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सोमवार, मई 16, 2011

ज्योतिष द्वारा रोग निदान

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ज्योतिष द्वारा रोग निदान

मत्स्य पुराण के अनुशार देवताओं और राक्षसों ने जब समुद्र मंथन किया था धन तेरस के दिन धनवंतरी नामक देवता अमृत कलश के साथ सागर मंथन से उत्पन्न हुए थे। धनवंतरी धन, स्वास्थय व आयु के अधिपति देवता हैं। धनवंतरी को देवों के वैध व चिकित्सक के रुप में जाना जाता हैं।
धनवंतरी ही सृष्टी के सर्व प्रथम चिकित्सक माने जाते हैं। श्री धनवंतरी ने ही आयुर्वेद को प्रतिष्ठित किया था। उनके बाद में ऋषि चरक जैसे अनेक आयुर्वेदाचार्य हो, गये। जिन्हों ने मनुष्य मात्र के स्वास्थ्य की देखरेख के लिए कार्य किये। इसी कारण प्राचीन काल में अधितर व्यक्ति का स्वस्थ उत्तम रहता था।
क्योकि प्राचिन कालमें प्रायः सभी चिकित्सक आयुर्वेद के साथ-साथ ज्योतिष का भी विशेष ज्ञान रखते थे। इसी लिए चिकित्सक बीमारी का परीक्षण ग्रहों की शुभ-अशुभ स्थिति के अनुसार सरलता से कर लेते थे। आज के आधुनिक युग के चिकित्सक को भी ज्योतिष विद्या का ज्ञान रखना चाहिए जिससे वे सरलता से प्रायः सभी रोगो का निदान करके रोगी की उपयुक्त चिकित्सा करने में पूर्णतः सक्षम हों सके।
ज्योतिष के अनुशार हर ग्रह और राशि मानव शरीर पर अपना विशेष प्रभाव रखते हैं, इस लिए उसे जानना भी अति आवश्यक हैं। सामान्यतः जन्म कुंडली में जो राशि अथवा जो ग्रह छठे, आठवें, या बारहवें स्थान से पीड़ित हो अथवा छठे, आठवें, या बारहवें स्थानों के स्वामी हो कर पीड़ित होरहे हो, तो उनसे संबंधित बीमारी की संभावना अधिक रहती हैं। जन्म कुंडली के अनुसार प्रत्येक स्थान और राशि से मानव शरीर के कौन-कौन से अंग प्रभावित होते हैं, उनसे संबंधित जानकारी दी जा रही हैं।

जन्मकुंडली से रोग निदान
ज्योतिष शास्त्र एवं आयुर्वेद के अनुसार मनुष्य द्वारा पूर्वकाल में किये गयें कर्मो का फल ही व्यक्ति के शरीर में विभिन्न रोगों के रूप में प्रगट होतें हैं।
हरित सहिंता के अनुशार:
जन्मान्तर कृतम् पापम् व्याधिरुपेण बाधते।
तच्छान्तिरौषधैर्दानर्जपहोमसुरार्चनैः॥
अर्थातः पूर्व जन्म में किया गये पाप कर्म ही व्याधि के रूप में हमारे शरीर में उत्पन्न हो कर कष्टकारी हो जाता हैं। तथा औषध, दान, जप, होम व देवपूजा से रोग की शांति होती हैं।
आयुर्वेद के जानकारो की माने तो कर्मदोष को ही रोग की उत्पत्ति का कारण माना गया हैं।

आयुर्वेद में कर्म के मुख्य तीन भेद माने गए हैं:
• एक हैं सन्चित कर्म
• दूसरा हैं प्रारब्ध कर्म
• तीसरा हैं क्रियमाण
आयुर्वेद के अनुसार मनुष्य के संचित कर्म ही कर्म जनित रोगों के प्रमुख कारण होते हैं
जिसे व्यक्ति प्रारब्ध के रूप में भोगता हैं।
वर्तमान समय में मनुष्य के द्वारा किये जाने वाला कर्म ही क्रियमाण होता हैं।
वर्तमान काल में अनुचित आहार-विहार के कारण भी शरीर में रोग उत्पन्न हो जाते हैं।
आयुर्वेद आचार्य सुश्रुत, चरक व त्रिष्ठाचार्य के मतानुसार ……………..>>

जन्म कुंडली से रोग व रोगके समय का ज्ञान
भारतीय ज्योतिषाचार्य हजारो वर्ष पूर्व ही जन्म कुंडली के माध्यम से यह ज्ञात करने में पूर्णताः सक्षम थे कि किसी व्यक्ति को कब तथा क्या बीमारी हो सकती हैं।
ज्योतिषशास्त्रो से प्राप्त ज्ञान एवं अभीतक हुएं ……………..>>

ग्रहों से सम्बंधित शरीर के अंग और रोग
यदि नवग्रह में से कोई ग्रह शत्रु राशि-नीच राशिः नवांश में, षड्बलहींन, पापयुक्त, पाप ग्रह से दृष्ट, त्रिकभाव में स्थित हों, तो संबंधित ग्रह अपने कारकत्व से सम्बंधित रोग उत्पन्न करते हैं। नव ग्रहों से सम्बंधित अंग, धातु और रोग इस प्रकार हैं।

रोग के प्रभाव का समय
पीड़ा कारक ग्रह अपनी ऋतू में, अपने वार में, मासेश होने पर अपने मास में, वर्षेश होने पर अपने वर्ष में, अपनी महादशा, अन्तर्दशा, प्रत्यंतर दशा एवं सूक्षम दशा में रोग कारक होते हैं। गोचर में पीड़ित ……………..>>

रोग शान्ति के उपाय
ग्रहों की विंशोत्तरी दशा तथा गोचर स्थिति से वर्तमान या भविष्य में होने वाले रोग को समय से पूर्व अनुमान लगा कर पीडाकारक ग्रहों से संबंधित दान, जप, हवन, यंत्र, कवच, व रत्न ……………..>>

संपूर्ण लेख पढने के लिये कृप्या गुरुत्व ज्योतिष ई-पत्रिका मई-2011 का अंक पढें।

इस लेख को प्रतिलिपि संरक्षण (Copy Protection) के कारणो से यहां संक्षिप्त में प्रकाशित किया गया हैं।



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अंक ज्योतिष और स्वास्थ

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अंक ज्योतिष और स्वास्थ

मूलांक : अर्थात जन्म तिथी या जन्म तारिख
भाग्यांक: अर्थात जन्म तारिख + माह + वर्ष का जोड = भाग्यांक

मूलांक-1:जन्म दिनांक 1,10,19,28
स्वास्थ्यः जब मूलांक 1 वाले व्यक्ति के जीवन में रोग की स्थिती आती हैं, तो उनको तीव्र ज्वर, हृदय रोग, आँख, चर्म रोग, मस्तिष्क संबंधि परेशानि, अपच, गठिआ, स्नायुविकार, चोट, कोढ़, आंतों के रोग तथा घुटने आदि की शिकायते रहती हैं। जिन व्यक्तियों का मूलांक 1 होता हैं वे किसी ना किसी रूप में हृदय से ……………..>>
आहारः किशमिश, सौंफ, केसर, कालीमिर्च, लौंग, आजवाईन, जायफल, खजूर, ……………..>>
सावधानी: आपको जनवरी, अक्तूबर और दिसंबर के महीनों में अपने स्वास्थ्य के प्रति सजग रहना चाहिए।

मूलांक-2: जन्म दिनांक 2,11,20,29
स्वास्थ्यः मूलांक 2 वाले व्यक्ति के जीवन में रोग की स्थिती आती हैं, तो उनको कमजोरी, उदर, उद्वेग, मानसिक पीड़ा, दुर्घटना, पाचन तंत्र ……………..>>
आहारः केला, ककड़ी, कलींदा, कुम्हड़ा, पत्ता गोभी, ……………..>>
सावधानी: आपको जनवरी, फरवरी और जुलाई के महीनों में स्वास्थ्य व खान-पान आदि में सावधानी बरतना चाहिए।

मूलांक-3: जन्म दिनांक 3,12,21,30
स्वास्थ्यः व्यक्ति को प्रायः हड्डियों में दर्द रहता हैं और थकावट सी रहती हैं। अत्यधिक परिश्रमि होते हैं अतः अति परिश्रम कारण वे थके से रहते हैं। स्नायु तंत्र कमजोर ……………..>>
आहारः चेरी, स्ट्रोबेरी, सेब, नाशपती, अनार, अनानस, अंगूर, ……………..>>
सावधानी: आपको फरवरी, जून, सिंतबर और दिसंबर में अपनी सेहत का विशेष रूप से ख्याल रखना चाहिए।

मूलांक-4:जन्म दिनांक 4,13,22,31
स्वास्थ्यः व्यक्ति प्रायः रक्त की कमी से पीड़ित रहते हैं। रक्त की कमी से अनेक रोग हो सकते हैं। ऐसे व्यक्तियों को लोहतत्व युक्त भोजन करना चाहियें। चलने-फिरने तथा श्वास ……………..>>
आहारः हरी शब्जीयां, करेला, नीम, मीठे फल, लौकी, ककड़ी, खीरा, ……………..>>
सावधानी: आपको जनवरी, फरवरी, जुलाई, अगस्त व सितंबर इन पांच महीनों में अपने स्वास्थ्य पर विशेष गौर करना चाहिए।

मूलांक-5:जन्म दिनांक 5,14,23
स्वास्थ्यः व्यक्ति प्रायः सर्दी, जुकाम आदि से पीड़ित रहना पड़ता हैं। नर्वस ब्रेकडाउन का भी भय बना रहता हैं। कण्ठ रोग, जीभ संबंधि रोग, अनिद्रा, कंधे में दर्द, हड्डियों संबंधि ……………..>>
आहारः सेब, केला, चीकू, अनार, अनानस, अंगूर, पुदिना, गाजर, ……………..>>
सावधानी: आपको जून, सिंतबर और दिसंबर के महीनों में अपने स्वास्थ्य के बारे में सावधानी बरतना चाहिए।

मूलांक-6:जन्म दिनांक 6,15,24
स्वास्थ्यः व्यक्ति फेफड़ो के रोग से ग्रसित रहते हैं। नाक, कान, गला, आँख, जीभ, दांत, अंगुली, नाखून, हड्डि, वीर्य संबंधि बीमारियां हुआ करती हैं। फेफडे, मूर्च्छा आना, ……………..>>
आहारः तरबूज, खरबूज, आम, सेब, नासपती, अनार, पालक, गाजर, ……………..>>
सावधानी: आपको मई, अक्तूबर एवं नवंबर के महीने अंक ६ के इन महीनों में उन्हें सावधानी रखनी चाहिए।

मूलांक-7: जन्म दिनांक 7,16,25
स्वास्थ्यः व्यक्ति को चर्मरोग घेरे रहते हैं। खुजली या दाद होनेकी संभावना बनी रही हैं। चर्म संबंधि शिकायत होती ही रहती हैं। आँख, उदर तथा फेफड़ों से संबंधि बीमारियां, ……………..>>
आहारः सेब ,अंगूर, संतरा, ककड़ी, प्याज, मूली, गाजर, ……………..>>

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सावधानी: आपको जनवरी-फरवरी और जुलाई-अगस्त के चार महीनों में अपने स्वास्थ्य के प्रति पूर्ण सावधानी रखनी चाहिए।

मूलांक-8: जन्म दिनांक 8,17,26
स्वास्थ्यः व्यक्ति को जिगर से संबंधि रोग लगे रहते हैं। व्यक्ति के लीवर कमजोर होन की वजह से अन्य अनेक बीमारियां आकर घेर लेती हैं। व्यसनों से हरदम दूर रहना चाहिये। दुर्बलता, ……………..>>
आहारः संतरा, पपीता, अनानस, नींबू, हरी सब्जियां, ककड़ी, खीरा, धनियां, ……………..>>
सावधानी: आपको जनवरी, फरवरी, जुलाई और दिसंबर के महीनों में पूर्ण रूप से सावधान रहने का संकेत दिया है

मूलांक-9:जन्म दिनांक 9,18,27
स्वास्थ्यः व्यक्ति चर्मरोग तथा नासारंध्र से संबंधित जुकाम आदि रोगों से पीड़ित हो सकते हैं। मस्तिष्क संबंधित रोग, जननेन्द्रिय संबंधित रोग, ज्वर, खसरा, मूत्र रोग, ……………..>>
आहारः संतरा, अमरूद, अंगूर, केला, ककड़ी, तोरई, मीठे फल, खीरा, ……………..>>
सावधानी: आपको पूरे वर्ष अपनी सेहत का ख्याल रखना चाहिए।


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सोमवार, मई 09, 2011

प्रश्न कुण्डली से जाने स्वास्थ्य लाभ के योग

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प्रश्न कुण्डली से जाने स्वास्थ्य लाभ के योग

 
सभी व्यक्ति स्वयं के और अपने स्वजनो के उत्तम स्वास्थ्य की कामना करता है। लेकिन हमारा शरीर में विभिन्न कारणो से स्वास्थ्य संबंधित परेशानियां समय के साथ-साथ आती-जाती रहती हैं।
लेकिन यदि बिमारी होने पर स्वास्थ्य में जल्दी सुधार नहीं होता तो, तरह-तरह की चिंता और मानसिक तनाव होना साधारण बात हैं। कि स्वास्थ्य में सुधार कब आयेगा?, कब उत्तम स्वास्थ्य लाभ होगा?, स्वास्थ्य लाभ होगा या नहीं?, इत्यादि प्रश्न उठ खडे हो जाते हैं।

मनुष्य की इसी चिंताको दूर करने के लिए हजारो वर्ष पूर्व भारतीय ज्योतिषाचार्यो नें प्रश्न कुंडली के माध्यम से ज्ञात करने की विद्या हमें प्रदान की हैं। जिस के फल स्वरुप किसी भी व्यक्ति के स्वास्थ्य से संबंधित प्रश्नो का ज्योतिषी गणनाओं के माध्यम से सरलता से समाधन किया जासकता हैं!

प्रश्न कुंडली के माध्यम से स्वास्थ्य से संबंधित जानकारी प्राप्त करने हेतु सर्व प्रथम प्रश्न कुंडली में रोगी के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ के योग हैं या नहीं यह देख लेना अति आवश्यक हैं।
आपके मार्गदर्शन हेतु यहां विशेष योग से आपको अवगत करवा रहे हैं।
 
लग्न में स्थित ग्रह या लग्नेश से रोग मुक्ति के योग।
• यदि लग्न में बलवान ग्रह स्थित हो तो रोगी को शीघ्र स्वास्थ्य लाभ देते हैं।
प्रश्न कुंडली में यदि लग्नेश (लग्न का स्वामी ग्रह) और दशमेश (दशम भाव का स्वामी ग्रह) मित्र हो तो रोगी को शीघ्र स्वास्थ्य लाभ ……………..>>
 
 
चन्द्रमा से रोग मुक्ति के योग
• यदि चन्द्र स्वराशि या उच्च राशि मे बलवान हो कर किसी शुभ ग्रह से युक्त हो या द्रष्ट हो तो रोगी को शीघ्र स्वास्थ्य लाभ होते देखा गया हैं।
यदि प्रश्न कुंडली में यदि चन्द्र चर राशि अर्थात द्विस्वभाव राशि में स्थित हो ……………..>>
 
प्रश्न कुंडली के माध्यम से स्वास्थ्य लाभ में विलम्ब होने के योग देख लेना भी आवश्यक होता हैं।
 
स्वास्थ्य लाभ में विलंब होने के योग
• सधारणतः जातक में षष्टम भाव व षष्टेश से रोग को देखा जाता हैं।
प्रश्न कुंडली में यदि लग्नेश और दशमेश के बीच ……………..>>
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यदि प्रश्न कुंडली में स्वास्थ्य लाभ में विलंब होने के योग बन रहे हो तो चिंतित होने के बजाय शास्त्रोक्त उपाय इत्यादि करना लाभदायक सिद्ध होता हैं। एसी स्थिती में विद्वानो के मत से महामृत्युंजय मंत्र-यंत्र का प्रयोग शीघ्र रोग मुक्ति हेतु रामबाण होता हैं।
 
प्रश्न कुंडली का अध्ययन करते समय यह योग भी देखले की रोगी को उचित उपयार प्राप्त हो रहा हैं या नहीं।
रोग का उचित उपचार होने के योग हैं या नहीं!
प्रश्न कुण्डली में प्रथम, पंचम, सप्तम एवं अष्टम भाव में पाप ग्रह हों और चन्द्रमा कमज़ोर या पाप ग्रह से पीड़ित हों तो रोग का उपचार कठिन हो ……………..>>
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प्रश्न कुंडली देखते समय शरीर के विभिन्न अंगो पर ग्रहो के प्रभाव एवं बिमारीयों को जानना भी आवश्यक होता हैं।
 
ज्योतिषी सिद्धांतो के अनुशार कुंडली के बारह भाव शरीर के विभिन्न अंगो को दर्शाते है।
  • प्रथम भाव : सिर, मस्तिष्क, स्नायु तंत्र.
  • द्वितीय भाव: चेहरा, गला, कंठ, गर्दन, आंख.
  • तीसरा भाव : कधे, छाती, फेफडे, श्वास, नसे और बाहें.
  • चतुर्थ भाव : स्तन, ऊपरी आन्त्र, ऊपरी पाचन तंत्र……………..>>
 
 
प्रश्न कुण्डली में रोग से संबंधित भाव
प्रश्न ज्योतिष के अनुसार प्रश्न कुंडली में लग्न स्थान चिकित्सक भाव होता हैं। अतः शुभ ग्रह प्रश्न कुंडली के लग्न में शुभ ग्रह की स्थिती से ज्ञात होता हैं की रोगी को किसी कुशल चिकित्सक की सलाह प्राप्त हो रही हैं या होगी।
यदि अशुभ ग्रह स्थित हो तो समझले की रोगी को ……………..>>
 
नोट: प्रश्न कुंडली का विश्लेषण सावधानी से करना उचित रहता हैं। विद्वानो के अनुशार प्रश्न कुंडली का विश्लेषण करते समय संबंधित भाव एवं भाव के स्वामी ग्रह अर्थातः भावेश एवं भाव के कारक ग्रह को ध्यान में रखते हुए आंकलन कर किया गया विश्लेषण स्पष्ट होता हैं। प्रश्न कुंडली का फलादेश करते समय हर छोटी छोटी बातों का ख्याल रखना आवश्यक होता हैं अन्यथा विश्लेषण किये गये प्रश्न का उत्तर स्टिक नहीं होता।
 
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MAY-2011

 
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शुक्रवार, मई 06, 2011

अक्षय तृतीया स्वयं सिद्धि अबूझ मुहूर्त्त

अक्षय तृतिया, अखातीज 2011, अक्षय तृतीया, Akshaya Tritiya-6 May- 2011 - Akhatrij Subh Muhurat, Akha Teej, Akshaya Tritiya, Parshuram Jayanti, Akshaya Tritiya Subha Muhurat अक्षय तृतिया, अखातीज 2011, अक्षय तृतीया, અક્ષય તૃતિયા, અખાતીજ 2011, અક્ષય તૃતીયા, ಅಕ್ಷಯ ತೃತಿಯಾ, ಅಖಾತೀಜ 2011, ಅಕ್ಷಯ ತೃತೀಯಾ, அக்ஷய த்ருதியா, அகாதீஜ 2011, அக்ஷய த்ருதீயா, అక్షయ తృతియా, అఖాతీజ 2011, అక్షయ తృతీయా, അക്ഷയ തൃതിയാ, അഖാതീജ 2011, അക്ഷയ തൃതീയാ, অক্শয ত্রুতিযা, অখাতীজ 2011, অক্শয ত্রুতীযা, ଅକ୍ଷଯ ତୃତିଯା, ଅଖାତୀଜ 2011, ଅକ୍ଷଯ ତୃତୀଯା, akShaya tRutiyA, aKAtIja 2011, akShaya tRutIyA,
अक्षय तृतिया स्वयं सिद्धि अबूझ मुहूर्त्त


वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतीया को अक्षय तृतीया का पर्व मनाया जाता हैं। अक्षय तृतीया स्वयंसिद्ध व अबूझ मुहूर्त हैं। एसी मान्यता हैं, कि अक्षय तृतीया के दिन किया गया दान, हवन, पूजन अक्षय (संपूर्ण) अर्थात जिसका क्षय (नाश) नहीं होता हैं।

हिंदू धर्मग्रंथो में अक्षय तृतीया तिथि से जुड़े कई रोचक तथ्यों का वर्णन मिलता है। यहां आपके मार्गदर्शन हेतु कुछ प्रमुख तथ्य प्रस्तुत हैं।

भारतीय पंचाग के अनुसार वर्ष में 19 अबूझ मुहूर्त व 4 स्वयं सिद्धि मुहूर्त्त होते हैं। अक्षय तृतीया (आखा तीज) भी अबूझ मुहूर्त व सिद्धि मुहूर्त्त में से एक हैं।


धर्म ग्रंथों के अनुसार अक्षय तृतीया से ही त्रेतायुग की शुरुआत मानी जाती हैं।

अक्षय तृतीया के दिन ही चार धामो में से एक श्री भगवान बद्रीनारायण के पट खुलते हैं।

अक्षय तृतीया के दिन वर्ष में एक बार ही वृंदावन में श्री बांकेबिहारीजी के मंदिर में श्री विग्रह के चरण दर्शन होते हैं।

शास्त्रो में उल्लेख हैं की अक्षय तृतीया के दिन भगवान नर-नारायण अवतरित हुवे थे।

अक्षय तृतीया के दिन भगवान श्री विष्णु ने श्रीपरशुरामजी और हयग्रीव के रुप में अवतरित हुवे थे।

स्वयंसिद्ध व अबूझ मुहूर्त होने के कारण अक्षय तृतीया के दिन संपूर्ण भारत वर्ष में सबसे अधिक विवाह होते हैं।

अक्षय तृतिया के दिन गंगा स्नान का बडा महत्व माना जाता हैं।

इस लिए अबूझ महुर्त में कोई भी शुभ कार्य प्रारम्भ किया जा सकता हैं। शास्त्रोक्त विधान के अनुशार कार्य प्रारम्भ करने के लिये मुहूर्त के अन्य किसी नियम को देखना आवश्यक नहीं हैं। अबूझ महुर्त में किसी भी समय में कार्य प्रारम्भ किया जा सकता हैं।

अक्षय तृतिया के दिन नई भूमि-भव-वाहन खरीदना, सोना-चांदि खरीदना जैसे स्थिर लक्ष्मी से संबंधित वस्तुएं खरीदना सर्वोतम माना गया हैं।

नये व्यवसायीक कार्य का शुभारम्भ करने के लिये इस दिन को प्रयोग किया जा सकता हैं।

इस दिन शुभ एवं पवित्र कार्य करने से जीवन में सुख-शांति आती है। इस दिन गंगा स्नान का भी विशेष महत्व है।

अक्षय तृतिया (अखातीज 6-मई-2011)

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अक्षय तृतिया (अखातीज 6-मई-2011)

अक्षय तृतिया को पूरे भारत वर्ष में कई नामों से जाना और मनाया जाता हैं, जिसमें अक्षय तृतीया, आखा तीज तथा वैशाख तीज प्रमुख हैं। इस वर्ष 2011 में अक्षय तृतीया 6 मई को हैं।

भारतीय परंपराके अंतर्गत अक्षय तृतिया का पर्व प्रमुख त्यौहारों में से एक हैं। अक्षय तृतिया को अबूझ महूर्त भी कहा जाता हैं।

अक्षय तृतिया पर्व वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतिया तिथि के दिन मनाया जाता हैं। विद्वानो के अनुशार अक्षय तृतिया के दिन स्नान, जप, होम, दान आदि पूण्य कार्य करना विशेष लाभदायक होता हैं। क्योकि मान्यता हैं, कि इस दिन किये गय पुण्य कार्य का फल व्यक्ति को अक्षय रुप में प्राप्त होता हैं।

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अक्षय तृतिया के दिन कोई भी शुभ कार्यो का प्रारम्भ करना विशेष शुभ माना जाता हैं। शास्त्रोक्त मतानुशार इस दिन कोई भी शुभ कार्य शुरु करने से उस कार्य का फल निश्चित स्थिर रुप में प्राप्त होते हैं।

शास्त्रो में उल्लेख हैं कि वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतिया अर्थात अक्षय तृतिया के दिन भगवान के नर-नारायण, परशुराम, हयग्रीव रुप में अवतरित हुए थे। इस लिये अक्षय तृतिया को परशुराम व अन्य जयन्तियां मानकर उसे उत्सव रुप में मनाया जाता हैं।

एक पौराणिक मान्यता के अनुसार त्रेता युग की शुरुआत भी इसी दिन से हुई थी. इसी कारण से इसे त्रेतायुगादि तिथि भी कहा जाता हैं।

विद्वानो के अनुशार अक्षय तृतिया के दिन गर्मी के मौसम में खाने-पीने-पहनने आदि काम आने वाली और गर्मी को शांत करने वाली सभी वस्तुओं का दान करना शुभ माना जाता हैं।

अक्षय तृतिया के दिन जौ, गेहूं, चने, दही, चावल, खिचडी, ईश (गन्ना) का रस, ठण्डाई व दूध से बने हुए पदार्थ, सोना, कपडे, जल का घडा आदि दान करना भी लाभदायक माना जाता हैं।

अक्षय तृतिया के दिन किए गए सभी धर्म कार्य अति उत्तम रहते हैं।

अक्षय तृतिया के दिन व्रत-उपवास के लिये भी उत्तम माना जाता हैं।

अक्षय तृतिया के दिन देश के कई हिस्सो में चावल, मूंग की बनी खिचडी खाने का रिवाज हैं।

अक्षय तृतिया के दिन गंगा स्नान का बडा महत्व माना जाता हैं।

वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतिया को स्वर्गीय आत्माओं की प्रसन्नाता के लिए कलश, पंखा, खडाऊँ, छाता, सत्तू, ककडी, खरबूजा आदि मौसमी फल, शक्कर इत्यादि पदार्थ ब्राह्माण को दान करने का विधान हैं।

अक्षय तृतिया के दिन चारों धामों में से एक श्री बद्रीनाथ नारायण धाम के पाट खुलते हैं।

अक्षय तृतिया (परशुराम तीज)
वैशाख शुक्ल पक्ष की तृतिया को अक्षय तृतिया के नाम से जानाजाता हैं। इस दिन श्री परशुरामजी का जन्म दिन होने के कारण इसे परशुराम तीज या परशुराम जयंती भी कहा जाता हैं।

अक्षय तृतीया शुभ मुहूर्त
भारत में पौराणिक काल से सभी शुभ कार्य शुभ मुहुर्त एवं शुभ समय पर प्रारंभ करने का प्रचलन हैं।

व्यक्ति द्वारा किए जाने वाले कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिये शुभ मुहुर्त और समय का चुनाव किया जाता हैं।

विद्वानो के अनुशार जब भी कोई व्यक्ति किसी शुभ कार्य की शुरुवात शुभ मुहुर्त समय पर करता हैं, तो उस शुभ मुहूर्त समय में किए शुरु किए गये कार्य के सफल होने की उस कार्य में अधिक लाभप्राप्ति की संभावनाएं बढ जाती हैं।

भारत में वसंत पंचमी, रामनवमी, अक्षय तृतिया, जन्माष्टमी, गणेश चतुर्थी, दशहरा, धनतेरस, दीपावलीम कार्तिक पूर्णिमा आदि को अबूझ महुर्त माना जाता हैं।

इस लिए अबूझ महुर्त में कोई भी शुभ कार्य प्रारम्भ किया जा सकता हैं। शास्त्रोक्त विधान के अनुशार कार्य प्रारम्भ करने के लिये मुहूर्त के अन्य किसी नियम को देखना आवश्यक नहीं हैं। अबूझ महुर्त में किसी भी समय में कार्य प्रारम्भ किया जा सकता हैं।

अक्षय तृतिया के दिन नई भूमि-भव-वाहन खरीदना, सोना-चांदि खरीदना जैसे स्थिर लक्ष्मी से संबंधित वस्तुएं खरीदना सर्वोतम माना गया हैं।

नये व्यवसायीक कार्य का शुभारम्भ करने के लिये इस दिन को प्रयोग किया जा सकता हैं।