु भक्ति नहीं छोड़ी।

हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को भी वरदान प्राप्त था कि वह आग में नहीं जलेगी। अत: दैत्यराज ने होलिका को विष्णु भक्त पुत्र का अंत करने के लिए प्रहलाद सहित आग में प्रवेश करा दिया। परंतु होलिका का वरदान निष्फल सिद्ध हुआ और वह स्वयं उस आग में जल कर मर गई और भक्त प्रहलाद का कुछ भी अनुष्ट नहीं हुवा। तभी से प्रहलाद की याद में होली का त्यौहार मनाया जाने लगा।

होलिका उत्सव का महत्व

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होलिका उत्सव का महत्व

भारतीय संस्कृती में होलिका दहन का उत्सव फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को मनाया जाता हैं। होलिका का व्रत रखने वाले श्रद्धालु दिन भर उपवास कर के संध्या-रात्री के समय होलीका के दहन के समय होलीका का पूजन कर भोजन करते हैं।

होली का उत्सव से अनेको काथाएं एवं रहस्य जुडे हुएं हैं। पौराणिक काल में होलीका दहन के लिये माघी पूर्णिमा के दिन नगर के शूर, सामंत और गणमान्य लोग गाजे-बाजे के साथ नगर से बाहर जाकर शाखा युक्त वृक्ष ले आते थे और गंधादि से विधि-वत पूजन करके नगर या गांव से बाहर पश्चिम की और वृक्षको खडा कर देते थे। पुरातन काल में यह होली, होली का डांडा और प्रहलाद, नवान्नेष्टि का यज्ञ स्तम्भ के नाम से प्रसिद्ध थी। होलीका व्रत में व्रती अपना व्रत संकल्प करके साथा धारण करते थे।

होलिका दहन से पूर्व दहन वाले स्थान को शुद्ध जल से पवित्र किया जाता था और पूर्ण विघिवत पूजन के साथा में होलीका दहन किया जाता था। होलिका की परिक्रमा भी की जाती थी। होलीका दहन के बाद डांडा रुपी प्रह्लाद को बाहर निकालकर शीतल जल से पवित्र किया जाता था।

इसके बाद लोग घर से लाए हुए खेडा, खांडा और बडकूलों को होली में डालकर गेहूं, जौ, गेहूं की बाली और हरे चने के झाड को सेंका जाता था। इसके पीछे भक्त प्रह्लाद की कथा भी आती है। उसी के स्मरण में होलिका दहन होता है। इसके पीछे यह भी भाव बताया जाता है कि इस समय नवीन धान्य जौ, गेंहू और चने की खेती पककर तैयार हो जाती है। इसलिए यज्ञ राज को नया धान अर्पण करके उनकी पूजा की जाती हैं। यज्ञ विघि से इसे अर्पित करके नवानेष्टि यज्ञ किया जाता है।

शनिवार, मार्च 12, 2011

होली दहन के पश्चयात समाप्त होंगे होलाष्टक

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होली दहन के पश्चयात समाप्त होंगे होलाष्टक

इस वर्ष 12 मार्च शनिवार से होलाष्टक प्रारंभ हो रहे हैं होलाष्टक 19 मार्च फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा के दिन होलीका दहन के प्रश्चयात समाप्त होंगे। शास्त्रीय मत के अनुसार होलाष्टक के दौरान सभी शुभ कार्य वर्जित रहेंगे। क्योकि इस दौरान नारायण भक्त प्रह्लाद का अधिग्रहण हुवा था इस कारण समय अशुभ माना जाता हैं।

होलाष्टक का महत्व क्या है ?
होली के आठ दिन पूर्व होलाष्टक प्रारंभ हो जाते हैं।
एसी मान्यता हैं कि इन आठ दिनों में
  • फाल्गुन शुक्ल अष्टमी को चंद्रमा का रुप उग्र होता हैं।
  • फाल्गुन शुक्ल नवमी को सूर्य का रुप उग्र होता हैं।
  • फाल्गुन शुक्ल दशमी को शनि का रुप उग्र होता हैं।
  • फाल्गुन शुक्ल एकादशी को शुक्र का रुप उग्र होता हैं।
  • फाल्गुन शुक्ल द्वादशी को गुरु का रुप उग्र होता हैं।
  • फाल्गुन शुक्ल त्रयोदशी को बुध का रुप उग्र होता हैं।
  • फाल्गुन शुक्ल चतुर्दशी को मंगल का रुप उग्र होता हैं।
  • एवं फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा के दिन राहु का रुप उग्र होता हैं।
इस लिये इस समय के दौराण शुभ कार्य करने से अशुभ फल प्राप्त होते हैं इस कारण हमारे विद्वानो ने इस दौरान शुभ कार्य करना वर्जित माना हैं।

होलाष्टक एवं मान्यता

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होलाष्टक एवं मान्यता
होली का पर्व फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता हैं । इस लिये होली के ठिक आठ दिन को होलाष्टक होते हैं। शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार होलाष्टक में कोई भी नया कार्य, कोई भी शुभ कार्य एंव मांगलिक कार्य करना उचित नहीं हैं।
  • होलाष्टक होलिका दहन के पश्चयात समाप्त होते हैं।
  • होलाष्टक के दौरान हिंदू संस्कृतिके १६ संस्कारो को वर्जित मने जाते हैं।
  • एसी मान्यता है कि होली के आठ दिन पूर्व के दिनो को ज्यादातर अमांगल प्रदान करने वाले होते हैं।
  • देश के कई हिस्से में होलाष्टक नहीं मानते हैं।
  • एसी मान्यता हैं कि कुछ तीर्थस्थान जेसे शतरुद्रा, विपाशा, इरावती एवं पुष्कर सरोवर के अलाव बाकी सब स्थानो पर होलाष्टक का अशुभ प्रभाव नहीं होता बकी सब स्थान पर सर्वत्र विवाह इत्यादि शुभ कार्य बिना परेशानि से हो सकते हैं।
लेकिन शास्त्रीय मान्यताओं से होलाष्टक के दौरान शुभ कार्य वर्जित मानागया हैं।

मंगलवार, मार्च 08, 2011

बुधवार, मार्च 02, 2011

शिव के दस प्रमुख अवतार

Ten major incarnation of Shiva, Ten leading incarnation of Shiva, Ten leading incarnations of Shiva, Ten leading Avatar of Shiva, Ten leading embodiment of Shiva, Ten leading incarnate of Shiva, Ten leading incarnate of Shiv, Ten leading incarnate of the Shiv शिव के दस प्रमुख अवतार, શિવ દસ પ્રમુખ અવતાર, ಶಿವ ದಸ ಪ್ರಮುಖ ಅವತಾರ, ஶிவ தஸ ப்ரமுக அவதார, శివ దస ప్రముఖ అవతార, ശിവ ദസ പ്രമുഖ അവതാര, ਸ਼ਿਵ ਦਸ ਪ੍ਰਮੁਖ ਅਵਤਾਰ, শিৱ দস প্রমুখ অৱতার, Siva ke dasa pramukha avatara, ଶିବ ଦଶ ପ୍ରମୁଖ ଅବତାର,

शिव के दस प्रमुख अवतार


शिवपुराण के अनुसार भगवान शिव के दस प्रमुख अवतार ।
यह दस अवतार इस प्रकार है जो मानव को सभी इच्छित फल प्रदान करने वाले हैं-

1. महाकाल- शिव के दस प्रमुख अवतारों में पहला अवतार महाकाल नाम से विख्यात हैं। भगवान शिव का महाकाल स्वरुप अपने भक्तों को भोग और मोक्ष प्रदान करने वाला परम कल्याणी हैं। इस अवतार की शक्ति मां महाकाली मानी जाती हैं।

2. तार- शिव के दस प्रमुख अवतारों में दूसरा अवतार तार नाम से विख्यात हैं। भगवान शिव का तार स्वरुप अपने भक्तों को भुक्ति-मुक्ति दोनों फल प्रदान करने वाला हैं। इस अवतार की शक्ति तारादेवी मानी जाती हैं।
3. बाल भुवनेश- शिव के दस प्रमुख अवतारों में तीसरा अवतार बाल भुवनेश नाम से विख्यात हैं। भगवान शिव का बाल भुवनेश स्वरुप अपने भक्तों को सुख, समृद्धि और शांति प्रदान करने वाला हैं। इस अवतार की शक्ति को बाला भुवनेशी माना जाता हैं।
4.षोडश श्रीविद्येश- शिव के दस प्रमुख अवतारों में चौथा अवतार षोडश श्रीविद्येश नाम से विख्यात हैं। भगवान शिव का षोडश श्रीविद्येश स्वरुप अपने भक्तों को सुख, भोग और मोक्ष प्रदान करने वाला हैं। इस अवतार की शक्ति को देवी षोडशी श्रीविद्या माना जाता हैं।
5. भैरव- शिव के दस प्रमुख अवतारों में पांचवा अवतार भैरव नाम से विख्यात हैं। भगवान शिव का भैरव स्वरुप अपने भक्तों को मनोवांछित फल प्रदान करने वाला हैं। इस अवतार की शक्ति भैरवी गिरिजा मानी जाती हैं।
6. छिन्नमस्तक- शिव के दस प्रमुख अवतारों में छठा अवतार छिन्नमस्तक नाम से विख्यात हैं। भगवान शिव का छिन्नमस्तक स्वरुप अपने भक्तों की मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला हैं। इस अवतार की शक्ति देवी छिन्नमस्ता मानी जाती हैं।
7. धूमवान- शिव के दस प्रमुख अवतारों में सातवां अवतार धूमवान नाम से विख्यात हैं। भगवान शिव का धूमवान स्वरुप अपने भक्तों की सभी प्रकार से श्रेष्ठ फल देने वाला हैं। इस अवतार की शक्ति को देवी धूमावती माना जाता हैं।
8. बगलामुख- शिव के दस प्रमुख अवतारों में आठवां अवतार बगलामुख नाम से विख्यात हैं। भगवान शिव का बगलामुख स्वरुप अपने भक्तों को परम आनंद प्रदान करने वाला हैं। इस अवतार की शक्ति को देवी बगलामुखी माना जाता हैं।
9. मातंग- शिव के दस प्रमुख अवतारों में नौवां अवतार मातंग के नाम से विख्यात हैं। भगवान शिव का मातंग स्वरुप अपने भक्तों की समस्त अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाला हैं। इस अवतार की शक्ति को देवी मातंगी माना जाता हैं।
10. कमल- शिव के दस प्रमुख अवतारों में दसवां अवतार कमल नाम से विख्यात हैं। भगवान शिव का कमल स्वरुप अपने भक्तों को भुक्ति और मुक्ति प्रदान करने वाला हैं। इस अवतार की शक्ति को देवी कमला माना जाता हैं।

विद्वानो के मत से उक्त शिव के सभी प्रमुख अवतार व्यक्ति को सुख, समृद्धि, भोग, मोक्ष प्रदान करने वाले एवं व्यक्ति की रक्षा करने वाले हैं।

शिव पंचदेवों में देवो के देव महादेव हैं।

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शिव पंचदेवों में देवो के देव महादेव हैं।


शास्त्रीय मतसे
शास्त्रोमें पंचदेवों की उपासना करने का विधान हैं।

आदित्यं गणनाथं च देवीं रूद्रं च केशवम्।
पंचदैवतमित्युक्तं सर्वकर्मसु पूजयेत्।।  (शब्दकल्पद्रुम)

भावार्थ: - पंचदेवों कि उपासना का ब्रह्मांड के पंचभूतों के साथ संबंध है। पंचभूत पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश से बनते हैं। और पंचभूत के आधिपत्य के कारण से आदित्य, गणनाथ(गणेश), देवी, रूद्र और केशव ये पंचदेव भी पूजनीय हैं। हर एक तत्त्व का हर एक देवता स्वामी हैं-

आकाशस्याधिपो विष्णुरग्नेश्चैव महेश्वरी।
वायोः सूर्यः क्षितेरीशो जीवनस्य गणाधिपः।।

भावार्थ:- क्रम इस प्रकार हैं महाभूत अधिपति
1. क्षिति (पृथ्वी) शिव
2. अप् (जल) गणेश
3. तेज (अग्नि) शक्ति (महेश्वरी)
4. मरूत् (वायु) सूर्य (अग्नि)
5. व्योम (आकाश) विष्णु

भगवान् श्रीशिव पृथ्वी तत्त्व के अधिपति होने के कारण उनकी शिवलिंग के रुप में पार्थिव-पूजा का विधान हैं। भगवान् विष्णु के आकाश तत्त्व के अधिपति होने के कारण उनकी शब्दों द्वारा स्तुति करने का विधान हैं। भगवती देवी के अग्नि तत्त्व का अधिपति होने के कारण उनका अग्निकुण्ड में हवनादि के द्वारा पूजा करने का विधान हैं। श्रीगणेश के जलतत्त्व के अधिपति होने के कारण उनकी सर्वप्रथम पूजा करने का विधान हैं, क्योंकि ब्रह्मांद में सर्वप्रथम उत्पन्न होने वाले जीव तत्त्व ‘जल’ का अधिपति होने के कारण गणेशजी ही प्रथम पूज्य के अधिकारी होते हैं।

मंगलवार, मार्च 01, 2011

रुद्राभिषेक से कामनापूर्ति

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रुद्राभिषेक से कामनापूर्ति, રુદ્રાભિષેક કામનાપૂર્તિ, ರುದ್ರಾಭಿಷೇಕ ಕಾಮನಾಪೂರ್ತಿ, ருத்ராபிஷேக காமநாபூர்தி, రుత్రాపిషేక కామనాపూర్తి, രുത്രാപിഷേക കാമനാപൂര്തി, ਰੁਤ੍ਰਾਪਿਸ਼ੇਕ ਕਾਮਨਾਪੂਰ੍ਤਿ, রুত্রাপিশেক কামনাপূর্তি, rusrabhishek se kamana purti, ରୁଦ୍ରାଭିଷେକ କାମନାପୂର୍ତି,

रुद्राभिषेक से कामनापूर्ति


धर्म शास्त्रों में विविध कामनाओं की पूर्ति हेतु रुद्राभिषेक के साथ निर्धारित सामग्री या द्रव्यों के प्रयोग से कार्य की सिद्धि होती हैं।

शिवलिंग पर जल से रुद्राभिषेक करने पर वर्षा होती हैं।
शिवलिंग पर कुशोदक से रुद्राभिषेक करने से असाध्य रोगों को शांत होते हैं।
शिवलिंग पर दही से रुद्राभिषेक करने से भूमि-भवन-वाहन प्राप्त होते हैं।
शिवलिंग पर गन्ने के रस से ……………..>>
शिवलिंग पर शहद एवं घी के मिश्रण ……………..>>
शिवलिंग पर तीर्थ के जल से ……………..>>
शिवलिंग पर दूध से रुद्राभिषेक करने से संतान की प्राप्ति होती हैं। जिस दंपत्ति को संतान प्राप्ति के योग नहीं बन रहे हो, काकवन्ध्या दोष अर्थात एक संतान के पश्चयात दूसरी संतान न होना अथवा मृतवत्सा दोष अर्थात संतानें पैदा होते मर जाती हो उनहें गाय के दूध से रुद्राभिषेक करना चाहिए।
शिवलिंग पर शीतल जल से ……………..>>
शिवलिंग पर दूध से ……………..>>
शिवलिंग पर गाय के दूध एवं शक्कर के ……………..>>
शिवलिंग पर सरसों के तेल ……………..>>
शिवलिंग पर शहद से ……………..>>
शिवलिंग पर शहद से ……………..>>
शिवलिंग पर गाय के घी ……………..>>

शास्त्रोक्त एवं विद्वानो के मत से शिवलिंगका विधिवत अभिषेक करने पर अभीष्ट निश्चय ही पूर्ण होता हैं।
यजुर्वेद में उल्लेखित विधि-विधान से रुद्राभिषेक करना अत्याधिक लाभप्रद मानागया हैं। लेकिन जो भक्त इस विधि-विधान को करने में असमर्थ हैं अथवा इस विधान से परिचित नहीं हैं वह भक्त शिवजी के षडाक्षती मंत्र ॐ नम:शिवाय का जप करते हुए रुद्राभिषेक कर सकते हैं।

विशेष कामना पूर्ति हेतु किये गये रुद्राभिषेक के शास्त्रोक्त नियम:
विद्वानो के मत से किसी विशेष कामना की पूर्ति हेतु किये जाने वाले रुद्राभिषेक हेतु शिव वास का विचार करने पर कामना पूर्ति हेतु किये गये अनुष्ठान में निश्चित मनोवांछित सफलता प्राप्त होती हैं।

शिववास विचार :
तिथिं च द्विगुणी कृत्यपंचाभिश्च समन्तितम्।।
सप्तभिस्तुहरीभ्दिगंशेषं शिववास उच्चयते।।
सके कैलाश वासंचद्वितीयं गौरिन्नि हो।।
तृतीये वृषभारूढ़ चतुर्थे च समास्थित पंचमे भोजनेचैव क्रीडायान्तुरसात्मके।।
शून्येश्मशानकेचैव शिववासंच योजयेत्।।

प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की प्रतिपदा (१), अष्टमी (८), अमावस्या तथा शुक्लपक्ष की द्वितीया (२)व नवमी (९) के दिन भगवान शिव माता पार्वती के साथ होते हैं, इस तिथि में रुद्राभिषेक करने से सुख-समृद्धि अवश्य प्राप्त होती हैं।
कृष्णपक्ष की चतुर्थी (४), एकादशी (११) तथा शुक्लपक्ष की पंचमी (५) व द्वादशी (१२) तिथियों में भगवान शिव ……………..>>
कृष्णपक्ष की पंचमी (५), द्वादशी (१२) तथा शुक्लपक्ष की षष्ठी (६)व त्रयोदशी (१३) तिथियों में भगवान शिव ……………..>>
कृष्णपक्ष की सप्तमी (७), चतुर्दशी (१४) तथा शुक्लपक्ष की प्रतिपदा (१), अष्टमी (८), पूर्णिमा (१५) में भगवान ……………..>>
कृष्णपक्ष की द्वितीया (२), नवमी (९) तथा शुक्लपक्ष की तृतीया (३) व दशमी (१०) में भगवान शिव ……………..>>
कृष्णपक्ष की तृतीया (३), दशमी (१०) तथा शुक्लपक्ष की चतुर्थी (४) व एकादशी (११)में भगवान शिव ……………..>>
कृष्णपक्ष की षष्ठी (6), त्रयोदशी (13) तथा शुक्लपक्ष की सप्तमी (7) व चतुर्दशी (14) में रुद्रदेवभोजन ……………..>>

नोट: शिववास का विचार निर्धारित कार्य की पूर्ति हेतु अथवा अभिष्ट कामनाओं की पूर्ति हेतु विचार किया जाता हैं। निष्काम भाव से की जाने वाला शिव पूजा-अर्चना अथवा रुद्राभिषेक हेतु शिववास विचार करने की आवश्यका नहीं होती।
(द्वादशज्योतिलिंग क्षेत्र एवं तीर्थ स्थान में तथा शिवरात्रि, प्रदोष, सावन के सोमवार-
इत्यादि विशेष शुभ-अवसरो अथवा पर्वो में शिववास विचार करने की आवश्यका नहीं होती।)


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शिवरात्री विशेष, शीवरात्री विशेष,

रुद्राक्ष धारण से कामनापूर्ति

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रुद्राक्ष धारण से कामनापूर्ति


रुद्राक्ष को भगवान शंकर का प्रिय आभूषण माना जाता हैं। यहीं कारण हैं की शिव भक्त अपने गले व भुजा में रुद्राक्ष धारण करते हैं। क्योकी विद्वानो के मत से शास्त्रोक्त मान्यता है की दीर्घायु प्रदान करने वाला तथा मनुष्य को अकाल मृत्यु से रक्षा करने वाला हैं।
गृहस्थ व्यक्तियों के लिए रुद्राक्ष अर्थ और काम को प्रदान करता हैं तो साधुसंत व संन्यासियों के लिए रुद्राक्ष धर्म और मोक्ष को प्रदान करने वाला माना जाता हैं। रुद्राक्ष को मनुष्य की अनेक शारीरिक और मानसिक व्याधियों को दूर कर मानसिक शांति प्रदान करने वाला माना जाता हैं। योगाभ्यास से जुडे साधनो के लिये रुद्राक्ष कुंडलिनी जागृत करने में सहायक सिद्ध होता हैं।
रुद्राक्ष के धारण करता को तंत्रिक व भूत-प्रेत इत्यादि का असर नहीं होता हैं। शास्त्रोक्त मत से रुद्राक्ष के दर्शन मात्र से ही पापों का क्षय हो जाता हैं। जिसके घर में रुद्राक्ष की पूजा की जाती है वहाँ लक्ष्मीजी सदा वास करती हैं। साधारण रुप से रुद्राक्ष का प्रभाव 1-2 दिन में प्रभाव दिखने लगता है। परंतु विशेष परिस्थित व कार्य उद्देश्य की पूर्ति हेतु धारण किया गया रुद्राक्ष 45 दिन में अपना प्रभाव दिखता हैं।

रुद्राक्ष धारण के शास्त्रोक्त नियम और मत
सभी वर्ण के लोग रुद्राक्ष धारण कर सकते हैं।
धारण करते समय ॐ नम: शिवाय का जाप करना लाभप्रद रहेगा।
रुद्राक्ष को अपवित्रता के साथ धारण न करें।
रुद्राक्ष को पूर्ण भक्ति और शुद्धता से ही धारण करें।
क्योकि रुद्राक्ष अटूट श्रद्धा और विश्वास से धारण करने पर ही फल प्राप्त होता हैं।
रुद्राक्ष को लाल, पीला या सफेद धागे में धारण करना लाभप्रद रहेगा।
चाँदी, सोना या तांबे में भी धारण किया जा सकता हैं।
रुद्राक्ष हमेशा विषम संख्या में धारण करना लाभप्रद होता हैं।

रोजगार के अनुशार रुद्राक्ष चुनाव
शिव भक्तो के जीवन में सर्व श्रेष्ठ सफलता के लिए रुद्राक्ष धारण करना सर्वोत्तम माना गया हैं।
राजनेता को पूर्ण सफलता हेतु तेरह मुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए।
सरकारी व कानूनी कार्य से ……………..>>

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शिव पुराण कि महिमा

शिव महापुराण महिमा, શિવ મહાપુરાણ મહિમા, ಶಿವ ಮಹಾಪುರಾಣ ಮಹಿಮಾ, ஶிவ மஹாபுராண மஹிமா, శివ మహాపురాణ మహిమా, ശിവ മഹാപുരാണ മഹിമാ, ਸ਼ਿਵ ਮਹਾਪੁਰਾਣ ਮਹਿਮਾ, শিৱ মহাপুরাণ মহিমা, Siv mahapuran mahima, ଶିବ ମହାପୁରାଣ ମହିମା, the glory of Shiv Mahapurana, the glorify of Shiv Mahapurana, the glorified of Shiv Mahapurana, the splendor of Shiv Mahapurana, the splendor of Shiv Puranas the splendor mythology of Shiv,

शिव पुराण कि महिमा


पुराण क्या हैं?
पुराण शब्द का शाब्दिक अर्थ होता हैं पुराना।
आज से हजारो वर्ष पूर्व रचित पुराण में उल्लेखीत श्लोक एवं उसकी शिक्षा पुरानी नहीं हुई हैं, आज के निरंतर द्वन्द्वता भरे युग में आज भी पुराणों की शिक्षा मनुष्य को द्वन्द्व से मुक्ति दिलाने में निश्चित दिशा दे ने में समर्थ हैं। क्योकी व्यक्ति चाहे जीवन में कितनी भी भौतिक और वैज्ञानिक उन्नति कर लें परंतु उसे मानव जीवन को आदर्श बनाने का मार्ग एवं मानव जीवन के उत्कर्ष का सुगम मार्ग भौतिकता में डूब कर या वैज्ञानिकता के मार्ग में प्राप्त नहीं हो सकता। वह मार्ग हमारे प्राचिन ग्रंथो में मौजुद हैं। अफसोस हम हमारे मूल्यवान ग्रंथो को किनारा कर आज हम जीवन की विडंबनापूर्ण स्थिति के बीच से गुजर रहे हैं। जिस्से हमारे बहुत सारे मूल्य एवं परंपरा खंडित हो गई हैं और दिन-प्रतिदिन खंडित होती जारही हैं, क्योकि आधुनिक ज्ञान के नाम पर विदेशी चिंतन का प्रभाव हमारे ऊपर अत्याधिक हावी होता जा रहा हैं। जिस कारण हम हमारी संसकृति सभ्यता एवं प्राचिन-पौराणिक ज्ञान से वंचित होते जारहे हैं।
क्या हैं शिव पुराण?
विद्वानो के मत से ब्रह्मा जी ने सर्वप्रथम स्वयं जिस प्राचीनतम धर्मग्रंथ की रचना की थी, उसे पुराण कहा जाता हैं। ब्रह्माजी द्वारा रचित धर्मग्रंथ में लगभग एक अरब से अधिक श्लोकों का उल्लेख हैं एवं यह बृहत धर्मग्रंथ देवलोक में आज भी मौजूद हैं, ऎसा विद्वानो का मत हैं!
महाभारत के रचयिता वेदव्यास जी ने मनुष्य के कल्याण हेतु धर्मग्रंथ अथवा बृहत पुराण के एक अरब से अधिक श्लोकों को केवल चार लाख श्लोकों में संपादित किया। चार लाख चार लाख श्लोकों में संपादित धर्मग्रंथ को वेदव्यास जी ने पुनः अठारह खण्डों में विभाजन किया। जो आज हमारी संस्कृति में अठारह पुराणों के रूप में विख्यात हैं।
अठारह पुराणों का वर्णन इस प्रकार हैं।
1. ब्रह्म पुराण
2. पद्म पुराण
3. विष्णु पुराण
4. शिव पुराण
5. भागवत पुराण
6. भविष्य पुराण
7. नारद पुराण
8. मार्कण्डेय पुराण
9. अग्नि पुराण
10. ब्रह्मवैवर्त पुराण
11. लिंग पुराण
12. वराह पुराण
13. स्कंद पुराण
14. वामन पुराण
15. कूर्म पुराण
16. मत्स्य पुराण
17. गरुड़ पुराण
18. ब्रह्माण्ड पुराण
उक्त 18 पुराणों में अलग-अलग देवी देवताओं के विभिन्न स्वरूपों ……………..>>
विद्वानो ने अठारह पुराणों के सार को एक ही श्लोक में व्यक्त करते हुए कहा हैं।
परोपकाराय पुण्याय पापाय पर पीड़नम्।
अष्टादश पुराणानि व्यासस्य वचन॥
अर्थात्: व्यास मुनि द्वारा रचित अठारह पुराणों में दो ही बातें मुख्यत: कही हैं, परोपकार करना संसार का सबसे बड़ा पुण्य और किसी को पीड़ा देना संसार सबसे बड़ा पाप हैं।
शिवपुराण का संक्षिप्त परिचय
एक बार सूतजी ने शिवपुराण के महत्त्व को समझाते ……………..>>
मूल शिव पुराण के बारह भेद या खण्ड हैं जो इस प्रकार हैं।
  • विद्येश्वरसंहिता,
  • रुद्रसंहिता,
  • विनायकसंहिता,
  • उमासंहिता,
  • मातृसंहिता,
  • एकादशरुद्रसंहिता,
  • कैलाससंहिता,
  • शतरुग्रसंहिता,
  • कोटिरुद्रसंहिता,
  • सहस्रकोटिरुद्रसंहिता,
  • वायवीयसंहिता तथा
  • धर्मसंहित

उक्त बारह संहिताएं अत्यन्त पुण्यमयी मानी गयी हैं।

ब्राह्मणो ! विद्येश्वरसंहिता में दस सहस्र श्लोक हैं।
  • रुद्रसंहिता, विनायकसंहिता, उमासंहिता और मातृसंहिता में आठ-आठ सहस्र श्लोक हैं।
  • एकादशरुद्रसंहिता में तेरह सहस्र,
  • कैलाससंहिता में छ: सहस्र,
  • शतरुग्रसंहिता में तीन सहस्र,
  • कोटिरुद्रसंहिता में नौ सहस्र,
  • सहस्रकोटिरुद्रसंहिता में ग्यारह सहस्र,
  • वायवीय संहिता में चार सहस्र तथा
  • धर्मसंहिता में बारह सहस्र श्लोक हैं।
इस प्रकार मूल शिवपुराण में श्लोकों की कुल संख्या एक लाख है।
परन्तु व्यासजी ने शिवपुराण को चौबीस सहस्त्र श्लोकों में संक्षिप्त कर दिया हैं।
चौबीस सहस्त्र श्लोकों को सात संहिता या खण्ड में विभक्त किया गया हैं।
  • विद्येश्वरसंहिता,
  • रुद्रसंहिता,
  • शतरुग्रसंहिता,
  • कोटिरुद्रसंहिता,
  • उमासंहिता,
  • कैलाशसंहिता तथा
  • वायवीयसंहिता हैं।
श्रीशिवपुराण-माहात्म्य
शौनकजी ने सूतजी से प्रश्न किया?
शौनकजी ने पूछा- प्रभो ! आप सम्पूर्ण सिद्धान्तों के ज्ञाता हैं।
प्रभो ! कृपया आप मुझसे पुराणों की ……………..>>
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शिवपूजन से नवग्रह शांति

शिव पूजन से नवग्रह पीडा निवारण उपाय, शिव पूजन से नवग्रह दोष निवारण, शिव पूजन से अशुभ ग्रहो की शांति, शिव पूजन से नबग्रह दोष निवारण, शिव पूजन से नवग्रह शांति के उपाय, शिव पूजन से नवग्रह शक्ति, शिव पूजन से नवग्रह पूजा, शिव पूजन से नवग्रह के अशुभ प्रभाव का निवारण, शिव पूजन से नवग्रह शांति, सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु(बृहस्पति), शुक्र, शनि, राहु, केतु, navgraha shanty hetu vrat aur upavash, Navgrah and dan, navgrah and donations, Planetary Donation, Nawgrah dan, Remedies for bad planetary influences, navagraha mantra in hindi, shiva pujan navagraha remedies, Pooja for a remedy or a Deity/Planet, Navagraha Dosha Remedies, Navagraha - Dosha Nivarana, Navagraha pooja, Soorya, chandra, mangala, mangal, kuja, guru, brihaspati, shukra, shani, rahu, ketu, शिव पूजन नवग्रह दोष निवारण, શિવ પૂજન નવગ્રહ દોષ નિવારણ, ಶಿವ ಪೂಜನ ನವಗ್ರಹ ದೋಷ ನಿವಾರಣ, ஶிவ பூஜந நவக்ரஹ தோஷ நிவாரண, శివ పూజన నవక్రహ తోష నివారణ, ശിവ പൂജന നവക്രഹ തോഷ നിവാരണ, ਸ਼ਿਵ ਪੂਜਨ ਨਵਕ੍ਰਹ ਤੋਸ਼ ਨਿਵਾਰਣ, শিৱ পূজন নৱক্রহ তোশ নিৱারণ, Siv pUjan navakrah toS nivAraN, ଶିବ ପୂଜନ-ନବଗ୍ରହ ଶାନ୍ତି,

शिवपूजन से नवग्रह शांति


ज्योतिष शास्त्र और शिवरात्रि
शास्त्रोक्त मत से हिंदू पंचांग (केलेन्डर) के अनुशार चतुर्दशी तिथि के स्वामी शिवजी को माना जाता हैं। विद्वानो के मतानुशार वैदिक ज्योतिष शास्त्रों में चतुर्दशी तिथि को परम शुभ फलदायी व कल्याणकारी मना गया हैं। साधारणत् हर महीने की चतुर्दशी तिथि को शिवरात्रि कहा जाता हैं। परंतु फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि कहा जाता हैं।
ज्योतिष शास्त्र के प्रमुख प्राचीन ग्रंथ बृहत्पाराशर, होराशास्त्र में विभिन्न ग्रहों की दशा-अंतर्दशा में बनने वाले अनिष्टकारक योग की निवृत्ति व ग्रह शांति हेतु भगवान शिव की पूजा-अर्चन और रुद्राभिषेक पर अधिक परामर्श दिये गये हैं।
भृगुसंहितामें भी महषि भृगु ……………..>>
ज्योतिष शास्त्र के प्रमुख प्राचीन ग्रंथ बृहत्पाराशर, होराशास्त्र में विभिन्न ग्रहों की दशा-अंतर्दशा में बनने वाले अनिष्टकारक योग की निवृत्ति व ग्रह शांति हेतु ……………..>>

भगवान शिव की आराधना से व्यक्ति को दैविक, दैहिक, भौतिक जेसे अनेको कष्टों से मुक्ति मिलती है। क्योंकि शिव का अर्थ कल्याणकारी और मंगलमय होता हैं।
यदि व्यक्ति ग्रहों की प्रतिकूल दशा के कारण परेशान हों, ग्रह की अशुभता के कारण कष्ट हो रहे हो, तो ग्रहों की अशुभता के निवारण के लिए व्यक्ति को शिवरात्रि पर चार प्रहर की पूजा अत्याधिक लाभप्रद मानीगई हैं। शिवरात्री के दिन आंक के पुष्प एवं बिल्व पत्रों को "ॐ नम: शिवाय" का 108 बार जप करते हुए शिवलिंग पर चढ़ाने से विशेष लाभ प्राप्त होता हैं।

ग्रह शांति के उपाय:
सूर्य: शिवलिंग पर रूद्रपाठ करते हुए जल या दूध के ……………..>>

चंद्र : शिवलिंग पर रूद्रपाठ करते हुए दूध या जल ……………..>>

मंगल : शिवलिंग पर रूद्रपाठ करते हुए जल या दूध के ……………..>>

बुध: शिवलिंग पर रूद्रपाठ करते हुए गंगा जल या दूध के साथ में दूब, ……………..>>

गुरु(बृहस्पति): शिवलिंग पर रूद्रपाठ करते हुए जल या दूध के साथ में हल्दी , ……………..>>

शुक्र: शिवलिंग पर रूद्रपाठ करते हुए गंगा जल या दही के साथ में शक्कर(मिश्री), ……………..>>

शनि : शिवलिंग पर रूद्रपाठ करते हुए गंगा जल या दही के साथ में काले तिल, ……………..>>

राहू-केतु: शिवलिंग पर रूद्रपाठ करते हुए जल या दूध के साथ में भांग या धतूरे ……………..>>


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शिव पूजन में कोन से फूल चढाएं?

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शिव पूजन से कामना सिद्धि- कार्य सिद्धि, શિવ પૂજન સે કામના સિદ્ધિ- કાર્ય સિદ્ધિ, ಶಿವ ಪೂಜನ ಸೇ ಕಾಮನಾ ಸಿದ್ಧಿ- ಕಾರ್ಯ ಸಿದ್ಧಿ, ஶிவ பூஜந ஸே காமநா ஸித்தி- கார்ய ஸித்தி, శివ పూజన సే కామనా సిత్తి- కార్య సిత్తి, ശിവ പൂജന സേ കാമനാ സിത്തി- കാര്യ സിത്തി, ਸ਼ਿਵ ਪੂਜਨ ਸੇ ਕਾਮਨਾ ਸਿੱਤਿ- ਕਾਰ੍ਯ ਸਿੱਤਿ, শিৱ পূজন সে কামনা সিত্তি- কার্য সিত্তি, Siv pUjan se kAmanA sitti- kAry sitti, ଶିବ ପୂଜନ କାମନା ସିଦ୍ଧି-କାର୍ୟ ସିଦ୍ଧି, विभिन्न शिवलिंग पूजन लाभ, વિભિન્ન શિવલિંગ પૂજન લાભ, ವಿಭಿನ್ನ ಶಿವಲಿಂಗ ಪೂಜನ ಲಾಭ, விபிந்ந ஶிவலிம்க பூஜந லாப, విపిన్న శివలిమ్క పూజన లాప, വിപിന്ന ശിവലിമ്ക പൂജന ലാപ, ਵਿਪਿੰਨ ਸ਼ਿਵਲਿਮ੍ਕ ਪੂਜਨ ਲਾਪ, ৱিপিন্ন শিৱলিম্ক পূজন লাপ, vipinn Sivalimk pUjan lAp, ବିଭିନ୍ନ ଶିବଲିଂଗ ପୂଜନ ଲାଭ,

शिव पूजन में कोन से फूल चढाएं?


विभिन्न कामनाओं की पूर्ति हेतु भगवान शिव का संबंधित फूलों से पूजन करने से अभिष्ट कामनाओं की पूर्ति शीघ्र होती हैं।
शिवपुराण की रुद्रसंहिता के अनुशार विभिन्न फूलों का प्रयोग कर यदि साधारण से साधारण मनुष्य भी थोडे से विधि-विधान से भगवान शिव का पूजन करले तो उसे मनोवांछित फलों की प्राप्ति हो जाती हैं।
  • जो व्यक्ति लाल व सफेद आंकड़े (आर्क) के फूल से भगवान शिव का पूजन करता हैं, उसे भोग व मोक्ष की प्राप्ति होती हैं।
  • जो व्यक्ति चमेली के फूल से भगवान शिव का पूजन करता हैं, उसे उत्तम वाहन सुख की प्राप्ति होती हैं।
  • जो व्यक्ति अलसी के फूल से भगवान शिव का पूजन करता हैं, उसे भगवान श्री हरी विष्णु का आशिर्वाद प्राप्त होता हैं।
  • जो व्यक्ति शमी पत्रों से भगवान शिव का पूजन करता हैं, उसे मोक्ष की प्राप्ति होती हैं।
  • जो व्यक्ति बेला के फूल से भगवान शिव का पूजन करता हैं, उसे उत्तम पत्नी की प्राप्ति होती होती हैं यदि कोई कन्या बेला के फूल चढाती हैं तो उसे उत्तम पति कि प्राप्ति होती हैं, अर्थातः विवाह से संबंधित बाधाएं दूर होती हैं।
  • जो व्यक्ति जूही के फूल से भगवान शिव का पूजन करता हैं, उसके घरमें अन्नपूर्णा का वास होता हैं उसे अन्न का अभाव नहीं होता हैं।
  • जो व्यक्ति कनेर के फूल से भगवान शिव का पूजन करता हैं, उसे उत्तम वस्त्र इत्यादी की प्राप्ति होती हैं।
  • जो व्यक्ति हरसिंगार के फूल से भगवान शिव का पूजन करता हैं, उसे सुख-सम्पत्ति की प्राप्ति एवं वृद्धि होती हैं।
  • जो व्यक्ति धतुरे के फूल से भगवान शिव का पूजन करता हैं, उसे उत्तम संतान की प्राप्ति होती हैं।
  • जो व्यक्ति डंठलवाले धतूरे से भगवान शिव का पूजन करता हैं, उसे शुभ फलो की प्राप्ति होती हैं।
  • जो व्यक्ति हरी दुर्वा से भगवान शिव का पूजन करता हैं, उसे दीर्धायु प्राप्त होती हैं।
  • जो व्यक्ति तुलसीदल से भगवान शिव का पूजन करता हैं, उसे भोग एवं मोक्ष की प्राप्ति होती हैं।
  • जो व्यक्ति कमल के फूल से भगवान शिव का पूजन करता हैं, उसे लक्ष्मी प्राप्ति होती हैं।
  • जो व्यक्ति बिल्वपत्र से भगवान शिव का पूजन करता हैं, उसे धन, ऎश्वर्य की प्राप्ति होती हैं।
  • जो व्यक्ति शतपत्र से भगवान शिव का पूजन करता हैं, उसे आर्थिक लाभ होता हैं।
  • जो व्यक्ति शंखपुष्प से भगवान शिव का पूजन करता हैं, उसे धन की प्राप्ति होती हैं।
  • जो व्यक्ति सफेद कमल के फूल से भगवान शिव का पूजन करता हैं, उसे भौतिक सुख एवं मोक्ष की प्राप्ति होती हैं।
विशेष: शास्त्रोक्त मत से मनोकामना पूर्ति हेतु यदि संबंधित फूलों को एक लाख या सवा लाख की संखाया में शिवजी चढ़ाया जाए तो शीघ्र एवं उत्तम मनोनुकूल फल प्राप्त होते हैं। भगवान शिव के पूजन हेतु चम्पा एवं केवडे, केतकी के फूल निषेध मानेगएं हैं अन्य शेष सभी फूल शिव पूजन हेतु प्रयोग किये जा सकते हैं।

शिव पूजन से कामना सिद्धि

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शिव पूजन से कामना सिद्धि

शिवलिंग पर गंगा जल से अभिषेक करने से भौतिक सुख प्राप्त होता हैं एवं मनुष्य को मोक्ष कि प्राप्ति होती हैं।
शिव पुराण के अनुशार शिवलिंग पर अन्न, फूल एवं विभिन्न वस्तुओं से जलाभिषेक कर मनुष्य के समस्त प्रकार के कष्टोका निवारण किया जासकता हैं।
निम्न साधना शिव प्रतिमा(मूर्ति) के समक्ष करने से शीघ्र लाभ प्राप्त होते हैं।
  • लक्ष्मी प्राप्ति हेतु भगवान शिव को बिल्वपत्र, कमल, शतपत्र एवं शंखपुष्प अर्पण करने से लाभ प्राप्त होता हैं।
  • पुत्र प्राप्ति हेतु भगवान शिव को धतुरे के फूल अर्पण करने से शुभ फल कि प्राप्ति होती हैं।
  • भौतिक सुख एवं मोक्ष प्राप्ति हेतु स्वेत आक, अपमार्ग एवं सफेद कमल के फूल भगवान शिव को चढाने से लाभ प्राप्त होता हैं।
  • वाहन सुख कि प्राप्ति हेतु चमेली के फूल भगवान शिव को चढाने से शीघ्र उत्तम वाहन प्राप्ति के योग बनते हैं।
  • विवाह सुख में आने वाली बाधाओं को दूर करने हेतु बेला के फूल भगवान शिव को चढाने से उत्तम पत्नी की प्राप्ति होती होती हैं एवं कन्या के फूल चढाने से उत्तम पति कि प्राप्ति होती हैं।
  • जूही के फूल भगवान शिव को चढाने से व्यक्ति को अन्न का अभाव नहीं होता हैं।
  • सुख सम्पत्ति की प्राप्ति हेतु भगवान शिव को हार सिंगार के फूल चढाने से लाभ प्राप्त होता हैं।
शिवलिंग पर अभिषेक हेतु प्रयोग
  • वंश वृद्धि हेतु शिवलिंग पर घी का अभिषेक शुभ फलदायी होता हैं।
  • भौतिक सुख साधनो में वृद्धि हेतु शिवलिंग पर सुगंधित द्रव्य से अभिषेक करने से शीघ्र उनमें बढोतरी होती हैं।
  • रोग निवृत्ति हेतु महामृत्युंजय मंत्र जप करते हुवे शहद (मधु) से अभिषेक करने से रोगों का नाश होता हैं।
  • रोजगार वृद्धि हेतु गंगाजल एवं शहद (मधु) से अभिषेक करने से लाभ प्राप्त होता हैं।
  • मानसिक अशांति व मानसिक कमजोरी के निवारण हेतु शिवलिंग पर जल अथवा दूध या दोनो के मिश्रण से अभिषेक करना चाहिए।
  • पारिवारीक अशांति के निवारण हेतु शिवलिंग पर दूध से अभिषेक करना चाहिए।
  • आनावश्यक कष्टो एवं दु:खो के निवारण हेतु शिवलिंग पर दूध से अभिषेक करना चाहिए।
विद्वानो के मत से अन्य सभी सामग्री से किये गये अभिषेक से गंगाजल से किया गया अभिषेक श्रेष्ठ फल प्रदान करने वाला होता हैं। एसी मान्यता हैं की गंगाजल से शिवलिंग का अभिषेक करने से से चारों पुरुषार्थ अर्थात धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष की प्राप्ति होती हैं।
महाशिवरात्री एवं श्रवण मास में किये गये पूजन एवं अभिषेक से भगवान शिव की कृपा प्राप्ति के साथ-साथ माता पर्वती, गणेश और मां लक्ष्मी की भी कृपा प्राप्त होती हैं।

कैसे करें शिव का पूजन

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कैसे करें शिव का पूजन


भगवान शिव का प्रिय- सोमवार, माह की दोनो चतुर्दशी, प्रदोष व्रत, माह श्रावण मास हैं, इस विशेष शुभ अवशरो पर अल्प समय में शिव पूजन का पूर्ण लाभ प्राप्त हो इस लिये शिवपूजन की वर्णित विधि से पूर्ण की जा सकती हैं।
  • उक्त शुभ अवसरो पर प्रातः काल उठकर स्नानादि से निवृत्त होकर त्रिदल वाले सुन्दर-साफ, बिना कटे-फटे पाँच-सात- नौ-ग्यारा यथा शक्ति विषम संख्या में बिल्व पत्र लेने चाहिये। यदि बिल्व पत्र प्राप्त नहो तो अक्षत अर्थात बिना टूटे-फूटे चावल को पूजन में ले सकते हैं।
  • साफ लोटे या किसी अन्य सुंदर पात्र में गंगा जल यदि गंगाजल न हो तो स्वच्छ जल ले सकते हैं।
  • पूजन हेतु अपनी सामर्थ्य के अनुसार अष्टगंध, चन्दन, हल्दी, धूप, दीप, अगरबत्ती इत्यादी सभी आवश्यक सामग्री लेकर किसी भी शिव मंदिर (शिवालय) में करना अधिक लाभ प्रद होता हैं। अन्यथा घर में शिवलिंग स्थापित कर सकते हैं।
  • समस्त सामग्री को किसी स्वच्छ पात्र में रखदें। यदि कोई पात्र उपलब्ध न हो, तो भूमि को लीप-पोतकर स्वच्छ करके निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए समस्त सामग्री भूमी पर रख दें।
मंत्र-
अपक्रामन्तु भूतानि पिशाचाः सर्वतो दिशा।
सर्वेषामविरोधेन पूजा कर्मसमारम्भे॥
अपसर्पन्तु ते भूताः ये भूताः भूमिसंस्थिताः।
ये भूता विनकर्तारस्ते नष्टन्तु शिवाज्ञया।
उक्त विधान के पश्चयात यदि शिवलिंग को स्वच्छ जल से धोएँ और निम्न मंत्र का उच्चारण करें।

मंत्र-
गंगा सिन्धुश्य कावेरी यमुना च सरस्वती।
रेवा महानदी गोदा अस्मिन्‌ जले सन्निधौ कुरु।

उक्त विधान के पश्चयात शिवलिंग के ऊपर अष्टगंध, चन्दन इत्यादि द्रव्य चढ़ाएँ और निम्न मंत्र का उच्चारण करें।

मंत्र-
ॐ भूः भुर्वः स्वः क्क द्रव्य त्रयम्बकं यजामहे सुगंधिम्‌ पुष्टि वर्धनम्‌ उर्व्वारुकमिव बन्धनान्‌ मृत्योर्मुक्षीय मामुतः।

उक्त विधान के पश्चयात शिवलिंग के ऊपर अक्षत चढ़ाएँ और निम्न मंत्र का उच्चारण करें।
मंत्र-
ॐ अक्षन्नमीमदन्त ह्यव प्रिया अधूषत । अस्तोषत स्वभानवो विप्रा नविष्ठाया मती योजा न्विन्द्र ते हरी ।।

उक्त विधान के पश्चयात शिवलिंग के ऊपर पुष्प चढ़ाएँ और निम्न मंत्र का उच्चारण करें।

मंत्र-
ॐ ओषधीः प्रति मोदध्वं पुष्पवतीः प्रसूवरीः। अश्वा इव सजित्वरीर्व्वीरुधः पारयिष्णवः।
उक्त विधान के पश्चयात भगवान को धूप अर्पण करें तथा भगवान को बिल्वपत्र अर्पण करें और निम्न मंत्र का उच्चारण करें।

मंत्र-
काशीवास निवासिनाम्‌ कालभैरव पूजनम्‌।
कोटिकन्या महादानम्‌ एक बिल्वं समर्पणम्‌।
दर्षनं बिल्वपत्रस्य स्पर्षनं पापनाशनम्‌।
अघोर पाप संहार एकबिल्वं शिवार्पणम।
त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रयायुधम्‌।
त्रिजन्मपाप संहारं एकबिल्वं शिवार्पणम।
उक्त विधान के पश्चयात शिवलिंग के ऊपर गंगा जल या शुद्ध जल चढ़ाएँ और निम्न मंत्र का उच्चारण करें।

मंत्र-
गंगोत्तरी वेग बलात्‌ समुद्धृतम् सुवर्ण पात्रेण हिमान्षु शीतलम् सुनिर्मलाम्भो ह्यमृतोपमम् जलम् गृहाण काशीपति भक्त वत्सल
उक्त विधान के पश्चयात भगवान शिव से पूजन में हुई तृटि हेतु निम्न मंत्र का उच्चारण करते हुए क्षमा याचना करें।
अपराधो सहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निषम् मया, दासोऽयमिति माम्‌ मत्वा क्षमस्व परमेश्वर।
आवाहनम् न जानामि न जानामि विसर्जनम् पूजाम् चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर।
मन्त्रहीनम् क्रियाहीनम् भक्तिहीनम् सुरेश्वर, यत्पूजितम् मया देव परिपूर्ण तदस्तु मे।
बिना मंत्र पढ़े भी उक्त समस्त सामग्री भगवान शिव को पूर्ण श्रद्धा एवं भक्ति भाव से अर्पित की जा सकती है।
व्यक्ति के अंतर मन में केवल विश्वास एवं श्रद्धा होनी चाहिए।

क्योकि भगवान भोलेनाथ के वचन हैं:

न मे प्रियश्चतुर्वेदी मद्भभक्तः श्वपचोऽपि यः।
तस्मै देयम् ततो ग्राह्यम् स च पूज्यो यथा ह्यहम्‌॥
पत्रम् पुष्पम् फलम् तोयम् यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तस्याहम् न प्रणस्यामि स च मे न प्रणस्यति॥

अर्थात: जो भक्तिभाव से बिना किसी वेद मंत्र के उच्चारण किए मात्र पत्र, पुष्प, फल अथवा जल समर्पित करता हैं उसके लिए मैं अदृश्य नहीं होता हूँ और वह भी मेरी दृष्टि से कभी ओझल नहीं होता हैं।

शिवलिंग के विभिन्न प्रकार व लाभ

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शिवलिंग के विभिन्न प्रकार व लाभ

  • "गन्धलिंग" दो भाग कस्तुरी, चार भाग चन्दन और तीन भाग कुंकम से बनाया जाता हैं।
  • मिश्री(चिनी) से बने शिव लिंग कि पूजा से रोगो का नाश होकर सभी प्रकार से सुखप्रद होती हैं।
  • सोंढ, मिर्च, पीपल के चूर्ण में नमक मिलाकर बने शिवलिंग कि पूजा से वशीकरण और अभिचार कर्म के लिये किया जाता हैं।
  • फूलों से बने शिव लिंग कि पूजा से भूमि-भवन कि प्राप्ति होती हैं।
  • जौं, गेहुं, चावल तीनो का एक समान भाग में मिश्रण कर आटे के बने शिवलिंग कि पूजा से परिवार में सुख समृद्धि एवं संतान का लाभ होकर रोग से रक्षा होती हैं।
  • किसी भी फल को शिवलिंग के समान रखकर उसकी पूजा करने से फलवाटिका में अधिक उत्तम फल होता हैं।
  • यज्ञ कि भस्म से बने शिव लिंग कि पूजा से अभीष्ट सिद्धियां प्राप्त होती हैं।
  • यदि बाँस के अंकुर को शिवलिंग के समान काटकर पूजा करने से वंश वृद्धि होती है।
  • दही को कपडे में बांधकर निचोड़ देने के पश्चात उससे जो शिवलिंग बनता हैं उसका पूजन करने से समस्त सुख एवं धन कि प्राप्ति होती हैं।
  • गुड़ से बने शिवलिंग में अन्न चिपकाकर शिवलिंग बनाकर पूजा करने से कृषि उत्पादन में वृद्धि होती हैं।
  • आंवले से बने शिवलिंग का रुद्राभिषेक करने से मुक्ति प्राप्त होती हैं।
  • कपूर से बने शिवलिंग का पूजन करने से आध्यात्मिक उन्नती प्रदत एवं मुक्ति प्रदत होता हैं।
  • यदि दुर्वा को शिवलिंग के आकार में गूंथकर उसकी पूजा करने से अकाल-मृत्यु का भय दूर हो जाता हैं।
  • स्फटिक के शिवलिंग का पूजन करने से व्यक्ति कि सभी अभीष्ट कामनाओं को पूर्ण करने में समर्थ हैं।
  • मोती के बने शिवलिंग का पूजन स्त्री के सौभाग्य में वृद्धि करता हैं।
  • स्वर्ण निर्मित शिवलिंग का पूजन करने से समस्त सुख-समृद्धि कि वृद्धि होती हैं।
  • चांदी के बने शिवलिंग का पूजन करने से धन-धान्य बढ़ाता हैं।
  • पीपल कि लकडी से बना शिवलिंग दरिद्रता का निवारण करता हैं।
  • लहसुनिया से बना शिवलिंग शत्रुओं का नाश कर विजय प्रदत होता हैं।

शिवरात्रि पूजन विधान

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शिवरात्रि पूजन विधान

महाशिवरात्रि के दिन शिवजी का पूजन अर्चन करने से उनकी कृपा सरलता से प्राप्त होति हैं, इस लिये शिवभक्त, शिवालय/शिव मंदिरों में जाकर शिवलिंग पर दूध, गंगाजल, बेल-पत्र, पुष्प आदि से अभिषेक कर, शिवजी का पूजन कर उपवास कर रात्रि जागरण कर भजन किर्तन करते हैं।
शास्त्रो मे वर्णन मिलता हैं की शिवरात्रि के दिन शिवजी की माता पर्वती से शादी हुई थी इसलिए रात्र के समय शिवजी की बारात निकाली जाती हैं।
शिवरात्रि का पर्व सृष्टि का सृजन कर्ता स्वयं परमात्मा के सृष्टि पर अवतरित होने की स्मृति दिलाता है। यहां ’रात्रि’ शब्द अज्ञान (अन्धकार) से होने वाले नैतिक कर्मो के पतन का द्योतक है। केवल परमात्मा ही ज्ञान के सागर हैं जो मनुष्य मात्र को सत्य ज्ञान द्वारा अन्धकार से प्रकाश की ओर अथवा असत्य से सत्य की ओर ले जाते हैं।
शिवरात्रि का व्रत सभी वर्ग एवं उम्र के लोग कर सकते हैं। इस व्रत के विधान में सुबह स्नान इत्यादि से निवृत्त होकर उपवास रखा जाता हैं।
शिवरात्रि के दिन शिव मंदिर/शिवालय में जाकर शिव लिंग पर अपने कार्य उद्देश्य की पूर्ति के अनुरुप दूध, दही, गंगाजल, घी, मधु (मध,महु), चीनी (मिश्रि) बेल-पत्र, पुष्प आदि का शिव लिंग पर अभिषेक कर शिवलिंग पूजन का विधान हैं।

शिवलिंग पर अभिषेक का महत्व
अभिषक अर्थात स्नान कारना अथवा किसी निर्धारित पदार्थ से वस्तु विशेष पर अर्पण पदार्थ को डालना। शिवलिंग पर स्नान अथवा अभिषेक करना। अभिषेक में भी रुद्राभिषेक का विशेष महत्व हैं। रुद्राभिषेक में रुद्रमंत्रों के उच्चारण के साथ शिवलिंग पर अभिषेक किया जाता हैं।
रुद्राभिषेक को भगवान शिव की आराधना का सर्वश्रेष्ठ उपायो में से एक माना गया हैं। विद्वानो के मत से धर्म शास्त्रो में शिव को जलधारा से अभिषेक करना सर्वाधिक प्रिय माना जाता है। विद्वानो के अनुशार भारत के प्रमुख ग्रंथ ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद में उल्लेखित मंत्रो का प्रयोग रुद्रमंत्रों के रुप में किया जाता हैं।

शिवलिंग पूजा का महत्व क्या हैं?

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शिवलिंग पूजा का महत्व क्या हैं?

शिवमहा पुराण के सृष्टिखंड अध्याय १२ श्लोक ८२ से ८६ में ब्रह्मा जी के पुत्र संतकुमार जी वेदव्यास जी को उपदेश देते हुए कहते हैं, हर गृहस्थ मनुष्य को अपने सद्दगुरू से विधिवत दीक्षा लेकर पंचदेवों (गणेश, सूर्य, विष्णु, दुर्गा, शिव) की प्रतिमाओं का नित्य पूजन करना चाहिए। क्योंकि शिव ही सबके मूल हैं, इस लिये मूल (शिव) को सींचने से सभी देवता तृत्प हो जाते हैं परन्तु सभी देवताओं को प्रसन्न करने पर भी शिव प्रसन्न नहीं होते। यह रहस्य केवल और केवल सद्दगुरू कि शरण में रहने वाले व्यक्ति ही जान सकते हैं।
  • सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु ने एक बार सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा के साथ निर्गुण, निराकार शिव से प्रार्थना की, प्रभु आप कैसे प्रसन्न होते हैं। भगवान शिव बोले मुझे प्रसन्न करने के लिए शिवलिंग का पूजन करो। जब किसी प्रकार का संकट या दु:ख हो तो शिवलिंग का पूजन करने से समस्त दु:खों का नाश हो जाता है।(शिवमहापुराण सृष्टिखंड )
  • जब देवर्षि नारद ने भगवान श्री विष्णु को शाप दिया और बाद में पश्चाताप किया तब विष्णु ने नारदजी को पश्चाताप के लिए शिवलिंग का पूजन, शिवभक्तों का सत्कार, नित्य शिवशत नाम का जाप आदि उपाय सुझाये। (शिवमहापुराण सृष्टिखंड )
  • एक बार सृष्टि रचयिता ब्रह्माजी सभी देवताओं को लेकर क्षीर सागर में श्री विष्णु के पास परम तत्व जानने के लिए पहोच गये। श्री विष्णु ने सभी को शिवलिंग की पूजा करने का सुझाव दिया और विश्वकर्मा को बुलाकर देवताओं के अनुसार अलग-अलग द्रव्य पदार्थ के शिवलिंग बनाकर देने का आदेश देकर सभी को विधिवत पूजा से अवगत करवाया। (शिवमहापुराण सृष्टिखंड )
  • ब्रह्मा जी ने देवर्षि नारद को शिवलिंग की पूजा की महिमा का उपदेश देते हुवे कहा। इसी उपदेश से जो ग्रंथ कि रचना हुई वो शिव महापुराण हैं। माता पार्वती के अत्यन्त आग्रह से, जनकल्याण के लिए निर्गुण, निराकार शिव ने सौ करोड़ श्लोकों में शिवमहापुराण की रचना कि। जो चारों वेद और अन्य सभी पुराण शिवमहापुराण की तुलना में नहीं आ सकते। भगवान शिव की आज्ञा पाकर विष्णु के अवतार वेदव्यास जी ने शिवमहापुराण को २४६७२ श्लोकों में संक्षिप्त किया हैं।
  • जब पाण्ड़व वनवास में थे , तब कपट से दुर्योधन पाण्ड़वों को दुर्वासा ऋषि को भेजकर तथा मूक नामक राक्षस को भेजकर कष्ट देता था। तब पाण्ड़वों ने श्री कृष्ण से दुर्योधन के दुर्व्यवहार से अवगत कराया और उससे छुटकारा पाने का मार्ग पूछा। तब श्री कृष्ण ने पाण्ड़वों को भगवान शिव की पूजा करने के लिए सलाह दी और कहा मैंने स्वयंने अपने सभी मनोरथों को प्राप्त करने के लिए भगवान शिव की पूजा की हैं और आज भी कर रहा हुं। आप लोग भी करो। वेदव्यासजी ने भी पाण्ड़वों को भगवान शिव की पूजा का उपदेश दिया। हिमालय से लेकर पाण्ड़व विश्व के हर कोने में जहां भी गये उन सभी स्थानो पर शिवलिंग कि स्थापना कर पूजा अर्चना करने का वर्णन शास्त्रों में मिलता हैं।
शिव महापुराण
सृष्टिखंड अध्याय ११ श्लोक १२ से १५ में शिव पूजा से प्राप्त होने वाले सुखों का वर्णन इस प्रकार हैं:
दरिद्रता, रोग कष्ट, शत्रु पीड़ा एवं चारों प्रकार के पाप तभी तक कष्ट देता है, जब तक भगवान शिव की पूजा नहीं की जाती। महादेव का पूजन कर लेने पर सभी प्रकार के दु:खोका शमन हो जाता हैं। सभी प्रकार के सुख प्राप्त हो जाते हैं एवं इससे सभी मनोकामनाएं सिद्ध हो जाती हैं।(शिवमहापुराण सृष्टिखंड अध्याय- ११ श्लोक१२ से १५

महाशिवरात्रि आध्यात्मिक आस्था का महापर्व हैं।

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महाशिवरात्रि आध्यात्मिक आस्था का महापर्व हैं।


हिन्दु धर्म में महाशिवरात्रि को हर्ष और उल्हास का महा पर्व माना जाता हैं।
शिव का व्यक्तित्व हर साधारण व्यक्ति की भावनाओं का प्रतीक है। सदियों से भारत में महाशिवरात्रि उत्सव को पूर्ण आस्था और आध्यात्मिकता के साथ सृष्टि के रचनाकर देव महादेव को आभर प्रकट करते हुए उनकी विशेष कृपा प्राप्त करने का विधान हैं। दार्शनिक चिंताधारा से देखे तो मानव जीवन के कल्याण लिये एवं मानवता को जोड़ ने हेतु।

हजारो वर्षो से भारतीय जीवन शैलि स्वाभाविक-अस्वाभाविक रूप से प्रकृति से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध रखती हैं। भारतीय संस्कृति में शिव को सर्वव्यापी पूर्ण ब्रह्म के रूप में समावेष किया गया हैं।
भारतीय संस्कृति मे शिव जी को पिता और उनकी पत्नि पार्वती जी को मां मान कर उनकी आराधना परिवार, समाज एवं विश्व के कल्याण हेतु की जाती हैं। प्रकृति की भेट बेल पत्र द्वारा शिवलिंग पर अभिषेक कर शिव के समीप अपने कार्य या कामना पूर्ति हेतु प्राथना की जाति हैं। जिस्से व्यक्ति अपने कल्याण कर अपनी हिंसक प्रवृति, क्रोध, अहंकार आदि बूरे कर्मो पर अंकुश लगाने में समर्थ हो सकें।

हिंदू संस्कृति में शिव को प्रसन्न करने हेतु शिवरात्रि पर्व पर शिवलिंग की विशेष पूजा-अर्चना की परम्परा हैं। इसि लिये शिवरात्रि पर देश-विदेश के सभी शिव मंदिरों में विभिन्न प्रकार से धार्मिक एवं आध्यात्मिक भावना के साथ पूजा, अर्चना, व्रत एव उपासना की जाती हैं। क्योकि शिव स्वयं विष पान करके सृष्टि को अमृत पान कराते हैं। इसी प्रकार शिवरात्रि का महापर्व संसार से बूराईयों को मिटाकर विश्व को सुख, स्मृद्धि, प्रेम एवं शांति फेलाने का हैं।

महाशिवरात्रि व्रत कथा
एक बार पार्वती ने भगवान शिवजी से पूछा, ऐसा कौन सा श्रेष्ठ तथा सरल व्रत अथवा पूजन हैं, जिससे मृत्यु लोक के प्राणी आपकी कृपा सरल ही प्राप्त कर लेते हैं?
प्रश्न के उत्तर में शिवजी ने पार्वती को शिवरात्रि व्रत का विधान बताकर यह कथा सुनाई-
एक गाँव में एक शिकारी रहता था। पशुओं को मार करके वह अपने कुटुम्ब को पालता था। शिकारी एक साहूकार का ऋणी था, लेकिन शिकारी साहूकार का ऋण समय पर न चुका सका। क्रोधवश साहूकार ने शिकारी को शिवमठ में बंदी बना लिया। संयोग से उस दिन शिवरात्रि थी।

शिकारी ध्यानमग्न होकर शिव संबंधी धार्मिक बातें सुनता रहा। चतुर्दशी को उसने शिवरात्रि की कथा भी सुनी। संध्या होते ही साहूकार ने उसे अपने पास बुलाया और ऋण चुकाने के विषय में बात की। शिकारी अगले दिन सारा ऋण लौटा देने का वचन देकर बंधन से छूट गया। अपनी दिनचर्या की भाँति वह जंगल में शिकार के लिए निकला, लेकिन दिनभर बंदीगृह में बंधक रहने के कारण भूख-प्यास से व्याकुल था। शिकार करने के लिए वह एक तालाब के किनारे बेल वृक्ष पर पड़ाव बनाने लगा। उस बेल-वृक्ष के नीचे शिवलिंग था जो बिल्वपत्रों से ढँका हुआ था। शिकारी को शिवलिंग का पता न चला। पड़ाव बनाते समय उसने बेल वृक्ष की टहनियाँ तोड़ कर नीचे फेकदी शिकारी ने जो टहनियाँ तोड़ीं, वे संयोग से शिवलिंग पर गिरीं। इस प्रकार दिनभर भूखे-प्यासे शिकारी का व्रत भी हो गया और शिवलिंग पर बेलपत्र भी चढ़ गए।

एक पहर रात्रि बीत जाने पर एक गर्भिणी मृगी तालाब पर पानी पीने पहुँची। शिकारी ने धनुष पर तीर चढ़ाकर ज्यों ही प्रत्यंचा खींची, मृगी बोली, 'मैं गर्भिणी हूँ। शीघ्र ही प्रसव करूँगी। तुम एक साथ दो जीवों की हत्या करोगे, जो ठीक नहीं है। मैं अपने बच्चे को जन्म देकर शीघ्र ही तुम्हारे सामने प्रस्तुत हो जाऊँगी, तब तुम मुझे मार लेना।' शिकारी ने प्रत्यंचा ढीली कर दी और मृगी झाड़ियों में लुप्त हो गई। कुछ ही देर बाद एक और मृगी उधर से निकली। शिकारी की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। समीप आने पर उसने धनुष पर बाण चढ़ाया। तब उसे देख मृगी ने विनम्रतापूर्वक निवेदन किया, 'हे पारधी ! मैं थोड़ी देर पहले ही ऋतु से निवृत्त हुई हूँ। कामातुर विरहिणी हूँ। अपने प्रिय की खोज में भटक रही हूँ। मैं अपने पति से मिलकर शीघ्र ही तुम्हारे पास आ जाऊँगी।'

शिकारी ने उसे भी जाने दिया। दो बार शिकार को खोकर उसका माथा ठनका। वह चिंता में पड़ गया। रात्रि का आखिरी पहर बीत रहा था। तभी एक अन्य मृगी अपने बच्चों के साथ उधर से निकली शिकारी के लिए यह स्वर्णिम अवसर था। उसने धनुष पर तीर चढ़ाने में देर न लगाई, वह तीर छोड़ने ही वाला था कि मृगी बोली, 'हे पारधी! मैं इन बच्चों को पिता के हवाले करके लौट आऊँगी। इस समय मुझे मत मार।' शिकारी हँसा और बोला, 'सामने आए शिकार को छोड़ दूँ, मैं ऐसा मूर्ख नहीं। इससे पहले मैं दो बार अपना शिकार खो चुका हूँ। मेरे बच्चे भूख-प्यास से तड़प रहे होंगे।'

उत्तर में मृगी ने फिर कहा, 'जैसे तुम्हें अपने बच्चों की ममता सता रही है, ठीक वैसे ही मुझे भी, इसलिए सिर्फ बच्चों के नाम पर मैं थोड़ी देर के लिए जीवनदान माँग रही हूँ। हे पारधी! मेरा विश्वास कर मैं इन्हें इनके पिता के पास छोड़कर तुरंत लौटने की प्रतिज्ञा करती हूँ।'

मृगी का दीन स्वर सुनकर शिकारी को उस पर दया आ गई। उसने उस मृगी को भी जाने दिया। शिकार के आभाव में बेलवृक्ष पर बैठा शिकारी बेलपत्र तोड़-तोड़कर नीचे फेंकता जा रहा था। पौ फटने को हुई तो एक हष्ट-पुष्ट मृग उसी रास्ते पर आया। शिकारी ने सोच लिया कि इसका शिकार वह अवश्व करेगा।

शिकारी की तनी प्रत्यंचा देखकर मृग विनीत स्वर में बोला,' हे पारधी भाई! यदि तुमने मुझसे पूर्व आने वाली तीन मृगियों तथा छोटे-छोटे बच्चों को मार डाला है तो मुझे भी मारने में विलंब न करो, ताकि उनके वियोग में मुझे एक क्षण भी दुःख न सहना पड़े। मैं उन मृगियों का पति हूँ। यदि तुमने उन्हें जीवनदान दिया है तो मुझे भी कुछ क्षण जीवनदान देने की कृपा करो। मैं उनसे मिलकर तुम्हारे सामने उपस्थित हो जाऊँगा।'

मृग की बात सुनते ही शिकारी के सामने पूरी रात का घटना-चक्र घूम गया। उसने सारी कथा मृग को सुना दी। तब मृग ने कहा, 'मेरी तीनों पत्नियाँ जिस प्रकार प्रतिज्ञाबद्ध होकर गई हैं, मेरी मृत्यु से अपने धर्म का पालन नहीं कर पाएँगी। अतः जैसे तुमने उन्हें विश्वासपात्र मानकर छोड़ा है, वैसे ही मुझे भी जाने दो। मैं उन सबके साथ तुम्हारे सामने शीघ्र ही उपस्थित होता हूँ।'

उपवास, रात्रि जागरण तथा शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाने से शिकारी का हिंसक हृदय निर्मल हो गया था। उसमें भगवद् शक्ति का वास हो गया था। धनुष तथा बाण उसके हाथ से सहज ही छूट गए। भगवान शिव की अनुकम्पा से उसका हिंसक हृदय कारुणिक भावों से भर गया। वह अपने अतीत के कर्मों को याद करके पश्चाताप की ज्वाला में जलने लगा।

थोड़ी ही देर बाद मृग सपरिवार शिकारी के समक्ष उपस्थित हो गया, ताकि वह उनका शिकार कर सके, किंतु जंगली पशुओं की ऐसी सत्यता, सात्विकता एवं सामूहिक प्रेमभावना देखकर शिकारी को बड़ी ग्लानि हुई। उसके नेत्रों से आँसुओं की झड़ी लग गई। उस मृग परिवार को न मारकर शिकारी ने अपने कठोर हृदय को जीव हिंसा से हटा सदा के लिए कोमल एवं दयालु बना लिया।

देव लोक से समस्त देव समाज भी इस घटना को देख रहा था। घटना की परिणति होते ही देवी-देवताओं ने पुष्प वर्षा की। तब शिकारी तथा मृग परिवार मोक्ष को प्राप्त हुए।