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गुरुवार, सितंबर 16, 2010

गणेश पूजन में कोन से फूल चढाए।

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गणेश पूजन में कोन से फूल चढाए।



गणेश जी को दूर्वा सर्वाधिक प्रिय है। इस लिये सफेद या हरी दूर्वा चढ़ानी चाहिए। दूर्वा की तीन या पाँच पत्ती होनी चाहिए।

गणेश जी को तुलसी छोड़कर सभी पत्र और पुष्प प्रिय हैं। गणेशजी पर तुलसी चढाना निषेध हैं।


न तुलस्या गणाधिपम्‌ (पद्मपुराण)
भावार्थ: तुलसी से गणेशजी की पूजा कभी नहीं करनी चाहिये।


गणेश तुलसी पत्र दुर्गा नैव तु दूर्वाया  (कार्तिक माहात्म्य)
भावार्थ: गणेशजी की तुलसी पत्र से एवं दुर्गाजी की दूर्वा पूजा नहीं करनी चाहिये।

गणेशजी की पूजा में मन्दार के लाल फूल चढ़ाने से विशेष लाभ प्राप्त होता हैं। लाल पुष्प के अतिरिक्त पूजा में श्वेत,पीले फूल भी चढ़ाए जाते हैं।

गणेश के कल्याणकारी मंत्र

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गणेश के कल्याणकारी मन्त्र


गणेश मंत्र कि प्रति दिन एक माला मंत्रजाप अवश्य करे।
दिये गये मंत्रो मे से कोई भी एक मंत्रका जाप करे।

(०१) गं ।

(०२) ग्लं ।

(०३) ग्लौं ।

(०४) श्री गणेशाय नमः ।

(०५) ॐ वरदाय नमः ।

(०६) ॐ सुमंगलाय नमः ।

(०७) ॐ चिंतामणये नमः ।

(०८) ॐ वक्रतुंडाय हुम् ।

(०९) ॐ नमो भगवते गजाननाय ।

(१०) ॐ गं गणपतये नमः ।

(११) ॐ ॐ श्री गणेशाय नमः ।

यह मंत्र के जप से व्यक्ति को जीवन में किसी भी प्रकार का कष्ट नहीं रेहता है।

• आर्थिक स्थिति मे सुधार होता है।
• एवं सर्व प्रकारकी रिद्धि-सिद्धि प्राप्त होती है।


भगवान गणपति के अन्य मंत्र


ॐ गं गणपतये नमः ।
एसा शास्त्रोक्त वचन हैं कि गणेश जी का यह मंत्र चमत्कारिक और तत्काल फल देने वाला मंत्र हैं। इस मंत्र का पूर्ण भक्तिपूर्वक जाप करने से समस्त बाधाएं दूर होती हैं। षडाक्षर का जप आर्थिक प्रगति व समृध्दिदायक है ।

ॐ वक्रतुंडाय हुम्‌ ।
किसी के द्वारा कि गई तांत्रिक क्रिया को नष्ट करने के लिए, विविध कामनाओं कि शीघ्र पूर्ति के लिए उच्छिष्ट गणपति कि साधना किजाती हैं। उच्छिष्ट गणपति के मंत्र का जाप अक्षय भंडार प्रदान करने वाला हैं।


ॐ हस्ति पिशाचि लिखे स्वाहा ।
आलस्य, निराशा, कलह, विघ्न दूर करने के लिए विघ्नराज रूप की आराधना का यह मंत्र जपे ।


ॐ गं क्षिप्रप्रसादनाय नम:।
मंत्र जाप से कर्म बंधन, रोगनिवारण, कुबुद्धि, कुसंगत्ति, दूर्भाग्य, से मुक्ति होती हैं। समस्त विघ्न दूर होकर धन, आध्यात्मिक चेतना के विकास एवं आत्मबल की प्राप्ति के लिए हेरम्बं गणपति का मंत्र जपे ।

ॐ गूं नम:।
रोजगार की प्राप्ति व आर्थिक समृध्दि प्राप्त होकर सुख सौभाग्य प्राप्त होता हैं।

ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं गं गण्पत्ये वर वरदे नमः ॐ तत्पुरुषाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्तिः प्रचोदयात।
लक्ष्मी प्राप्ति एवं व्यवसाय बाधाएं दूर करने हेतु उत्तम मानगया हैं।


ॐ गीः गूं गणपतये नमः स्वाहा।
इस मंत्र के जाप से समस्त प्रकार के विघ्नो एवं संकटो का का नाश होता हैं।

ॐ श्री गं सौभाग्य गणपत्ये वर वरद सर्वजनं में वशमानय स्वाहा।
विवाह में आने वाले दोषो को दूर करने वालों को त्रैलोक्य मोहन गणेश मंत्र का जप करने से शीघ्र विवाह व अनुकूल जीवनसाथी की प्राप्ति होती है ।

ॐ वक्रतुण्डेक द्रष्टाय क्लींहीं श्रीं गं गणपतये वर वरद सर्वजनं मं दशमानय स्वाहा ।
इस मंत्रों के अतिरिक्त गणपति अथर्वशीर्ष, संकटनाशक, गणेश स्त्रोत, गणेशकवच, संतान गणपति स्त्रोत, ऋणहर्ता गणपति स्त्रोत मयूरेश स्त्रोत, गणेश चालीसा का पाठ करने से गणेश जी की शीघ्र कृपा प्राप्त होती है ।

ॐ वर वरदाय विजय गणपतये नमः।
इस मंत्र के जाप से मुकदमे में सफलता प्राप्त होती हैं।

ॐ गं गणपतये सर्वविघ्न हराय सर्वाय सर्वगुरवे लम्बोदराय ह्रीं गं नमः।
वाद-विवाद, कोर्ट कचहरी में विजय प्राप्ति, शत्रु भय से छुटकारा पाने हेतु उत्तम।

ॐ नमः सिद्धिविनायकाय सर्वकार्यकर्त्रे सर्वविघ्न प्रशमनाय सर्व राज्य वश्य कारनाय सर्वजन सर्व स्त्री पुरुषाकर्षणाय श्री ॐ स्वाहा।
इस मंत्र के जाप को यात्रा में सफलता प्राप्ति हेतु प्रयोग किया जाता हैं।


ॐ हुं गं ग्लौं हरिद्रा गणपत्ये वरद वरद सर्वजन हृदये स्तम्भय स्वाहा।
यह हरिद्रा गणेश साधना का चमत्कारी मंत्र हैं।


ॐ ग्लौं गं गणपतये नमः।
गृह कलेश निवारण एवं घर में सुखशान्ति कि प्राप्ति हेतु।


ॐ गं लक्ष्म्यौ आगच्छ आगच्छ फट्।
इस मंत्र के जाप से दरिद्रता का नाश होकर, धन प्राप्ति के प्रबल योग बनने लगते हैं।


ॐ गणेश महालक्ष्म्यै नमः।
व्यापार से सम्बन्धित बाधाएं एवं परेशानियां निवारण एवं व्यापर में निरंतर उन्नति हेतु।


ॐ गं रोग मुक्तये फट्।
भयानक असाध्य रोगों से परेशानी होने पर, उचित ईलाज कराने पर भी लाभ प्राप्त नहीं होरहा हो, तो पूर्ण विश्वास सें मंत्र का जाप करने से या जानकार व्यक्ति से जाप करवाने से धीरे-धीरे रोगी को रोग से छुटकारा मिलता हैं।


ॐ अन्तरिक्षाय स्वाहा।
इस मंत्र के जाप से मनोकामना पूर्ति के अवसर प्राप्त होने लगते हैं।


गं गणपत्ये पुत्र वरदाय नमः।
इस मंत्र के जाप से उत्तम संतान कि प्राप्ति होती हैं।


ॐ वर वरदाय विजय गणपतये नमः।
इस मंत्र के जाप से मुकदमे में सफलता प्राप्त होती हैं।


ॐ श्री गणेश ऋण छिन्धि वरेण्य हुं नमः फट ।
यह ऋण हर्ता मंत्र हैं। इस मंत्र का नियमित जाप करना चाहिए। इससे गणेश जी प्रसन्न होते है और साधक का ऋण चुकता होता है। कहा जाता है कि जिसके घर में एक बार भी इस मंत्र का उच्चारण हो जाता है है उसके घर में कभी भी ऋण या दरिद्रता नहीं आ सकती।


जप विधि

प्रात: स्नानादि शुद्ध होकर कुश या ऊन के आसन पर पूर्व कि और मुख होकर बैठें। सामने गणॆश‌जी का चित्र, यंत्र या मूर्ति स्थाप्ति करें फिर षोडशोपचार या पंचोपचार से भगवान गजानन का पूजन कर प्रथम दिन संकल्प करें। इसके बाद भगवान ग्णेश‌का एकाग्रचित्त से ध्यान करें। नैवेद्य में यदि संभव होतो बूंदि या बेसन के लड्डू का भोग लगाये नहीं तो गुड का भोग लगाये । साधक को गणेश‌जी के चित्र या मूर्ति के सम्मुख शुद्ध घी का दीपक जलाए। रोज १०८ माला का जाप कर ने से शीघ्र फल कि प्राप्ति होती हैं। यदि एक दिन में १०८ माला संभव न हो तो ५४, २७,१८ या ९ मालाओं का भी जाप किया जा सकता हैं। मंत्र जाप करने में यदि आप असमर्थ हो, तो किसी ब्राह्मण को उचित दक्षिणा देकर उनसे जाप करवाया जा सकता हैं।

गणेश गायत्री मन्त्र

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गणेश गायत्री मंत्र

एकदन्ताय् विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दन्ती प्रचोदयात्॥ (गणपत्युपनिषद्)

तत्पुरुषाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दन्ती प्रचोदयात्॥(नारायणोपनिषद्)

तत्कराटाय विद्महे हस्तिमुखाय धीमहि।
तन्नो दन्ती प्रचोदयात्॥(मैत्रायणीसंहिता)

लम्बोदराय विद्महे महोदराय धीमहि।
तन्नो दन्ती प्रचोदयात्॥(अग्निपुराण)

महोत्कटाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि।
तन्नो दन्ती प्रचोदयात्॥(अग्निपुराण)

गणेश चतुर्थी पर चंद्र दर्शन कलंक निवारण के उपाय

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गणेश चतुर्थी पर चंद्र दर्शन कलंक निवारण के उपाय
भारतीय शास्त्रों में गणेश चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन निषेध माना गया हैं इस दिन चंद्र दर्शन करने से व्यक्ति को एक साल तक मिथ्या कलंक लगता हैं। भगवान श्री कृष्ण को भी चंद्र दर्शन का मिथ्या कलंक लगने के प्रमाण हमारे शास्त्रों में विस्तार से वर्णित हैं।

भाद्रशुक्लचतुथ्र्यायो ज्ञानतोऽज्ञानतोऽपिवा।
अभिशापीभवेच्चन्द्रदर्शनाद्भृशदु:खभाग्॥
अर्थातः जो जानबूझ कर अथवा अनजाने में ही भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चंद्रमा का दर्शन करेगा, वह अभिशप्त होगा। उसे बहुत दुःख उठाना पडेगा।

गणेशपुराणके अनुसार भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चंद्रमा देख लेने पर कलंक अवश्य लगता हैं। ऐसा गणेश जी का वचन हैं।

भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन न करें यदि भूलसे चंद्र दर्शन हो जाये तो उसके निवारण के निमित्त श्रीमद्‌भागवत के १०वें स्कंध, ५६-५७वें अध्याय में उल्लेखित स्यमंतक मणि की चोरी कि कथा का का श्रवण करना लाभकारक हैं। जिस्से चंद्रमा के दर्शन से होने वाले मिथ्या कलंक का ज्यादा खतरा नहीं होगा।

चंद्र-दर्शन दोष निवारण हेतु मंत्र
यदि अनिच्छा से चंद्र-दर्शन हो जाये तो व्यक्ति को निम्न मंत्र से पवित्र किया हुआ जल ग्रहण करना चाहिये। मंत्र का २१, ५४ या १०८ बा जप करे। ऐसा करने से वह तत्काल शुद्ध हो निष्कलंक बना रहता हैं। मंत्र निम्न है

 
सिंहः प्रसेनमवधीत्‌ , सिंहो जाम्बवता हतः।
सुकुमारक मा रोदीस्तव, ह्येष स्यमन्तकः ॥

अर्थात: सुंदर सलोने कुमार! इस मणि के लिये सिंह ने प्रसेन को मारा हैं और जाम्बवान ने उस सिंह का संहार किया हैं, अतः तुम रोऒ मत। अब इस स्यमंतक मणि पर तुम्हारा ही अधिकार हैं।(ब्रह्मवैवर्त पुराण, अध्यायः ७८)

शनिवार, सितंबर 11, 2010

गणेश वाहन मूषक केसे बना

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गणेश वाहन मूषक केसे बना



समेरू पर्वत पर सौमरि ऋषि का आश्रम था। उनकी अत्यंत रूपवान तथा पतिव्रता पत्नी का नाम मनोमयी था। एक दिन ऋषिवर लकड़ी लेने के लिए वन में चले गए। उनके जाने के पश्चयात मनोमयी गृहकार्य में व्यस्त हो गईं। उसी समय एक दुष्ट कौंच नामक गंधर्व वहां आया। जब कौंच ने लावव्यमयी मनोमयी को देखा, तो उसके भीतर काम जागृत होगया एवं वह व्याकुल हो गया। कौंच ने मनोमयी का हाथ पकड़ लिया। रोती व कांपती हुई मनोमयी उससे दया की भीख मांगने लगी। उसी समय वहा सौभरि ऋषि आ गए।

उन्हें गंधर्व को श्राप देते हुए कहा, तुमने चोर की भांति मेरी सहधर्मिनी का हाथ पकड़ा हैं, इस कारण तुम अबसे मूषक होकर धरती के नीचे और चोरी करके अपना पेट भरोगे।’

ऋषि का श्राप सुनकर गंधर्व ने ऋषि से प्रार्थना की- हे ऋषिवर, अविवेक के कारण मैंने आपकी पत्नी के हाथ का स्पर्श किया। मुझे क्षमा कर दें।

ऋषि बोले: कौंच! मेरा श्राप व्यर्थ नहीं होगा। तथापि द्वापर में महर्षि पराशर के यहां गणपति देव गजरूप में प्रकट होंगे। तब तुम उनका वाहन बन जाओगे। इसके पश्चयात तुम्हारा कल्याण होगा तथा देवगण भी तुम्हारा सम्मान करेंगे।’

संकष्टहर चतुर्थी व्रत का प्रारंभ कब हुवा

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संकष्टहर चतुर्थी व्रत का प्रारंभ कब हुवा



संकष्टहर चतुदर्शी कथाः भारद्वाज मुनि और पृथ्वी के पुत्र मंगल की कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर माघ मास के कृष्ण पक्ष में चतुर्थी तिथि को गणपति ने उनको दर्शन दिये थे।

गजानन के वरदान के फलस्वरूप मंगल कुमार को इस दिन मंगल ग्रह के रूप में सौर मण्डल में स्थान प्राप्त हुवाथा। मंगल कुमार को गजानन से यह भी वरदान मिला कि माघ कृष्ण पक्ष की चतुदर्शी जिसे संकष्टहर चतुर्थी के नाम से जाना जाता हैं उस दिन जो भी व्यक्ति गणपतिजी का व्रत रखेगा उसके सभी प्रकार के कष्ट एवं विघ्न समाप्त हो जाएंगे।

एक अन्य कथा के अनुसार भगवान शंकर ने गणपतिजी से प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया था कि माघ कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को चन्द्रमा मेरे सिर से उतरकर गणेश के सिर पर शोभायमान होगा। इस दिन गणेश जी की उपासना और व्रत त्रि-ताप (तीनो प्रकार के ताप) का हरण करने वाला होगा। इस तिथि को जो व्यक्ति श्रद्धा भक्ति से युक्त होकर विधि-विधान से गणेश जी की पूजा करेगा उसे मनोवांछित फल कि प्राप्ति होगी।

गणेश पूजन से वास्तु दोष निवारण

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गणेश पूजन से वास्तु दोष निवारण


 
हिंदू संस्कृति में भगवान गणेश सर्व विघ्न विनाशक माना हैं। इसी कारण गणपति जी का पूजन किसी भी व्रत अनुष्ठान में सर्व प्रथम किया जाता हैं। भवन में वास्तु पूजन करते समय भी गणपति जी को प्रथमपूजा जाता हैं। जिस घर में नियमित गणपति जी का विधि विधान से पूजन होता हैं, वहां सुख-समृद्धि एवं रिद्धि-सिद्धि का निवास होता हैं।

गणेश प्रतिमा (मूर्ति) की स्थापना भवन के मुख्य द्वार के ऊपर अंदर-बहार दोनो और लगाने से अधिक लाभ प्राप्त होता हैं।

गणेश प्रतिमा (मूर्ति) की पूजा घरमें स्थापना करने पर उन्हें सिंदूर चढाने से शुभ फल कि प्राप्ति होती हैं।

भवन में द्वारवेध हो, अर्थात भवन के मुख्य द्वार के सामने वृक्ष, मंदिर, स्तंभ आदि द्वार में प्रवेश

करने वाली उर्जा हेतु बाधक होने पर वास्तु में उसे द्वारवेध माना जाता हैं। द्वारवेध होने पर वहां रहने वालों में उच्चाटन होता हैं। ऐसे में भवन के मुख्य द्वार पर गणोशजी की बैठी हुई प्रतिमा (मूर्ति) लगाने से द्वारवेध का निवारण होता हैं। लगानी चाहिए किंतु उसका आकार 11 अंगुल से अधिक नहीं होना चाहिए।

पूजा स्थानमें पूजन के लिए गणेश जी की एक से अधिक प्रतिमा (मूर्ति) रखना वर्जित हैं।

गणेश पुराण कि महिमा

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गणेश पुराण कि महिमा



गणेश पुराण
शौनक जी ने पूछा हे प्रभो! गणेश पुराण का आरम्भ किस प्रकार हुआ? यह आप मुझे बताने की कृपा करें।

इस पर सूत जी बोले हे शौनक! यद्यपि गणेश पुराण अति प्राचीन हैं, क्योंकि भगवान गणेश तो आदि हैं, न जाने कब से गणेश जी अपने उपासकों पर कृपा करते चले आ रहे हैं। गणेशजी के तो अनन्त चरित्र हैं, जिनका संग्रह एक महापुराण का रूप ले सकता हैं।

गणेश पुराण को एक बार भगवान विष्णु ने नारद जी को और भगवान शंकर ने माता पार्वती जी को सुनाया था। बाद में वही पुराण संक्षेप रूप में ब्रह्माजी ने पुत्र महर्षि वेदव्यास को सुनाया और फिर व्यास जी से महर्षि भृगु ने सुना। भृगु ने कृपा करके सौराष्ट्र के राजा सोमकान्त को सुनाया था। तब से वह पुराण अनेक कथाओं में विस्तृत होता और अनेक कथाओं से रहित होता हुआ अनेक रूप में प्रचलित हैं। शौनक जी ने पूछा भगवान्! आप यह बताने का कष्ट करें कि राजा सोमकान्त कौन था? उसने महर्षि से गणेश पुराण का श्रवण किस जगह किया था? एवं उस पुराण के श्रवण से उसे क्या-क्या उपलब्धियाँ हुई? हे नाथ! मुझे श्री गणेश्वर की कथा के प्रति उत्कण्ठा बढ़ती ही जा रही हैं। सूतजी बोले-'हे शौनक! सौराष्ट्र के देवनगर नाम की एक प्रसिद्ध राजधानी थी। वहाँ का राजा सोमकान्त था। राजा अपनी प्रजा का पालन पुत्र के समान करता था। वह वेदज्ञान सम्पन्न, शस्त्र-विद्या में पारंगत एवं प्रबल प्रतापी राजा समस्त राजाओं में मान्य तथा अत्यन्त वैभवशाली था। उसका ऐश्वर्य कुबेर के भी ऐश्वर्य को लज्जित करता था। उसने अपने पराक्रम से अनेकों देश जीत लिये थे। उसकी पत्नी अत्यन्त रूपवती, गुणवती, धर्मज्ञा एवं पतिव्रता धर्म का पालन करने वाली थी। वह सदैव अपने प्राणनाथ कि सेवा में लगी रहती थी। उसका नाम सुधर्मा था। जैसे वह पतिव्रता थी, वैसे ही राजा भी एक पत्नी व्रत का पालन करने वाला था। उसका हेमकान्त नामक एक सुन्दर पुत्र था। पुत्र भी सोमकान्त कि तरह सभी विद्याओं का ज्ञाता और अस्त्र-शस्त्रादि के अभ्यास में निपुण हो गया था। इन सभी श्रेष्ठ सम्पन्न, सद्गुणी लक्षणों से राजा अपनी प्रजाजनों के हितों का अत्यन्त पोषक था।

इस प्रकार राजा सोमकान्त स्त्री, पुत्र, पशु, वाहन, राज्य एवं प्रतिष्ठा इत्यादि से सब प्रकारसुखी था। उसे किसी प्रकार का दु:ख तो था ही नहीं। सभी प्रजाजन उसका सम्मान करते थे, जिस कारण उसकी श्रेष्ठ कीर्ति भी संसारव्यापी थी। परन्तु युवावस्था के अन्त में सोमकान्त को घृणित कुष्ठ रोग हो गया। उसके अनेक उपाचार किये गये, किन्तु कोई लाभ नहीं हुआ। रोग शीघ्रता से बढऩे लगा और उसके कीड़े पड़ गये। जब रोग की अधिक वृद्धि होने लगी और उसका कोई उपाय न हो सका तो राजा ने अमात्यों को बुलाकर कहा-सुब्रतो! जाने किस कारण यह रोग मुझे पीडि़त कर रहा हैं। अवश्य ही यह मेरें किसी पूर्व जन्म के पाप का फल होगा। इसलिए मैं अब अपना समस्त राज-पाट छोड़कर वन में रहूँगा। अतः आप मेरे पुत्र हेमकान्त को मेरे समान मानकर राज्य शासन का धर्मपूर्वक संचालन कराते रहें। यह कहकर राजा ने शुभ दिन दिखवाकर अपने पुत्र हेमकान्त को राज्यपद पर अभिषिक्त किया और अपनी पत्नी सुधर्मा के साथ निर्जन वन की ओर चल दिया। प्रजापालक राजा के वियोग में समस्त प्रजाजन अश्रु बहाते हुए उनके साथ चले। राज्य की सीमा पर पहुँचकर राजा ने अपने पुत्र, अमात्यगण और प्रजाजनों को समझाया-आप सब लोग धर्म के जानने वाले, श्रेष्ठ आचरण में तत्पर एवं सहृदय हैं। यह संसार तो वैसे भी परिवर्तनशील है। जो आज है, वह कल नहीं था और आने वाले कल भी नहीं रहेगा। इसलिए मेरे जाने से दु:ख का कोई कारण नहीं हैं। मेरे स्थान पर मेरा पुत्र सभी कार्यों को करेगा, इसलिए आप सब उसके अनुशासन में रहते हुए उसे सदैव सम्मति देते रहें। फिर पुत्र से कहा-'पुत्र! यह स्थिति सभी के समक्ष आती रही हैं। हमारे पूर्व पुरूष भी परम्परागत रूप से वृद्धावस्था आने पर वन में जाते रहे हैं। मैं कुछ समय पहिले ही वन में जा रहा हूँ तो कुछ पहिले या पीछे जाने में कोई अन्तर नहीं पड़ता। यदि कुछ वर्ष बाद जाऊँ तब भी मोह का त्याग करना ही होगा। इसलिए, हे वत्स! तुम दु:खित मत होओ और मेरी आज्ञा मानकर राज्य-शासन को ठीक प्रकार चलाओ। ध्यान रखना क्षत्रिय धर्म का कभी त्याग न करना और प्रजा को सदा सुखी रखना। इस प्रकार राजा सोमकान्त ने सभी को समझा बुझाकर वहाँ से वापस लौटाया और स्वयं अपनी पतिव्रता पत्नि के साथ वन में प्रवेश किया। पुत्र हेमकान्त के आग्रह से उसने सुबल और ज्ञानगम्य नामक दो अमात्यों को भी साथ ले लिया। उन सबने एक समतल एवं सुन्दर स्थान देखकर वहाँ विश्राम किया। तभी उन्हें एक मुनिकुमार दिखाई दिया। राजा ने उससे पूछा-'तुम कौनहो? कहाँ रहते हो? यदि उचित समझो तो मुझे बताओ। मुनि बालक ने कोमल वाणी में कहा-'मैं महर्षि भृगु का पुत्र हूँ, मेरा नाम च्यवन है। हमारा आश्रम निकट में ही है। अब आप भी अपना परिचय दीजिए। राजा ने कहा-'मुनिकुमार! आपका परिचय पाकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। मैं सौराष्ट्र के देवनगर राज्य का अधिपति रहा हूँ। अब अपने पुत्र को राज्य देकर मैंने अरण्य की शरण ली हैं। मुझे कुष्ठ रोग अत्यन्त पीडि़त किये हुए हैं, इसकी निवृत्ति का कोई उपाय करने वाला हो तो कृपया कर मुझे बताइये। मुनिकुमार ने कहा-'मैं अपने पिताजी से आपका वृतान्त कहता हूँ, फिर वे जैसा कहेंगे, आपको बताऊँगा। यह कहकर मुनि बालक चला गया और कुछ देर में ही आकर बोला-'राजन्! मैंने आपका वृत्तान्त अपने पिताजी को बताया। उनकी आज्ञा हुई हैं कि आप सब मेरे साथ आश्रम में चलकर उनसे भेंट करें तभी आपके रोग के विषय में भी विचार किया जायेगा। पूर्वजन्म का वृत्तान्त जानने के लिये राजा अपनी पत्नि और अमात्यों के सहित च्यवन के साथ-साथ भृगु आश्रम में जा पहुँचा और उन्हें प्रणाम कर बोला हे भगवान् हे महर्षि! मैं आपकी शरण हूँ, आप मुझ कुष्ठी पर कृपा कीजिए। महर्षि बोले राजन्! यह तुम्हारे किसी पूर्वजन्म के पाप कर्म का ही उदय हो गया हैं। इसका उपाय मैं विचार कर बताऊँगा। आज तो आप सब स्नानादि से निवृत्त होकर रात्रि-विश्राम करो। महर्षि की आज्ञानुसार सबने स्नान, भोजन आदि उपरान्त रात्रि व्यतीत की और प्रात: स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त होकर महर्षि की सेवा में उपस्थित हुए।

महर्षि ने कहा-'राजन्! मैंने तुम्हारे पूर्वजन्म का वृत्तान्त जान लिया हैं और यह भी ज्ञात कर लिया हैं कि किस पाप के फल से तुम्हें इस घृणित रोग की प्राप्ति हुई हैं। यदि तुम चाहो तो उसे सुना दूँ। राजा ने हाथ जोड़कर निवेदन किया बड़ी कृपा होगी मुनिनाथ! मैं उसे सुनने के लिए उत्कण्ठित हूँ। महर्षि ने कहा तुम पूर्व जन्म में एक धनवान वैश्य के लाड़ले पुत्र थे। वह वैश्य विंध्याचल के निकट कौल्हार नामक ग्राम में निवास करता था। उसकी पत्नी का नाम सुलोचना था। तुम उसी वैश्य-दम्पत्ति के पत्र हुए। तुम्हारा नाम 'कामद था। तुम्हारा लालन-पालन बड़े लाड़-चाव से हुआ। उन्होंने तुम्हारा विवाह एक अत्यन्त सुन्दरी वैश्य कन्या से कर दिया था, जिसका नाम कुटुम्बिनी था। यद्यपि तुम्हारी भार्या सुशीला थी और तुम्हें सदैव धर्म में निरत देखना चाहती थी, किन्तु तुम्हारा स्वभाव वासनान्ध होने के कारण दिन प्रतिदिन विकृत होता जा रहा था। किन्तु माता-पिता भी धार्मिक थे, इसलिए उनके सामने तुम्हारी विकृति दबी रही। परन्तु माता-पिता की मृत्यु के बाद तुम निरंकुश हो गये और अपनी पत्नी की बात भी नहीं मानते थे।

तुम्हारे अनाचार में प्रवृत्त देखकर उसे दु:ख होता था, तो भी उसका कुछ वश न चलता था। तुम्हारी उन्मुक्ताता चरम सीमा पर थी। अपनों से भी द्वेष और क्रूरता का व्यवहार किया करते थे। हत्या आदि करा देना तुम्हारे लिये सामान्य बात हो गई। पीडि़त व्यक्तियों ने तुम्हारे विरूद्ध राजा से पुकार की। अभियोग चला और तुम्हें राज्य की सीमा से भी बाहर चले जाने का आदेश हुआ। तब तुम घर छोड़कर किसी निर्जन वन में रहने लगे। उस समय तुम्हारा कार्य लोगों को लूटना और हत्या करना ही रह गया। एक दिन मध्याह्न काल था। गुणवर्धक नामक एक विद्वान् ब्राह्मण उधर से निकला। बेचारा अपनी पत्नी को लिवाने के लिए ससुराल जा रहा था। तुमने उस ब्राह्मण युवक को पकड़ कर लूट लिया। प्रतिरोध करने पर उसे मारने लगे तो वह चीत्कार करने लगा-मुझे मत मार, मत मार। देख, मेरा दूसरा विवाह हुआ है, मैं पत्नी को लेने के लिये जा रहा हूँ। किन्तु तुम तो क्रोधावेश में ऐसे लीन हो रहे थे कि तुमने उसकी बात सुनकर भी नहीं सुनी। जब उसे मारने लगे तो उसने शाप दे दिया-'अरे हत्यारे! मेरी हत्या के पाप से तू सहस्र कल्प तक घोर नरक भोगेगा। तुमने उसकी कोई चिन्ता न की और सिर काट लिया। राजन्! तुमने ऐसी-ऐसी एक नहीं बल्कि अनेक निरीह हत्याएँ की थीं, जिनकी गणना करना भी पाप है। इस प्रकार इस जन्म में तुमने घोर पाप कर्म किये थे, किन्तु बुढ़ापा आने पर जब अशक्त हो गये तब तुम्हारे साथ क्रूरकर्मा थे वे भी किनारा कर गये। उन्होंने सोच लिया कि अब तो इसे खिलाना भी पड़ेगा, इसलिए मरने दो यहीं। गणपति-उपासना का अमांघ प्रभाव राजन्! अब तुम निरालम्ब थे, चल-फिर तो सकते ही नहीं थे, भूख से पीडि़त रहने के कारण रोगों ने भी घेर लिया। उधर से जो कोई निकलता, तुम्हें घृणा की दृष्टि से देखता हुआ चला जाता। तब तुम आहार की खोज में बड़ी कठिनाई से चलते हुए एक जीर्णशीर्ण देवालय में जा पहुँचे। उसमें भगवान् गणेश्वर की प्रतिमा विद्यमान थी। तब न जाने किस पुण्य के उदय होने से तुम्हारे मन में गणेशजी के प्रति भक्ति-भाव जाग्रत हुआ। तुम निराहार रहकर उनकी उपासना करने लगे। उससे तुम्हें सब कुछ मिला और रोग भी कम हुआ।

राजन्! तुमने अपने साथियों की दृष्टि बचाकर बहुत-सा धन एक स्थान पर गाढ़ दिया था। अब तुमने उस धन को उसे देवालय के जीर्णोद्धार में लगाने का निश्चय किया। शिल्पी बुलाकर उस मन्दिर को सुन्दर और भव्य बनवा दिया। इस कारण कुख्याति सुख्याति में बदलने लगी। फिर यथा समय तुम्हारी मृत्यु हुई। यमदूतों ने पकड़कर तुम्हें यमराज के समक्ष उपस्थित किया। यमराज तुमसे बोले-'जीव! तुमने पाप और पुण्य दोनों ही किये हैं और दोनों का ही भोग तुम्हें भोगना है। किन्तु पहले पाप का फल भोगना चाहते हो या पुण्य का? इसके उत्तर में तुमने प्रथम पुण्यकर्मों के भोग की इच्छा प्रकट की और इसीलिए उन्होंने तुम्हें राजकुल में जन्म लेने के लिए भेज दिया। पूर्व जन्म में तुमने भगवान् गणाध्यक्ष का सुन्दर एवं भव्य मन्दिर बनवाया था, इसलिए तुम्हें सुन्दर देह की प्राप्ति हुई है। यह कहकर महर्षि भृगु कुछ रूके, क्योंकि उन्होंने देखा कि राजा को इस वृत्तान्त पर शंङ्का हो रही है। तभी महर्षि के शरीर से असंख्य विकराल पक्षी उत्पन्न होकर राजा की ओर झपटे। उनकी चोंच बड़ी तीक्ष्ण थी, जिनसे वे राजा के शरीर को नोच-नोच कर खाने लगे। उसके कारण उत्पन्न असह्य पीड़ा से व्याकुल हुए राजा ने महर्षि के समक्ष हाथ जोड़कर निवेदन किया-'प्रभो! आपका आश्रम तो समस्त दोष, द्वेष आदि से परे है और यहाँ मैं आपकी शरण में बैठा हूँ तब यह पक्षी मुझे अकारण ही क्यों पीडि़त कर रहे हैं? हे मुनिनाथ! इनसे मेरी रक्षा कीजिए।

महर्षि ने राजा के आत्र्तवचन सुनकर सान्त्वना देते हुए कहा-'राजन्! तुमने मेरे वचनों में शंका की थी और जो मुझ सत्यवादी के कथन में शंका करता है, उसे खाने के लिए मेरे शरीर से इसी प्रकार पक्षी प्रकट हो जाते हैं, जो कि मरे हुंकार करने पर भस्म हो जाया करते हैं। यह कहकर महर्षि ने हुंङ्कार की ओर तभी वे समस्त पक्षी भस्म हो गये। राजा श्रद्धावनत होकर उनके समक्ष अश्रुपात करता हुआ बोला-'प्रभो! अब उस पाप से मुक्त होने के उपाय कीजिए। महर्षि ने कुछ विचार कर कहा-'राजन्! तुम पर भगवान् गणेश्वर की कृपा सहज रूप से है और वे ही प्रभु तुम्हारे पापों को भी दूर करने में समर्थ हैं। इसलिए तुम उनके पाप-नाशक चरित्रों को श्रवण करो। गणेश पुराण में उनके प्रमुख चरित्रों का भले प्रकार वर्णन हुआ है, अतएव तुम श्रद्धा-भक्ति पूर्वक उसी को सुनने में चित्त लगाओ। राजा ने प्रार्थना की-'महामुने! मैंने गणेश पुराण का नाम भी आज तक नहीं सुना तो उनके सुनने का सौभाग्य कैसे प्राप्त कर सकूँगा। हे नाथ! आपसे अधिक ज्ञानी और प्रकाण्ड विद्वान् और कौन हो सकता है? आप ही मुझ पर कृपा कीजिए। महर्षि ने राजा की दीनता देखकर उसके शरीर पर अपने कमण्डल का मन्त्रपूत जल छिड़का। तभी राजा को एक छींक आई और नासिका से एक अत्यन्त छोटा काले वर्ण का पुरूष बाहर निकल आया। देखते-देखते वह बढ़ गया। उसके भयंकर रूप को देखकर राजा कुछ भयभीत हुआ, किन्तु समस्त आश्रमवासी वहाँ से भाग गये। वह पुरूष महर्षि के समक्ष हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। भृगु ने उसकी ओर देखा और कुछ उच्च स्वर में बोले-'तू कौन है? क्या चाहता है? वह बोला-'मैं साक्षात् पाप हूँ, समस्त पापियों के शरीर में मेरा निवास है। आपके मन्त्रपूत जल के स्पर्श से मुझे विवश होकर राजा के शरीर से बाहर निकलना पड़ा है। अब मुझे बड़ी भूख लगी है, बताइये क्या खाऊँ और कहाँ रहूँ? महर्षि बोले-'तु उस आम के अवकाश स्थान में निवास कर और उसी वृक्ष के पत्ते खाकर जीवन-निर्वाह कर। यह सुनते ही वह पुरूष आम के वृक्ष के पास पहुँचा, किन्तु उसके स्पर्श मात्र से वह वृक्ष जलकर भस्म हो गया। फिर जब पाप पुरूष को रहने के लिए कोई स्थान दिखाई न दिया तो वह भी अन्तर्हित हो गया।

हर्षि बोले-'राजन्? कालान्तर में यह वृक्ष पुन: अपना पूर्वरूप धारण करेगा। जब तक यह पुन: उत्पन्न न हो तब तक मैं तुम्हें गणेश पुराण का श्रवण कराता रहूँगा। तुम पुराण श्रवण के संकल्पपूर्वक आदि देव गणेशजी का पूजन करो, तब मैं गणेश पुराण की कथा का आरम्भ करूँगा। मुनिराज के आदेशानुसार राजा ने पुराण-श्रवण का संकल्प किया। उसी समय राजा ने अनुभव किया कि उसकी समस्त पीड़ा दूर हो गई है। दृष्टि डाली तो कुष्ठ रोग का अब कहीं चिन्ह भी शेष नहीं रह गया था। अपने को पूर्णरूप से रोग रहित एवं पूर्ववत् सुन्दर हुआ देखकर राजा के आश्चर्य की सीमा न रही और उसने महर्षि के चरण पकड़ लिए और निवेदन किया कि प्रभो! मुझे गणेश पुराण का विस्तारपूर्वक श्रवण कराइये। महर्षि ने कहा-'राजन्! यह गणेश पुराण समस्त पापों और संकटों को दूर करने वाला है, तुम इसे ध्यानपूर्वक सुनो। इसका श्रवण केवल गणपति-भक्तों को ही करना-कराना चाहिए अन्य किसी को नहीं। कलियुग में पापों की अधिक वृद्धि होगी, और लागे कष्ट-सहन में असमर्थ एवं अल्पायु होंगे। उनके पाप दूर करने का कोई साधन होना चाहिए। इस विचार से महर्षि वेदव्यास ने मुझे सुनाया था। उन्हीं की कृपा से मैं भगवान गणाध्यक्ष के महान चरित्रों को सुनने का सौभाग्य प्राप्त कर सका था। महाराज! भगवान गजानन अपने सरल स्वभाव वाले भक्तों को सब कुछ प्रदान करने में समर्थ हैं। निरभिमान प्राणियों पर वे सदैव अनुग्रह करते हैं किन्तु मिथ्याभिमानी किसी को भी नहीं रहने देते।

अमंगल हि नही मंगलकारी भी है मंगल

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अमंगल हि नही मंगलकारी भी है मंगल



भारतीय संस्कृति में आध्यात्मिक आस्था कि द्रष्टि से भगवान गणपतिजी का हमारे जीवन में विशेष महत्व हैं। ठिक उसी प्रकार से ज्योतिष शास्त्र कि द्रष्टि से भी गणेशजी विशेष महत्व रखते हैं। ज्योतिष के अनुशार बारह राशि चक्र में सबसे प्रथम जो राशि आति हैं वह हैं मेष राशि हैं। मेष राशिका स्वामी ग्रह मंगल हैं। जिस प्रकार गणेशजी का सर्व प्रथम स्मरण-पूजन-अर्चन होता हैं। इसी प्रकार मंगल ग्रह के आधिपत्य वाली मेष राशि भी राशि चक्र में अन्य ग्रहो कि राशि से सर्व प्रथम आती हैं। जिस प्रकार गणेशजी गणो के पति अर्थात गणपति हैं, इसी प्रकार मंगल ग्रह को भी ज्योतिष में सेनापति कि सज्ञा दिगई हैं।

जेसे मंगल का रंग लाल या सिंदूर के रंगके समान हैं, इस लिये भगवान गणेश को भी सिंदूर हि चढाया जाता हैं। इस लिये गणेशजी को मंगलनाथ या मंगलमूर्ति भी कहाजाता हैं। मंगल कुमार को गणेशजी नें मंगलवार के दिन दर्शन देकर उनहे मंगल ग्रह होने का वरदान दिया था इसी के कारण ही भगवान गणेश को मंगल मूर्ति कहा जाता हैं और मंगलवार के दिन मंगलमूर्ति गणेश का पूजन किया जाता हैं। विद्वानो ने देवी महाकाली जी का पूजन भी मंगलवार को श्रेष्ठ फल देने वाला माना हैं।

मंगल ग्रह कि उत्पत्ति शिव से मानी गई हैं। इसी कारण मंगल में शिव के समान तेज हैं। मंगल के प्रभाव वाले जाताक आकर्षक, तेजस्वी, चिड़चिड़े स्वाभाव, समस्याओं से लडऩे की शक्ति विशेष रूप से प्रभावमान होता हैं। विकट से विकट समस्याओं में घिरे होने के बावजूद जातक अपना धैर्य नहीं छोड़ते हैं। ज्योतिष ग्रथो में मंगल को भले ही क्रूर ग्रह बताया गया हैं, मंगल केवल अमंगलकारी हि नहीं हैं यह मंगलकारी भी होता हैं।

नौमी भौम वार मधुमासा।
अवघपूरी यह चरित प्रकाशा।।(राचमा )

भगवान राम का जन्म मंगलवार को ही हुआ था। श्री रामभक्त हनुमानजी का जन्म भी मंगलवार को ही हुआ था। इसलिए हनुमानजी का पूजन मंगलवार को विशेष रूप से होता हैं।

मंगल के दिन कर्ज लेने का कार्य वर्जित माना जाता हैं। मंगलवार को बाल-दाढी, नाखून इत्यादि अपवित्र कार्यों को निषेध मना जाता हैं।

जातक में मंगल+चंद्र युति हो या मंगल और चंद्र पर परस्पर एक दूसरे की दृष्टि हो तो जातक रंक से राजा बन जाता हैं। अत: मंगल केवल एक क्रूर ग्रह ही नहीं मंगलकारी ग्रह भी है।

गणेश चतुर्थी पर चंद्र दर्शन निषेध क्यों...

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गणेश चतुर्थी पर चंद्र दर्शन निषेध क्यों...



गणेश चतुर्थी पर चंद्र दर्शन निषेध होने कि पौराणिक मान्यता हैं। शास्त्रोंक्त वचन के अनुशार जो व्यक्ति इस दिन चंद्रमा को जाने-अन्जाने देख लेता हैं उसे मिथ्या कलंक लगता हैं। उस पर झूठा आरोप लगता हैं।

कथा
एक बार जरासन्ध के भय से भगवान कृष्ण समुद्र के बीच नगर बनाकर वहां रहने लगे। भगवान कृष्ण ने जिस नगर में निवास किया था वह स्थान आज द्वारिका के नाम से जाना जाता हैं।

उस समय द्वारिका पुरी के निवासी से प्रसन्न होकर सूर्य भगवान ने सत्रजीत यादव नामक व्यक्ति अपनी स्यमन्तक मणि वाली माला अपने गले से उतारकर दे दी।

यह मणि प्रतिदिन आठ सेर सोना प्रदान करती थी। मणि पातेही सत्रजीत यादव समृद्ध हो गया। भगवान श्री कृष्ण को जब यह बात पता चली तो उन्होंने सत्रजीत

से स्यमन्तक मणि पाने की इच्छा व्यक्त की। लेकिन सत्रजीत ने मणि श्री कृष्ण को न देकर अपने भाई प्रसेनजीत को दे दी। एक दिन प्रसेनजीत शिकार पर गया जहां एक शेर ने प्रसेनजीत को मारकर मणि ले ली। यही रीछों के राजा और रामायण काल के जामवंत ने शेर को मारकर मणि पर कब्जा कर लिया था।

कई दिनों तक प्रसेनजीत शिकार से घर न लौटा तो सत्रजीत को चिंता हुई और उसने सोचा कि श्रीकृष्ण ने ही मणि पाने के लिए प्रसेनजीत की हत्या कर दी। इस प्रकार सत्रजीत ने पुख्ता सबूत जुटाए बिना ही मिथ्या प्रचार कर दिया कि श्री कृष्ण ने प्रसेनजीत की हत्या करवा दी हैं। इस लोकनिंदा से आहत होकर और इसके निवारण के लिए श्रीकृष्ण कई दिनों तक एक वन से दूसरे वन भटक कर प्रसेनजीत को खोजते रहे और वहां उन्हें शेर द्वारा प्रसेनजीत को मार डालने और रीछ द्वारा मणि ले जाने के चिह्न मिल गए। इन्हीं चिह्नों के आधार पर श्री कृष्ण जामवंत की गुफा में जा पहुंचे जहां जामवंत की पुत्री मणि से खेल रही थी। उधर जामवंत श्री कृष्ण से मणि नहीं देने हेतु युद्ध के लिए तैयार हो गया। सात दिन तक जब श्री कृष्ण गुफा से बाहर नहीं आए तो उनके संगी साथी उन्हें मरा हुआ जानकार विलाप करते हुए द्वारिका लौट गए। २१ दिनों तक गुफा में युद्ध चलता रहा और कोई भी झुकने को तैयार नहीं था। तब जामवंत को भान हुआ कि कहीं ये वह अवतार तो नहीं जिनके दर्शन के लिए मुझे श्री रामचंद्र जी से वरदान मिला था। तब जामवंत ने अपनी पुत्री का विवाह श्री कृष्ण के साथ कर दिया और मणि दहेज में श्री कृष्ण को दे दी। उधर कृष्ण जब मणि लेकर लौटे तो उन्होंने सत्रजीत को मणि वापस कर दी। सत्रजीत अपने किए पर लज्जित हुआ और अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह श्री कृष्ण के साथ कर दिया।

कुछ ही समय बाद अक्रूर के कहने पर ऋतु वर्मा ने सत्रजीत को मारकर मणि छीन ली। श्री कृष्ण अपने बड़े भाई बलराम के साथ उनसे युद्ध करने पहुंचे। युद्ध में जीत हासिल होने वाली थी कि ऋतु वर्मा ने मणि अक्रूर को दे दी और भाग निकला। श्री कृष्ण ने युद्ध तो जीत लिया लेकिन मणि हासिल नहीं कर सके। जब बलराम ने उनसे मणि के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा कि मणि उनके पास नहीं। ऐसे में बलराम खिन्न होकर द्वारिका जाने की बजाय इंद्रप्रस्थ लौट गए। उधर द्वारिका में फिर चर्चा फैल गई कि श्री कृष्ण ने मणि के मोह में भाई का भी तिरस्कार कर दिया। मणि के चलते झूठे लांछनों से दुखी होकर श्री कृष्ण सोचने लगे कि ऐसा क्यों हो रहा है। तब नारद जी आए और उन्होंने कहा कि हे कृष्ण तुमने भाद्रपद में शुक्ल चतुर्थी की रात को चंद्रमा के दर्शन कियेथे और इसी कारण आपको मिथ्या कलंक झेलना पड़ रहा हैं।

श्रीकृष्ण चंद्रमा के दर्शन कि बात विस्तार पूछने पर नारदजी ने श्रीकृष्ण को कलंक वाली यह कथा बताई थी। एक बार भगवान श्रीगणेश ब्रह्मलोक से होते हुए लौट रहे थे कि चंद्रमा को गणेशजी का स्थूल शरीर और गजमुख देखकर हंसी आ गई। गणेश जी को यह अपमान सहन नहीं हुआ। उन्होंने चंद्रमा को शाप देते हुए कहा, 'पापी तूने मेरा मजाक उड़ाया हैं। आज मैं तुझे शाप देता हूं कि जो भी तेरा मुख देखेगा, वह कलंकित हो जायेगा।

गणेशजी शाप सुनकर चंद्रमा बहुत दुखी हुए। गणेशजी शाप के शाप वाली बाज चंद्रमा ने समस्त देवताओं को सोनाई तो सभी देवताओं को चिंता हुई। और विचार विमर्श करने लगे कि चंद्रमा ही रात्री काल में पृथ्वी का आभूषण हैं और इसे देखे बिना पृथ्वी पर रात्री का कोई काम पूरा नहीं हो सकता। चंद्रमा को साथ लेकर सभी देवता ब्रह्माजी के पास पहुचें। देवताओं ने ब्रह्माजी को सारी घटना विस्तार से सुनाई उनकी बातें सुनकर ब्रह्माजी बोले, चंद्रमा तुमने सभी गणों के अराध्य देव शिव-पार्वती के पुत्र गणेश का अपमान किया हैं। यदि तुम गणेश के शाप से मुक्त होना चाहते हो तो श्रीगणेशजी का व्रत रखो। वे दयालु हैं, तुम्हें माफ कर देंगे। चंद्रमा गणेशजी को प्रशन्न करने के लिये कठोर व्रत-तपस्या करने लगे। भगवान गणेश चंद्रमा की कठोर तपस्या से प्रसन्न हुए और कहा वर्षभर में केवल एक दिन भाद्रपद में शुक्ल चतुर्थी की रात को जो तुम्हें देखेगा, उसे ही कोई मिथ्या कलंक लगेगा। बाकी दिन कुछ नहीं होगा। ’ केवल एक ही दिन कलंक लगने की बात सुनकर चंद्रमा समेत सभी देवताओं ने राहत की सांस ली। तब से भाद्रपद में शुक्ल चतुर्थी की रात को चंद्रमा के दर्शन का निषेध हैं।

गणेश चतुर्थी ज्योतिष की नजर में

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गणेश चतुर्थी ज्योतिष की नजर में



गणपति समस्त लोकोंमें सर्व प्रथम पूजेजाने वाले एकमात्र देवाता हैं। गणेश समस्त गण के गणाध्यक्षक होने के कारणा गणपति नाम से भी जाने जाते हैं। मनुष्य को जीवन में समस्त प्रकार कि रिद्धि-सिद्धि एवं सुखो कि प्राप्ति एवं अपनी सम्स्त आध्यात्मिक-भौतिक इच्छाओं कि पूर्ति हेतु गणेश जी कि पूजा-अर्चना एवं आराधना अवश्य करनी चाहिये।

गणेशजी का पूजन अनादिकाल से चला आ रहा हैं, इसके अतिरिक्त ज्योतिष शास्त्रों के अनुशार ग्रह पीडा दूर करने हेतु भगवान गणेश कि पूजा-अर्चना करने से समस्त ग्रहो के अशुभ प्रभाव दूर होते हैं एवं शुभ फल कि प्राप्ति होती हैं। इस लिये गणेश पूजाका अत्याधिक महत्व हैं।

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभः।
निर्विघ्नं कुरू मे देव सर्व कार्येषु सर्वदा।।

भगवान गणेश सूर्य तेज के समान तेजस्वी हैं। गणेशजी का पूजन-अर्चन करने से सूर्य के प्रतिकूल प्रभाव का शमन होकर व्यक्ति के तेज-मान-सम्मान में वृद्धि होती हैं, उसका यश चारों और बढता हैं। पिता के सुख में वृद्धि होकर व्यक्ति का आध्यात्मिक ज्ञान बढता हैं।

भगवान गणेश चंद्र के समान शांति एवं शीतलता के प्रतिक हैं। गणेशजी का पूजन-अर्चन करने से चंद्र के प्रतिकूल प्रभाव का नाश होकर व्यक्ति को मानसिक शांति प्राप्त होती हैं। चंद्र माता का कारक ग्रह हैं इस लिये गणेशजी के पूजन से मातृसुख में वृद्धि होती हैं।

भगवान गणेश मंगल के समान शिक्तिशाली एवं बलशाली हैं। गणेशजी का पूजन-अर्चन करने से मंगल के अशुभ प्रभाव दूर होते हैं और व्यक्ति कि बल-शक्ति में वृद्धि होती हैं। गणेशजी के पूजन से ऋण मुक्ति मिलती हैं। व्यक्ति के साहस, बल, पद और प्रतिष्ठा में वृद्धि होती हैं जिस कारण व्यक्ति में नेतृत्व करने कि विलक्षण शक्ति का विकास होता हैं। भाई के सुख में वृद्धि होती हैं।

गणेशजी बुद्धि और विवेक के अधिपति स्वामि बुध ग्रह के अधिपति देव हैं। अत: विद्या-बुद्धि प्राप्ति के लिए गणेश जी की आराधना अत्यंत फलदायी सिद्धो होती हैं। गणेशजी के पूजन से वाकशक्ति और तर्कशक्ति में वृद्धि होती हैं। बहन के सुख में वृद्धि होती हैं।

भगवान गणेश बृहस्पति(गुरु) के समान उदार, ज्ञानी एवं बुद्धि कौशल में निपूर्ण हैं। गणेशजी का पूजन-अर्चन करने से बृहस्पति(गुरु) से संबंधित पीडा दूर होती हैं और व्यक्ति कें आध्यात्मिक ज्ञान का विकास होता हैं। व्यक्ति के धन और संपत्ति में वृद्धि होती हैं। पति के सुख में वृद्धि होती हैं।

भगवान गणेश धन, ऐश्वर्य एवं संतान प्रदान करने वाले शुक्र के अधिपति हैं। गणेशजी का पूजन करने से शुक्र के अशुभ प्रभाव का शमन होता हैं। व्यक्ति को समस्त भौतिक सुख साधन में वृद्धि होकर व्यक्ति के सौन्दर्य में वृद्धि होती हैं। पति के सुख में वृद्धि होती हैं।

भगवान गणेश शिव के पुत्र हैं। भगवान शिव शनि के गुरु हैं। गणेशजी का पूजन करने से शनि से संबंधित पीडा दूर होती हैं। भगवान गणेश हाथी के मुख एवं पुरुष शरीर युक्त होने से राहू व केतू के भी अधिपति देव हैं। गणेशजी का पूजन करने से राहू व केतू से संबंधित पीडा दूर होती हैं। इसलिये नवग्रह कि शांति मात्र भगवान गणेश के स्मरण से ही हो जाती हैं। इसमें कोई संदेह नहीं हैं। भगवान गणेश में पूर्ण श्रद्धा एवं विश्वास कि आवश्यक्ता हैं। भगवान गणेश का पूजन अर्चन करने से मनुष्य का जीवन समस्त सुखो से भर जाता है।

जन्म कुंडली में चाहें होई भी ग्रह अस्त हो या नीच हो अथवा पीडित हो तो भगवान गणेश कि आराधना से सभी ग्रहो के अशुभ प्रभाव दूर होता हैं एवं शुभ फलो कि प्राप्ति होती हैं।

वक्रतुण्ड कथा

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वक्रतुण्ड कथा


वक्रतुण्डावतारश्च देहानां ब्रह्मधारकः।
मत्सरासुरहन्ता स सिंहवाहनगः स्मृतः।।

भगवान् श्रीगणेश का ‘वक्रतुण्डावतार’ ब्रह्मरूप से सम्पूर्ण शरीरों को धारण करनेवाला, मत्सरासुर का वध करनेवाला तथा सिंहवाहन पर चलनेवाला हैं।

मुद्गल पुराण के अनुसार भगवान् गणेश के अनेकों अवतार हैं, जिनमें आठ अवतार प्रमुख हैं। पहला अवतार भगवान् वक्रतुण्ड का है। ऐसी कथा है कि देवराज इन्द्र के प्रमाद से मत्सरासुर का जन्म हु्आ। उसने दैत्यगुरु शुक्राचार्य से भगवान् शिवके ॐ नमः शिवाय (पञ्चाक्षरी मन्त्र) की दीक्षा प्राप्त कर भगवान् शंकर की कठोर तपस्या की भगवान् शंकर ने प्रसन्न होकर उसे अभय होने का वरदान दिया। वरदान प्राप्त कर जब मत्सरासुर घर लौटा तब शुक्राचार्य ने उसे दैत्यों का राजा बना दिया। दैत्यमन्त्रियों ने शक्तिशाली मत्सर को विश्व पर विजय प्राप्त करने की सलाह दी। शक्ति और पद के मद से चूर मत्सरासुर ने अपनी विशाल सेना के साथ पृथ्वी के राजाओं पर आक्रमण कर दिया। कोई भी राजा असुर के सामने टिक नहीं सका। कुछ पराजित हो गये और कुठ प्राण बचाकर कन्दराओं में छिप गये। इस प्रकार सम्पूर्ण पृथ्वी पर मत्सरासुर का शासन हो गया।

पृथ्वी साम्राज्य प्राप्त कर उस दैत्य ने क्रमशः पाताल और स्वर्ग पर भी चढ़ाई कर दी। शेष ने विनयपूर्वक उसके अधीन रहकर उसे कर पाताल लोक देना स्वीकार कर लिया। इन्द्र इत्यादि देवता उससे पराजित होकर भाग गये। मत्सरासुर स्वर्ग का भी सम्राट हो गया।

असुरों से दुःखी होकर देवतागण ब्रह्मा और विष्णु को साथ लेकर शिवजी के कैलास पहुँचे। उन्होंने भगवान् शंकर को दैत्यों के अत्याचार वृतांत सुनाया। भगवान् शंकरने मत्सरासुर के इस दुष्कर्म की घोर निन्दा की। यह समाचार सुनकर मत्सरासुर ने कैलास पर भी आक्रमण कर दिया।

भगवान् शिव से उसका घोर युद्ध हुआ। परन्तु, त्रिपुरारि भगवान् शिव भी जीत नहीं सके। उसने उन्हें भी कठोर पाश में बाँध लिया और कैलाश का स्वामी बनकर वहीं रहने लगा। चारों तरफ दैत्यों का अत्याचार होने लगा।

दुःखी देवताओं के सामने मत्सरासुर के विनाश का कोई मार्ग नहीं बचा। वे अत्यन्त चिन्तित और दुर्बल हो रहे थे। उसी समय वहाँ भगवान दत्तात्रेय आ पहुँचे। उन्होंन देवताओं को वक्रतुण्ड के गं(एकाक्षरी मन्त्र) का उपदेश किया। समस्त देवता भगवान् वक्रतुण्ड के ध्यान के साथ एकाक्षरी मन्त्र का जप करने लगे। उनकी आराधना से सन्तुष्ट होकर तत्काल फलदाता वक्रतुण्ड प्रकट हुए। उन्होंने देवताओंसे कहा आप लोग निश्चिन्त हो जायँ। मैं मत्सरासुर के गर्व को चूर-चूर कर दूँगा।

भगवान् वक्रतुण्ड ने अपने असंख्य गणों के साथ मत्सरासुर के नगरों को चारों तरफ से घेर लिया। भयंकर युद्ध छिड़ गया। पाँच दिनों तक लगातार युद्ध चलता रहा। मत्सरासुर के सुन्दरप्रिय एवं विषयप्रिय नामक दो पुत्र थे वक्रतुण्ड के गणों ने उन्हें मार डाला। पुत्र वध से व्याकुल मत्सरासुर रणभूमि में उपस्थित हुआ। वहाँ से उसने भगवान् वक्रतुण्ड को अपशब्द कहे। भगवान् वक्रतुण्ड ने प्रभावशाली स्वर में कहा यदि तुझे प्राणप्रिय हैं तो शस्त्र रखकर तु मेरी शरण में आ जा नहीं तो निश्चित मारा जायगा।

वक्रतुण्ड के भयानक रूप को देखकर मत्सरासुर अत्यन्त व्याकुल हो गया। उसकी सारी शक्ति क्षीण हो गयी। भयके मारे वह काँपने लगा तथा विनयपूर्वक वक्रतुण्ड की स्तुति करने लगा। उसकी प्रार्थना से सन्तुष्ट होकर दयामय वक्रतुण्ड ने उसे अभय प्रदान करते हुए अपनी भक्ति का वरदान किया तथा सुख शांति से जीवन बिताने के लिये पाताल लोक जाने का आदेश दिया। मत्सरासुर से निश्चिन्त होकर देवगण वक्रतुण्ड की स्तुति करने लगे। देवताओं को स्वतन्त्र कर प्रभु वक्रतुण्ड ने उन्हें भी अपनी भक्ति प्रदान की।

गणेश एकदंत कथा

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एकदंत कथा गणेश


एकदंत कैसे कहलाए गणेशजी
महाभारत विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य एवं ग्रंथ हैं। जिसकी रचना में एक लाख से ज्यादा श्लोको का प्रयोग हुवा हैं। एसी लोकमान्यता हैं कि ब्रह्माजी ने स्वप्न में ऋषि पराशर एवं सत्यवती के पुत्र महर्षि व्यास को महाभारत लिखने की प्रेरणा दी थी।

महाभारत के रचनाकार अलौकिक शक्ति से सम्पन्न महर्षि व्यास त्रिकाल द्रष्‍टा थे। इस लिये महर्षि व्यास ने महाभारत लिखने का यह काम स्वीकार कर लिया, लेकिन महर्षि व्यास के मस्तिष्क में जिस तीव्रतासे महाभारत के मंत्र आ रहेथे इस कारण उन मंत्रो को उसी तीव्रता से को कोई लिखने वाला योग्य व्यक्ति न मिला। वे ऐसे किसी व्यक्ति की खोज में लग गए जो महाभारत लिख सके। महाभारत के प्रथम अध्याय में उल्लेख हैं कि वेद व्यास ने गणेशजी को महाभारत लिखने का प्रस्ताव दिया तो गणेशजी ने महाभारत लिख का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

गणेशजी ने महाभारत लिखने के पहले शर्त रखी कि महर्षि कथा लिखवाते समय एक पल के लिए भी नहीं रुकेंगे।

इस शर्त को मानते हुए महर्षि ने भी एक शर्त रख दी कि गणेशजी भी एक-एक वाक्य को बिना समझे नहीं लिखेंगे। महाभारत लिखते समय इस शर्त के कारणा गणेशजी के समझने के दौरान महर्षि को सोचने का अवसर मिल जाता था।

महाभारत लिखने गणेशजी ने अपना एक दाँत तोडकर उसकि लेखनी बानई। इस लिये उन्हें एकदंत कहा जाता हैं। माना जाता है कि बिना रुके लिखने की शीघ्रता में यह दाँत टूटा था।

एक दांत टूट ने कि और एक कहानी हैं

ब्रह्मावैवर्त पुराण के अनुशार परशुराम शीवजी को मिल्ने कैलश गये। कैलश के प्रवेश द्वार पर ही गणेश ने परशुराम को रोक लियी किन्तु परशुराम रुके नहीं और बलपूर्वक प्रवेश करने का प्रयास किया। तब गणेशजी नें परशुराम से युद्ध कर उनको स्तम्भित कर अपनी सूँड में लपेटकर समस्त लोकों में भ्रमण कराते हुए गौलोक में भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन कराते हुए भूतल पर पटक दिया। परशुराम ने क्रोध में फरसे(परशु ) से गणेशजी के एक दांत को काट डाला। तभिसे गणेश को एकदंत कहा जाता हैं।

एकदन्त कथा

एकदन्तावतारौ वै देहिनां ब्रह्मधारकः।
मदासुरस्य हन्ता स आखुवाहनगः स्मृतः।।

भावार्थ: भगवान् गणेश का ‘एक दन्तावतार’ देहि-ब्रह्मधारक है, वह मदासुरका वध करनेवाला है; उसका वाहन मूषक बताया गया है।

वह महर्षि च्यवन का पुत्र मदासुर एक बलवान् पराक्रमी दैत्य था। एक बार वह अपने पिता से आज्ञा प्राप्त कर दैत्यगुरु शुक्राचार्य के पास गया।

उसने शुक्राचार्य से अनुरोध किय कि आप मुझे कृप्या अपना शिष्य बना लें, मैं समग्र ब्रह्माण्ड का स्वामी बनना चाहता हूँ। कृप्या आप मेरी इच्छा पूरी करने के लिये मेरा उचित मार्गदर्शन करें। शुक्राचार्य ने सन्तुष्ट होकर उसे अपना शिष्य बना लिया। सर्वज्ञ आचार्य ने उसे "ह्रीं" (एकाक्षरी) शक्ति मन्त्र प्रदान किया। मदासुर अपने गुरुदेव शुक्राचार्य से आज्ञा पाकर के उनके चरणों में प्रणाम कर आशीर्वाद लेकर जंगल में तप करने के लिये चला गया। उसने जगदम्बा का ध्यान करते हुए एक हजार वर्षों तक कठोर तप किया। तप करते हुवे उसका शरीर दीमकों की बाँबी से ढंक गया। उसके चारों तरफ वृक्ष उग गये और लताएँ फैल गयीं। उसके कठोर तपसे प्रसन्न होकर मां भगवती प्रकट हुईं। भगवती ने उसे नीरोग रहने तथा निष्कंटक सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का राज्य प्राप्त होने का वरदान दिया।

मदासुरने पहले सम्पूर्ण धरती पर अपना साम्राज्य स्थापित किया। फिर स्वर्ग पर साम्राज्य स्थापित करने केलिये चढ़ाई की। इन्द्र इत्यादि देवाताओं को पराजीत कर उसने स्वर्ग का भी साम्राज्य स्थापित किया। उसने प्रमदासुर की कन्या सालसा से विवाह किया। सालसासे उसे तीन पुत्र हुए। उसने भगवान् शिव को पराजित कर दिया। सर्वत्र असुरों का क्रूरतम शासन चलने लगा। पृथ्वीपर समस्त धर्म-कर्म लुप्त होने लगा। सर्वत्र हाहाकार मच गया। देवतागण एवं मुनिगण दुःखीत होने लगे।

चिन्तित देवता सनत्कुमार के पास गये, तथा उनसे असुरो के विनाश एवं पूनः धर्म-स्थापना का उपाय पूछाः सनत्कुमार ने कहा देवगण आप लोग श्रद्धापूर्वक भगवान् एकदन्त की उपासना करें। वे सन्तुष्ट होकर अवश्य ही आपलोगों का मनोरथ पूर्ण करेंगे। महर्षि के उपदेश अनुसार देवगण एकदन्त की उपासना करन लगे। तपस्या के सौ वर्ष पूरे होने पर भगवान् एकदन्त प्रकट हुए तथा वर माँगने के लिये कहा। देवताओं ने निवेदन किया प्रभु मदासुर के शासन में देवताओं का स्थानभ्रष्ट और मुनिगण कर्मभ्रष्ट हो गये हैं। आप हमें इस कष्ट से मुक्ति दिलाकार अपनी भक्ति प्रदान करें।

उधर देवर्षिने मदासुर को सूचना दी कि भगवान् एकदन्त ने देवताओं को वरदान दिया हैं। अब वे तुम्हारा प्राण-हरण करने के लिये तुमसे युद्ध करना चाहते हैं। मदासुर अत्यन्त कुपित होकर अपनी विशाल सेना के साथ एकदन्त से युद्ध करने चला गया। भगवान् एकदन्त रास्ते में ही प्रकट हो गये। राक्षसों ने देखा कि भगवान् एकदन्त मूषक पर सवार होकर सामने से चले आ रहे हैं। उनकी आकृति अत्यन्त भयानक हैं। उनके हाथोंमें परशु, पाश आदि आयुध हैं। उन्होंने असुरों से कहा कि तुम अपने स्वामी से कह दो यदि वह जीवित रहना चाहता हैं तो देवताओं से द्वेष छोड़ दे। उनका राज्य उन्हें वापस कर दे। अगर वह ऐसा नहीं करता हैं तो मैं निश्चित ही उसका वध करूँगा। महाक्रूर मदासुर युद्ध के लिये तैयार हो गया जैसे ही उसने अपने धनुष पर बाण चढ़ाना चाहा कि भगवान् एकदन्त का तीव्र परशु उसे लगा और वह बेहोश होकर गिर गया।

बेहोशी टूटने पर मदारसुर समझ गया कि यह सर्व समर्थ परमात्मा ही हैं। उसने हाथ जोड़कर स्तुति करते हुए कहा कि प्रभु आप मुझे क्षमा कर अपनी दृढ़ भक्ति प्रदान करें। एकदन्त ने प्रसन्न होकर कहा कि जहाँ मेरी पूजा आराधना हो, वहाँ तुम कदापि मत जाना। आजसे तुम पाताल में रहोगे। देवता भी प्रसन्न होकर एकदन्त की स्तुति करके स्वर्ग लोक चले गये।

गणेशजी माता लक्ष्मी के दत्तक पुत्र है?

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गणेशजी माता लक्ष्मी के दत्तक  पुत्र है?



विष्णु  धाम में भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी विराजमान होकर आपस में वार्तालाप कर रहे थे, बात-बात में अहं के कारण लक्ष्मी जी बोल उठे कि मैं

सभी लोक में सब से अधिक पूजनीय एवं सबसे श्रेष्ठ हुं।

लक्ष्मी जी को इस प्रकार अपनी  अहं से स्वयं कि प्रशंसा  करते देख भगवान विष्णु जी को अच्छा नहीं लगा। उनका अहं दूर करने के लिए उन्होंने कहा तुम सर्व संपन होते हुए भी आज तक माँ का  सुख प्राप्त नहीं कर पाई।

इस बात को सुन कर लक्ष्मीजी को बहुत दुःखी होगई और वो  अपनी  पीड़ा सुनांने के लिये माता पार्वती के पास गयीं और उनसे विनती कि वो अपने पुत्र कार्तिकेय और गणेशजी में से किसे एक पुत्र को उनहें दत्तक  पुत्र के रूप में प्रदान कर  दें। लक्ष्मीजी कि पीडा देख कर पार्वतीजी ने गणेश जी को लक्ष्मीजी को दत्तक पुत्र के रूप में देने का स्वीकार कर लिया। पार्वतीजी से गणेश जी को पुत्र के रूप पाकर लक्ष्मीजी नें हर्षित होते हुवे कहां मैं अपनी सभी सिद्धियां, सुख अपने पुत्र गणेश  जी को प्रदान करती  हूँ। इस के साथ साथ में मेरी पुत्री के समान प्रिय रिध्धि और सिध्धि जो के ब्रह्मा जी कि पुत्रियाँ हैं , उनसे गणेशजी का विवाह करने का वचन देती हूँ । यदि सम्पूर्ण  त्रिलोकों में जो व्यक्ति , श्री गणेश जी कि पूजा नहीं करेगा वरन उनकी  निंदा करेगा मैं उनसे कोसों दूर रहूँगी 
 जब भी मेरी पूजा होगी उसके साथ हिं गणेश कि भी पूजा अवश्य होगी।

मनोवांछित फलो कि प्राप्ति हेतु सिद्धि प्रद गणपति स्तोत्र

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मनोवांछित फलो कि प्राप्ति हेतु सिद्धि प्रद गणपति स्तोत्र


प्रतिदिन इस स्तोत्र का पाठ करने से मनोवांछित फल शीघ्र प्राप्त होते हैं।
मनोवांछित फल प्राप्त करने हेतु गणेश‌जी के चित्र या मूर्ति के सामने मंत्र जाप कर सकते हैं। पूर्ण श्रद्धा एवं पूर्ण विश्वास के साथ मनोवांछित फल प्रदान करने वाले इस स्तोत्र का प्रतिदिन कम से कम 21 बार पाठ अवश्य करें।

अधिकस्य अधिकं फलम्।
जप जितना अधिक हो सके उतना अच्छा है। यदि मंत्र अधिक बार जाप कर सकें तो श्रेष्ठ।

प्रातः एवं सायंकाल दोनों समय करें, फल शीघ्र प्राप्त होता है।

कामना पूर्ण होने के पश्चयात भी नियमित स्त्रोत ला पाठ करते रहना चाहिए। कुछ एक विशेष परिस्थिति में पूर्व जन्म के संचित कर्म स्वरूप प्रारब्ध की प्रबलता के कारण मनोवांछित फल की प्राप्ति या तो देरी संभव हैं!

मनोवांछित फल की प्राप्ति के अभाव में योग्य विद्वान की सलाह लेकर मार्गदर्शन प्राप्त करना उचित होगा। अविश्वास व कुशंका करके आराध्य के प्रति अश्रद्धा व्यक्त करने से व्यक्ति को प्रतिकूल प्ररिणाम हि प्राप्त होते हैं। शास्त्रोक्त वचन हैं कि भगवान (इष्ट) कि आराधना कभी व्यर्थ नहीं जाती।

मंत्र:-

गणपतिर्विघ्नराजो लम्बतुण्डो गजाननः।
द्वैमातुरश्च हेरम्ब एकदन्तो गणाधिपः॥

विनायकश्चारुकर्णः पशुपालो भवात्मजः।
द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत्‌॥

विश्वं तस्य भवेद्वश्यं न च विघ्नं भवेत्‌ क्वचित्‌।

(पद्म पु. पृ. 61।31-33)

भावार्थ: गणपति, विघ्नराज, लम्बतुण्ड, गजानन, द्वैमातुर, हेरम्ब, एकदन्त, गणाधिप, विनायक, चारुकर्ण, पशुपाल और भवात्मज- गणेशजी के यह बारह नाम हैं। जो व्यक्ति प्रातःकाल उठकर इनका नियमित पाठ करता हैं, संपूर्ण विश्व उनके वश में हो जाता हैं, तथा उसे जीवन में कभी विघ्न का सामना नहीं करना पड़ता।

शुक्रवार, सितंबर 10, 2010

गणेश ने चूर किय कुबेर का अहंकार

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गणेश ने चूर किय कुबेर का अहंकार


एक पौराणिक कथा के अनुशार हैं। कुबेर तीनों लोकों में सबसे धनी थे। एक दिन उन्होंने सोचा कि हमारे पास इतनी संपत्ति हैं, लेकिन कम ही लोगों को इसकी जानकारी हैं। इसलिए उन्होंने अपनी संपत्ति का प्रदर्शन करने के लिए एक भव्य भोज का आयोजन करने की बात सोची। उस में तीनों लोकों के सभी देवताओं को आमंत्रित किया गया।

भगवान शिव कुबेरके इष्ट देवता थे, इसलिए उनका आशीर्वाद लेने वह कैलाश पहुंचे और कहा, प्रभो! आज मैं तीनों लोकों में सबसे धनवान हूं, यह सब आप की कृपा का फल हैं। अपने निवास पर एक भोज का आयोजन करने जा रहा हूँ, कृपया आप परिवार सहित भोज में पधारने की कृपा करे।

भगवान शिव कुबेर के मन का अहंकार ताड़ गए, बोले, वत्स! मैं बूढ़ा हो चला हूँ, इस लिये कहीं बाहर नहीं जाता। इस लिये तुम्हारें भोज मैं नहीं आसकता। शिवजी कि बात पर कुबेर गिड़-गिड़ाने लगे, भगवन! आपके बगैर तो मेरा सारा आयोजन बेकार चला जाएगा। तब शिव जी ने कहा, एक उपाय हैं। मैं अपने छोटे बेटे गणपति को तुम्हारे भोज में जाने को कह दूंगा। कुबेर संतुष्ट होकर लौट आए। नियत समय पर कुबेर ने भव्य भोज का आयोजन किया।

तीनों लोकों के देवता पहुंच चुके थे। अंत में गणपति आए और आते ही कहा, मुझको बहुत तेज भूख लगी हैं। भोजन कहां है। कुबेर उन्हें ले गए भोजन से सजे कमरे में। गणपति को सोने की थाली में भोजन परोसा गया। क्षण भर में ही परोसा गया सारा भोजन खत्म हो गया। दोबारा खाना परोसा गया, उसे भी खा गए। बार-बार खाना परोसा जाता और क्षण भर में गणेश जी उसे चट कर जाते। थोड़ी ही देर में हजारों लोगों के लिए बना भोजन खत्म हो गया, लेकिन गणपति का पेट नहीं भरा। गणपति रसोईघर में पहुंचे और वहां रखा सारा कच्चा सामान भी खा गए, तब भी भूख नहीं मिटी। जब सब कुछ खत्म हो गया तो गणपति ने कुबेर से कहा, जब तुम्हारे पास मुझे खिलाने के लिए कुछ था ही नहीं तो तुमने मुझे न्योता क्यों दिया था? गणपति जी कि यह बात सुनकर कुबेर का अहंकार चूर-चूर हो गया।

गणपति पूजन में तुलसी निषिद्ध क्यों?

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गणेश पूजन में तुलसी निषिद्ध क्यों

लेख साभार: गुरुत्व ज्योतिष पत्रिका (सितम्बर-2010)

तुलसी समस्त पौधों में श्रेष्ठ मानी जाती हैं। हिंदू धर्म में समस्त पूजन कर्मो में तुलसी को प्रमुखता दी जाती हैं। प्रायः सभी हिंदू मंदिरों में चरणामृत में भी तुलसी का प्रयोग होता हैं। इसके पीछे ऎसी कामना होती है कि तुलसी ग्रहण करने से तुलसी अकाल मृत्यु को हरने वाली तथा सर्व व्याधियों का नाश करने वाली हैं।

परन्तु यही पूज्य तुलसी को भगवान श्री गणेश की पूजा में निषिद्ध मानी गई हैं।

इनसे सम्बद्ध ब्रह्मकल्प में एक कथा मिलती हैं

एक समय नवयौवन सम्पन्न तुलसी देवी नारायण परायण होकर तपस्या के निमित्त से तीर्थो में भ्रमण करती हुई गंगा तट पर पहुँचीं। वहाँ पर उन्होंने गणेश को देखा, जो कि तरूण युवा लग रहे थे। गणेशजी अत्यन्त सुन्दर, शुद्ध और पीताम्बर धारण किए हुए आभूषणों से विभूषित थे, गणेश कामनारहित, जितेन्द्रियों में सर्वश्रेष्ठ, योगियों के योगी थे गणेशजी वहां श्रीकृष्ण की आराधना में घ्यानरत थे। गणेशजी को देखते ही तुलसी का मन उनकी ओर आकर्षित हो गया। तब तुलसी उनका उपहास उडाने लगीं। घ्यानभंग होने पर गणेश जी ने उनसे उनका परिचय पूछा और उनके वहां आगमन का कारण जानना चाहा। गणेश जी ने कहा माता! तपस्वियों का घ्यान भंग करना सदा पापजनक और अमंगलकारी होता हैं।

शुभे! भगवान श्रीकृष्ण आपका कल्याण करें, मेरे घ्यान भंग से उत्पन्न दोष आपके लिए अमंगलकारक न हो।

इस पर तुलसी ने कहा—प्रभो! मैं धर्मात्मज की कन्या हूं और तपस्या में संलग्न हूं। मेरी यह तपस्या पति प्राप्ति के लिए हैं। अत: आप मुझसे विवाह कर लीजिए। तुलसी की यह बात सुनकर बुद्धि श्रेष्ठ गणेश जी ने उत्तर दिया हे माता! विवाह करना बडा भयंकर होता हैं, मैं ब्रम्हचारी हूं। विवाह तपस्या के लिए नाशक, मोक्षद्वार के रास्ता बंद करने वाला, भव बंधन से बंधे, संशयों का उद्गम स्थान हैं। अत: आप मेरी ओर से अपना घ्यान हटा लें और किसी अन्य को पति के रूप में तलाश करें। तब कुपित होकर तुलसी ने भगवान गणेश को शाप देते हुए कहा कि आपका विवाह अवश्य होगा। यह सुनकर शिव पुत्र गणेश ने भी तुलसी को शाप दिया देवी, तुम भी निश्चित रूप से असुरों द्वारा ग्रस्त होकर वृक्ष बन जाओगी।

इस शाप को सुनकर तुलसी ने व्यथित होकर भगवान श्री गणेश की वंदना की। तब प्रसन्न होकर गणेश जी ने तुलसी से कहा हे मनोरमे! तुम पौधों की सारभूता बनोगी और समयांतर से भगवान नारायण कि प्रिया बनोगी। सभी देवता आपसे स्नेह रखेंगे परन्तु श्रीकृष्ण के लिए आप विशेष प्रिय रहेंगी। आपकी पूजा मनुष्यों के लिए मुक्ति दायिनी होगी तथा मेरे पूजन में आप सदैव त्याज्य रहेंगी। ऎसा कहकर गणेश जी पुन: तप करने चले गए। इधर तुलसी देवी दु:खित ह्वदय से पुष्कर में जा पहुंची और निराहार रहकर तपस्या में संलग्न हो गई। तत्पश्चात गणेश के शाप से वह चिरकाल तक शंखचूड की प्रिय पत्नी बनी रहीं। जब शंखचूड शंकर जी के त्रिशूल से मृत्यु को प्राप्त हुआ तो नारायण प्रिया तुलसी का वृक्ष रूप में प्रादुर्भाव हुआ।

गणपति सर्वप्रथम पूजा वैदिक एवं शास्त्र मत

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सर्वप्रथम पूजा वैदिक एवं शास्त्र के मत



गणपति शब्द का अर्थ हैं।

गण(समूह)+पति (स्वामी) = समूह के स्वामी को सेनापति अर्थात गणपति कहते हैं। मानव शरीर में पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और चार अन्तःकरण होते हैं। एवं इस शक्तिओं को जो शक्तियां संचालित करती हैं उन्हीं को चौदह देवता कहते हैं। इन सभी देवताओं के मूल प्रेरक हैं भगवान श्रीगणेश।

भगवान गणपति शब्दब्रह्म अर्थात् ओंकार के प्रतीक हैं, इनकी महत्व का यह हीं मुख्य कारण हैं।

श्रीगणपत्यथर्वशीर्ष में वर्णित हैं ओंकार का ही व्यक्त स्वरूप गणपति देवता हैं। इसी कारण सभी प्रकार के शुभ मांगलिक कार्यों और देवता-प्रतिष्ठापनाओं में भगवान गणपति कि प्रथम पूजा कि जाती हैं। जिस प्रकार से प्रत्येक मंत्र कि शक्ति को बढाने के लिये मंत्र के आगें ॐ (ओम्) आवश्यक लगा होता हैं। उसी प्रकार प्रत्येक शुभ मांगलिक कार्यों के लिये पर भगवान् गणपति की पूजा एवं स्मरण अनिवार्य मानी गई हैं। इस सभी शास्त्र एवं वैदिक धर्म, सम्प्रदायों ने इस प्राचीन परम्परा को एक मत से स्वीकार किया हैं इसका सदीयों से भगवान गणेश जी क प्रथम पूजन करने कि परंपरा का अनुसरण करते चले आरहे हैं।

गणेश जी की ही पूजा सबसे पहले क्यों होती है, इसकी पौराणिक कथा इस प्रकार है -

पद्मपुराण के अनुसार (सृष्टिखण्ड 61। 1 से 63। 11) –

एक दिन व्यासजी के शिष्य ने अपने गुरूदेव को प्रणाम

करके प्रश्न किया कि गुरूदेव! आप मुझे देवताओं के पूजन का सुनिश्चित क्रम बतलाइये। प्रतिदिन कि पूजा में सबसे पहले किसका पूजन करना चाहिये ?

तब व्यासजी ने कहा: विघ्नों को दूर करने के लिये सर्वप्रथम गणेशजी की पूजा करनी चाहिये। पूर्वकाल में पार्वती देवी को देवताओं ने अमृत से तैयार किया हुआ एक दिव्य मोदक दिया। मोदक देखकर दोनों बालक (स्कन्द तथा गणेश) माता से माँगने लगे। तब माता ने मोदक के प्रभावों का वर्णन करते हुए कहा कि तुम दोनो में से जो धर्माचरण के द्वारा श्रेष्ठता प्राप्त करके आयेगा, उसी को मैं यह मोदक दूँगी। माता की ऐसी बात सुनकर स्कन्द मयूर पर आरूढ़ हो कर अल्प मुहूर्तभर में सब तीर्थों की स्न्नान कर लिया। इधर लम्बोदरधारी गणेशजी माता-पिता की परिक्रमा करके पिताजी के सम्मुख खड़े हो गये। तब पार्वतीजी ने कहा- समस्त तीर्थों में किया हुआ स्न्नान, सम्पूर्ण देवताओं को किया हुआ नमस्कार, सब यज्ञों का अनुष्ठान तथा सब प्रकार के व्रत, मन्त्र, योग और संयम का पालन- ये सभी साधन माता-पिता के पूजन के सोलहवें अंश के बराबर भी नहीं हो सकते।

इसलिये यह गणेश सैकड़ों पुत्रों और सैकड़ों गणों से भी बढ़कर श्रेष्ठ है। अतः देवताओं का बनाया हुआ यह मोदक मैं गणेश को ही अर्पण करती हूँ। माता-पिता की भक्ति के कारण ही गणेश जी की प्रत्येक शुभ मंगल में सबसे पहले पूजा होगी। तत्पश्चात् महादेवजी बोले- इस गणेश के ही अग्रपूजन से सम्पूर्ण देवता प्रसन्न होंजाते हैं। इस लिये तुमहें सर्वप्रथम गणेशजी की पूजा करनी चाहिये।

गणेशजी सर्वप्रथम पूजनीय कथा

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श्री गणेश जी सर्वप्रथम पूजनीय कथा


भारतीय संस्कृति में प्रत्येक शुभकार्य करने के पूर्व भगवान श्री गणेश जी की पूजा की जाती हैं इसी लिये ये किसी भी कार्य का शुभारंभ करने से पूर्व कार्य का "श्री गणेश करना" कहा जाता हैं। एवं प्रत्यक शुभ कार्य या अनुष्ठान करने के पूर्व ‘‘श्री गणेशाय नमः” का उच्चारण किया जाता हैं। गणेश को समस्त सिद्धियों को देने वाला माना गया है। सारी सिद्धियाँ गणेश में वास करती हैं।

इसके पीछे मुख्य कारण हैं की भगवान श्री गणेश समस्त विघ्नों को टालने वाले हैं, दया एवं कृपा के अति सुंदर महासागर हैं, एवं तीनो लोक के कल्याण हेतु भगवान गणपति सब प्रकार से योग्य हैं। समस्त विघ्न बाधाओं को दूर करने वाले गणेश विनायक हैं। गणेशजी विद्या-बुद्धि के अथाह सागर एवं विधाता हैं।

भगवान गणेश को सर्व प्रथम पूजे जाने के विषय में कुछ विशेष लोक कथा प्रचलित हैं। इन विशेष एवं लोकप्रिय कथाओं का वर्णन यहा कर रहें हैं।

इस के संदर्भ में एक कथा है कि महर्षि वेद व्यास ने महाभारत को से बोलकर लिखवाया था, जिसे स्वयं गणेशजी ने लिखा था। अन्य कोई भी इस ग्रंथ को तीव्रता से लिखने में समर्थ नहीं था।

सर्वप्रथम कौन पूजनीय हो?

कथा इस प्रकार हैं : तीनो लोक में सर्वप्रथम कौन पूजनीय हो?, इस बात को लेकर समस्त देवताओं में विवाद खडा हो गया। जब इस विवादने बडा रुप धारण कर लिये तब सभी देवता अपने-अपने बल बुद्धिअ के बल पर दावे प्रस्तुत करने लगे। कोई परीणाम नहीं आता देख सब देवताओं ने निर्णय लिया कि चलकर भगवान श्री विष्णु को निर्णायक बना कर उनसे फैसला करवाया जाय।

सभी देव गण विष्णु लोक मे उपस्थित हो गये, भगवान विष्णु ने इस मुद्दे को गंभीर होते देख श्री विष्णु ने सभी देवताओं को अपने साथ लेकर शिवलोक में पहुच गये। शिवजी ने कहा इसका सही निदान सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी हि बताएंगे। शिवजी श्री विष्णु एवं अन्य देवताओं के साथ मिलकर ब्रह्मलोक पहुचें और ब्रह्माजी को सारी बाते विस्तार से बताकर उनसे फैसला करने का अनुरोध किया। ब्रह्माजी ने कहा प्रथम पूजनीय वहीं होगा जो जो पूरे ब्रह्माण्ड के तीन चक्कर लगाकर सर्वप्रथम लौटेगा।

समस्त देवता ब्रह्माण्ड का चक्कर लगाने के लिए अपने अपने वाहनों पर सवार होकर निकल पड़े। लेकिन, गणेशजी का वाहन मूषक था। भला मूषक पर सवार हो गणेश कैसे ब्रह्माण्ड के तीन चक्कर लगाकर सर्वप्रथम लौटकर सफल होते। लेकिन गणपति परम विद्या-बुद्धिमान एवं चतुर थे।

गणपति ने अपने वाहन मूषक पर सवार हो कर अपने माता-पित कि तीन प्रदक्षिणा पूरी की और जा पहुँचे निर्णायक ब्रह्माजी के पास। ब्रह्माजी ने जब पूछा कि वे क्यों नहीं गए ब्रह्माण्ड के चक्कर पूरे करने, तो गजाननजी ने जवाब दिया कि माता-पित में तीनों लोक, समस्त ब्रह्माण्ड, समस्त तीर्थ, समस्त देव और समस्त पुण्य विद्यमान होते हैं।

अतः जब मैंने अपने माता-पित की परिक्रमा पूरी कर ली, तो इसका तात्पर्य है कि मैंने पूरे ब्रह्माण्ड की प्रदक्षिणा पूरी कर ली। उनकी यह तर्कसंगत युक्ति स्वीकार कर ली गई और इस तरह वे सभी लोक में सर्वमान्य 'सर्वप्रथम पूज्य' माने गए।

लिंगपुराण के अनुसार (105। 15-27) – एक बार असुरों से त्रस्त देवतागणों द्वारा की गई प्रार्थना से भगवान शिव ने सुर-समुदाय को अभिष्ट वर देकर आश्वस्त किया। कुछ ही समय के पश्चात तीनो लोक के देवाधिदेव महादेव भगवान शिव का माता पार्वती के सम्मुख परब्रह्म स्वरूप

गणेश जी का प्राकट्य हुआ। सर्वविघ्नेश मोदक प्रिय गणपतिजी का जातकर्मादि संस्कार के पश्चात् भगवान शिव ने अपने पुत्र को उसका कर्तव्य समझाते हुए आशीर्वाद दिया कि जो तुम्हारी पूजा किये बिना पूजा पाठ, अनुष्ठान इत्यादि शुभ कर्मों का अनुष्ठान करेगा, उसका मंगल भी अमंगल में परिणत हो जायेगा। जो लोग फल की कामना से ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र अथवा अन्य देवताओं की भी पूजा करेंगे, किन्तु तुम्हारी पूजा नहीं करेंगे, उन्हें तुम विघ्नों द्वारा बाधा पहुँचाओगे।

जन्म की कथा भी बड़ी रोचक है।

गणेशजी की पौराणिक कथा

भगवान शिव कि अन उपस्थिति में माता पार्वती ने विचार किया कि उनका स्वयं का एक सेवक होना चाहिये, जो परम शुभ, कार्यकुशल तथा उनकी आज्ञा का सतत पालन करने में कभी विचलित न हो। इस प्रकार सोचकर माता पार्वती नें अपने मंगलमय पावनतम शरीर के मैल से अपनी माया शक्ति से बाल गणेश को उत्पन्न किया।

एक समय जब माता पार्वती मानसरोवर में स्नान कर रही थी तब उन्होंने स्नान स्थल पर कोई आ न सके इस हेतु अपनी माया से गणेश को जन्म देकर 'बाल गणेश' को पहरा देने के लिए नियुक्त कर दिया।

इसी दौरान भगवान शिव उधर आ जाते हैं। गणेशजी शिवजी को रोक कर कहते हैं कि आप उधर नहीं जा सकते हैं। यह सुनकर भगवान शिव क्रोधित हो जाते हैं और गणेश जी को रास्ते से हटने का कहते हैं किंतु गणेश जी अड़े रहते हैं तब दोनों में युद्ध हो जाता है। युद्ध के दौरान क्रोधित होकर शिवजी बाल गणेश का सिर धड़ से अलग कर देते हैं। शिव के इस कृत्य का जब पार्वती को पता चलता है तो वे विलाप और क्रोध से प्रलय का सृजन करते हुए कहती है कि तुमने मेरे पुत्र को मार डाला।

पार्वतीजी के दुःख को देखकर शिवजी ने उपस्थित गणको आदेश देते हुवे कहा सबसे पहला जीव मिले, उसका सिर काटकर इस बालक के धड़ पर लगा दो, तो यह बालक जीवित हो उठेगा। सेवको को सबसे पहले हाथी का एक बच्चा मिला। उन्होंने उसका सिर लाकर बालक के धड़ पर लगा दिया, बालक जीवित हो उठा।

उस अवसर पर तीनो देवताओं ने उन्हें सभी लोक में अग्रपूज्यता का वर प्रदान किया और उन्हें सर्व अध्यक्ष पद पर विराजमान किया। स्कंद पुराण

ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार (गणपतिखण्ड) –

शिव-पार्वती के विवाह होने के बाद उनकी कोई संतान नहीं हुई, तो शिवजी ने पार्वतीजी से भगवान विष्णु के शुभफलप्रद ‘पुण्यक’ व्रत करने को कहा पार्वती के ‘पुण्यक’ व्रत से भगवान विष्णु ने प्रसन्न हो कर पार्वतीजी को पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया। ‘पुण्यक’ व्रत के प्रभाव से पार्वतीजी को एक पुत्र उत्पन्न हुवा।

पुत्र जन्म कि बात सुन कर सभी देव, ऋषि, गंधर्व आदि सब गण बालक के दर्शन हेतु पधारे। इन देव गणो में शनि महाराज भी उपस्थित हुवे। किन्तु शनिदेव ने पत्नी द्वारा दिये गये शाप के कारण बालक का दर्शन नहीं किया। परन्तु माता पार्वती के बार-बार कहने पर शनिदेव नें जेसे हि अपनी द्रष्टि शिशु बालके उपर पडी, उसी क्षण बालक गणेश का गर्दन धड़ से अलग हो गया। माता पार्वती के विलप करने पर भगवान् विष्णु पुष्पभद्रा नदी के अरण्य से एक गजशिशु का मस्तक काटकर लाये और गणेशजी के मस्तक पर लगा दिया। गजमुख लगे होने के कारण कोई गणेश कि उपेक्षा न करे इस लिये भगवान विष्णु अन्य देवताओं के साथ में तय किय कि गणेश सभी मांगलीक कार्यो में अग्रणीय पूजे जायेंगे एवं उनके पूजन के बिना कोई भी देवता पूजा ग्रहण नहीं करेंगे।

इस पर भगवान् विष्णु ने श्रेष्ठतम उपहारों से भगवान गजानन कि पूजा कि और वरदान दिया कि

सर्वाग्रे तव पूजा च मया दत्ता सुरोत्तम।
सर्वपूज्यश्च योगीन्द्रो भव वत्सेत्युवाच तम्।।
(गणपतिखं. 13। 2)

भावार्थ: ‘सुरश्रेष्ठ! मैंने सबसे पहले तुम्हारी पूजा कि है, अतः वत्स! तुम सर्वपूज्य तथा योगीन्द्र हो जाओ।’

ब्रह्मवैवर्त पुराण में ही एक अन्य प्रसंगान्तर्गत पुत्रवत्सला पार्वती ने गणेश महिमा का बखान करते हुए परशुराम से कहा –

त्वद्विधं लक्षकोटिं च हन्तुं शक्तो गणेश्वरः। जितेन्द्रियाणां प्रवरो नहि हन्ति च मक्षिकाम्।।
तेजसा कृष्णतुल्योऽयं कृष्णांश्च गणेश्वरः। देवाश्चान्ये कृष्णकलाः पूजास्य पुरतस्ततः।।
(ब्रह्मवैवर्तपु., गणपतिख., 44। 26-27)

भावार्थ: जितेन्द्रिय पुरूषों में श्रेष्ठ गणेश तुममें जैसे लाखों-करोड़ों जन्तुओं को मार डालने की शक्ति है; परन्तु तुमने मक्खी पर भी हाथ नहीं उठाया। श्रीकृष्ण के अंश से उत्पन्न हुआ वह गणेश तेज में श्रीकृष्ण के ही समान है। अन्य देवता श्रीकृष्ण की कलाएँ हैं। इसीसे इसकी अग्रपूजा होती है।

शास्त्रीय मतसे

शास्त्रोमें पंचदेवों की उपासना करने का विधान हैं।

आदित्यं गणनाथं च देवीं रूद्रं च केशवम्।
पंचदैवतमित्युक्तं सर्वकर्मसु पूजयेत्।।
(शब्दकल्पद्रुम)

भावार्थ: - पंचदेवों कि उपासना का ब्रह्मांड के पंचभूतों के साथ संबंध है। पंचभूत पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश से बनते हैं। और पंचभूत के आधिपत्य के कारण से आदित्य, गणनाथ(गणेश), देवी, रूद्र और केशव ये पंचदेव भी पूजनीय हैं। हर एक तत्त्व का हर एक देवता स्वामी हैं- 

आकाशस्याधिपो विष्णुरग्नेश्चैव महेश्वरी।
वायोः सूर्यः क्षितेरीशो जीवनस्य गणाधिपः।।

भावार्थ:- क्रम इस प्रकार हैं महाभूत अधिपति

1. क्षिति (पृथ्वी) शिव
2. अप् (जल) गणेश
3. तेज (अग्नि) शक्ति (महेश्वरी)
4. मरूत् (वायु) सूर्य (अग्नि)
5. व्योम (आकाश) विष्णु

भगवान् श्रीशिव पृथ्वी तत्त्व के अधिपति होने के कारण उनकी शिवलिंग के रुप में पार्थिव-पूजा का विधान हैं। भगवान् विष्णु के आकाश तत्त्व के अधिपति होने के कारण उनकी शब्दों द्वारा स्तुति करने का विधान हैं। भगवती देवी के अग्नि तत्त्व का अधिपति होने के कारण उनका अग्निकुण्ड में हवनादि के द्वारा पूजा करने का विधान हैं। श्रीगणेश के जलतत्त्व के अधिपति होने के कारण उनकी सर्वप्रथम पूजा करने का विधान हैं, क्योंकि ब्रह्मांद में सर्वप्रथम उत्पन्न होने वाले जीव तत्त्व ‘जल’ का अधिपति होने के कारण गणेशजी ही प्रथम पूज्य के अधिकारी होते हैं।

आचार्य मनु का कथन है-

“अप एच ससर्जादौ तासु बीजमवासृजत्।”
(मनुस्मृति 1)

भावार्थ: इस प्रमाण से सृष्टि के आदि में एकमात्र वर्तमान जल का अधिपति गणेश हैं।

मंगलवार, सितंबर 07, 2010

पंच महाभूत तत्व एवं वास्तु (भाग:४)

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पंच महाभूत तत्व एवं वास्तु (भाग:४)

वायु
समग्र ब्रह्मांड वायु मंडल से भरा पडा हैं, एवं हमारे जीवन मे भी वायु तत्व का अत्याधिक महत्व हैं।
क्योकि साधारण व्यक्ति अन्य किसी तत्व के बिना कुछ घंटे बिता सकती हैं, लेकिन वायु तत्व के बिना व्यक्ति चंद मिनिट भी बडी मुशकील से बिता सकते हैं। क्योकि जीवन को टिकाए रखने के लिये हमारा श्वास लेना अति आवश्यक हैं एवं यदि इस क्रम में रुकावट आजये या विच्छेदन होजाये तो हमारा जीवन समाप्त हो जाता हैं। मनुष्य हि क्यो प्राणी एवं पेड़-पौधे भी वायु के बिना क्षीण होकर समाप्ती कि और जाने लगते हैं। इस लिये वायु तत्व का संतुलन सृष्टि को सुव्यवस्थित रुप में चलाने के लिये वायु क योगदान अधिक महत्वपूर्ण है।

मनुष्य के जीवन में प्रत्येक क्रिया-कलाप में कहीं न कहीं पंच महाभूतों का संयोग अवश्य पाया जाता हैं। इसी लिये अन्य किसी ग्रह पर आजतक लम्बे समय तक मनुष्य को पैर टिकाना मुश्किल नजर आरहा हैं, इसी कारण से वहां जीवन संभव नहीं हो पाया हैं। 

इसी तरहा वास्तु में वायु तत्व का अधिक महत्व हैं।

यदि घर में वायु तत्व के संतुलन में गडबडी होतो भवन में निवास कर्ता को धन कि कमी एवं विभिन्न प्रकार के रोग देखने को मिलते हैं। यदि घर में वायु तत्व कि अधिकता होतो तो व्यक्ति के विचारों में स्थिरता कि कमी पाई जाती हैं, व्यक्ति एक साथ अनेक कार्य करने हेतु प्रेरिततो होता हैं परंतु उसे पूर्ण करने हेतु उचित परिश्रम नहीं कर पाता। इस लिये घर में वायु तत्व का संतुलन बनाये रखे।


आकाश
आकाश तत्व का कोई अंत नहीं हैं, वह अनंत हैं। आकाश तत्व के भीतर अंदर नजा ने कितनी आकाश गंगाए समाइ हुइ हैं, जिनमें सूर्य के समान या उस्से बडे सैकड़ों सूर्य हैं। हमारे जीवन मे सुख-समृद्धि एंव शांति प्राप्त करने में आकाश का महत्वपूर्ण स्थान होता हैं। इस लिये व्यक्ति को अपने भवन में पंच महाभूत तत्व का उचित सम्तुलन बनाए रखना चाहिये जिस्से हमारे जीवन मे हम सुख-समृद्धि-शांति को प्राप्त कर उन्नति के शिखर को प्राप्त कर सके।

अधिक जानकारी हेतु संपर्क करें।

शनिवार, सितंबर 04, 2010

पंच महाभूत तत्व एवं वास्तु (भाग:३)

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पंच महाभूत तत्व एवं वास्तु (भाग:३)

अग्नि
अग्नि एवं तेज ऊर्जा के कुदरति स्त्रोत हैं। ऊर्जा के बिना मानव जीवन का कोई अस्तित्व नहीं हैं। समग्र ब्रह्मांड में ऊर्जा का प्रमुख स्त्रोत एक मात्र सूर्य हैं, उस के अलावा कोई और प्रमुख स्त्रोत का अस्तित्व नहीं हैं। यही कारण हैं कि आज सूर्य के तेज से ही हमारा जीवन सुचारु रुप से प्रकाशमान हैं। वायु मंडल में व्याप्त वायुकण (धूल) और बादल इत्यादि सभी में अपनी चुम्बकीय शक्ति होती हैं जिसके कारण सब एक दूसरे की ओर आकर्षित होते रहते हैं। इसी आकर्षित होने के कारण कण एक दूसरे से पास आते और दूर होते रहते हैं, जिसके बल के कारण हि ऊर्जा उत्पन्न होती हैं। इस्से उत्पन्न होने वाली उर्जा को हि अग्नि कहा जाता हैं।

अग्नि का हमारे जीवन में बहुत महत्व हैं, इस महत्व से हर व्यक्ति भली भाति वाकिफ हैं। हमारी भारतिय संस्कृति के धार्मिक कार्यक्रम में भी अग्नि का विशेष महत्व हैं। यज्ञ, हवन, विवाह, संस्कार जेसे अन्य धार्मिक कर्मकांडो में बिना अग्नि के बिना संपन्न होना असंभव सा प्रतित होता हैं।

इसी कारण भारतिय सभ्यताओं में अग्नि को देव कहा गया हैं। अग्निको देवता मनकर उसका पोजन किया जाता हैं। क्योकि एसा माना जाता हैं, कि यदि अग्नि देव क्रोधित होजाये तो बड़े-बड़े महलों व ऊंचे-ऊंचे भवनों को धूलमें उडादे और राख बनादे। इस लिये अग्नि का पूजन कर उन्हें शांत रखने का प्रयास किया जाता हैं।

हमारे प्रमुख धर्म ग्रंथो में एक ऋग्वेद का सर्व प्रथम मंत्र ही अग्नि से शुरू होता है।

मंत्र:
अग्निमीले पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्। होतारं रत्नधातमम्॥

भावार्थ:- सर्वप्रथम आराधन किए जाने वाले, यज्ञ को प्रकाशित करने वाले, ऋतुओं के अनुसार यज्ञ सम्पादित करने वाले, देवताओं का आह्वान करने वाले तथा धन प्रदान करने वालों में सर्वश्रेष्ठ अग्नि देवता की मैं स्तुति करता हूं।

भारतीय शास्त्रो मे उल्लेख मिलता है, कि अग्नि का संबंध मनुष्य के जन्म से लेकर मरण तक होता हैं। इसी कारण से वास्तु के पंच तत्वो में अग्नि तत्व भी समाया हुवा हैं।

यदि भवन में अग्नि तत्व कि अधिकता हो जाये, तो भवन में निवास कर्ता के बिच में मानसिक तनाव एवं परस्पत वैमनस्य रहता हैं। निवास कर्ता को छोटी-छोटी बातो पर गुस्सा आना एक स्वाभाविक लक्षण सरलता से दिखाई देता हैं। यदि आपके घर में भी एसी समस्या होती हैं। तो विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य ले।

आप गुरुत्व कार्यालय द्वारा परामर्श प्राप्त कर सकते हैं।

शुक्रवार, सितंबर 03, 2010

हस्त रेखा एवं रोग (भाग:3)

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हस्त रेखा एवं रोग (भाग:3)

 
हस्त रेखा से लकवा से पीड़ित होने के लक्षण?
  • यदि दोनों हाथों में शनि पर्वत पर नक्षत्र जेसा चिह्न हों।
  • शनि पर्वत पर क्रॉस का चिह्न हों।
  • चंद्र पर्वत पर जालीदार रेखाएं हों।
  • नखों की आकार त्रिकोण जेसा प्रतित होरहा हों।
  • दोनों हाथों में आयु रेखा के अंत में नक्षत्र जेसा चिह्न या भाग्य रेखा के अंत में शनि पर्वत पर नक्षत्र जेसा चिह्न हों।
  • मस्तक रेखा में से कोई रेखा निकलकर शनि पर्वत तक जाती हों या वहां तीन शाखा वाली रेखा हों।
  • या तीन टुकड़ों में शुक्र मुद्रा हों।
  • मस्तक रेखा में शनि या सूर्य पर्वत के नीचे यव का चिह्न हों।
  • नाखून टुकडो में बटे हुवे दिखाई देतो हों।
  • उपरोक्त लक्षण में से यदि एक भी लक्षण व्यक्ति के हाथ में दिखाई दे, तो व्यक्ति को लकवा रोग पीड़ित होने कि संभावनाएं अधिक होजाती हैं।

 
नोट:- उपरोक्त सभी वर्णन पूर्णतः सिद्धान्तों पर आधारित हैं। उपरोक्त लक्षण यदि व्यक्ति कि हथेली में हो, तो उसके सूक्ष्म परीक्षण से व्यक्ति के शरीर में पीड़ा देने वाली परेशानी या भविष्य में होने वाली बीमारी का पता लगाया जा सकता हैं। इस परीक्षण कि सार्थकरा परीक्षण करने वाले के विद्वान के ज्ञान एवं अनुभव पर निर्भर करता हैं।

गुरुत्व ज्योतिष (सितंबर-२०१०)

सितम्बर अंक में आप आयेंगे >>>>>>>

सितंबर -२०१० मासिक व्रत-पर्व-त्यौहार, सितंबर-२०१० मासिक पंचांग, सितम्बर २०१० विशेष योग, ग्रह चलन सितम्बर -2010, सितंबर -२०१० मासिक राशि फल, कृष्ण के विभिन्न मंत्र , कृष्ण के मुख में ब्रह्मांड दर्शन, कृष्ण स्मरण का महत्व, श्री कृष्ण का नामकरण संस्कार

सर्वप्रथम पूजनीय कथा, सर्वप्रथम पूजा वैदिक एवं शास्त्र के मत, गणेश के कल्याणकारी मंत्र ,गणेश चतुर्थी ज्योतिष की नजर में, गणपति पूजन में तुलसी निषिद्ध क्यों, गणेश पूजन में कोन से फूल चढाए, विघ्ननाशक गणेश मन्त्र, एकदंत कथा गणेश , वक्रतुण्ड कथा, संकटनाशन गणेशस्तोत्रम्, संकष्टहरणं गणेशाष्टकम्‌ , गणेश कवचम्, मनोवांछितफलोकि प्राप्ति हेतु सिद्धिप्रद गणपति स्तोत्र, गणेश पूजन से वास्तु दोष निवारण, गणेश वाहन मूषक केसे बना, संकष्टहर चतुर्थी व्रत का प्रारंभ कब हुवा, अमंगल हि नही मंगलकारी भी है-मंगल, गणेशजी माता लक्ष्मी के दत्तक पुत्र है?, संतान गणपति स्तोत्र, गणेश पुराण कि महिमा, गणेश पंच्चरत्नम्, गणपति अथर्वशीर्ष, गणेश स्तवन, गणेश चतुर्थी पर चंद्र दर्शन निषेध क्यों..., गणेशद्वादशनामस्तोत्रम्, एकदन्त शरणागति स्तोत्रम्,



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गुरुवार, सितंबर 02, 2010

मासिक राशि फल( सितम्बर-२०१०)

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मासिक राशि फल( सितम्बर-२०१०)


 
मेष : सभी मामलों में चिंता बढ़ सकती हैं। हर कार्य में विध्न बाधा उत्पन्न होती हुई प्रतित होगी जिस कारण आपके उत्साह में कमी हो सकती हैं। सावधानी बर्ते गिरवी रखकर कर्ज लेना पड सकता हैं। किसी और के लिये जिन्मेदारी, जमानत, इत्यादि काम में अतिरिक्त सावधा रहें यदि संभव हो सके तो कार्य को टाल देंना आपके लिये उपयुक्त होगा। पूंजी निवेश और बड़ी खरीद-बिक्री इत्यादि से बचें।


वृष : आपके द्वारा किये गयें कार्य में सफलता प्राप्त होगी, समझौतावादी दृष्टिकोण रखें। विरोधी और शत्रुपक्ष पर आप विजय प्राप्त कर सकते हैं। कानूनी विवादों में सफलता प्राप्त कर सकते हैं।। आर्थिक स्थिती पूर्ववत बनी रहेंगी। भूमि-भवन-वाहना खरीद के योग बन रहें है। घर-परिवार में प्रसन्नता रहेगी। स्वास्थ्य उत्तम रहेंगा।

मिथुन : कामकाज में व्यस्तता रहेगी। जिसके कारण मानसिक अशांति होगी। पारिवारिक में आर्थिक विवाद हो सकता हैं अतः सावधानी बर्ते। व्यापार-नौकरी के कार्यो में अस्थिरता रहे सकती हैं। किसी भी कार्य में भागीदारी करने से नुकसान संभव हैं। महत्व पूर्ण कार्यो में विलंब होगा। स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखें। पुरानी दर्द, बीमारी से परेशानी संभव हैं। तनाव से बचे।

कर्क : कार्य में सफलता प्राप्त होगी। आर्थिक मामलो में सुधार होगा। पुराना भुगतान प्राप्त हो सकता हैं। परिवार और मित्रों का सहयोग प्राप्त होगा। व्यापारिक योजनाएं सफल होगी। भूमि-भवन के मामलो में शुभ समाचार प्राप्त होगा। आत्मित व्यक्तिओं से मार्गदर्शन प्राप्त होगा। आपके मान प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। उपयोगी लेन-देन ने मामले सुलझ सकते हैं।

सिंह : व्यापार-नौकरी में वृद्धि एवं पदोऊन्नति हो सकती हैं। दूसरों के अनुरुप कार्य करने कि उपेक्षा अपने स्वयं के निर्णयो पर काये करने से अधिक लाभ कि प्राप्ति होगी और आपके मान-सम्मान-प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। आर्थिक मामलो में सुधार होगा। अधिक प्रयास परिश्रम से नये कार्य से लाभ प्राप्त कर सकते हैं। संबंधों का लाभ मिलेगा। कोर्ट-कचहरी के विवाद सुलझेंगे। संतोष रहेगा।

कन्या : नई-नई समस्याएँ सामने आयेगी। मानसिक तनाव रहेंगा। शत्रु पक्ष से परेशानी होसकती हैं, सावधान सहें। मशीनरी के कार्य एवं वाहान इत्यादि चलाते समय सावधानी बर्ते दूर्घटना या चोट लग सकती है। कार्यकारी व्यस्तता एवं भागदौड़ बनी रहेंगी एतः स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखें। विरोधि लोग आपका पद-प्रतिष्ठा बिगाड ने का प्रयास करेंगे। व्यापार-नौकरी में भी सावधान रहें नुकशान हो सकता हैं।

तुला : कार्य में सफलता प्राप्त होगी। आपके सोचे हुवे प्रायः सभी कार्य में सफलता प्राप्त होंगी। आर्थिक स्थिती में सुधार होगा। पारिवारिक सुख में वृद्धि होगी। छोटे-छोटे विवाद-मतभेदों को मौका मिलते हि सुधार ले अन्यथा परेशानी बढसकती हैं। आपके मान-सम्मान-प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। स्वास्थ्य उत्तम रहेगा।

वृश्चिक : सोच विचार कर किये गये सभी कार्य आपके अनुकूल होंगे। फिरभी परेशानियाँ, चिंता होने कि संभावना हैं। व्यापार-नौकरी में प्रगति होगी, आपके उत्साह में वृद्धि होगी। उधार दिया हुवा पैसे प्राप्त हो सकते हैं। पुराने वाद-विवाद से बचें। सरकारी या उच्चाधिकारी से लाभ प्राप्त होगा। कानूनि विवादो से बचें रहें। स्वास्थ्य में सुधार होगा। शुभ समाचार प्राप्त होंगे।

धनु : आपके परिश्रम द्वारा किये गये कार्यों में निश्चित सफलता प्राप्त हो सकती हैं। आकस्मिक धन प्राप्ति के अवसर मिलेंगे। आर्थिक स्थिती में सुधार होगा। घर परिवार में सुख साधनो में वृद्धि होगी। मौके का फायदा उठाये। तत्काल निर्णय लेने वाले रवैया अपनाये। व्यापार-नौकरी में वृद्धि होगी। स्वास्थय समान्य रहेंगा।

मकर : महत्व पूर्ण कार्य में सफलता प्राप्त होगी। परिवार और मित्रों से लाभ प्राप्त होगा। आर्थिक और पारिवारीक स्थितियों में सुधार होगा। मान-प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। आर्थिक में सुधार होगा। भूमि-भवन-वाहना इत्यादि से लाभ प्राप्त होगा। व्यापात-नौकरी में सफलता प्राप्त होगी। स्वास्थ्य उत्तम रहेंगा। आपके निर्णयों को मान्यता प्राप्त होगी।

कुंभ : आकस्मिक लाभ प्राप्ति हो सकते हैं। शुभ अवसर का फायदा उठाये। आर्थिक समस्याएं दूर होगी। समस्त परेशानीयों से राहत मिल सकती है। शत्रु एवं विरोधि पक्ष पर आपका दब-दबा रहेंगा। अपने पद और प्रतिष्ठा से विशेष लाभ प्राप्त कर पायेंगे। पारिवार में उत्साह का माहोल रहेंगी। नये व्यापार-नौकरी के अवसर प्राप्त होंगे। स्वास्थ्य अनुकूल रहेगा।

मीन : कार्य आपके अनुरूप नहीं होंगे, थोडे से मानसिक और शारीरिक परिश्रम से स्थिती में सुधार हो सकता हैं। पूर्व कि समस्याओं से छुटकारा प्राप्त होगा। व्यर्थ के मानसिक तनाव व परेशानी से दूर रहें। व्यापार-नौकरी में तत्काल निर्णय लेने से समस्याओं से मुक्ति मिलेगी। पारिवारिक सहयोग से लाभ प्राप्त होगा। वर्तमान के समय, स्थिति को अनदेखा न करें। स्वास्थय उत्तम रहेंगा। आकस्मिक धन लाभ हो सकता हैं।

बुधवार, सितंबर 01, 2010

कृष्ण के विभिन्न कल्याणकारी मंत्र

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 कृष्ण के विभिन्न मंत्र




मूल मंत्र :
कृं कृष्णाय नमः
यह भगवान कृष्ण का मूलमंत्र हैं। इस मूल मंत्र के नियमित जाप करने से व्यक्ति को जीवन में सभी बाधाओं एवं कष्टों से मुक्ति मिलती हैं एवं सुख कि प्राप्ति होती हैं।

सप्तदशाक्षर मंत्र:
ॐ श्रीं नमः श्रीकृष्णाय परिपूर्णतमाय स्वाहा
यह भगवान कृष्ण का सत्तरा अक्षर का हैं। इस मूल मंत्र के नियमित जाप करने से व्यक्ति को मंत्र सिद्ध हो जाने के पश्चयात उसे जीवन में सबकुछ प्राप्त होता हैं।

सप्ताक्षर मंत्र:
गोवल्लभाय स्वाहा
इस सात अक्षरों वाले मंत्र के नियमित जाप करने से जीवन में सभी सिद्धियां प्राप्त होती हैं।

अष्टाक्षर मंत्र:
गोकुल नाथाय नमः
इस आठ अक्षरों वाले मंत्र के नियमित जाप करने से व्यक्ति कि सभी इच्छाएँ एवं अभिलाषाए पूर्ण होती हैं।

दशाक्षर मंत्र:
क्लीं ग्लौं क्लीं श्यामलांगाय नमः
इस दशाक्षर मंत्र के नियमित जाप करने से संपूर्ण सिद्धियों की प्राप्ति होती हैं।

द्वादशाक्षर मंत्र:
ॐ नमो भगवते श्रीगोविन्दाय
इस कृष्ण द्वादशाक्षर मंत्र के नियमित जाप करने से इष्ट सिद्धी की प्राप्ति होती हैं।

तेईस अक्षर मंत्र:
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीकृष्णाय गोविंदाय गोपीजन वल्लभाय श्रीं श्रीं श्री
यह तेईस अक्षर मंत्र के नियमित जाप करने से व्यक्ति कि सभी बाधाएँ स्वतः समाप्त हो जाती हैं।

अट्ठाईस अक्षर मंत्र:
ॐ नमो भगवते नन्दपुत्राय आनन्दवपुषे गोपीजनवल्लभाय स्वाहा
यह अट्ठाईस अक्षर मंत्र के नियमित जाप करने से व्यक्ति को समस्त अभिष्ट वस्तुओं कि प्राप्ति होती हैं।

उन्तीस अक्षर मंत्र:
लीलादंड गोपीजनसंसक्तदोर्दण्ड बालरूप मेघश्याम भगवन विष्णो स्वाहा।
यह उन्तीस अक्षर मंत्र के नियमित जाप करने से स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।

बत्तीस अक्षर मंत्र:
नन्दपुत्राय श्यामलांगाय बालवपुषे कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा।
यह बत्तीस अक्षर मंत्र के नियमित जाप करने से व्यक्ति कि समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।

तैंतीस अक्षर मंत्र:
ॐ कृष्ण कृष्ण महाकृष्ण सर्वज्ञ त्वं प्रसीद मे। रमारमण विद्येश विद्यामाशु प्रयच्छ मे॥

यह तैंतीस अक्षर के नियमित जाप करने से समस्त प्रकार की विद्याएं निःसंदेह प्राप्त होती हैं।
यह श्रीकृष्ण के तीव्र प्रभावशाली मंत्र हैं। इन मंत्रों के नियमित जाप से व्यक्ति के जीवन में सुख, समृद्धि एवं सौभाग्य की प्राप्ति होती हैं।