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शुक्रवार, दिसंबर 25, 2009

देवी-गायत्री मंत्र

Devi ki Prasannataa ke liye Gayatri Mantra
विभिन्न देवी की प्रसन्नता के लिये गायत्री मंत्र


दुर्गा गायत्री

ॐ गिरिजाये विधमहे, शिवप्रियाय धीमहि तन्नो दुर्गा :प्रचोदयात


लक्ष्मी गायत्री

ॐ महालाक्ष्मये विधमहे, विष्णु प्रियाय धीमहि तन्नो लक्ष्मी:प्रचोदयात


राधा गायत्री

ॐ वृष भानु: जायै विधमहे, क्रिश्न्प्रियाय धीमहि तन्नो राधा :प्रचोदयात


तुलसी गायत्री

ॐ श्री तुल्स्ये विधमहे, विश्नुप्रियाय धीमहि तन्नो वृंदा: प्रचोदयात


सीता गायत्री

ॐ जनक नंदिन्ये विधमहे भुमिजाय धीमहि तन्नो सीता :प्रचोदयात



हंसा गायत्री

ॐ परम्ह्न्साय विधमहे, महा हंसाय धीमहि तन्नो हंस: प्रचोदयात


सरस्वती गायत्री

ॐ वाग देव्यै विधमहे काम राज्या धीमहि तन्नो सरस्वती :प्रचोदयात



पृथ्वी गायत्री

ॐ पृथ्वी देव्यै विधमहे सहस्र मूरतयै धीमहि तन्नो पृथ्वी :प्रचोदयात

देव- गायत्री मंत्र

Dev Gayatri Mantra
विभिन्न देव की प्रसन्नता के लिये गायत्री मंत्र

निम्न लिखीत मंत्रो मेसे किसे एक का प्रतिदिन पाठ करने से उनकी कृपा प्राप्त होती हैं।


ब्रम्हा गायत्री

ॐ वेदात्मने च विधमहे हिरंगार्भाय तन्नो ब्रह्म प्रचोदयात


विष्णु गायत्री

ॐ नारायण विधमहे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णु प्रचोदयात


शिव गायत्री

ॐ महादेवाय विधमहे, रुद्रमुर्तय धीमहि तन्नो शिव: प्रचोदयात


कृष्ण गायत्री

ॐ देव्किनन्दनाय विधमहे, वासुदेवाय धीमहि तन्नो कृष्ण:प्रचोदयात


इन्द्र गायत्री

ॐ सहस्त्र नेत्राए विधमहे वज्रहस्ताय धीमहि तन्नो इन्द्र:प्रचोदयात


हनुमान गायत्री

ॐ अन्जनिसुताय विधमहे वायु पुत्राय धीमहि, तन्नो मारुती :प्रचोदयात

यम गायत्री

ॐ सुर्यपुत्राय विधमहे, महाकालाय धीमहि तन्नो यम् :प्रचोदयात


राम गायत्री

ॐ दशारथाय विधमहे सीता वल्लभाय धीमहि तन्नो राम :प्रचोदयात


वरुण गायत्री

ॐ जल बिम्बाय विधमहे नील पुरु शाय धीमहि तन्नो वरुण :प्रचोदयात



नारायण गायत्री

ॐनारायण विधमहे, वासुदेवाय धीमहि तन्नो नारायण :प्रचोदयात



हयग्रीव गायत्री

ॐ वाणीश्वराय विधमहे, हयग्रीवाय धीमहि तन्नो हयग्रीव :प्रचोदयात

नवग्रह की शांति के लिये गायत्री मंत्र

Navgrah kee shanti ke liye gayatri mantra , Navgrah ki Shanti ke Mantra

नवग्रह की शांति के लिये गायत्री मंत्र
निम्न लिखीत मंत्रो का ग्रहो के अनुशार जाप करने से ग्रहो की प्रतिकूलता दूर होकर अनुकूलता प्राप्त होती हैं।





सूर्य गायत्री

ॐ आदित्याय च विधमहे प्रभाकराय धीमहि, तन्नो सूर्य :प्रचोदयात



चन्द्र गायत्री

ॐ अमृतंग अन्गाये विधमहे कलारुपाय धीमहि, तन्नो सोम प्रचोदयात


मंगल गायत्री

ॐ अंगारकाय विधमहे शक्तिहस्ताय धीमहि, तन्नो भोम :प्रचोदयात



बुध गायत्री

ॐ सौम्यरुपाय विधमहे वानेशाय च धीमहि, तन्नो सौम्य प्रचोदयात



गुरु गायत्री

ॐ अन्गिर्साय विधमहे दिव्यदेहाय धीमहि, जीव: प्रचोदयात



शुक्र गायत्री

ॐ भ्रगुजाय विधमहे दिव्यदेहाय, तन्नो शुक्र:प्रचोदयात



शनि गायत्री

ॐ भग्भवाय विधमहे मृत्युरुपाय धीमहि, तन्नो सौरी:प्रचोदयात





राहू गायत्री

ॐ शिरोरुपाय विधमहे अमृतेशाय धीमहि, तन्नो राहू:प्रचोदयात





केतु गायत्री

ॐ पद्म्पुत्राय विधमहे अम्रितेसाय धीमहि तन्नो केतु: प्रचोदयात

गुरुवार, दिसंबर 24, 2009

गौ सेवा का महत्व

Gay ki sevaa ka mahatv - Gou seva -
गौ सेवा का महत्व

भारतीय परंपरा के मत से गाय के शरीर में ३३ करोड़ देवता वास होता हैं, एवं गौ-सेवा से एक ही साथ 33 करोड देवता प्रसन्न होते हैं।

हिन्दू संस्कृति जिस घर में गाय माता का निवास करती हैं एवं जहां गौ सेवा होती है, उस घर से समस्त परेशानीयां कोसों दूर रहती हैं। भारतीय संस्कृति में गाय को माता का संम्मान दिय जाता हैं इस लिये उसे गौ-माता केहते है।

गाय प्राप्त गाय का दूध, दूध ही नहीं अमृत तुल्य हैं। गाय से प्राप्त दूध, घी, मक्खन से मानव शरीर पुष्ट बनता हैं । एवं गाय का गोबर चुल्हें, हवन इत्यादि मे उप्युक्त होता हैं और यहां तक की उसका मूत्र भी विभिन्न दवाइयां बनाने के काम आता हैं।

गाय ही ऐसा पशुजीव हैं जो अन्य पशुओं में सर्वश्रेष्ठ और बुद्धिमान माना हैं।
कहाजाता हैं भगवान श्री कृष्ण छह वर्ष के गोपाल बने क्योंकि उन्होंने गौ सेवा का संकल्प लिया था। भगवान श्री कृष्ण ने गौ सेवा करके गौ का महत्व बढाया हैं।
  • गाय के मूत्र में कैंसर, टीवी जैसे गंभीर रोगों से लड़ने की क्षमता होती हैं, जिसे वैज्ञानिक भी मान चुके हैं।
  • गौ-मूत्र के सेवन करने से पेट के सभी विकार दूर होते हैं।
  • ज्योतिष शास्त्र मे भी नव ग्रहो के अशुभ प्रभाव से मुक्ति के लिये गाय को विभिन्न प्रकार के अन्न का वर्णन किया गया हैं।
  • यदि बच्चे को बचपन से गाय के दूध पिलाया जाए तो बच्चे की बुद्धि कुशाग्र होती हैं।
  • गाय के गोबर को आंगन लिपने एवं मंगल कार्यो मे लिया जाता हैं।
  • गोबर, गौ मूत्र, गौ-दही, गौ-दूध, गौधृत ये पंचगव्य हैं।
  • गाय की सेवा से भगवान शिव भी प्रसन्न होते हैं।

इस संसार मे आज हर व्यक्ति किसी न किसी कारण दुखी हैं। कोई अपने कर्मों या अपने पर आई विपदाओं से दुखी हैं अर्थात वह अपने दुखों के कारण दुखी हैं मगर कोई दूसरे के सुख से दुखी हैं अर्थात ईर्षा के कारण भी दुखी हैं। यानी यहां दुखी हर कोई हैं कारण भले ही भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। इन समस्त परेशानीओ का निदन है गौ सेवा।

शनिवार, दिसंबर 19, 2009

हिन्दू धर्म (भाग: २)

Hindu Dharam
हिन्दू धर्म

ऋग्वेद में कई बार सप्त सिन्धु का उल्लेख मिलता है - वो भूमि जहाँ आर्य सबसे पहले बसे थे। संस्कृत में सिन्धु शब्द के दो मुख्य अर्थ हैं - पहला, सिन्धु नदी जो मानसरोवर के पास से निकल कर लद्दाख़ और पाकिस्तान से बहती हुई समुद्र मे मिलती है, दूसरा, कोई समुद्र या जलराशि।


 
ऋग्वेद की नदीस्तुति के अनुसार वे सात नदियाँ थीं : सिन्धु, सरस्वती, वितस्ता (झेलम), शुतुद्रि (सतलुज), विपाशा (व्यास), परुषिणी (रावी) और अस्किनी (चेनाब)।

 
भाषाविदों के अनुसार हिन्द आर्य भाषाओं की ध्वनि ईरानी भाषाओं की ध्वनि में बदल जाती है। इसलिये सप्त सिन्धु अवेस्तन भाषा (पारसियों की धर्मभाषा) मे जाकर हफ्त हिन्दु मे परिवर्तित हो गया (अवेस्ता : वेन्दीदाद, फ़र्गर्द 1.18)। इसके बाद ईरानियों ने सिन्धु नदी के पूर्व में रहने वालों को हिन्दु नाम दिया। जब अरब से मुस्लिम हमलावर भारत में आए, तो उन्होने भारत के मूल धर्मावलम्बियों को हिन्दू कहना शुरू कर दिया। मुख्य सिद्धान्त

 
हिन्दू धर्म के अन्तर्गत कई मत और सम्प्रदाय आते हैं, और सभी को बराबर श्रद्धा दी जाती है। धर्मग्रन्थ भी कई हैं।

फ़िर भी, हिन्दू धर्म का मुख्य सिद्धान्त, जो ज़्यादातर हिन्दू मानते हैं,वह है इन सब में
  • विश्वास :
  • धर्म (वैश्विक क़ानून),
  • कर्म (और उसके फल),
  • पुनर्जन्म का सांसारिक चक्र,
  • मोक्ष (सांसारिक बन्धनों से मुक्ति--जिसके कई रास्ते हो सकते हैं),
  • और , ईश्वर।

 

 हिन्दू धर्म मे स्वर्ग और नरक को अस्थायी मानाजाता है।

 हिन्दू धर्म के अनुसार संसार के सभी प्राणियों में आत्मा होती है। मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो इस लोक में पाप और पुण्य, दोनो कर्म भोग सकता है, और मोक्ष प्राप्त कर सकता है।

 
हिन्दू धर्म में चार मुख्य सम्प्रदाय हैं :

 
  • वैष्णव (जो विष्णु को परमेश्वर मानते हैं),
  • शैव (जो शिव को परमेश्वर मानते हैं),
  • शाक्त (जो देवी को परमशक्ति मानते हैं)
  • और स्मार्त (जो परमेश्वर के विभिन्न रूपों को एक ही समान मानते हैं)।
लेकिन ज्यादातर हिन्दू स्वयं को किसी भी सम्प्रदाय में वर्गीकृत नहीं करते हैं।

 
ब्रह्म हिन्दू धर्मग्रन्थ उपनिषदों के अनुसार ब्रह्म ही परम तत्व है (इसे त्रिमूर्ति के देवता ब्रह्मा से भ्रमित न करें)।

 
ब्रह्म ही जगत का सार है, जगत की आत्मा है। वो विश्व का आधार है। उसी से विश्व की उत्पत्ति होती है और विश्व नष्ट होने पर उसी में विलीन हो जाता है। ब्रह्म एक, और सिर्फ़ एक ही है। वो विश्वातीत भी है और विश्व के परे भी। वही परम सत्य, सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ है। वो कालातीत, नित्य और शाश्वत है। वही परम ज्ञान है। ब्रह्म के दो रूप हैं : परब्रह्म और अपरब्रह्म। परब्रह्म असीम, अनन्त और रूप-शरीर विहीन है। वो सभी गुणों से भी परे है, पर उसमें अनन्त सत्य, अनत चित् और अनन्त आनन्द है। ब्रह्म की पूजा नही की जाती है, क्योंकि वो पूजा से परे और अनिर्वचनीय है। उसका ध्यान किया जाता है।

 
प्रणव ॐ (ओम्) ब्रह्मवाक्य है, जिसे हिन्दू धर्म में परम पवित्र शब्द मानते हैं।

 
हिन्दु धर्म में मानते है कि ओम की ध्वनि पूरे ब्रह्मांड मे गून्ज रही है। ध्यान की उच्चतम सीमा मे गहरे उतरने पर यह सुनाई देता है। ब्रह्म की परिकल्पना वेदान्त दर्शन का केन्द्रीय स्तम्भ है, और हिन्दू धर्म की विश्व को अनुपम देन है।

 
ईश्वर ब्रह्म और ईश्वर में क्या सम्बन्ध है, इसमें हिन्दू दर्शनों की सोच अलग अलग है।

अद्वैत वेदान्त के अनुसार जब मानव ब्रह्म को अपने मन से जानने की कोशिश करता है, तब मानव ब्रह्म ईश्वर हो जाता है, क्योंकि मानव माया नाम की एक जादुई शक्ति के वश मे रहता है।

 
क्रमशः अगल क्रम शीध्र प्रस्तुत होगा।

हिन्दू धर्म (भाग: १)

Hindu Dharam

हिन्दू धर्म


हिन्दू धर्म वेदों पर आधारित है ।
हिन्दू धर्म में देवी-देवता को विभिन्न रुप मे पूजा जाने पर भी उनको एक ही ईश्वर के विभिन्न रूप माना जाता है । मनु ने धर्म के दस लक्षण बताये हैं।

धृति क्षमा दमोस्तेयं शौचं इन्द्रियनिग्रहः।


धीर्विद्या सत्यं अक्रोधो , दसकं धर्म लक्षणम ॥

अर्थातः

1. धैर्य

2. क्षमा

3. संयम

4. चोरी न करना

5. शौच (स्वच्छता)

6. इन्द्रियों को वश मे रखना

7. बुद्धि

8. विद्या

9. सत्य और

10. क्रोध न करना

ये दस धर्म के लक्षण हैं ।

धर्म की कसौटी


धर्म के अनुशार जो अपने अनुकूल न हो?  वैसा व्यवहार दूसरे के साथ नहीं करना चाहिये - यह धर्म की कसौटी है।



धर्म का सर्वस्व क्या है?,

श्रूयतां धर्म सर्वस्वं श्रूत्वा चैव अनुवर्त्यताम् ।


आत्मनः प्रतिकूलानि , परेषाम् न समाचरेत् ॥

(सुनो और सुनकर उस पर चलो ! अपने/अपनो को जो अच्छा न लगे, वैसा आचरण दूसरे के साथ नही करना चाहिये।)

हिन्दू धर्म (संस्कृत: सनातन धर्म) विश्व के सभी पुरातन धर्मों में सबसे पुराना धर्म है।


हिन्दू धर्म वेदों पर आधारित धर्म है, जो अपने अन्दर कई अलग अलग उपासना पद्धतियाँ, सम्प्रदाय, और द्रष्टिकोण समेटे हुए है।

हिन्दू धर्म में कई देवी-देवताओं की पूजा की जाती है, लेकिन असल में हिन्दू धर्म मे इश्वर एक है और उस्के स्वरुप भिन्न है पर ज्यादा जोर दिया गया है।

हिन्दी में इस धर्म को सनातन धर्म अथवा वैदिक धर्म भी कहते हैं।
इंडोनेशिया में इस धर्म का औपचारिक नाम "हिन्दु आगम" है।
हिन्दू केवल एक धर्म या सम्प्रदाय ही नही है अपितु जीवन जीने की एक पद्धति है।

" हिन्सायाम दूयते या सा हिन्दु "


अर्थात
जो अपने मन वचन कर्म से हिंसा से दूर रहे वह हिन्दु है और जो कर्म अपने हितों के लिए दूसरों को कष्ट दे वह हिंसा है।

क्रमशः अगल क्रम शीध्र प्रस्तुत होगा।

शुक्रवार, दिसंबर 18, 2009

गुरुपुष्यामृत योग

Gurupushyamrut yoga/ gurupushya yoga
गुरुपुष्यामृत योग


एक आम आदमी भी इस शुभ महूर्त का चयन कर सबसे उपयुक्त लाभ प्राप्त कर सकता है। और अशुभता से बच सकता है।

अपने जीवन में दिन-प्रतिदिन सफलता की प्राप्ति के लिए इस अद्भुत महूर्त वाले दिन किसी भी नये कार्य को जेसे नौकरी, व्यापार, या परिवार से जुड़े कार्य, बंद हो चुके कार्य शुरू करने के लिये एवं जीवन के कोई भी अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्र में कार्य करने से 99.9% निश्चित सफलता कि संभावना होति है।

गुरुपुष्यामृत योग बहोत कम बनता है जब गुरुवार के दिन पुष्य नक्षत्र होता है । तब बनता है गुरु पुष्य योग।

गुरुवार के दिन शुभ कार्यो एवं आध्यात्म से संबंधित कार्य करना बहोत ही शुभ एवं मंगलमय होता है।

पुष्य नक्षत्र भी सभी प्रकार के शुभ कार्यो एवं आध्यात्म से जुडे कार्यो के लिये अति शुभ माना गया है।

जब गुरुवार के दिन पुष्य नक्षत्र होता तब बन जाता है अद्भुत एवं अत्यंत शुभ फल प्रद अमृत योग।

एक साधक के लिए बेहद फायदेमंद होता हैं गुरुपुष्यामृत योग

इस दिन विद्वान एवं गुढ रहस्यो के जानकार मां महालक्ष्मी कि साधना करने कि सलाह देते है।

इस खास दिन साधना करने पर बहोत अच्छे एवं शीघ्र परीणाम प्राप्त होते है। मां महालक्ष्मी का आह्वान कर उनकी कृपा द्रष्टि से समृद्धि और शांति प्राप्त कि जासकती है।

गुरुपुष्यामृत योग के लिये यह यह भी कहा जाता है कि यदि कोइ व्यक्ति अपने किसी कार्य उद्देश्य मे सिद्धि चाहता है। उसे इस दिन अपने इष्ट भगवान से इच्छापूर्ति हेतु प्राथना (पूजा-अर्चना) अवश्य करनी चाहिये एसा करने से मनचाहि सिद्धि निश्चित रूप से फलप्रद होती है।

गुरुपुष्यामृत योग पूजा-अर्चना/मंत्र सिद्धि/तंत्र सिद्धि/यंत्र सिद्धि/साधना/संकल्य जेसे के कार्य इस दिन करने से उत्तम सफलता मिलती है।

व्यक्ति की सफलता मे वृद्धि होत है। दुर्भाग्यशाली व्यक्ति पर किये गये तांत्रिक प्रभाव को दुर कर उसे दुर्भाग्य से मुक्त किया जासकता है।

गुरुवार, दिसंबर 17, 2009

रामायन आरति

Ramayana Arati, Ramaayana arti, Raamayan
॥श्री रामायन आरति॥


आरति श्रीरामायनजी की।
कीरति कलित ललित सिय पी की॥

गावत ब्रह्मादिक मुनि नारद। बालमीक बिग्यान-बिसारद॥
सुक सनकादि सेष अरु सारद। बरनि पवनसुत कीरति नीकी॥१॥

गावत बेद पुरान अष्टदस। छहो सास्त्र सब ग्रन्थन को रस॥
मुनि जन धन संतन को सरबस। सार अंस संमत सबही की॥३॥

गावत संतत संभु भवानी। अरु घटसंभव मुनि बिग्यानी॥
ब्यास आदि कबिबर्ज बखानी। काकभुसुंडि गरुड के ही की॥२॥

कलि मल हरनि विषय रस फीकी। सुभग सिंगार मुक्ति जुबती की॥
दलन रोग भव मूरि अमी की। तात मात सब बिधि तुलसी की॥४॥

सूर्याष्टक स्तोत्र

SuryaaShtakam Satrot,  Sury Ashataka Satrot, Sury Satrot,
॥सूर्याष्टक स्तोत्र॥


   
आदि देव: नमस्तुभ्यम प्रसीद मम भास्कर ।

 दिवाकर नमस्तुभ्यम प्रभाकर नमोअस्तु ते ॥

 

 सप्त अश्व रथम आरूढम प्रचंडम कश्यप आत्मजम ।

 श्वेतम पदमधरम देवम तम सूर्यम प्रणमामि अहम ॥

  
लोहितम रथम आरूढम सर्वलोकम पितामहम ।

 महा पाप हरम देवम त्वम सूर्यम प्रणमामि अहम ॥

 

 त्रैगुण्यम च महाशूरम ब्रह्मा विष्णु महेश्वरम ।

 महा पाप हरम देवम त्वम सूर्यम प्रणमामि अहम ॥

 

 बृंहितम तेज: पुंजम च वायुम आकाशम एव च ।

 प्रभुम च सर्वलोकानाम तम सूर्यम प्रणमामि अहम ॥

 

 बन्धूक पुष्प संकाशम हार कुण्डल भूषितम । 
एक-चक्र-धरम देवम तम सूर्यम प्रणमामि अहम ॥

 

 तम सूर्यम जगत कर्तारम महा तेज: प्रदीपनम ।

 महापाप हरम देवम तम सूर्यम प्रणमामि अहम ॥

 

 सूर्य-अष्टकम पठेत नित्यम ग्रह-पीडा प्रणाशनम ।

 अपुत्र: लभते पुत्रम दरिद्र: धनवान भवेत ॥

 

आमिषम मधुपानम च य: करोति रवे: दिने ।

सप्त जन्म भवेत रोगी प्रतिजन्म दरिद्रता ॥

 

स्त्री तैल मधु मांसानि य: त्यजेत तु रवेर दिने ।

न व्याधि: शोक दारिद्रयम सूर्यलोकम गच्छति ॥

 
 

यह सूर्याष्टक सिद्ध स्तोत्र है,
  • प्रात: स्नानोपरान्त तांबे के पात्र से सूर्य को अर्घ देनाचाहिये।
  • तदोपरान्त सूर्य के सामने खडे होकर सूर्य को देखते हुए १०८ पाठ नित्य करने चाहिये।
  • नित्य पाठ करने से मान, सम्मान, नेत्र ज्योति जीवनोप्रयन्त बनी रहेगी।
  • सूर्य ग्रह से संबंधित समस्त कम होजाते है एवं शुभ फल की प्राप्र्ति होती है।
  • यदि प्रतिदिन १०८ बार संभव न होतो १ बार करने से भी लाभ प्राप्त होते है।

शनिवार, दिसंबर 12, 2009

आप अपना नाम कैसे लिखते है?

Aap apnaa name keise likhate hai ?
आप अपना नाम कैसे लिखते है?

हस्ताक्षर - के बारे में खास बात है कि आप अपना नाम कैसे लिखते है?


अंक ज्योतिष के अनुशार आप कैसे अपना नाम हस्ताक्षर मे केसे लिखते है यह बहोत महत्वपूर्ण है। अधिक महत्वपूर्ण कैसे आप अपने हस्ताक्षर के बाकी हिस्से. यह हस्ताक्षर का लेखन से आप के बारे में विभिन्न जानकारी देता है। जो बात आपके हस्ताक्षर मे है ? क्या वह बात किसी और के लेखन या किसी और के हस्ताक्षर में है?

  • आपके लेखन के अन्य शब्दों की लिखाइ से फर्क नहीं पड़ता जो आपके हस्ताक्षर का नहीं हिस्सा है।
  • आपके हस्ताक्षर आपका व्यक्तित्व और दिल के बारे में दिखाते है जो असलीयत मे आप होते है।
  • यह आप का वह चेहरा होता है जो आप दुनिया को दिखाना चहते या दिखाते है।
  • यदि हस्ताक्षर दो तरह के हैं, तब आप का एक सार्वजनिक व्यक्तित्व और एक निजी व्यक्तित्व होगा जिसके अंतर का विश्लेषण किया जाना चाहिए.
  • कुछ लोगों दिखावे वाले हस्ताक्षर पर जोर डालते है. वे ऐसे लोग होते है जो नेता, अभिनेता और संगीतकार के रूप में होते है जो एक "दिखावे के कारोबार 'में होते हैं। क्योकि उनके जीवन मे उन्हें निरंतर लोगों की नजरों में बने रेहना होता है।
  • यह भी आवशयक है कि लोगों को अपनी आवशयक्ता के अनुशार हस्ताक्षर लागू करना चाहिये। किसे कौन से काम करने की आवश्यकता है उन्हें उसी के मुताबक निजी हस्ताक्षर विकसित करने चाहिये।
  • पहली बात यह देखने कि है कि एक हस्ताक्षर में वही लिखे जो आपकी आवशक्ता है और जो आप अपने जीवन मे बनना य प्राप्त करना चाहते है।
  • हस्ताक्षर का निश्चय अंक ज्योतिष के अनुशार करना सर्वदा उचित होता है।
  • यदि आप के पास उचित जानकारी का अभाव होतो बेहतर होगा किसी परिचित कुशल हस्ताक्षर निरीक्षक कि सलाह ले।
  • यदि यह भी संभव न होतो हम से सम्पर्क कर सकते है। हम २८ वर्षोसे इन से संबंधित कार्यो मे जुडे हुवे है।
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बुधवार, दिसंबर 09, 2009

मंत्र की परीभाषा

Mantra ki Paribhasha/Pareebhasha
परिभाषा

मंत्र की परीभाषा: मंत्र उस ध्वनि को कहते है जो अक्षर(शब्द) एवं अक्षरों (शब्दों) के समूह से बनता है। संपूर्ण ब्रह्माण्ड में दो प्रकार कि ऊर्जा से व्याप्त है, जिसका हम अनुभव कर सकते है, वह ध्वनि उर्जा एवं प्रकाश उर्जा है। एवं ब्रह्माण्ड में कुछ एसी ऊर्जा से व्याप्त भी व्याप्त है जिसे ना हम देख सकते है नाही सुन सकते है नाहीं अनुभव कर सकते है।

आध्यात्मिक शक्ति इनमें से कोई भी एक प्रकार की ऊर्जा दूसरे के बिना सक्रिय नहीं होती। मंत्र सिर्फ़ ध्वनियाँ नहीं हैं जिन्हें हम कानों से सुनते सकते हैं, ध्वनियाँ तो मात्र मंत्रों का लौकिक स्वरुप भर हैं जिसे हम सुन सकते हैं।

ध्यान की उच्चतम अवस्था में व्यक्ति का आध्यात्मिक व्यक्तित्व पूरी तरह से ब्रह्माण्ड की अलौकिक शक्तिओ के साथ मे एकाकार हो जाता है।

जिस व्यक्ति ने अन्तर ज्ञान प्राप्त कर लिया है. वही सारे ज्ञान एवं 'शब्द' के महत्व और भेद को जान सकता है।

प्राचीन ऋषियों ने इसे शब्द-ब्रह्म की संज्ञा दी - वह शब्द जो साक्षात् ईश्वर है! उसी सर्वज्ञानी शब्द-ब्रह्म से एकाकार होकर व्यक्ति को मनचाहा ज्ञान प्राप्त कर ने मे समर्थ हो सकता है.

फ़िरोजा एक विलक्षण रत्न

Firoza Ek Vilakshan Ratna
फ़िरोजा एक विलक्षण रत्न

फ़िरोजा- (भाग्यशाली पत्थर)
TORQUISE - FIROZA- PEROZ ( Lucky Stone)


फ़िरोजा शब्द अंदाज से 16 वीं सदी के आसपास फ्रेंच भाषा के तुर्की (Turquois) से प्राप्त हुवा था या गहरे नीले रंग का पत्थर (pierre turquin) से प्राप्त हुवा होगा या, इस के नाम मे बहोत सारे सहस्य है! नकली फ़िरोजा के अस्तित्व लागू होने से असली फ़िरोजा का महत्व कम हो गया है, फ़िरोजा को कई नामों से जाना जाता है,


खनिज समूह: मरकत समूह.

वितरण स्थान: के प्राप्ति स्थान बहोत सारे है।, जिनमें से कुछ ही का उल्लेख वाणिज्यिक के लिए उत्तम होता है।, जिसकी गुणवत्ता और प्रभाव अच्छा हो उस का उल्लेख किया जारहा है।

ईरान के मा’डन (Ma'dan) से ४५-५० किमी उत्तर पश्चिम में नेइशाबुर(निशापुर) जिसे भारत मे निशापुरी के नाम से जाना जता है। निशापुरी सबसे अच्छा होता है इस्का रंग एवं प्रभाव बाकी जगाओ से प्राप्त से उत्तम होता है।

दक्षिण ऑस्ट्रेलिया. में चीन, ब्राजील, मेक्सिको, संयुक्त राज्य अमरीका, इंग्लैंड, बेल्जियम और भी बहोत सारी जगाहो रे .. प्राप्त होता है।

प्राकृतिक सुंदर फ़िरोजा फ़ायदेमंद है।


मूल यह एक 100% प्राकृतिक रत्न पत्थर है। (खनन/खादान के माध्यम से प्राप्त)

फ़िरोजा को एक आध्यात्मिक रूप में सहायता हेतु प्रयोग किया जाता है।


किसी भी स्थिति में, जहां स्पस्ट बात करने की आवश्यक है, वहा व्यक्ति की बात मे एक प्रकार के गुण उत्पन्न करती है जो उसे दूसरो से अलग और ज्यदा स्पस्ट सुवक्ता बनने मे मदद करता है। व्यक्ति को दोस्तों के बीच खुले विचार, प्यार और नि: स्वार्थ संबंध के प्रवाह को सक्षम करने के लिए, फ़िरोजा उपयोगकर्ता के अंदर समग्र मानसिक स्थिति को बढ़ाने मे, सकारात्मक सोच, संपूर्णता, अंतर्ज्ञान, बुद्धि, मानसिक अधिक स्थिरता और आत्म का विकास कर उसको जानने के लिए अग्रणी बनाता है।


फ़िरोजा के लिये कहा जाता ह। इस रत्न का लाभ सभी राशि के लोगो द्वारा उपयोग किया जा सकता है, इसे दुनिया मे सभी उम्र और सब धर्म के लोगो मे इस्तेमाल सबसे आम पहलू यह है, कि प्रत्येक संस्कृति और हर धर्म मे फ़िरोजा के लाभ का सम्मान करते है।

  • पहनने वाला के परिवार को मुसीबत से बचाया है विशेष रूप से पति और पत्नी बीच , नफ़रत को नष्ट करता है और प्यार बढ़ाता है।
  • इस रत्न की अदृश्य स्त्रोतों से आने वाली ऊर्जा आप के लिए उप्योगी हो सकती है।
  • फ़िरोजा के रंग मे बदलाव होता रहता है।
  • यदि यह गहरे नीले रंग का हो तो यह अच्छा शगुन है।
  • यदि यह गहरे हरे रंग का हो तो यह माध्यम है।
  • परन्तु अगर यह पीला हो जाता है यह एक बुरा शगुन है।
  • फ़िरोजा को दोस्ती केलिये एक अच्छा संकेत माना जाता है अगर किसी अन्य व्यक्ति के द्वारा उपहार मे प्राप्त हो।
  • अगर इमे धागे के समान रेखा दिखाई देती है, यह शत्रुता उत्पन्न होने का संकेत है।
  • यह भी अविवाहित लड़कियों को पेहनाने से उनके विवाह शीघ्र होता है।


लाभ:-
यह चीन मे व्यापक रूप से फेंग शुई और क्रिस्टल चिकित्सा में इस्तेमाल किया है।
  • शराब की लत छुडाने के लिए क्रिस्टल चिकित्सकों द्वारा फ़िरोजा की सिफारिश की जाती है।
  • संक्रमण,ऊँचा रक्तचाप, अस्थम, दाँत और मुँह की समस्या एवं सूर्य के विकिरण से रक्षा होती है।
यह ज्यादातर बाज़र मे बिकने वाले फ़िरोजा जेसे पत्थर असली नहीं होते।
एक असली या नकली फ़िरोजा को पहचान ने के लिये, इसकी सतह को देखे असली कि सतह खुर्दरी और समतल या सपाट नहीं होती, एवं नकली फ़िरोजा की सतह समतल या सपाट होती है।


चिकित्सा अस्वीकृति
ऊपर उल्लेख फ़िरोजा सब वर्णन के भारतीय और चीनी पौराणिक कथाओं के अनुसार हैं।
पत्थर के हीलिंग लाभ के लिये अपने चिकित्सक या अन्य स्वास्थ्य देखभाल पेशेवर से सलाह ले एक विकल्प के रूप में इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।


Note:-
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सोमवार, दिसंबर 07, 2009

गायत्री स्तोत्र

Gayatri Strotr
॥गायत्री स्तोत्र॥

सुकल्याणीं वाणीं सुरमुनिवरैः पूजितपदाम
शिवाम आद्यां वंद्याम त्रिभुवन मयीं वेदजननीं
परां शक्तिं स्रष्टुं विविध विध रूपां गुण मयीं
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम

विशुद्धां सत्त्वस्थाम अखिल दुरवस्थादिहरणीम्
निराकारां सारां सुविमल तपो मुर्तिं अतुलां
जगत् ज्येष्ठां श्रेष्ठां सुर असुर पूज्यां श्रुतिनुतां
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम

तपो निष्ठां अभिष्टां स्वजनमन संताप शमनीम
दयामूर्तिं स्फूर्तिं यतितति प्रसादैक सुलभां
वरेण्यां पुण्यां तां निखिल भवबन्धाप हरणीं
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम

सदा आराध्यां साध्यां सुमति मति विस्तारकरणीं
विशोकां आलोकां ह्रदयगत मोहान्धहरणीं
परां दिव्यां भव्यां अगम भव सिन्ध्वेक तरणीं
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम
अजां द्वैतां त्रेतां विविध गुणरूपां सुविमलां
तमो हन्त्रीं तन्त्रीं श्रुति मधुरनादां रसमयीं
महामान्यां धन्यां सततकरूणाशील विभवां
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम

जगत् धात्रीं पात्रीं सकल भव संहारकरणीं
सुवीरां धीरां तां सुविमलतपो राशि सरणीं
अनैकां ऐकां वै त्रयजगत् अधिष्ठान् पदवीं
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम

प्रबुद्धां बुद्धां तां स्वजनयति जाड्यापहरणीं
हिरण्यां गुण्यां तां सुकविजन गीतां सुनिपुणीं
सुविद्यां निरवद्याममल गुणगाथां भगवतीं
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम
अनन्तां शान्तां यां भजति वुध वृन्दः श्रुतिमयीम
सुगेयां ध्येयां यां स्मरति ह्रदि नित्यं सुरपतिः
सदा भक्त्या शक्त्या प्रणतमतिभिः प्रितिवशगां
भजे अम्बां गायत्रीं परम सुभगा नंदजननीम

शुद्ध चितः पठेद्यस्तु गायत्र्या अष्टकं शुभम्
अहो भाग्यो भवेल्लोके तस्मिन् माता प्रसीदति

गायत्री चालीसा

Gayatri Chalisa
॥गायत्री चालीसा॥


ह्रीं श्रीं क्लीं मेधा प्रभा जीवन ज्योति प्रचण्ड॥
शान्ति कान्ति जागृत प्रगति रचना शक्ति अखण्ड॥

जगत जननी मङ्गल करनि गायत्री सुखधाम।
प्रणवों सावित्री स्वधा स्वाहा पूरन काम॥

भूर्भुवः स्वः ॐ युत जननी।
गायत्री नित कलिमल दहनी॥१॥

अक्षर चौविस परम पुनीता।
इनमें बसें शास्त्र श्रुति गीता॥२॥

शाश्वत सतोगुणी सत रूपा।
सत्य सनातन सुधा अनूपा॥३॥

हंसारूढ श्वेताम्बर धारी।
स्वर्ण कान्ति शुचि गगन- बिहारी॥४॥

पुस्तक पुष्प कमण्डलु माला।
शुभ्र वर्ण तनु नयन विशाला॥५॥

ध्यान धरत पुलकित हित होई।
सुख उपजत दुःख दुर्मति खोई॥६॥

कामधेनु तुम सुर तरु छाया।
निराकार की अद्भुत माया॥७॥

तुम्हरी शरण गहै जो कोई।
तरै सकल संकट सों सोई॥८॥

सरस्वती लक्ष्मी तुम काली।
दिपै तुम्हारी ज्योति निराली॥९॥

तुम्हरी महिमा पार न पावैं।
जो शारद शत मुख गुन गावैं॥१०॥

चार वेद की मात पुनीता।
तुम ब्रह्माणी गौरी सीता॥११॥

महामन्त्र जितने जग माहीं।
कोउ गायत्री सम नाहीं॥१२॥

सुमिरत हिय में ज्ञान प्रकासै।
आलस पाप अविद्या नासै॥१३॥

सृष्टि बीज जग जननि भवानी।
कालरात्रि वरदा कल्याणी॥१४॥

ब्रह्मा विष्णु रुद्र सुर जेते।
तुम सों पावें सुरता तेते॥१५॥

तुम भक्तन की भक्त तुम्हारे।
जननिहिं पुत्र प्राण ते प्यारे॥१६॥

महिमा अपरम्पार तुम्हारी।
जय जय जय त्रिपदा भयहारी॥१७॥

पूरित सकल ज्ञान विज्ञाना।
तुम सम अधिक न जगमे आना॥१८॥

तुमहिं जानि कछु रहै न शेषा।
तुमहिं पाय कछु रहै न क्लेसा॥१९॥

जानत तुमहिं तुमहिं ह्वै जाई।
पारस परसि कुधातु सुहाई॥२०॥

तुम्हरी शक्ति दिपै सब ठाई।
माता तुम सब ठौर समाई॥२१॥

ग्रह नक्षत्र ब्रह्माण्ड घनेरे।
सब गतिवान तुम्हारे प्रेरे॥२२॥

सकल सृष्टि की प्राण विधाता।
पालक पोषक नाशक त्राता॥२३॥

मातेश्वरी दया व्रत धारी।
तुम सन तरे पातकी भारी॥२४॥

जापर कृपा तुम्हारी होई।
तापर कृपा करें सब कोई॥२५॥

मंद बुद्धि ते बुधि बल पावें।
रोगी रोग रहित हो जावें॥२६॥

दरिद्र मिटै कटै सब पीरा।
नाशै दुःख हरै भव भीरा॥२७॥

गृह क्लेश चित चिन्ता भारी।
नासै गायत्री भय हारी॥२८॥

सन्तति हीन सुसन्तति पावें।
सुख संपति युत मोद मनावें॥२९॥

भूत पिशाच सबै भय खावें।
यम के दूत निकट नहिं आवें॥३०॥

जो सधवा सुमिरें चित लाई।
अछत सुहाग सदा सुखदाई॥३१॥

घर वर सुख प्रद लहैं कुमारी।
विधवा रहें सत्य व्रत धारी॥३२॥

जयति जयति जगदंब भवानी।
तुम सम और दयालु न दानी॥३३॥

जो सतगुरु सो दीक्षा पावे।
सो साधन को सफल बनावे॥३४॥

सुमिरन करे सुरूचि बड़भागी।
लहै मनोरथ गृही विरागी॥३५॥

अष्ट सिद्धि नवनिधि की दाता।
सब समर्थ गायत्री माता॥३६॥

ऋषि मुनि यती तपस्वी योगी।
आरत अर्थी चिन्तित भोगी॥३७॥

जो जो शरण तुम्हारी आवें।
सो सो मन वांछित फल पावें॥३८॥

बल बुधि विद्या शील स्वभाउ।
धन वैभव यश तेज उछाउ॥३९॥

सकल बढें उपजें सुख नाना।
जे यह पाठ करै धरि ध्याना॥४०॥

॥दोहा॥
यह चालीसा भक्तियुत पाठ करै जो कोई।
तापर कृपा प्रसन्नता गायत्री की होय॥

दुर्गा चालीसा

Gurga Chalisa
॥दुर्गा चालीसा॥


नमो नमो दुर्गे सुख करनी।
नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी॥१॥

निरंकार है ज्योति तुम्हारी।
तिहूँ लोक फैली उजियारी॥२॥

शशि ललाट मुख महाविशाला।
नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥३॥

रूप मातु को अधिक सुहावे।
दरश करत जन अति सुख पावे॥४॥

तुम संसार शक्ति लै कीना।
पालन हेतु अन्न धन दीना॥५॥

अन्नपूर्णा हुई जग पाला।
तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥६॥

प्रलयकाल सब नाशन हारी।
तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥७॥

शिव योगी तुम्हरे गुण गावें।
ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥८॥

रूप सरस्वती को तुम धारा।
दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥९॥

धरयो रूप नरसिंह को अम्बा।
परगट भई फाड़कर खम्बा॥१०॥

रक्षा करि प्रह्लाद बचायो।
हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥११॥

लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं।
श्री नारायण अंग समाहीं॥१२॥

क्षीरसिन्धु में करत विलासा।
दयासिन्धु दीजै मन आसा॥१३॥

हिंगलाज में तुम्हीं भवानी।
महिमा अमित न जात बखानी॥१४॥

मातंगी अरु धूमावति माता।
भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥१५॥

श्री भैरव तारा जग तारिणी।
छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥१६॥

केहरि वाहन सोह भवानी।
लांगुर वीर चलत अगवानी॥१७॥

कर में खप्पर खड्ग विराजै।
जाको देख काल डर भाजै॥१८॥

सोहै अस्त्र और त्रिशूला।
जाते उठत शत्रु हिय शूला॥१९॥

नगरकोट में तुम्हीं विराजत।
तिहुँलोक में डंका बाजत॥२०॥

शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे।
रक्तबीज शंखन संहारे॥२१॥

महिषासुर नृप अति अभिमानी।
जेहि अघ भार मही अकुलानी॥२२॥

रूप कराल कालिका धारा।
सेन सहित तुम तिहि संहारा॥२३॥

परी गाढ़ सन्तन पर जब जब।
भई सहाय मातु तुम तब तब॥२४॥

अमरपुरी अरु बासव लोका।
तब महिमा सब रहें अशोका॥२५॥

ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी।
तुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥२६॥

प्रेम भक्ति से जो यश गावें।
दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥२७॥

ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई।
जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई॥२८॥

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी।
योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥२९॥

शंकर आचारज तप कीनो।
काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥३०॥

निशिदिन ध्यान धरो शंकर को।
काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥३१॥

शक्ति रूप का मरम न पायो।
शक्ति गई तब मन पछितायो॥३२॥

शरणागत हुई कीर्ति बखानी।
जय जय जय जगदम्ब भवानी॥३३॥

भई प्रसन्न आदि जगदम्बा।
दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥३४॥

मोको मातु कष्ट अति घेरो।
तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥३५॥

आशा तृष्णा निपट सतावें।
मोह मदादिक सब बिनशावें॥३६॥

शत्रु नाश कीजै महारानी।
सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥३७॥

करो कृपा हे मातु दयाला।
ऋद्धि-सिद्धि दै करहु निहाला।३८॥

जब लगि जिऊँ दया फल पाऊँ।
तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ॥३९॥

श्री दुर्गा चालीसा जो कोई गावै।
सब सुख भोग परमपद पावै॥४०॥

दोहा:  देवीदास शरण निज जानी।
करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥

दुर्गा आरती

Durga Arti
॥दुर्गा आरती॥


जय अम्बे गौरी मैया जय श्यामा गौरी।
तुमको निसदिन ध्यावत हरि ब्रम्हा शिवरी॥१॥

मांग सिंदूर विराजत टीको मृगमदको।
उज्जवल से दोऊ नैना चन्द्रवदन नीको॥२॥

कनक समान कलेवर रक्ताम्बर राजे।
रक्त पुष्प गल माला कण्ठन पर साजे॥३॥

केहरि वाहन राजत खड्ग खप्पर धारी।
सुर नर मुनि जन सेवत तिनके दुःख हारी॥४॥

कानन कुंडल शोभित नासाग्रे मोती।
कोटिक चंद्र दिवाकर राजत सम ज्योति॥५॥

शुंभ निशंभु विदारे महिषासुरधाती।
धूम्रविलोचन नैना निशदिन मदमाती॥६॥

चण्ड मुण्ड संहारे शोणित बीज हरे।
मधु कैटभ दोउ मारे सुर भयहीन करे॥७॥

ब्रम्हाणी रुद्राणी तुम कमलारानी।
आगम निगम बखानी तुम शिव पटरानी॥८॥

चौसंठ योगिनी गावत नृत्य करत भैरुँ।
बाजत ताल मृदंगा अरु डमरुँ॥९॥

तुम ही जग की माता तुम ही हो भरता।
भक्तन की दुःखहर्ता सुख सम्पत्ति कर्ता॥१०॥

भुजा चार अति शोभित वर मुद्रा धारी।
मनवांच्छित फल पावे सेवत नर नारी॥११॥

कंचन थाल विराजत अगर कपुर बात्ती।
श्री माल केतु में राजत कोटि रतन ज्योती॥१२॥

या अम्बे जी की आरती जो कोई नर गाये।
कहत शिवानंद स्वामी सुख संपत्ति पाये॥१३॥

गुरु मंत्र

Guru Mantra
॥गुरु मंत्र॥

सद्द गुरु:- गुरु को भारतीय संस्कृति मे परमात्मा की दिव्य चेतना का अंश माना जाता है, जो साधक का मार्गदर्शन करता है ।


ॐ गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः, गुरुरेव महेश्वरः ।
गुरुरेव परब्रह्म, तस्मै श्रीगुरवे नमः॥

किसी भी प्रकार कि साधना/उपासना से पेहले गुरु मंत्र का उच्चारण करें । एसा करने से मंत्रो का प्रभाव कही गुना बढ जात है।

शास्त्रोक्त मन्त्र

Shastrokt Mantra
शास्त्रोक्त मन्त्र


विनायक : ॐ सिद्धि विनायकाय नमः .
सरस्वती : ॐ सरस्वत्यै नमः .
लक्ष्मी : ॐ महा लक्ष्म्यै नमः .
दुर्गा : ॐ दुर्गायै नमः .
विष्णु : ॐ श्री विष्णवे नमः . और ॐ नमो नारायणाय .
कृष्ण : ॐ श्री कृष्णाय नमः . और ॐ नमो भगवते वासुदेवाय .
राम : ॐ श्री रामचन्द्राय नमः .
नरसिंह : ॐ श्री नारसिंहाय नमः .
शिव : ॐ शिवाय नमः या ॐ नमः शिवाय .

महालक्ष्मी स्तुति

Maha Lakshamee Stuti/ Lakshami Stuti


॥महालक्ष्मी स्तुति॥

नमस्तेस्तु महामाये श्रीपीठे सुरपूजिते।
शङ्खचक्रगदाहस्ते महालक्षि्म नमोस्तु ते॥१॥

नमस्ते गरुडारूढे कोलासुरभयङ्करि।
सर्वपापहरे देवि महालक्षि्म नमोस्तु ते॥२॥

सर्वज्ञे सर्ववरदे सर्वदुष्टभयङ्करि।
सर्वदु:खहरे देवि महालक्षि्म नमोस्तु ते॥३॥

सिद्धिबुद्धिप्रदे देवि भुक्ति मुक्ति प्रदायिनि।
मन्त्रपूते सदा देवि महालक्षि्म नमोस्तु ते॥४॥

आद्यन्तरहिते देवि आद्यशक्ति महेश्वरि।
योगजे योगसम्भूते महालक्षि्म नमोस्तु ते॥५॥

स्थूलसूक्ष्ममहारौद्रे महाशक्ति महोदरे।
महापापहरे देवि महालक्षि्म नमोस्तु ते॥६॥

पद्मासनस्थिते देवि परब्रह्मस्वरूपिणि।
परमेशि जगन्मातर्महालक्षि्म नमोस्तु ते॥७॥

श्वेताम्बरधरे देवि नानालङ्कारभूषिते।
जगत्सि्थते जगन्मातर्महालक्षि्म नमोस्तु ते॥८॥

महालक्ष्म्यष्टकं स्तोत्रं य: पठेद्भक्ति मान्नर:।
सर्वसिद्धिमवापनेति राज्यं प्रापनेति सर्वदा॥९॥
एककाले पठेन्नित्यं महापापविनाशनम्।
द्विकालं य: पठेन्नित्यं धनधान्यसमन्वित:॥१०॥

त्रिकालं य: पठेन्नित्यं महाशत्रुविनाशनम्।
महालक्ष्मीर्भवेन्नित्यं प्रसन्ना वरदा शुभा॥११॥

सर्व ऐश्वर्य प्रद-लक्ष्मी-कवच

Sarv Ashvary prad lakshami kavach


सर्व ऐश्वर्य प्रद-लक्ष्मी-कवच

श्री मधुसूदन उवाच:-
गृहाण कवचम् शक्र सर्वदुःखविनाशनम्।
परमैश्वर्यजनकं सर्वशत्रुविमर्दनम्।।

ब्रह्मणे च पुरा दत्तम् संसारे च जलप्लुते।
यद् धृत्वा जगतां श्रेष्ठः सर्वैश्वर्ययुतो विधिः।।

बभूवुर्मनवः सर्वे सर्वैश्वर्ययुतो यतः।
सर्वैश्वर्यप्रदस्यास्य कवचस्य ऋषिर्विधि।।

पङ्क्तिश्छन्दश्च सा देवी स्वय पद्मालया सुर।
सिद्धैश्वर्यजपेष्वेव विनियोगः प्रकीर्तित।।

यद् धृत्वा कवचं लोकः सर्वत्र विजयी भवेत्।।

।।मूल कवच पाठ।।

मस्तकम् पातु मे पद्मा कण्ठं पातु हरिप्रिया।
नासिकाम् पातु मे लक्ष्मीः कमला पातु लोचनम्।।

केशान् केशवकान्ता च कपालम् कमलालया।
जगत्प्रसूर्गण्डयुग्मं स्कन्धं सम्पत्प्रदा सदा।।

ॐ श्रीं कमलवासिन्यै स्वाहा पृष्ठं सदावतु।
ॐ श्रीं पद्मालयायै स्वाहा वक्षः सदावतु।।

पातु श्रीर्मम कंकालं बाहुयुग्मं च ते नमः।।

ॐ ह्रीं श्रीं लक्ष्म्यै नमः पादौ पातु मे संततम् चिरम्।
ॐ ह्रीं श्रीं नमः पद्मायै स्वाहा पातु नितम्बकम्।।

ॐ श्रीं महालक्ष्म्यै स्वाहा सर्वांगं पातु मे सदा।
ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै स्वाहा मां पातु सर्वतः।।

इस  मंत्र के पाठ से मां महालक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है।

शनिवार, दिसंबर 05, 2009

शिव तांडव स्तोत्र

Shiv Tandav Stotr
॥शिव तांडव स्तोत्र॥


जटाटवीग लज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेऽवलम्ब्यलम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्‌।
डमड्डमड्डमड्डम न्निनादवड्डमर्वयं चकार चंडतांडवं तनोतु नः शिवः शिवम ॥१॥

जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिंपनिर्झरी । विलोलवी चिवल्लरी विराजमानमूर्धनि ।
धगद्धगद्ध गज्ज्वलल्ललाट पट्टपावके किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं ॥२॥

धरा धरेंद्र नंदिनी विलास बंधुवंधुर- स्फुरदृगंत संतति प्रमोद मानमानसे ।
कृपाकटा क्षधारणी निरुद्धदुर्धरापदि कवचिद्विगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥३॥

जटा भुजं गपिंगल स्फुरत्फणामणिप्रभा- कदंबकुंकुम द्रवप्रलिप्त दिग्वधूमुखे ।
मदांध सिंधु रस्फुरत्वगुत्तरीयमेदुरे मनो विनोदद्भुतं बिंभर्तु भूतभर्तरि ॥४॥

सहस्र लोचन प्रभृत्य शेषलेखशेखर- प्रसून धूलिधोरणी विधूसरांघ्रिपीठभूः ।
भुजंगराज मालया निबद्धजाटजूटकः श्रिये चिराय जायतां चकोर बंधुशेखरः ॥५॥

ललाट चत्वरज्वलद्धनंजयस्फुरिगभा- निपीतपंचसायकं निमन्निलिंपनायम्‌ ।
सुधा मयुख लेखया विराजमानशेखरं महा कपालि संपदे शिरोजयालमस्तू नः ॥६॥

कराल भाल पट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल- द्धनंजया धरीकृतप्रचंडपंचसायके ।
धराधरेंद्र नंदिनी कुचाग्रचित्रपत्रक- प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने मतिर्मम ॥७॥

नवीन मेघ मंडली निरुद्धदुर्धरस्फुर- त्कुहु निशीथिनीतमः प्रबंधबंधुकंधरः ।
निलिम्पनिर्झरि धरस्तनोतु कृत्ति सिंधुरः कलानिधानबंधुरः श्रियं जगंद्धुरंधरः ॥८॥

प्रफुल्ल नील पंकज प्रपंचकालिमच्छटा- विडंबि कंठकंध रारुचि प्रबंधकंधरम्‌
स्मरच्छिदं पुरच्छिंद भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छिदांधकच्छिदं तमंतकच्छिदं भजे ॥९॥

अगर्वसर्वमंगला कलाकदम्बमंजरी- रसप्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम्‌ ।
स्मरांतकं पुरातकं भावंतकं मखांतकं गजांतकांधकांतकं तमंतकांतकं भजे ॥१०॥

जयत्वदभ्रविभ्रम भ्रमद्भुजंगमस्फुर- द्धगद्धगद्वि निर्गमत्कराल भाल हव्यवाट्-
धिमिद्धिमिद्धिमि नन्मृदंगतुंगमंगल- ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्ड ताण्डवः शिवः ॥११॥

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजंग मौक्तिकमस्रजो- र्गरिष्ठरत्नलोष्टयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।
तृणारविंदचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समं प्रवर्तयन्मनः कदा सदाशिवं भजे ॥१२॥

कदा निलिंपनिर्झरी निकुजकोटरे वसन्‌ विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरःस्थमंजलिं वहन्‌ ।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन्‌ कदा सुखी भवाम्यहम्‌ ॥१३॥

निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका- निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः ।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं परिश्रय परं पदं तदंगजत्विषां चयः ॥१४॥

प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना ।
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्‌ ॥१५॥

इमं हि नित्यमेव मुक्तमुक्तमोत्तम स्तवं पठन्स्मरन्‌ ब्रुवन्नरो विशुद्धमेति संततम्‌ ।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नांयथा गतिं विमोहनं हि देहना तु शंकरस्य चिंतनम ॥१६॥

पूजाऽवसानसमये दशवक्रत्रगीतं यः शम्भूपूजनमिदं पठति प्रदोषे ।
तस्य स्थिरां रथगजेंद्रतुरंगयुक्तां लक्ष्मी सदैव सुमुखीं प्रददाति शम्भुः ॥१७॥

महामृत्युंजय मंत्र

Mahamrutyunjay Mantra
महामृत्युंजय मंत्र
महामृत्युंजय मंत्र का जप आवश्यकता के अनुरूप होते हैं। अलग-अलग उद्देश्य के लिये अलग-अलग मंत्रों का प्रयोग होता है। मंत्र में दिए अक्षरों एवं उसकी संख्या के अनुरुप से उसके प्रभाग मे बदलाव आते है। यह मंत्र निम्न प्रकार से है-

एकाक्षरी मंत्र- हौं । (एक अक्षर का मंत्र)

त्र्यक्षरी मंत्र- ॐ जूं सः । (तीन अक्षर का मंत्र)

चतुरक्षरी मंत्र- ॐ वं जूं सः। (चार अक्षर का मंत्र)

नवाक्षरी मंत्र- ॐ जूं सः पालय पालय। (नव अक्षर का मंत्र)

दशाक्षरी मंत्र- ॐ जूं सः मां पालय पालय। (दश अक्षर का मंत्र)

(स्वयं के लिए इस मंत्र का जप इसी तरह होगा। यदि किसी अन्य व्यक्ति के लिए यह जप किया जा रहा हो तो 'मां' के स्थान पर उस व्यक्ति का नाम लेना होगा)

महामृत्युंजय का वेदोक्त मंत्र निम्नलिखित है-

त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌॥

इस मंत्र में द्वात्रिंशाक्षरी (32 अक्षर का मंत्र) का प्रयोग हुआ है और इसी मंत्र में ॐ' लगा देने से 33 शब्द हो जाते हैं। इसे 'त्र्यत्रिंशाक्षरी या तैंतीस अक्षरी मंत्र कहते हैं। श्री वशिष्ठजी ने इन 33 शब्दों के 33 देवता समाहित है अर्थात्‌ शक्तियाँ निश्चित की हैं जो कि निम्नलिखित हैं।

इस मंत्र में
8 वसु,
11 रुद्र,
12 आदित्य
1 प्रजापति तथा
1 वषट को माना है।

मंत्र उच्चारण विचार :

इस मंत्र में आए प्रत्येक शब्द का उच्चारण स्पष्ट करना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि स्पष्ट शब्द उच्चारण मे ही मंत्र है। इस मंत्र में उल्लेखित प्रत्येक शब्द अपने आप में एक संपूर्ण बीज मंत्र का अर्थ लिए हुए है।

गणेश आरति

Ganesh Aarti
॥श्री गणेश आरति॥

जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा.
माता जाकी पारवती पिता महादेवा॥ जय गणेश.....

एकदन्त दयावन्त चारभुजाधारी
माथे पर तिलक सोहे मूसे की सवारी॥ जय गणेश.....

पान चढ़े फल चढ़े और चढ़े मेवा
लड्डुअन का भोग लगे सन्त करें सेवा॥ जय गणेश.....

अंधे को आँख देत कोढ़िन को काया
बाँझन को पुत्र देत निर्धन को माया॥ जय गणेश.....

' सूर' श्याम शरण आए सफल कीजे सेवा
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा॥ जय गणेश.....

गणपति अथर्वशीर्ष

Ganpati Atharvsheersh
।।गणपति अथर्वशीर्ष।।

ॐ नमस्ते गणपतये। त्वमेव प्रत्यक्षं तत्वमसि । त्वमेव केवलं कर्ता सि। त्वमेव केवलं धर्तासि। त्वमेव केवलं हर्तासि । त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि। त्व साक्षादात्मासि नित्यम्। ऋतं वच्मि। सत्यं वच्मि। अव त्व मांम्। अव वक्तारम्। अव श्रोतारम्। अव दातारम्। अव धातारम्। अवा नूचानमव शिष्यम्।अव पश्चातात्।अव पुरस्तात्। अवोत्तरात्तात्। अव दक्षिणात्तात्।

अव चोर्ध्वात्तात्। अवाधरात्तात्। सर्वतो माँ पाहि-पाहि समंतात्। त्वं वाङ्‍मय स्त्वं चिन्मयः। त्वमानंदमसयस्त्वं ब्रह्ममयः। त्वं सच्चिदानंदात् द्वितीयोसि। त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि। त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोसि। सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते। सर्वं जगदिदं त्वत्त स्तिष्ठति। सर्वं जगदिदं त्वयि वयमेष्यति। सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति। त्वं भूमिरापोनलो निलो नभः। त्वं चत्वारि वाकूपदानि। त्वं गुणत्रयातीत: त्वमवस्थात्रयातीतः। त्वं देहत्रयातीतः। त्वं कालत्रयातीतः। त्वं मूलाधार स्थितोसि नित्यं। त्वं शक्ति त्रयात्मकः। त्वां योगिनो ध्यायंति नित्यं। त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रूद्रस्त्वं इंद्रस्त्वं अग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चंद्रमास्त्वं ब्रह्मभूर्भुव:स्वरोम्।

गणादि पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनंतरम्। अनुस्वार: परतरः। अर्धेन्दुलसितम्। तारेण ऋद्धं। एतत्तव मनुस्व रूपम्। गकार: पूर्वरूपम्। अकारो मध्यमरूपम्। अनुस्वारश्चान्त्यरूपम्। बिन्दुरूत्तररूपम्। नाद: संधानम्। सँ हितासंधि: सैषा गणेश विद्या। गणकऋषि: निचृद्गायत्रीच्छंदः। गणपतिर्देवता। ॐ गं गणपतये नमः।एकदंताय विद्‍महे। वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दंती प्रचोदयात्। एकदंतं चतुर्हस्तं पाशमंकुश धारिणम्। रदं च वरदं हस्तै र्विभ्राणं मूषकध्वजम्। रक्तं लंबोदरं शूर्प कर्णकं रक्तवाससम्। रक्तगंधानु लिप्तांगं रक्तपुष्पै: सुपुजितम्। भक्तानुकंपिनं देवं जगत्कारण मच्युतम्। आविर्भूतं च सृष्टयादौ प्रकृ‍ते पुरुषात्परम्। एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वरः।

नमो व्रातपतये। नमो गणपतये। नम: प्रमथपतये। नमस्ते अस्तु लंबोदरायै एकदंताय। विघ्ननाशिने शिवसुताय। श्रीवरदमूर्तये नमो नमः। एतदथर्व शीर्ष योधीते। स ब्रह्म भूयाय कल्पते। स सर्व विघ्नैर्नबाध्यते। स सर्वत: सुखमेधते। स पच्चमहापापात्प्रमुच्यते। सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति। प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति। सायं प्रात: प्रयुंजानो अपापो भवति। सर्वत्राधीयानो ड पविघ्नो भवति। धर्मार्थकाममोक्षं च विंदति। इदमथर्वशीर्षमशिष्याय न देयम्। यो यदि मोहात् दास्यति स पापीयान् भवति। सहस्रावर्तनात् यं यं काममधीते तंतमनेन साधयेत्। अनेन गणपति मभिषिंचति स वाग्मी भवति । चतुर्थ्यामनश्र्नन जपति स विद्यावान भवति। इत्यथर्वण वाक्यम्। ब्रह्माद्यावरणं विद्यात् न बिभेति कदाचनेति। यो दूर्वांकुरैंर्यजति स वैश्रवणोपमो भवति। यो लाजैर्यजति स यशोवान भवति स मेधावान भवति। यो मोदक सहस्रेण यजति स वांछित फल मवाप्रोति। य: साज्यसमिद्भि र्यजति स सर्वं लभते स सर्वं लभते। अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा सूर्य वर्चस्वी भवति। सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमा संनिधौ वा जप्त्वा सिद्धमंत्रों भवति। महाविघ्नात् प्रमुच्यते। महादोषात् प्रमुच्यते। महापापात् प्रमुच्यते। स सर्वविद्‍ भवति से सर्वविद्‍ भवति । य एवं वेद इत्युपनिषद्‍।

॥इति श्री गणपति अथर्वशीर्ष सम्पुर्ण ॥

गणेश पंच्चरत्नम्

Ganesh Panchcharatnam


।। श्री गणेशाय नमः।।

॥गणेश पंच्चरत्नम्॥
मुदा करात्तमोदकम् सदा विमुक्तिसाधकम्
कलाधरावतम्सकम् विलासिलोकरक्षकम्।
अनायकैक नायकम् विनाशितेभदैत्यकम्
नताशुभाशुनाशकम् नमामि तम् विनायकम् ॥१॥

नतेतरातिभीकरम् नवोदितार्कभास्वरम्
नमत्सुरारिनिर्जरम् नताधिकापदुद्वरम्।
सुरेश्वरम् निधीश्वरम् गजेश्वरम् गणेश्वरम्
महेश्वरम् तमाश्रये परात्परम् निरन्तरम् ॥२॥

समस्तलोकशङ्करम् निरस्तदैत्यकुञ्जरम्
दरेतरोदरम् वरम् वरेभवक्त्रमक्षरम्।
कृपाकरम् क्षमाकरम् मुदाकरम् यशस्करम्
मनस्करम् नमस्कृतां नमस्करोमि भास्वरम् ॥३॥

अकिञ्चनार्तिमार्जनं चिरन्तनोक्ति भाजनम्
पुरारिपूर्वनन्दनम् सुरारिगर्वचर्वणम्।
प्रपञ्चनाशभीषणम् धनञ्जयादि भूषणम्
कपोलदानवारणम् भजे पुराणवारणम् ॥४॥

नितान्तकान्त दन्तकान्ति मन्तकान्तकात्मजम्
अचिन्त्यरूप मन्तहीन मन्तराय कृन्तनम्।
हृदन्तरे निरन्तरम् वसन्तमेव योगिनाम्
तमेकदन्तमेव तम् विचिन्तयामि सन्ततम् ॥५॥

महागणेश पंच्चरत्नमादरेण योन्वहम्
प्रजल्पति प्रभातके हृदिस्मरन्गणेश्वरम्।
अरोगतामदोषतां सुसाहितीं सुपुत्रतां
समाहितायुरष्टभूतिमभ्युपैति सोचिरात् ॥६॥

॥इति श्री गणेश पंच्चरत्नम् सम्पुर्ण॥

गणेश द्वादश नामस्तोत्रम्

Ganesh Dwadasha name Strotram
।। श्री गणेशाय नमः।

॥गणेशद्वादशनामस्तोत्रम्।।

शुक्लांम्बरधरम् देवम् शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनम् ध्यायेत्सर्वविघ्नोपशांतये ।।१।।

अभीप्सितार्थसिद्ध्यर्थं पूजेतो य: सुरासुरैः।
सर्वविघ्नहरस्तस्मै गणाधिपतये नमः।।२।।

गणानामधिपश्चण्डो गजवक्त्रस्त्रिलोचनः।
प्रसन्न भव मे नित्यम् वरदातर्विनायक ।।३।।

सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णक:
लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः।।४।।

धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचंद्रो गजाननः।
द्वादशैतानि नामानि गणेशस्य य: पठेत् ।। ५ ।।

विद्यार्थी लभते विद्याम् धनार्थी विपुलम् धनम् ।
इष्टकामम् तु कामार्थी धर्मार्थी मोक्षमक्षयम् ।। ६ ।।

विद्यारभ्मे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा
संग्रामे संकटेश्चैव विघ्नस्तस्य न जायते ।। ७ ।।

॥इति श्री गणेशद्वादशनाम स्तोत्रम् सम्पुर्ण॥

संकष्टहरणं गणेशाष्टकम्‌

Sankashta haranam Ganeshashtakam


॥ संकष्टहरणं गणेशाष्टकम्‌ ॥

ॐ अस्य श्री संकष्टहरणस्तोत्रमन्त्रस्य श्रीमहागणपतिर्देवता, संकष्टहरणार्थ जपे विनियोगः।

ॐ ॐ ॐ काररूपम्‌ त्र्यहमिति च परम्‌ यत्स्वरूपम्‌ तुरीयम्‌
त्रैगुण्यातीतनीलं कलयति मनसस्तेज-सिन्दूर-मूर्तिम्‌।
योगीन्द्रैर्ब्रह्मरन्ध्रैः सकल-गुणमयं श्रीहरेन्द्रेणसंगं
गं गं गं गं गणेशं गजमुखमभितो व्यापकं चिन्तयन्ति ॥१॥

वं वं वं विघ्नराजं भजति निजभुजे दक्षिणे न्यस्तशुण्डं
क्रं क्रं क्रं क्रोधमुद्रा-दलित-रिपुबलं कल्पवृक्षस्य मूले।
दं दं दं दन्तमेकं दधति मुनिमुखं कामधेन्वा निषेव्यम्‌
धं धं धं धारयन्तं धनदमतिघियं सिद्धि-बुद्धि-द्वितीयम्‌ ॥२॥

तुं तुं तुं तुंगरूपं गगनपथि गतं व्याप्नुवन्तं दिगन्तान्‌
क्लीं क्लीं क्लींकारनाथं गलितमदमिलल्लोल-मत्तालिमालम्‌।
ह्रीं ह्रीं ह्रींकारपिंगं सकलमुनिवर-ध्येयमुण्डं च शुण्डं
श्रीं श्रीं श्रीं श्रीं श्रयन्तं निखिल-निधिकुलं नौमि हेरम्बबिम्बम्‌ ॥३॥

लौं लौं लौंकारमाद्यं प्रणवमिव पदं मन्त्रमुक्तावलीनाम्‌
शुद्धं विघ्नेशबीजं शशिकरसदृशं योगिनां ध्यानगम्यम्‌।
डं डं डं डामरूपं दलितभवभयं सूर्यकोटिप्रकाशम्‌
यं यं यं यज्ञनाथं जपति मुनिवरो बाह्यमभ्यन्तरं च ॥४॥

हुं हुं हुं हेमवर्णं श्रुति-गणितगुणं शूर्पकणं कृपालुं
ध्येयं सूर्यस्य बिम्बं ह्युरसि च विलसत्‌ सर्पयज्ञोपवीतम्‌।
स्वाहाहुंफट् नमोन्तैष्ठ-ठठठ-सहितैः पल्लवैः सेव्यमानम्‌
मन्त्राणां सप्तकोटि-प्रगुणित-महिमाधारमोशं प्रपद्ये ॥५॥

पूर्वं पीठं त्रिकोणं तदुपरि रुचिरं षट्कपत्रं पवित्रम्‌
यस्योर्ध्वं शुद्धरेखा वसुदलकमलं वो स्वतेजश्चतुस्रम्‌।
मध्ये हुंकारबीजं तदनु भगवतः स्वांगषट्कं षडस्रे
अष्टौ शक्तीश्च सिद्धीर्बहुलगणपतिर्विष्टरश्चाष्टकं च ॥६॥

धर्माद्यष्टौ प्रसिद्धा दशदिशि विदिता वा ध्वजाल्यः कपालं
तस्य क्षेत्रादिनाथं मुनिकुलमखिलं मन्त्रमुद्रामहेशम्‌।
एवं यो भक्तियुक्तो जपति गणपतिं पुष्प-धूपा-
क्षताद्यैर्नैवेद्यैर्मोदकानां स्तुतियुत-विलसद्-गीतवादित्र-नादैः ॥७॥

राजानस्तस्य भृत्या इव युवतिकुलं दासवत्‌सर्वदास्ते
लक्ष्मीः सर्वांगयुक्ता श्रयति च सदनं किंकराः सर्वलोकाः।
पुत्राः पुत्र्यः पवित्रा रणभूवि विजयी द्यूतवादेपि वीरो
यस्येशो विघ्नराजो निवसति हृदये भक्तिभाग्यस्य रुद्रः ॥८॥

॥ इति श्री संकष्टहरणं गणेशाष्टकं सम्पूर्णम्‌ ॥

संकटनाशन गणेश स्तोत्रम्

Sankat Nashak Ganesh Strotram

संकटनाशन गणेश स्तोत्रम् का प्रति दिन पाठ करने से समस्त प्रकार के संकटोका नाश होता है, श्री गणेशजी कि कृपा एवं सुख समृद्धि कि प्राप्त होती है।




वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ ।
निर्विघ्नम् कुरु में देव सर्व कार्येषु सर्वदा ॥


विघ्नेश्वराय वरदाय सूरप्रियाय लम्बोदराय सकलाय जगद्विताय ।
नागाननाय श्रुतियज्ञ विभूषिताय गौरीसुताय गणनाथ नमोनमस्ते ॥

॥संकटनाशन गणेशस्तोत्रम्॥

प्रणम्य शिरसा देवं गौरीपुंत्र विनायकम्
भक्तावासं स्मरे नित्यं आयुकामार्थसिद्धये ॥ १ ॥


प्रथमं वक्रतुंडं च एकदंतं द्वितियकम्
तृतीयं कृष्णपिंगाक्षं गजवकत्रं चतुर्थकम् ॥ २ ॥


लंबोदरं पंचमं च षष्टमं विकटमेव च
सप्तमं विघ्नराजं च धूम्रवर्णं तथाअष्टकम् ॥ ३ ॥


नवं भालचंद्रं च दशमं तु विनायकम्
एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम् ॥ ४ ॥


द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्यं य: पठेन्नर:
न च विघ्नभयं तस्य सर्व सिद्धि करं प्रभो ॥ ५ ॥


विद्यार्थि लभते विद्यां धनार्थि लभते धनम्
पुत्रार्थि लभते पुत्रांमोक्षार्थि लभते गतिम् ॥ ६ ॥


जपेत्गणपतिस्तोत्रं षडभिमासै: फलं लभेत
संवतसरेणसिद्धिं च लभते नात्रसंशयः ॥ ७ ॥


अष्टभ्योब्राह्मणोभ्यस्य लिखित्वा य: समर्पयेत्
तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादतः ॥ ८ ॥

॥ इतिश्री नारदपुराणे ‘संकटनाशन गणेशस्तोत्रम्’ संपूर्णम् ॥

शुक्रवार, दिसंबर 04, 2009

नवग्रह स्तोत्रम

Navgrah Strotram नबग्रह स्तोत्रम


||नवग्रह स्तोत्रम||
ब्रह्मा मुरारी त्रिपुरान्तकारी भानु शशि भूमि सुतो बुधश्च

गुरुश्च शुक्रः शनि राहु केतवः सर्वे ग्रहाः शान्तिकराः भवन्तु ....

नियमित रुइ से नव ग्रह स्तोत्र के पाठ से नव ग्रहों की अशुभता दुर होकर शुभता प्राप्त होती है।

गुरु पुष्य योग

Guru Pushya Yoga/Guru Pushyaamrut Yoga

गुरु पुष्य योग/पुष्यामृत योग
हर दिन बदलने वाले नक्षत्र मे पुष्य नक्षत्र भी सामिल है,एवं अन्दाज से हर २७वें दिन पुष्य नक्षत्र होता है। यह जिस वार को आता है, इसका नाम भी उसी प्रकार रखा जाता है।

इसी प्रकार गुरुवार को पुष्य नक्षत्र होने से गुरु पुष्य योग कहाजात है।
गुरु पुष्य योग में विद्वान ज्योतिषियो का कहना हैं कि पुष्य नक्षत्र में धन प्राप्ति, चांदी, सोना, नये वाहन, बही-खातों की खरीदारी एवं गुरु ग्रह से संबंधित वस्तुए अत्याधिक लाभ प्रदान करती है।

• इस दिन की गई खरीदारी अधिक समय तक स्थायी और समृद्धि प्रदान करती है।
• इस दिन की गई सुवर्ण अथवा गुरु ग्रह से संबंधित वस्तुए अत्याधिक लाभ प्रदान करती है। पीला पखराज धारण करना इस दिन अत्यन्त शुभ फलदायी मानगया है।
• इस दिन की गई सुवर्ण अथवा गुरु ग्रह से संबंधित वस्तुए अत्याधिक लाभ प्रदान करती है। पीला पखराज धारण करना इस दिन अत्यन्त शुभ फलदायी मानगया है।
• इस दिन की गई भूमि व जमीन आदि की खरीदी विशेष फलदायी होती है।

बुधवार, दिसंबर 02, 2009

श्री हनुमत् स्तवन

Hanumant Stavan

||  श्री हनुमत् स्तवन ||


प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानघन।
जासु ह्रदय आगार बसहिं राम सर चाप धर॥१॥

अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं।
दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्॥२॥

सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं।
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥३॥

गोष्पदीकृतवारीशं मशकीकृतराक्षसम्।
रामायणमहामालारत्नं वन्देऽनिलात्मजम्॥४॥

अञ्जनानन्दनं वीरं जानकीशोकनाशनम्।
कपीशमक्षहन्तारं वन्दे लङ्काभयङ्करम्॥५॥

महाव्याकरणाम्भोधिमन्थमानसमन्दरम्।
कवयन्तं रामकीर्त्या हनुमन्तमुपास्महे॥६॥

उल्लङ्घ्य सिन्धोः सलिलं सलीलं यः शोकवह्निं जनकात्मजायाः।
आदाय तेनैव ददाह लङ्कां नमामि तं प्राञ्जलिराञ्जनेयम्॥७॥

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये॥८॥

आञ्जनेयमतिपाटलाननं काञ्चनाद्रिकमनीयविग्रहम्।
पारिजाततरुमूलवासिनं भावयामि पवमाननन्दनम्॥९॥

यत्र-यत्र रघुनाथकीर्तनं तत्र-तत्र कृतमस्तकाञ्जलिम्।
बाष्पवारिपरिपूर्णलोचनं मारुतिं नमत राक्षसान्तकम्॥१०॥

हनुमान आरती

Hanuman Aarti
||  हनुमान आरती ||


आरती कीजै हनुमान लला की। दुष्टदलन रघुनाथ कला की॥१॥
जाके बल से गिरिवर काँपै। रोग-दोष जाके निकट न झाँपै॥२॥
अंजनि पुत्र महा बलदाई। संतन के प्रभु सदा सहाई॥३॥
दे बीरा रघुनाथ पठाये। लंका जारि सीय सुधि लाये॥४॥
लंका सो कोट समुद्र सी खाई। जात पवनसुत बार न लाई॥५॥
लंका जारि असुर सँहारे। सियारामजी के काज सँवारे॥६॥
लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे। आनि सजीवन प्रान उबारे॥७॥
पैठि पताल तोरि जम-कारे। अहिरावन की भुजा उखारे॥८॥
बायें भुजा असुर दल मारे। दहिने भुजा संतजन तारे॥९॥
सुर नर मुनि आरती उतारे। जै जै जै हनुमान उचारे॥१०॥
कंचन थार कपूर लौ छाई। आरति करत अंजना माई॥११॥
जो हनुमान जी की आरती गावै। बसि बैकुण्ठ परमपद पावै॥१२॥

||  इति श्री हनुमान चालीसा सम्पूर्ण ||

संकट मोचन हनुमानाष्टक

sankat Mochan Hanumaan Ashtak
||  संकट मोचन हनुमानाष्टक ||

बाल समय रबि भक्षि लियो तब तीनहुँ लोक भयो अँधियारो।
ताहि सों त्रास भयो जग को यह संकट काहु सों जात न टारो।
देवन आनि करी बिनती तब छाँड़ि दियो रबि कष्ट निवारो।
को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥१॥

बालि की त्रास कपीस बसै गिरि जात महाप्रभु पंथ निहारो।
चौंकि महा मुनि साप दियो तब चाहिय कौन बिचार बिचारो।
कै द्विज रूप लिवाय महाप्रभु सो तुम दास के सोक निवारो।
को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥२॥

अंगद के सँग लेन गये सिय खोज कपीस यह बैन उचारो।
जीवत ना बचिहौ हम सो जु बिना सुधि लाए इहाँ पगु धारो।
हेरि थके तट सिंधु सबै तब लाय सिया-सुधि प्रान उबारो।
को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥३॥

रावन त्रास दई सिय को सब राक्षसि सों कहि सोक निवारो।
ताहि समय हनुमान महाप्रभु जाय महा रजनीचर मारो।
चाहत सीय असोक सों आगि सु दै प्रभु मुद्रिका सोक निवारो।
को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥४॥

बान लग्यो उर लछिमन के तब प्रान तजे सुत रावन मारो।
लै गृह बैद्य सुषेन समेत तबै गिरि द्रोन सु बीर उपारो।
आनि सजीवन हाथ दई तब लछिमन के तुम प्रान उबारो।
को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥५॥

रावन जुद्ध अजान कियो तब नाग कि फाँस सबै सिर डारो।
श्रीरघुनाथ समेत सबै दल मोह भयो यह संकट भारो।
आनि खगेस तबै हनुमान जु बंधन काटि सुत्रास निवारो।
को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥६॥

बंधु समेत जबै अहिरावन लै रघुनाथ पताल सिधारो।
देबिहिं पूजि भली बिधि सों बलि देउ सबै मिलि मंत्र बिचारो।
जाय सहाय भयो तब ही अहिरावन सैन्य समेत सँहारो।
को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥७॥

काज कियो बड़ देवन के तुम बीर महाप्रभु देखि बिचारो।
कौन सो संकट मोर गरीब को जो तुमसों नहिं जात है टारो।
बेगि हरो हनुमान महाप्रभु जो कुछ संकट होय हमारो।
को नहिं जानत है जग में कपि संकटमोचन नाम तिहारो॥८॥

||  दोहा ||
लाल देह लाली लसे अरू धरि लाल लँगूर।
बज्र देह दानव दलन जय जय जय कपि सूर॥

||  इति संकटमोचन हनुमानाष्टक सम्पूर्ण ||