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शुक्रवार, मार्च 26, 2010

प्रदोष व्रत का महत्व

Pradosh Vrat ka Mahatva,

प्रदोष व्रत का महत्व

प्रदोष व्रत हर महीने में दो बार शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी  को प्रदोष व्रत कहते हैं। यदि इन तिथियों को सोमवार होतो उसे सोम प्रदोष व्रत कहते हैं, यदि मंगल वार होतो उसे भौम प्रदोष व्रत कहते हैं और शनिवार होतो उसे शनि प्रदोष व्रत व्रत कहते हैं। विशेष कर सोमवार, मंगलवार एवं शनिवार के प्रदोष व्रत अत्याधिक प्रभावकारी माने गये हैं। साधारण तौर पर अलग-अलग जगह पर द्वाद्वशी और त्रयोदशी की तिथि को प्रदोष तिथि कहते हैं। इस दिन व्रत रखने का विधान हैं।

प्रदोष व्रत का महत्व कुछ इस प्रकार का बताया गया हैं कि यदि व्यक्ति को सभी तरह के जप, तप और नियम संयम के बाद भी यदि उसके गृहस्थ जीवन में दुःख, संकट, क्लेश आर्थिक परेशानि, पारिवारिक कलह, संतानहीनता या संतान के जन्म के बाद भी यदि नाना प्रकार के कष्ट विघ्न बाधाएं, रोजगार के साथ सांसारिक जीवन से परेशानिया खत्म नहीं हो रही हैं, तो उस व्यक्ति के लिए प्रति माह में पड़ने वाले प्रदोष व्रत पर जप, दान, व्रत इत्यादि पूण्य कार्य करना शुभ फलप्रद होता हैं।

ज्योतिष कि द्रष्टि से जो व्यक्ति चंद्रमा के कारण पीडित हो उसे वर्ष भर प्रदोष व्रतों पर चहे वह किसी भी वारको पडता हो उसे प्रदोष व्रत अवश्य करना चाहिये। प्रदोष व्रतों पर उपवास रखना, लोहा, तिल, काली उड़द, शकरकंद, मूली, कंबल, जूता और कोयला आदि दान करने से शनि का प्रकोप भी शांत हो जाता हैं, जिस्से व्यक्ति के रोग, व्याधि, दरिद्रता, घर कि अशांति, नौकरी या व्यापार में परेशानी आदि का स्वतः निवारण हो जाएगा।

भौम प्रदोष व्रत एवं शनि प्रदोष व्रत के दिन शिवजी, हनुमानजी, भैरव कि पूजा-अर्चना करना भी लाभप्रद होता हैं।

गुरुवार के दिन पडने वाला प्रदोष व्रत विशेष कर पुत्र कामना हेतु या संतान के शुभ हेतु रखना उत्तम होता हैं। संतानहीन दंपत्तियों के लिए इस व्रत पर घरमें मिष्ठान या फल इत्यादि गाय को खिलाने से शीघ्र शुभ फलकी प्राप्ति होति हैं। संतान कि कामना हेतु 16 प्रदोष व्रत करने का विधान हैं, एवं संतान बाधा में शनि प्रदोष व्रत सबसे उत्तम मनागया हैं।

संतान कि कामना हेतु प्रदोष व्रत के दिन पति-पत्नी दोनो प्रातः स्नान इत्यादि नित्य कर्म से निवृत होकर शिव, पार्वती और गणेशजी कि एक साथमें आराधना कर किसी भी शिव मंदिर में जाकर शिवलिंग पर जल भिषेक, पीपल के मूल में जल चढ़ाकर सारे दिन निर्जल रहने का विधान हैं।



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गुरुवार, मार्च 25, 2010

रत्न एवं रंगों द्वारा रोग निवारण भाग:-२

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रत्न एवं रंगों द्वारा रोग निवारण भाग:-२ 

हमारे आस पास के माहोल मे इन रंगों के होने से ही हम अपने अंगों द्वारा स्पर्श, सूंघने, स्वाद, दृष्टि और आवाज का आभास प्राप्त करते हैं। इसी वजह से हम नाक से केवल सूंघ सकते हैं, देख नहीं सकते या स्वाद नहीं ले सकते। ऐसा इसलिए होता हैं क्योकि खुशबू और बदबू को केवल नाक ग्रहन कर स्कती हैं क्योकि वह हरे रंग से प्रभावित हैं एवं वह केवल हरे रंग को ही ग्रहण करती हैं, बाकी को नहीं कर सकती। इसी लिये हरे रंग को खुशबू और बदबू जेसी सूंघने कि शक्ति के साथ में संबंध होता हैं।

इसी प्रकार सही रोग का अनुसंधान कर सही रंगोका चुनाव कर व्यक्ति निश्चित लाभा उठा सकते हैं इस मे कोइ दो राइ नहीं हो सकती।

मनुष्य के शरीर मे उत्पन्न होने वाले त्रिदोष भी इसी प्रकार सात रंगों के कारण पैदा होते हैं। आयुर्वेद में वायु दोष वायु तत्व नीले और जामुनी रंग से उतपन्न होती हैं। पित्त अग्नि तत्व के लाल रंग से उतपन्न होता हैं। कफ जल तत्व के केसरी या नारंगी से उतपन्न होता हैं। पृथ्वी तत्व हरे रंग से उतपन्न होता हैं।

पृथ्वी तत्व का प्रतिनिधित्व करने वाला हरा रंग बाकि सब रंगो में सबसे ठंडा होता है। इसी लिए हमे किसी पेड़ या हरे रंग छपरे के नीचे होने से हमे कम गरमी लगती हैं। शायद इसी अनुसंधान के से आजकल प्लस्टिक के हरें रंगके छपरे या प्लास्टिक प्लेट (ग्रीन इफेक्ट) वाली चद्दर कि बिक्री जोरो पर हैं।

इस लिये मानव शरीर को गरम-ठंडा रख कर और सही रंगों की पेहचान कर मानव शरीर में प्रवाहित कर दिया जाये तो व्यक्ति सदैव निरोग रेह सकता हैं। क्योकि जन शरीर में गरमी एवं ठंडी का संतुलन खराब होजाता हैं तभी शरीरमे त्रिदोष उत्पन्न होते हैं जिसे हम विस्तान में वायु, पित्त और कफ के नाम से जानते हैं। वायु, पित्त और कफ कि उत्पत्ति से हर छोटी बडी बिमारी उत्पन्न होना शुरु होजाती हैं चाहे वह मामिली शर्दी खासीं होया बडे से बडा कैंसर इत्यादि हो।

हमारे शरीर में जब गर्मी या ठंडी की अधिकता या कमी हो जाती है तो विपरीत रंगो या रत्नो के माध्यमों द्वारा रंगों के संतुलन से इसे ठीक किया जाता हैं।

क्योकि रंग हमें प्राप्त होते हैं रत्नों से। हर एक रत्न में रोग ठीक करने की क्षमता होती है। शरीर में जब रोग पैदा होते हैं तो वह रंग को लेकर और यह कमी पूरी करते हैं रत्न।  सदियों से आयुर्वेद में रत्नों का उपयोग भस्म के रूप में किया जाता रहा हैं  ज्योतिष में रोगों को ग्रहो से जोड कर उसे शांत करने हेतु रत्न धारण कर प्रयोग किया जाता हैं।  इसी लिये यह सारी क्रियाए महज रंगों का संतुलन शरीर में करने से ही संपन्न होती है।

ज्यादातर लोगो को गरमी में काला कपड़ा पहनने से अधिक गरमी महसूस होती हैं और सफेद कपड़ा पहनने से ठंडक महसूस होती हैं आपने भी अपने जीवन में कभी ना कभी यह जरुर महसुश किया होगा कि किसी रंग विशेष के कपडे या अन्य सामग्री से आपको लाभा हो रहा हैं या नुक्शान हो रहा हैं।

किसी विशेष रंग के कपडे पहनेते हि आपको ज्यादा गुस्सा आजाता हैं तो कभी किसी रंग के कपडे पहने होने पर गुस्से बहोत कम मात्रा में या नहीं के बराबर आता हैं यह प्रभाव तो आपने सहज में ही महसूस किया होगा।। यह सब खेल रंगो कि माय का हैं।


नोट:-
  • उपरोक्त सभी जानकारी हमारे निजी एवं हमारे द्वारा किये गये प्रयोगो एवं अनुशंधान के आधार पर दिगई हैं।
  • कृप्या किसी भी प्रकार के प्रयोग या रंग या रत्न का चुनाव करने से पूर्व विशेषज्ञ कि सलाह अवश्य ले।
  • यदि कोइ व्यक्ति विशेषज्ञ कि सलाह नही लेकर उपरोक्त जानकारी के प्रयोग करता हैं तो उसके लभा या हानी उसकी स्वयं कि जिन्मेदारी होगी। इस्से के लिये कार्यालय के सदस्य या संस्थपक जिन्मेदार नहीं होंगे।
  • हम उपयोक्त लाभ का दावा नहीं कर रहे यह महज एक जानकारी प्रदान करेने हेतु इस ब्लोग पर उपलब्ध कराइ हैं।
  • रंगोका प्रभाव निश्चित हैं इसमे कोइ दो राय नहीं किन्तु रत्न एवं रंगो का चुनाव अन्य उसकि गुणवत्ता एवं सफाई पर निर्भर हैं अपितु विशेषज्ञ कि सलाह अवश्य ले धन्यवाद।

बुधवार, मार्च 24, 2010

रत्न एवं रंगों द्वारा रोग निवारण भाग:-१

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रत्न एवं रंगों द्वारा रोग निवारण भाग:-१

हर रत्न का अपने रंग का अद्भुत एवं चमत्कारिक प्रभाव होता हैं जिस्से हमारे मानव शरीर से सभी प्रकार के रोग हेतु उपयुक्त रत्न का चुनाव कर लाभ प्राप्त किया जासकता हैं।

ब्रह्मांड में व्याप्त हर रंग इंद्रधनुष के सात रंगों के संयोग से संबंध रखता हैं, हमारे ऋषि-मुनियों ने हजारों साल पहले लिखदिया था कि इंद्रधनुष के सात रंग सात ग्रहों के प्रतीक होते हैं, एवं इन रंगों का संबंध ब्रह्मांड के सात ग्रहो से होता हैं जो मनुष्य पर अपना निश्चित प्रभाव हर क्षण डालते हैं। इस बात को आज का उन्नत एवं आधुनिक विज्ञान भी इस बातकी पृष्टि करता हैं। ज्योतिष के द्रष्टि कोण से हर ग्रह का अपना अलग रंग व रत्न हैं।
हमारे लिये अपने जीवन को रोग मुक्त रखने हेतु इन सातो रंगो का निश्चित संतुलन रखना अति आवश्यक होता हैं। एवं यदि यह संतुलन बिगड जाये तो व्यक्ति को तरह-तरह के रोग होना प्रारंभ हो जाता हैं एवं उन रंगो को संतुलित करने हेतु रत्नों को माध्यम बनाकर उसे कायम रखकर हम कुछ बीमारियों में लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

इन रंगो को प्रिज्म में देखने पर वह अलग रंग का दिखता हैं। वास्तव में हर रंग जो हमे दिखाइ देता हैं जिसे हम - स्वेत-काला-लाल-हरा-पीला-भूरा इत्यादि सभी जो हमे द्रष्टि गोचर होते हैं वह रंग वास्तव में अलग रंग का होता हैं!

जेसे बादल का रंग देखने में हल्का भूरा या हल्का नीला प्रतित होता है, लेकिन यदि इन बादल को प्रिज्म के माध्यम से देखा जाए तो काला या हल्का भूरा दिखने वाला बादल असल में नारंगी रंग का होता हैं। सूर्य की रोशनी देख ने में सफेद या सुनहरी दिखती हैं लेकिन प्रिज्म से देखने से इसमें सात रंग दिखाइ देते हैं।

कोइ भी व्यक्ति रंगों के भेद को समज कर कौन सा रंग शरीर के किस हिस्से पर अपना प्रभावित रखता हैं, कौन रंग किस बीमारी को पैदा कर सकता हैं,

सात रंगो कि जानकारी इस प्रकार हैं।

सूर्य ग्रह के मुख्य रत्न माणिक्य (रुबी) से लाल रंग कि रश्मि प्राप्त होती हैं।
चंद्र ग्रह के मुख्य रत्न मोति से केसरी या नारंगी रंग कि रश्मि प्राप्त होती हैं।
मंगल ग्रह के मुख्य रत्न मूंगे से पीले रंग कि रश्मि प्राप्त होती हैं।
बुध ग्रह के मुख्य रत्न पन्ना से हरे रंग कि रश्मि प्राप्त होती हैं।
बृहस्पती (गुरु) ग्रह के मुख्य रत्न पीले पुखराज से नीले रंग कि रश्मि प्राप्त होती हैं।
शुक्र ग्रह के मुख्य रत्न हीरे से हल्के नीले(आसमानी) रंग कि रश्मि प्राप्त होती हैं।
शनि ग्रह के मुख्य रत्न निलम से जामुनी रंग कि रश्मि प्राप्त होती हैं।

अब इन रंगो का पंचभूत तत्व पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश के बारे में जाने और समज कर उनका प्रयोग कर लाभ प्राप्त कर सके।

जल तत्व:- केसरी या नारंगी एंव आसमानी रंग का संचालन करता हैं।
अग्नि तत्व:- लाल एवं पीले रंग का संचालन करता हैं।
वायु तत्व:- जामुनी रंग का संचालन करता हैं।
आकाश तत्व:- नीले रंग का संचालन करता हैं।
पृथ्वी तत्व:- हरे रंग का संचालन करता हैं।

मानव शरीर के साथ रंगो के भेद को जनते हैं। इन सबके भेदो को प्रिज्म द्वार अनुसंधान कर जानागया हैं।
आंख :- लाल रंग
श्वसन:- हरा रंग
स्पश:- जामुनी रंग
ध्वनि:- नीले रंग
स्वाद:- केसरी या नारंगी

मानव शरीर कि गरमी पीले एवं आसमानी रंग से प्रभावित होती हैं। त्वचा जामुनी रंग से प्रभावित होती हैं। नाक को देखने से नाक हरे प्रभावित होती हैं। जीभ को देखने से केसरी या नारंगी से प्रभावित होती दिखाइ देती हैं। कान को देख ने पर कान की नली नीले रंग कि ही दिखाई देती हैं।

(क्रमशः...........)

नोट:-

  • उपरोक्त सभी जानकारी हमारे निजी एवं हमारे द्वारा किये गये प्रयोगो एवं अनुशंधान के आधार पर दिगई हैं।

  • कृप्या किसी भी प्रकार के प्रयोग या रंग या रत्न का चुनाव करने से पूर्व विशेषज्ञ कि सलाह अवश्य ले।

  • यदि कोइ व्यक्ति विशेषज्ञ कि सलाह नही लेकर उपरोक्त जानकारी के प्रयोग करता हैं तो उसके लभा या हानी उसकी स्वयं कि जिन्मेदारी होगी। इस्से के लिये कार्यालय के सदस्य या संस्थपक जिन्मेदार नहीं होंगे।

  • हम उपयोक्त लाभ का दावा नहीं कर रहे यह महज एक जानकारी प्रदान करेने हेतु इस ब्लोग पर उपलब्ध कराइ हैं।

  • रंगोका प्रभाव निश्चित हैं इसमे कोइ दो राय नहीं किन्तु रत्न एवं रंगो का चुनाव अन्य उसकि गुणवत्ता एवं सफाई पर निर्भर हैं अपितु विशेषज्ञ कि सलाह अवश्य ले धन्यवाद।

ब्रह्मदेवकृत राम स्तुति

Brahm Dev Krut Ram Stuti,

ब्रह्मदेवकृत राम स्तुति
श्रीगणेशाय नमः ।
ब्रहोवाच

वन्दे देवं विष्णुमशेषस्थितिहेतुं त्वामध्यात्मज्ञानिभिरन्तर्ह्रदि भाव्यम् ।
हेयाहेयद्वंद्वविहीनं परमेकं सत्तामात्रं सर्वह्रदिस्थं दृशिरूपम् ॥ १ ॥

प्राणापानौ निश्चयबुद्ध्या ह्रदि रुद्‌ध्वा छित्त्वा सर्वसंशयबंधं विषयौघान् ।
पश्यंतीशं यं गतमोहा यतयस्तं वंदे रामं रत्‍नकिरीटं रविभासम् ॥ २ ॥

मायातीतं माधवमाद्यं जगदादिं मायाधीशं मोहविनाशं मुनिवंद्यम् ।
योगिध्येयं योगविधानं परिपूर्णं वंदे रामं रञ्जितलोकं रमणीयम् ॥ ३ ॥

भावाऽभावप्रत्ययहीनं भवमुख्यैर्भोगासक्तैरर्चितपदांबुजयुग्मम् ।
नित्यं शुद्धं बुद्धमनंतं प्रणवाख्यं वंदे रामं वीरमशेषासुरदावम् ॥ ४ ॥

त्वं मे नाथो नाथितकार्याखिलकारी मानातीतो माधवरूपोऽखिलधारी ।
भक्त्या गम्यो भाविरूपो भवहारी योगाभ्यासैर्भावितचेतःसहचारी ॥ ५ ॥

त्वामाद्यंतं लोकततीनां परमीशं लोकानां नो लौकिकमानैरधिगम्यम् ।
भक्तिश्रद्धाभावसमेतैर्भजनीयं वंदे रामं सुन्दरमिन्दीवरनीलम् ॥ ६ ॥

को वा ज्ञातुं त्वामतिमानं गतमानं मानासक्तो माधवशक्तो मुनिमान्यम् ।
वृन्दारण्ये वंदितवृन्दाकरवृन्दं वंदे रामं भवमुखवन्द्यं सुखकंदम् ॥ ७ ॥

नानाशास्त्रैर्वेदकदंबैः प्रतिपाद्यं नित्यानंदं निर्विषयज्ञानमनादिम् ।
मत्सेवार्थं मानुषभावं प्रतिपन्नं वंदे रामं मरकतवर्णं मथुरेशम् ॥ ८ ॥

श्रद्धायुक्तो यः पठतीमं स्तवमाद्यं ब्राह्मं ब्रह्मज्ञानविधानं भुवि मर्त्यः ।
रामं श्यामं कामितकामप्रदमीशं ध्यात्वा ध्याता पातकजालैर्विगतः स्यात् ॥ ९ ॥

॥ इति श्रीमदध्यात्मरामायणे युद्धकाण्डे ब्रह्मदेवकृतं रामस्तोत्रम् संपूर्णम् ॥

महादेव कृत रामस्तुति

mahadev krut ram stuti

महादेव कृत रामस्तुति
श्री महादेव उवाच ।

नमोऽस्तु रामाय सशक्तिकाय नीलोत्पलश्यामकोमलाय ।
किरीटहाराङ्गदभूषणाय सिंहासनस्थाय महाप्रभाय ॥ १ ॥

त्वमादिमध्यांतविहीन एकः स्रृजस्यवस्यत्सि च लोकजातम् ।
स्वमायया तेन न लिप्यसे त्वं यत्स्वे सुखेऽजस्त्ररतोऽनवद्यः ॥ २॥

लीलां विधत्से गुणसंवृतस्त्वं प्रसन्नभक्तानुविधानहेतोः ।
नानाऽवतारैः सुरमानुषाद्यैः प्रतीयसे ज्ञानिभिरेव नित्यम् ॥ ३ ॥

स्वांशेन लोकं सकलं विधाय तं बिभर्षि च त्वं तदधः फणीश्‍वरः ।
उपर्यधो भान्वनिलोड्डपौषधीन्प्रकर्षरूपोवसि नैकधा जगत् ॥४॥

त्वमिह देहभृतां शिखिरूपः पचसि भक्तमशेषमजस्त्रम् ।
पवनपंचकरूपसहायो जगदखंडमनेन बिभर्षि ॥ ५ ॥

चंद्रसूर्यशिखिमध्यगतं यत्तेज ईश चिदशेषतनूनाम् ।
प्राभवत्तनुभृतामिह धैर्यं शौर्यमायुरखिलं तव सत्त्वम् ॥ ६ ॥

त्वं विरिञ्चिशिवविष्णुविभेदात्कालकर्मशशिसूर्यविभागात् ।
वादिनां पृथगिवेश विभासि ब्रह्म निश्‍चितमनन्यदिहैकम् ॥ ७ ॥

मत्स्यादिरूपेण यथा त्वमेकः श्रुतौ पुराणेषु च लोकसिद्धः ।
तथैव सर्वं सदसद्विभागस्त्वमेव नान्यद्भवतो विभाति ॥ ८ ॥

यद्यत्समुत्पन्नमनन्तसृष्टावुत्पत्स्यते यच्च भवच्च यच्च ।
न दृश्यते स्थावरजंगमादौ त्वया विनाऽतः परतः परस्त्वम् ॥ ९ ॥

तत्त्वं न जानंति परात्मनस्ते जनाः समस्तास्तव माययातः ।
त्वद्भक्तसेवामलमानसानां विभाति तत्त्वं परमेकमैशम् ॥ १० ॥

ब्रह्मादयस्ते न विदुः स्वरूपं चिदात्मतत्त्वं बहिरर्थभावाः ।
ततो बुधस्त्वामिदमेव रूपं भक्त्या भजन्मुक्तिमुपैत्यदुःखः ॥ ११ ॥

अहं भवन्नामगुणैः कृतार्थो वसामि काश्यामनिशं भवान्या ।
मुमूर्षमाणस्य विमुक्तयेऽहं दिशामि मंत्रं तव राम नाम ॥ १२ ॥

इमं स्तवं नित्यमनन्यभक्त्या श्रृण्वन्ति गायंति लिखंति ये वै ।
ते सर्व्सौख्यं परमं च लब्ध्वा भवत्पदं यान्ति भवत्प्रसादात् ॥ १३ ॥

॥ इति श्रीमहादेवकृतस्तोत्र संपूर्णम् ॥

रामाष्टकम्

RamaShtakam, Ram Ashtakam, राम अष्टकम्

रामाष्टकम्

भजे विशेषसुन्दरं समस्तपापखण्डनम् ।
स्वभक्तचित्तरञ्जनं सदैव राममद्वयम् ॥ १ ॥

जटाकलापशोभितं समस्तपापनाशकम् ।
स्वभक्तभीतिभंजनं भजे ह राममद्वयम् ॥ २ ॥

निजस्वरूपबोधकं कृपाकरं भवापहम् ।
समं शिवं निरंजनं भजे ह राममद्वयम् ॥ ३ ॥

सदाप्रञ्चकल्पितं ह्यनामरूपवास्तवम् ।
निराकृतिं निरामयं भजे ह राममद्वयम् ॥ ४ ॥

निष्प्रपञ्चनिर्विकल्पनिर्मलं निरामयम् ॥
चिदेकरूपसंततं भजे ह राममद्वयम् ॥ ५ ॥

भवाब्धिपोतरूपकं ह्यशेषदेहकल्पितम् ।
गुणाकरं कृपाकरं भजे ह राममद्वयम् ॥ ६ ॥

महावाक्यबोधकैर्विराजमनवाक्पदैः ।
परब्रह्म व्यापकं भजे ह राममद्वयम् ॥ ७ ॥

शिवप्रदं सुखप्रदं भवच्छिदं भ्रमापहम् ।
विराजमानदैशिकं भजे ह राममद्वयम् ॥ ८ ॥

रामाष्टकं पठति यः सुकरं सुपुण्यं व्यासेन भाषितमिदं श्रृणुते मनुष्यः ।
विद्यां श्रियं विपुलसौख्यमनन्तकीर्ति सम्प्राप्य देहविलये लभते च मोक्षम् ॥ ९ ॥

॥ इति श्रीव्यासविरचितं रामाष्टकं संपूर्णम् ॥

जटायुकृत राम स्तोत्रम्

jatayu krut ram stotra
जटायुकृत राम स्तोत्रम्

श्रीगणेशाय नमः । जटायुरुवाच ।

अगणितगुणमप्रमेयमाद्यं सकलजगत्स्थितिसंयमादिहेतुम् ।
उपरमपरमं परात्मभृतं सततमहं प्रणतोऽस्मि रामचन्द्रम् ॥ १ ॥

निरवधिसुखमिंदिराकटाक्षं क्षपितसुरेन्द्रचतुर्मुखदिदुःखम् ।
नरवरमनिशं नतोऽस्मि रामं वरदमहं वरचापबाणहस्तम् ॥ २ ॥

त्रिभुवनकमनीयरूपमीड्यं रविशतभासुरमीहितप्रदानम् ।
शरणदमनिशं सुरागमूले कृतनिलयं रघुनन्दनं प्रपद्ये ॥ ३ ॥

भवविपिनदवाग्निमधेयं भवमुखदैवतदैवतं दयालुम् ।
दनुजपतिसहस्त्रकोटिनाशं रवितनयासदृशं हरिं प्रपद्ये ॥ ४ ॥

अविरतभवभावनातिदूरं भवविमुखैर्मुनिभिः सदैव दृश्यम् ।
भवजलधिसुतारणांघ्रिपोतं शरणमहं रघुनन्दनं प्रपद्ये ॥ ५ ॥

गिरिशगिरिसुतमनोनिवासं गिरिवरधारिणमीहिताभिरामम् ।
सुरवरदनुजेन्द्रसेवितांघ्रिं सुरवरदं रघुनायकं प्रपद्ये ॥ ६ ॥

परधनपरदारवर्जितानां परगुणभूतिषु तुष्टमानसानाम् ।
परहितनिरतात्मनां सुसेव्यं रघुवरमंबुजलोचनं प्रपद्ये ॥ ७ ॥

स्मितरुचिरविकासिताब्जमतिसुलभं सुरराजनीलनीलम् ।
सितजलरुहचारुनेत्रशोभं रघुपतिमीशगुरोर्गुरुं प्रपद्ये ॥ ८ ॥

हरिकमलजशंभुरूपभेदात्त्वमहि विभासि गुणत्रयानुवृत्तः ।
रविरिव जल्पूरितोदपात्रेष्वमरपतिस्तुतिपात्रमीशमीडे ॥ ९ ॥

रतिपतिशतकोटिसुन्दराङ्ग शतपथगोचरभावनाविदूरम्।
यतिपतिह्रदये सदा विभांतं रघुपतिमार्तिहरं प्रभुं प्रपद्ये ॥ १० ॥

इत्येवं स्तुवतस्तस्य प्रसन्नोऽभूद्रघूत्तमः ।
उवाच गच्छ भद्रं ते मम विष्णोः परं पदम् ॥ ११ ॥

श्रृतोति य इदं स्तोत्रं लिखेद्वा नियतः पठेत् ।
स याति मम सारूप्यं मरणे मत्स्मृतिं लभेत् ॥ १२ ॥

इति राघवभाषितं तदा श्रुतवान् हर्षसमाकुलो द्विजः ।
रघुनन्दनसाम्यमास्थितः प्रययौ ब्रह्मसुपूजितं पदम् ॥ १३ ॥
॥ इति श्रीमदध्यात्मरामायणे आरण्यकांडे जटायुकृतरामस्तोत्रं संपूर्णम् ॥

मंगलवार, मार्च 23, 2010

रामस्तुति

ram stuti, rama stuti

रामस्तुति

श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणम् ।
नवकञ्ज लोचन कञ्ज मुखकर कञ्जपद कञ्जरुणम् ॥१॥

कंदर्प अगणित अमित छबि नव नील नीरज सुन्दरम् ।
पटपीत पानहुँ तड़ित रुचि सुचि नौमि जनक सुतावरम् ॥२॥

भजु दीन बन्धु दिनेश दानव दैत्यवंशनिकन्दनम् ।
रघुनन्द आनंदकंद कोशल चन्द दशरथ नन्दनम् ॥३॥

सिरक्रीट कुण्डल तिलक चारु उदार अङ्ग विभूषणम् ।
आजानुभुज सर चापधर सङ्ग्राम जित खरदूषणम् ॥४॥
इति वदति तुलसीदास शङ्कर शेष मुनि मनरञ्जनम् ।

मम हृदयकञ्ज निवास कुरु कामादिखलदलमञ्जनम् ॥५॥

मन जाहि राचो मिलहि सोवर सहजसुन्दर सांवरो ।
करुणानिधान सुजान शील सनेह जानत रावरो ॥६॥

एहि भाँति गौरि अशीस सुनि सिय सहित हिय हर्षित अली ।
तुलसी भवानिहिं पूजि पुनि पुनि मुदित मन मन्दिर चली ॥७॥

जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हर्षनः जात कहि ।
मञ्जुल मङ्गल मूल वाम अङ्ग परकन लगे ॥८॥

सियावर रामचन्द्र पद गहि रहुँ ।
उमावर शम्भुनाथ पद गहि रहुँ ।
महाविर बजरँगी पद गहि रहुँ । शरणा गतो हरि ॥

राम भुजन्ग स्तोत्र

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राम भुजन्ग स्तोत्र

विशुद्धं परं सच्चिदानन्दरूपम् गुणाधारमाधारहीनं वरेण्यम् ।
महान्तं विभान्तं गुहान्तं गुणान्तं सुखान्तं स्वयं धाम रामं प्रपद्ये ॥ १ ॥

शिवं नित्यमेकं विभुं तारकाख्यं सुखाकारमाकारशून्यं सुमान्यं ।
महेशं कलेशं सुरेशं परेशं नरेशं निरीशं महीशं प्रपद्ये ॥ २ ॥

शिवाय विष्णुरूपाय शिवरूपाय विष्णवे ।
शिवस्य हृदयम् विश्णु विष्णोश्च हृदयम् शिवः ॥
यदावर्णयत्कर्णमूलेऽन्तकाले शिवो राम रामेति रामेति काश्याम् ।
तदेकं परं तारकब्रह्मरूपं भजेऽहं भजेऽहं भजेऽहं भजेऽहम् ॥ ३ ॥

श्रीरामरामरामेति रमे रामे मनोरमे । सहस्रनाम तत्तुल्यं राम नाम वरानने ॥
महारत्नपीठे शुभे कल्पमूले सुखासीनमादित्यकोटिप्रकाशम् ।
सदा जानकीलक्ष्मणोपेतमेकं सदा रामचन्द्रम् भजेऽहं भजेऽहम् ॥ ४ ॥

क्वणद्रत्नमन्जीरपादारविन्दम् लसन्मेखलाचारुपीताम्बराढ्यम् ।
महारत्नहारोल्लसत्कौस्तुभाङ्गं नदच्चंचरीमंजरीलोलमालम् ॥ ५ ॥

लसच्चन्द्रिकास्मेरशोणाधराभम् समुद्यत्पतङ्गेन्दुकोटिप्रकाशम् ।
नमद्ब्रह्मरुद्रादिकोटीररत्न- स्फुरत्कान्तिनीराजनाराधितान्घ्रिम् ॥ ६ ॥

' कोटीरोज्ज्वल-रत्न-दीपकलिका-नीराजनम् कुर्वते' ।
पुरः प्राञ्जलीनाञ्जनेयादिभक्तान् स्वचिन्मुद्रया भद्रया बोधयन्तम् ।
भजेऽहं भजेऽहं सदा रामचन्द्रं त्वदन्यं न मन्ये न मन्ये न मन्ये ॥ ७ ॥

मोउन-व्याख्यान-प्रकटित-परब्रह्मतत्त्वं युवानं ।
वर्षिष्ठ-अन्तेवसद्-ऋषि-गणैरावृतं ब्रह्म-निष्ठैः ॥
आचार्येन्द्रं करकलित-चिन्मुद्र-मानन्दरूपम्
स्वात्मारामं मुदितवदनं दक्षिणामूर्तिमीडे ॥
यदा मत्समीपं कृतान्तः समेत्य प्रचण्डप्रतापैर्भटैर्भीषयेन्माम् ।
तदाविष्करोषि त्वदीयं स्वरूपं तदापत्प्रणाशं सकोदण्डबाणम् ॥ ८ ॥

निजे मानसे मन्दिरे संनिधेहि प्रसीद प्रसीद प्रभो रामचन्द्र ।
ससौमित्रिणा कैकेयीनन्दनेन स्वशक्त्यानुभक्त्या च संसेव्यमान ॥ ९ ॥

स्वभक्ताग्रगण्यैः कपीशैर्महीशै- रनीकैरनेकैश्च राम प्रसीद ।
नमस्ते नमोऽस्त्वीश राम प्रसीद प्रशाधि प्रशाधि प्रकाशं प्रभो माम्
त्वमेवासि दैवं परं मे यदेकं सुचैतन्यमेतत्त्वदन्यं न मन्ये ।
यतोऽभूदमेयं वियद्वायुतेजो- जलोर्व्यादिकार्यं चरं चाचरं च ॥ ११ ॥

नमः सच्चिदानन्दरूपाय तस्मै नमो देवदेवाय रामाय तुभ्यम् ।
नमो जानकीजीवितेशाय तुभ्यं नमः पुण्डरीकायताक्षाय तुभ्यम् ॥ १२ ॥

नमो भक्तियुक्तानुरक्ताय तुभ्यं नमः पुण्यपुञ्जैकलभ्याय तुभ्यम् ।
नमो वेदवेद्याय चाद्याय पुंसे नमः सुन्दरायेन्दिरावल्लभाय ॥ १३ ॥

नमो विश्वकर्त्रे नमो विश्वहर्त्रे नमो विश्वभोक्त्रे नमो विश्वमात्रे ।
नमो विश्वनेत्रे नमो विश्वजेत्रे नमो विश्वपित्रे नमो विश्वमात्रे ॥ १४ ॥

शिलापि त्वदन्घ्रिक्षमासङ्गिरेणु- प्रसादाद्धि चैतन्यमाधत्त राम ।
नरस्त्वत्पदद्वन्द्वसेवाविधाना- त्सुचैतन्यमेतेति किं चित्रमद्य ॥ १५ ॥

पवित्रं चरित्रं विचित्रं त्वदीयं नरा ये स्मरन्त्यन्वहं रामचन्द्र ।
भवन्तं भवान्तं भरन्तं भजन्तो लभन्ते कृतान्तं न पश्यन्त्यतोऽन्ते ॥ १६ ॥

' अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥
स पुण्यः स गण्यः शरण्यो ममायं नरो वेद यो
देवचूडामणिं त्वाम् । सदाकारमेकं चिदानन्दरूपं मनोवागगम्यं परन्धाम राम ॥ १७ ॥

प्रचण्डप्रतापप्रभावाभिभूत- प्रभूतारिवीर प्रभो रामचन्द्र ।
बलं ते कथं वर्ण्यतेऽतीव बाल्ये यतोऽखण्डि चण्डीशकोदण्डदण्डः ॥ १८ ॥

दशग्रीवमुग्रं सपुत्रं समित्रं सरिद्दुर्गमध्यस्थरक्षोगणेशम् ।
भवन्तं विना राम वीरो नरो वा- ऽसुरो वाऽमरो वा जयेत्कस्त्रिलोक्याम् ॥ १९ ॥

सदा राम रामेति रामामृतं ते सदाराममानन्दनिष्यन्दकन्दम् ।
पिबन्तं नमन्तं सुदन्तं हसन्तं हनूमन्तमन्तर्भजे तं नितान्तम् ॥ २० ॥

यत्र यत्र रघुनाथकीर्तनं तत्र तत्र कृत-मस्तकाञ्जलिम् ।
बाष्पवारिपरिपूर्ण-लोचनं मारुतिम् नमत राक्षसान्तकम् ॥
सदा राम रामेति रामामृतम् ते सदाराममानन्दनिष्यन्दकन्दम् ।
पिबन्नन्वहं नन्वहं नैव मृत्यो- र्बिभेमि प्रसादादसादात्तवैव ॥ २१ ॥

असीतासमेतैरकोदण्डभूशै- रसौमित्रिवन्द्यैरचण्डप्रतापैः ।
अलङ्केशकालैरसुग्रीवमित्रै- ररामाभिधेयैरलम् देवतैर्नः ॥ २२ ॥

अवीरासनस्थैरचिन्मुद्रिकाढ्यै- रभक्ताञ्जनेयादितत्त्वप्रकाशैः ।
अमन्दारमूलैरमन्दारमालै- ररामाभिधेयैरलम् देवतैर्नः ॥ २३ ॥

असिन्धुप्रकोपैरवन्द्यप्रतापै- रबन्धुप्रयाणैरमन्दस्मिताढ्यैः ।
अदण्डप्रवासैरखण्डप्रबोधै- ररामभिदेयैरलम् देवतैर्नः ॥ २४ ॥

हरे राम सीतापते रावणारे खरारे मुरारेऽसुरारे परेति ।
लपन्तं नयन्तं सदाकालमेव समालोकयालोकयाशेषबन्धो ॥ २५ ॥

नमस्ते सुमित्रासुपुत्राभिवन्द्य नमस्ते सदा कैकयीनन्दनेड्य ।
नमस्ते सदा वानराधीशवन्द्य नमस्ते नमस्ते सदा रामचन्द्र ॥ २६ ॥

प्रसीद प्रसीद प्रचण्डप्रताप प्रसीद प्रसीद प्रचण्डारिकाल ।
प्रसीद प्रसीद प्रपन्नानुकम्पिन् प्रसीद प्रसीद प्रभो रामचन्द्र ॥ २७ ॥

भुजङ्गप्रयातं परं वेदसारं मुदा रामचन्द्रस्य भक्त्या च नित्यम् ।
पठन् सन्ततं चिन्तयन् स्वान्तरङ्गे स एव स्वयम् रामचन्द्रः स धन्यः ॥ २८ ॥

॥ इति श्रीशङ्कराचार्यविरचितम् श्री रामभुजङ्गप्रयात स्तोत्रम् सम्पूर्णम्॥

श्री राम के सिद्ध मंत्र भाग: ५

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श्री राम के सिद्ध मंत्र भाग: ५

आकर्षण हेतु
मंत्र :-
जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू।
सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू॥

परस्पर प्रेम बढाने हेतु
मंत्र :-
सब नर करहिं परस्पर प्रीती।
चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥

विचारो की शुद्धि हेतु
मंत्र :-
ताके जुग पद कमल मनाउँ।
जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ॥

मोक्ष-प्राप्ति हेतु
मंत्र :-
सत्यसंध छाँड़े सर लच्छा।
काल सर्प जनु चले सपच्छा॥

भक्ति भाव उजागर हेतु
मंत्र :-
भगत कल्पतरु प्रनत हित कृपासिंधु सुखधाम।
सोइ निज भगति मोहि प्रभु देहु दया करि राम॥

अपनी आवश्यक्ता के अनुशार उपरोक्त मंत्र का नियमित जाप करने से लाभ प्ताप्त होता हैं।
श्री रामचरित मानस मे गहरी आस्था रखने वाले व्यक्ति को विशेष एवं शीघ्र लाभ प्राप्त होता हैं।

श्री राम के सिद्ध मंत्र भाग: ४

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श्री राम के सिद्ध मंत्र भाग: ४

मनोरथ सिद्धि हेतु
मंत्र :-
भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहिं जे नर अरु नारि।
तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि॥

कुशलता हेतु
मंत्र :-
भुवन चारिदस भरा उछाहू।
जनकसुता रघुबीर बिआहू॥

मनोरथ सिद्धि हेतु
मंत्र :-
भव भेषज रघुनाथ जसु सुनहिं जे नर अरु नारि।
तिन्ह कर सकल मनोरथ सिद्ध करहिं त्रिसिरारि॥

कुशलता हेतु
मंत्र :-
भुवन चारिदस भरा उछाहू।
जनकसुता रघुबीर बिआहू॥

खोयी हुई वस्तु पुनः प्राप्त करने हेतु
मंत्र :-
गई बहोर गरीब नेवाजू।
सरल सबल साहिब रघुराजू॥

मुकदमें में विजय प्ताप्ति हेतु
मंत्र :-
पवन तनय बल पवन समाना।
बुधि बिबेक बिग्यान निधाना॥

शत्रु को मित्र बनाने हेतु
मंत्र :-
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई।
गोपद सिंधु अनल सितलाई॥

शत्रुता नाश हेतु
मंत्र :-
बयरु न कर काहू सन कोई।
राम प्रताप विषमता खोई॥

खोयी हुई वस्तु पुनः प्राप्त करने हेतु
गई बहोर गरीब नेवाजू।
सरल सबल साहिब रघुराजू॥

अपनी आवश्यक्ता के अनुशार उपरोक्त मंत्र का नियमित जाप करने से लाभ प्ताप्त होता हैं।
श्री रामचरित मानस मे गहरी आस्था रखने वाले व्यक्ति को विशेष एवं शीघ्र लाभ प्राप्त होता हैं।

सीताराम स्तोत्रम्

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सीताराम स्तोत्रम्

कमल लोचनौ राम कांचनाम्बरौ कवचभूषणौ राम कार्मुकान्वितौ ।
कलुषसंहारौ राम कामितप्रदौ रहसि नौमि तौ सीतारामलक्ष्मणौ ॥१॥

मकरकुण्डलौ राम मौलिसेवितौ मणिकिरीटिनौ राम मञ्जुभाषिणौ ।
मनुकुलोद्भवौ राम मानुषोत्तमौ रहसि नौमि तौ सीतारामलक्ष्मणौ ॥२॥

सत्यसम्पन्नौ राम समरभीकरौ सर्वरक्षणौ राम सर्वभूषणौ ।
सत्यमानसौ राम सर्वपोषितौ रहसि नौमि तौ सीतारामलक्ष्मणौ ॥३॥

धृतशिखण्डिनौ राम दीनरक्षकौ धृतहिमाचलौ राम दिव्यविग्रहौ ।
विविधपूजितौ राम दीर्घदोर्युगौ रहसि नौमि तौ सीतारामलक्ष्मणौ ॥४॥

भुवनजानुकौ राम पादचारिणौ पृथुशिलीमुकौ राम पापनाङ्घ्रिकौ ।
परमसात्विकौ राम भक्तवत्सलौ रहसि नौमि तौ सीतारामलक्ष्मणौ ॥५॥

वनविहारिणौ राम वल्कलांबरौ वनफलाशिनौ राम वासवार्चितौ ।
वरगुणाकरौ राम वालिमर्दनौ रहसि नौमि तौ सीतारामलक्ष्मणौ ॥६॥

दशरथात्मजौ राम पशुपतिप्रियौ शशिनिवासिनौ राम विशदमानसौ ।
दशमुखान्तकौ राम निशितसायकौ रहसि नौमि तौ सीतारामलक्ष्मणौ ॥७॥

कमल लोचनौ राम समरपण्डितौ भीमविग्रहौ राम कामसुन्दरौ ।
दामभूषणौ राम हेमनूपुरौ रहसि नौमि तौ सीतारामलक्ष्मणौ ॥८॥

भरतसेवितौ राम दुरितमोचकौ करधृताशुगौ राम सूकरस्तुतौ ।
शरधि धारणौ राम धीरकवचिनौ रहसि नौमि तौ सीतारामलक्ष्मणौ ॥९॥

धर्मचारिणौ राम कर्मसाक्षिणौ धर्मकार्मुखौ राम शर्मदायकौ ।
धर्मशोभितौ राम कर्ममोदिनौ रहसि नौमि तौ सीतारामलक्ष्मणौ ॥१०॥

नीलदेहिनौ राम लोलकुन्दलौ कालभीकरौ राम वालिमर्दनौ ।
कलुषहारिणौ राम ललितभूषणौ रहसि नौमि तौ सीतारामलक्ष्मणौ ॥११॥

मातृनन्दनौ राम भाद्रबालकौ भ्रातॄ सम्मतौ राम शत्रुसूदकौ ।
भ्रातृशेखरौ राम सेतुनायकौ रहसि नौमि तौ सीतारामलक्ष्मणौ ॥१२॥

शरधिबन्धनौ राम दलितदानवौ कुलविवर्धनौ राम बलविराजितौ ।
सोलजाजितौ राम बलविराजितौ रहसि नौमि तौ सीतारामलक्ष्मणौ ॥१३॥

राजलक्षणौ राम विजय काङ्क्षिणौ गजवरारुहौ राम पूजितामरौ ।
विजितमत्सरौ राम भजितवारणौ रहसि नौमि तौ सीतारामलक्ष्मणौ ॥१४॥

सर्वमानितौ राम सर्वकारिणौ गर्वभञ्जनौ राम निर्विकारणौ ।
दुर्विभासितौ राम सर्वभासकौ रहसि नौमि तौ सीतारामलक्ष्मणौ ॥१५॥

रविकुलोद्भवौ राम भवविनाशकौ कानकाश्रितौ राम पादकोशकौ ।
रविसुतप्रियौ राम कविभिरीडितौ रहसि नौमि तौ सीतारामलक्ष्मणौ ॥१६॥

राम राघव सीता राम राघव राम राघव सीता राम राघव ।
कृष्णकेशव राधा कृष्णकेशव कृष्णकेशव राधा कृष्णकेशव ॥१७॥

राम सहस्रनाम स्तोत्रम्

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राम सहस्रनाम स्तोत्रम्

राजीवलोचनः श्रीमान् श्रीरामो रघुपुङ्गवः ।
रामभद्रः सदाचारो राजेन्द्रो जानकीपतिः ॥१॥
अग्रगण्यो वरेण्यश्च वरदः परमेश्वरः ।
जनार्दनो जितामित्रः परार्थैकप्रयोजनः ॥२॥
विश्वामित्रप्रियो दान्तश्शत्रुजिच्छत्रुतापनः ।
सर्वज्ञः सर्वदेवादिः शरण्यो वालिमर्दनः ॥३॥
ज्ञानभाव्योऽपरिच्छेद्योवाग्मीसत्यव्रतः शुचिः ।
ज्ञानगम्यो दृढप्रज्ञः खरध्वंसी प्रतापवान् ॥४॥
द्युतिमानात्मवान् वीरो जितक्रोधोऽरिमर्दनः ।
विश्वरूपो विशालाक्षः प्रभुः परिवृढो दृढः ॥५॥


ईशः खड्गधरः श्रीमान् कौसलेयोऽनसूयकः ।
विपुलांसो महोरस्कः परमेष्ठी परायणः ॥६॥
सत्यव्रतः सत्यसंधो गुरुः परमधार्मिकः ।
लोकज्ञो लोकवन्द्यश्च लोकात्मालोककृत्परः ॥७॥
अनादिर्भगवान् सेव्यो जितमायो रघूद्वहः ।
रामो दयाकरो दक्षः सर्वज्ञः सर्वपावनः ॥८॥
ब्रह्मण्यो नीतिमान् गोप्ता सर्वदेवमयो हरिः ।
सुन्दरः पीतवासाश्च सूत्रकारः पुरातनः ॥९॥
सौम्यो महर्षिः कोदण्डी सर्वज्ञः सर्वकोविदः ।
कविः सुग्रीववरदः सर्वपुण्याधिकप्रदः ॥१०॥


भव्यो जितारिषड्वर्गो महोदरोऽघनाशनः ।
सुकीर्तिरादिपुरुषः कान्तः पुण्यकृतागमः ॥११॥
अकल्मषश्चतुर्बाहुः सर्वावासो दुरासदः ।
स्मितभाषी निवृत्तात्मा स्मृतिमान् वीर्यवान् प्रभुः ॥१२॥
धीरो दान्तो घनश्यामः सर्वायुधविशारदः ।
अध्यात्मयोगनिलयः सुमना लक्ष्मणाग्रजः ॥१३॥
सर्वतीर्थमयश्शूरः सर्वयज्ञफलप्रदः ।
यज्ञस्वरूपी यज्ञेशो जरामरणवर्जितः ॥१४॥
वर्णाश्रमकरो वर्णी शत्रुजित् पुरुषोत्तमः ।
विभीषणप्रतिष्ठाता परमात्मा परात्परः ॥१५॥


प्रमाणभूतो दुर्ज्ञेयः पूर्णः परपुरंजयः ।
अनन्तदृष्टिरानन्दो धनुर्वेदो धनुर्धरः ॥१६॥
गुणाकरो गुणश्रेष्ठः सच्चिदानन्दविग्रहः ।
अभिवन्द्यो महाकायो विश्वकर्मा विशारदः ॥१७॥
विनीतात्मा वीतरागः तपस्वीशो जनेश्वरः ।
कल्याणप्रकृतिः कल्पः सर्वेशः सर्वकामदः ॥१८॥
अक्षयः पुरुषः साक्षी केशवः पुरुषोत्तमः ।
लोकाध्यक्षो महामायो विभीषणवरप्रदः ॥१९॥
आनन्दविग्रहो ज्योतिर्हनुमत्प्र्भुरव्ययः ।
भ्राजिष्णुः सहनो भोक्ता सत्यवादी बहुश्रुतः ॥२०॥


सुखदः कारणं कर्ता भवबन्धविमोचनः ।
देवचूडामणिर्नेता ब्रह्मण्यो ब्रह्मवर्धनः ॥२१॥
संसारोत्तारको रामः सर्वदुःखविमोक्षकृत् ।
विद्वत्तमो विश्वकर्ता विश्वहर्ता च विश्वकृत् ॥२२॥
नित्योनियतकल्याणः सीताशोकविनाशकृत् ।
काकुत्स्थः पुण्डरीकाक्षो विश्वामित्रभयापहः ॥२३॥
मारीचमथनो रामो विराधवधपण्डितः ।
दुस्स्वप्ननाशनो रम्यः किरीटी त्रिदशाधिपः ॥२४॥
महाधनुर्महाकायो भीमो भीमपराक्रमः ।
तत्त्वस्वरूपी तत्त्वज्ञः तत्त्ववादी सुविक्रमः ॥२५॥


भूतात्मा भूतकृत्स्वामी कालज्ञानी महापटुः ।
अनिर्विण्णो गुणग्राही निष्कलङ्कः कलङ्कहा ॥२६॥
स्वभावभद्रश्शत्रुघ्नः केशवः स्थाणुरीश्वरः ।
भूतादिः शम्भुरादित्यः स्थविष्ठश्शाश्वतोध्रुवः ॥२७॥
कवची कुण्डली चक्री खड्गी भक्तजनप्रियः ।
अमृत्युर्जन्मरहितः सर्वजित्सर्वगोचरः ॥२८॥
अनुत्तमोऽप्रमेयात्मा सर्वादिर्गुणसागरः ।
समः समात्मा समगो जटामुकुटमण्डितः ॥२९॥
अजेयः सर्वभूतात्मा विष्वक्सेनो महातपाः ।
लोकाध्यक्षो महाबाहुरमृतो वेदवित्तमः ॥३०॥


सहिष्णुः सद्गतिः शास्ता विश्वयोनिर्महाद्युतिः ।
अतीन्द्र ऊर्जितः प्रांशुरुपेन्द्रो वामनो बली ॥३१॥
धनुर्वेदो विधाता च ब्रह्मा विष्णुश्च शंकरः ।
हंसो मरीचिर्गोविन्दो रत्नगर्भो महामतिः ॥३२॥
व्यासो वाचस्पतिः सर्वदर्पितासुरमर्दनः ।
जानकीवल्लभः पूज्यः प्रकटः प्रीतिवर्धनः ॥३३॥
सम्भवोऽतीन्द्रियोवेद्योऽनिर्देशोजाम्बवत्प्रभुः ।
मदनो मथनो व्यापी विश्वरूपो निरञ्जनः ॥३४॥
नारायणोऽग्रणीः साधुर्जटायुप्रीतिवर्धनः ।
नैकरूपो जगन्नाथः सुरकार्यहितः स्वभूः ॥३५॥


जितक्रोधो जितारातिः प्लवगाधिपराज्यदः ।
वसुदः सुभुजो नैकमायो भव्यप्रमोदनः ॥३६॥
चण्डांशुः सिद्धिदः कल्पः शरणागतवत्सलः ।
अगदो रोगहर्ता च मन्त्रज्ञो मन्त्रभावनः ॥३७॥
सौमित्रिवत्सलो धुर्यो व्यक्ताव्यक्तस्वरूपधृक् ।
वसिष्ठो ग्रामणीः श्रीमाननुकूलः प्रियंवदः ॥३८॥
अतुलः सात्त्विको धीरः शरासनविशारदः ।
ज्येष्ठः सर्वगुणोपेतः शक्तिमांस्ताटकान्तकः ॥३९॥
वैकुण्ठः प्राणिनां प्राणः कमठः कमलापतिः ।
गोवर्धनधरो मत्स्यरूपः कारुण्यसागरः ॥४०॥


कुम्भकर्णप्रभेत्ता च गोपिगोपालसंवृतः ।
मायावी व्यापको व्यापी रैणुकेयबलापहः ॥४१॥
पिनाकमथनो वन्द्यः समर्थो गरुडध्वजः ।
लोकत्रयाश्रयो लोकचरितो भरताग्रजः ॥४२॥
श्रीधरः सद्गतिर्लोकसाक्षी नारायणो बुधः ।
मनोवेगी मनोरूपी पूर्णः पुरुषपुङ्गवः ॥४३॥
यदुश्रेष्ठो यदुपतिर्भूतावासः सुविक्रमः ।
तेजोधरो धराधारश्चतुर्मूर्तिर्महानिधिः ॥४४॥
चाणूरमर्दनो दिव्यश्शान्तो भरतवन्दितः ।
शब्दातिगो गभीरात्मा कोमलाङ्गः प्रजागरः ॥४५॥


लोकगर्भश्शेषशायी क्षीराब्धिनिलयोऽमलः ।
आत्मयोनिरदीनात्मा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥४६॥
अमृतांशुर्महागर्भो निवृत्तविषयस्पृहः ।
त्रिकालज्ञो मुनिस्साक्षी विहायसगतिः कृती ॥४७॥
पर्जन्यः कुमुदो भूतावासः कमललोचनः ।
श्रीवत्सवक्षाः श्रीवासो वीरहा लक्ष्मणाग्रजः ॥४८॥
लोकाभिरामो लोकारिमर्दनः सेवकप्रियः ।
सनातनतमो मेघश्यामलो राक्षसान्तकृत् ॥४९॥
दिव्यायुधधरः श्रीमानप्रमेयो जितेन्द्रियः ।
भूदेववन्द्यो जनकप्रियकृत्प्रपितामहः ॥५०॥


उत्तमः सात्विकः सत्यः सत्यसंधस्त्रिविक्रमः ।
सुव्रतः सुलभः सूक्ष्मः सुघोषः सुखदः सुधीः ॥५१॥
दामोदरोऽच्युतश्शार्ङ्गी वामनो मधुराधिपः ।
देवकीनन्दनः शौरिः शूरः कैटभमर्दनः ॥५२॥
सप्ततालप्रभेत्ता च मित्रवंशप्रवर्धनः ।
कालस्वरूपी कालात्माकालः कल्याणदःकविः
संवत्सर ऋतुः पक्षो ह्ययनं दिवसो युगः ॥५३॥
स्तव्यो विविक्तो निर्लेपः सर्वव्यापी निराकुलः ।
अनादिनिधनः सर्वलोकपूज्यो निरामयः ॥५४॥
रसो रसज्ञः सारज्ञो लोकसारो रसात्मकः ।
सर्वदुःखातिगो विद्याराशिः परमगोचरः ॥५५॥


शेषो विशेषो विगतकल्मषो रघुनायकः ।
वर्णश्रेष्ठो वर्णवाह्यो वर्ण्यो वर्ण्यगुणोज्ज्वलः ॥५६॥
कर्मसाक्ष्यमरश्रेष्ठो देवदेवः सुखप्रदः ।
देवाधिदेवो देवर्षिर्देवासुरनमस्कृतः ॥५७॥
सर्वदेवमयश्चक्री शार्ङ्गपाणी रघूत्तमः ।
मनो बुद्धिरहंकारः प्रकृतिः पुरुषोऽव्ययः ॥५८॥
अहल्यापावनः स्वामी पितृभक्तो वरप्रदः ।
न्यायो न्यायी नयी श्रीमान्नयो नगधरोध्रुवः ॥५९॥
लक्ष्मीविश्वम्भराभर्ता देवेन्द्रो बलिमर्दनः ।
वाणारिमर्दनो यज्वानुत्तमो मुनिसेवितः ॥६०॥


देवाग्रणीः शिवध्यानतत्परः परमः परः ।
सामगेयः प्रियोऽक्रूरः पुण्यकीर्तिस्सुलोचनः ॥६१॥
पुण्यः पुण्याधिकः पूर्वः पूर्णः पूरयिता रविः ।
जटिलः कल्मषध्वान्तप्रभञ्जनविभावसुः ॥६२॥
अव्यक्तलक्षणोऽव्यक्तो दशास्यद्विपकेसरी ।
कलानिधिः कलानाथो कमलानन्दवर्धनः ॥६३॥
जयी जितारिः सर्वादिः शमनो भवभञ्जनः ।
अलंकरिष्णुरचलो रोचिष्णुर्विक्रमोत्तमः ॥६४॥
आशुः शब्दपतिः शब्दागोचरो रञ्जनो रघुः ।
निश्शब्दः प्रणवो माली स्थूलः सूक्ष्मो विलक्षणः ॥६५॥


आत्मयोनिरयोनिश्च सप्तजिह्वः सहस्रपात् ।
सनातनतमस्स्रग्वी पेशलो जविनां वरः ॥६६॥
शक्तिमाञ्शङ्खभॄन्नाथः गदापद्मरथाङ्गभृत् ।
निरोहो निर्विकल्पश्च चिद्रूपो वीतसाध्वसः ॥६७॥
शताननः सहस्राक्षः शतमूर्तिर्धनप्रभः ।
हृत्पुण्डरीकशयनः कठिनो द्रव एव च ॥६८॥
उग्रो ग्रहपतिः श्रीमान् समर्थोऽनर्थनाशनः ।
अधर्मशत्रू रक्षोघ्नः पुरुहूतः पुरुष्टुतः ॥६९॥
ब्रह्मगर्भो बृहद्गर्भो धर्मधेनुर्धनागमः ।
हिरण्यगर्भोज्योतिष्मान् सुललाटः सुविक्रमः ॥७०॥


शिवपूजारतः श्रीमान् भवानीप्रियकृद्वशी ।
नरो नारायणः श्यामः कपर्दीनीललोहितः ॥७१॥
रुद्रः पशुपतिः स्थाणुर्विश्वामित्रो द्विजेश्वरः ।
मातामहोमातरिश्वाविरिञ्चोविष्टरश्रवाः ॥७२॥
अक्षोभ्यः सर्वभूतानां चण्डः सत्यपराक्रमः ।
वालखिल्यो महाकल्पः कल्पवृक्षः कलाधरः ॥७३॥
निदाघस्तपनोऽमोघः श्लक्ष्णः परबलापहृत् ।
कबन्धमथनो दिव्यः कम्बुग्रीवशिवप्रियः ॥७४॥
शङ्खोऽनिलः सुनिष्पन्नः सुलभः शिशिरात्मकः ।
असंसृष्टोऽतिथिः शूरः प्रमाथी पापनाशकृत् ॥७५॥


वसुश्रवाः कव्यवाहः प्रतप्तो विश्वभोजनः ।
रामोनीलोत्पलश्यामोज्ञानस्कन्धोमहाद्युतिः ॥७६॥
पवित्रपादः पापारिर्मणिपूरो नभोगतिः ।
उत्तारणो दुष्कृतिहा दुर्धर्षो दुस्सहोऽभयः ॥७७॥
अमृतेशोऽमृतवपुर्धर्मी धर्मः कृपाकरः ।
भर्गो विवस्वानादित्यो योगाचार्यो दिवस्पतिः ॥७८॥
उदारकीर्तिरुद्योगी वाङ्मयः सदसन्मयः ।
नक्षत्रमाली नाकेशः स्वाधिष्ठानः षडाश्रयः ॥७९॥
चतुर्वर्गफलो वर्णी शक्तित्रयफलं निधिः ।
निधानगर्भो निर्व्याजो गिरीशो व्यालमर्दनः ॥८०॥


श्रीवल्लभः शिवारम्भः शान्तिर्भद्रः समञ्जसः ।
भूशयो भूतिकृद्भूतिर्भूषणो भूतवाहनः ॥८१॥
अकायो भक्तकायस्थः कालज्ञानी महावटुः ।
परार्थवृत्तिरचलो विविक्तः श्रुतिसागरः ॥८२॥
स्वभावभद्रो मध्यस्थः संसारभयनाशनः ।
वेद्यो वैद्यो वियद्गोप्ता सर्वामरमुनीश्वरः ॥८३॥
सुरेन्द्रः करणं कर्म कर्मकृत्कर्म्यधोक्षजः ।
ध्येयो धुर्यो धराधीशः संकल्पः शर्वरीपतिः ॥८४॥
परमार्थगुरुर्वृद्धः शुचिराश्रितवत्सलः ।
विष्णुर्जिष्णुर्विभुर्वन्द्यो यज्ञेशो यज्ञपालकः ॥८५॥


प्रभविष्णुर्ग्रसिष्णुश्च लोकात्मा लोकभावनः ।
केशवः केशिहा काव्यः कविः कारणकारणम् ॥८६॥
कालकर्ता कालशेषो वासुदेवः पुरुष्टुतः ।
आदिकर्ता वराहश्च माधवो मधुसूदनः ॥८७॥
नारायणो नरो हंसो विष्वक्सेनो जनार्दनः ।
विश्वकर्ता महायज्ञो ज्योतिष्मान् पुरुषोत्तमः ॥८८॥
वैकुण्ठः पुण्डरीकाक्षः कृष्णः सूर्यः सुरार्चितः ।
नारसिंहो महाभीमो वक्रदंष्ट्रो नखायुधः ॥८९॥
आदिदेवो जगत्कर्ता योगीशो गरुडध्वजः ।
गोविन्दोगोपतिर्गोप्ता भूपतिर्भुवनेश्वरः ॥९०॥


पद्मनाभो हृषीकेशो धाता दामोदरः प्रभुः ।
त्रिविक्रमस्त्रिलोकेशो ब्रह्मेशः प्रीतिवर्धनः ॥९१॥
वामनो दुष्टदमनो गोविन्दो गोपवल्लभः ।
भक्तप्रियोऽच्युतः सत्यः सत्यकीर्तिर्धृतिः स्मृतिः ॥९२॥
कारुण्यं करुणो व्यासः पापहा शान्तिवर्धनः ।
संन्यासी शास्त्रतत्वज्ञो मन्दराद्रिनिकेतनः ॥९३॥
बदरीनिलयः शान्तस्तपस्वी वैद्युतप्रभः ।
भूतावासो गुहावासः श्रीनिवासः श्रियः पतिः ॥९४॥
तपोवासो मुदावासः सत्यवासः सनातनः ।
पुरुषः पुष्करः पुण्यः पुष्कराक्षो महेश्वरः ॥९५॥


पूर्णमूर्तिः पुराणज्ञः पुण्यदः प्रीतिवर्धनः ।
शङ्खी चक्री गदी शार्ङ्गी लाङ्गली मुसली हली ॥९६॥
किरीटी कुण्डली हारी मेखली कवची ध्वजी ।
योद्धा जेता महावीर्यः शत्रुजिच्छत्रुतापनः ॥९७॥
शास्ता शास्त्रकरः शास्त्रं शंकर: शंकरस्तुतः ।
सारथिः सात्त्विकः स्वामी सामवेदप्रियः समः ॥९८॥
पवनः संहतः शक्तिः सम्पूर्णाङ्गः समृद्धिमान् ।
स्वर्गदः कामदः श्रीदः कीर्तिदोऽकीर्तिनाशनः ॥९९॥
मोक्षदः पुण्डरीकाक्षः क्षीराब्धिकृतकेतनः ।
सर्वात्मासर्वलोकेशः प्रेरकः पापनाशनः ॥१००॥


सर्वव्यापी जगन्नाथः सर्वलोकमहेश्वरः ।
सर्गस्थित्यन्तकृद्देवः सर्वलोकसुखावहः ॥१०१॥
अक्षय्यः शाश्वतोऽनन्तः क्षयवृद्धिविवर्जितः ।
निर्लेपो निर्गुणः सूक्ष्मो निर्विकारो निरञ्जनः ॥१०२॥
सर्वोपाधिविनिर्मुक्तः सत्तामात्रव्यवस्थितः ।
अधिकारी विभुर्नित्यः परमात्मा सनातनः ॥१०३॥
अचलो निर्मलो व्यापी नित्यतृप्तो निराश्रयः ।
श्यामो युवा लोहिताक्षो दीप्तास्यो मितभाषणः ॥१०४॥
आजानुबाहुः सुमुखः सिंहस्कन्धो महाभुजः ।
सत्यवान् गुणसम्पन्नः स्वयंतेजाः सुदीप्तिमान् ॥१०५॥


कालात्मा भगवान् कालः कालचक्रप्रवर्तकः ।
नारायणः परंज्योतिः परमात्मा सनातनः ॥१०६॥
विश्वसृड्विश्वगोप्ता च विश्वभोक्ता च शाश्वतः ।
विश्वेश्वरो विश्वमूर्तिर्विश्वात्मा विश्वभावनः ॥१०७॥
सर्वभूतसुहृच्छान्तः सर्वभूतानुकम्पनः ।
सर्वेश्वरेश्वरः सर्वः श्रीमानाश्रितवत्सलः ॥१०८॥
सर्वगः सर्वभूतेशः सर्वभूताशयस्थितः ।
अभ्यन्तरस्थस्तमसश्छेत्ता नारायणः परः ॥१०९॥
अनादिनिधनः स्रष्टा प्रजापतिपतिर्हरिः ।
नरसिंहो हृषीकेशः सर्वात्मा सर्वदृग्वशी ॥११०॥


जगतस्तस्थुषश्चैव प्रभुर्नेता सनातनः ।
कर्ता धाता विधाता च सर्वेषां प्रभुरीश्वरः ॥१११॥
सहस्रमूर्तिर्विश्वात्मा विष्णुर्विश्वदृगव्ययः ।
पुराणपुरुषः स्रष्टा सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥११२॥
तत्त्वं नारायणो विष्णुर्वासुदेवः सनातनः ।
परमात्मा परं ब्रह्म सच्चिदानन्दविग्रहः ॥११३॥
परंज्योतिः परंधामः पराकाशः परात्परः ।
अच्युतः पुरुषः कृष्णः शाश्वतः शिव ईश्वरः ॥११४॥
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरुग्रः साक्षी प्रजापतिः ।
हिरण्यगर्भः सविता लोककृल्लोकभृद्विभुः ॥११५॥


रामः श्रीमान् महाविष्णुर्जिष्णुर्देवहितावहः ।
तत्वात्मा तारकं ब्रह्म शाश्वतः सर्वसिद्धिदः ॥११६॥
अकारवाच्योभगवान् श्रीर्भूलीलापतिः पुमान् ।
सर्वलोकेश्वरः श्रीमान् सर्वज्ञः सर्वतोमुखः ॥११७॥
स्वामी सुशीलः सुलभः सर्वज्ञः सर्वशक्तिमान् ।
नित्यः सम्पूर्णकामश्च नैसर्गिकसुहृत्सुखी ॥११८॥
कृपापीयूषजलधिश्शरण्यः सर्वदेहिनाम् ।
श्रीमान्नारायणः स्वामी जगतां पतिरीश्वरः ॥११९॥
श्रीशः शरण्यो भूतानां संश्रिताभीष्टदायकः ।
अनन्तः श्रीपती रामो गुणभृन्निर्गुणो महान् ॥१२०॥


॥ इति श्रीरामसहस्रनामस्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

श्री राम के सिद्ध मंत्र भाग: ३

Ram Mantra, Shri ram ke siddha mantra, shree rama ke siddha mantra, rama mantra, shree ram charitmanas ke siddha mantra Part: 3 , Bhag : 3

श्री राम के सिद्ध मंत्र भाग: ३

विद्या प्राप्ति हेतु
मंत्र :-
गुरु गृहँ गए पढ़न रघुराई।
अलप काल विद्या सब आई॥

ज्ञान-प्राप्ति हेतु
मंत्र :-
छिति जल पावक गगन समीरा।
पंच रचित अति अधम सरीरा॥

शिक्षा में सफ़लता हेतु
मंत्र :-
जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी।
कबि उर अजिर नचावहिं बानी॥
मोरि सुधारिहि सो सब भाँती।
जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती॥

आजीविका प्राप्ति हेतु
मंत्र :-
बिस्व भरण पोषन कर जोई।
ताकर नाम भरत जस होई॥

शीघ्र विवाह हेतु
मंत्र :-
तब जनक पाइ वशिष्ठ आयसु ब्याह साजि सँवारि कै।
मांडवी श्रुतकीरति उरमिला, कुँअरि लई हँकारि कै॥

यात्रा में सफ़लताहेतु
मंत्र :-
प्रबिसि नगर कीजै सब काजा।
ह्रदयँ राखि कोसलपुर राजा॥

पुत्र प्राप्ति हेतु
मंत्र :-
प्रेम मगन कौसल्या निसिदिन जात न जान।
सुत सनेह बस माता बालचरित कर गान॥

सम्पत्ति की प्राप्ति हेतु
मंत्र :-
जे सकाम नर सुनहि जे गावहि।
सुख संपत्ति नाना विधि पावहि॥

ऋद्धि-सिद्धि प्राप्त करने हेतु
मंत्र :-
साधक नाम जपहिं लय लाएँ।
होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ॥

सर्व प्रकार के सुख प्राप्ति हेतु
मंत्र :-
सुनहिं बिमुक्त बिरत अरु बिषई।
लहहिं भगति गति संपति नई॥

अपनी आवश्यक्ता के अनुशार उपरोक्त मंत्र का नियमित जाप करने से लाभ प्ताप्त होता हैं।
श्री रामचरित मानस मे गहरी आस्था रखने वाले व्यक्ति को विशेष एवं शीघ्र लाभ प्राप्त होता हैं।

रामाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रम्

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रामाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रम्


श्रीराघवं दशरथात्मजमप्रमेयं सीतापतिं रघुकुलान्वयरत्नदीपम् ।
आजानुबाहुमरविन्ददलायताक्षं रामं निशाचरविनाशकरं नमामि ॥

वैदेहीसहितं सुरद्रुमतले हैमे महामण्डपे मध्ये पुष्पकमासने मणिमये वीरासने सुस्थितम् ।
अग्रे वाचयति प्रभञ्जनसुते तत्त्वं मुनिभ्यः परं व्याख्यान्तं भरतादिभिः परिवृतं रामं भजे श्यामलम् ॥

श्रीरामो रामभद्रश्च रामचन्द्रश्च शाश्वतः ।
राजीवलोचनः श्रीमान् राजेन्द्रो रघुपुङ्गवः ॥१॥

जानकीवल्लभो जैत्रो जितामित्रो जनार्दनः ।
विश्वामित्रप्रियो दान्तः शत्रुजिच्छत्रुतापनः ॥२॥

वालिप्रमथनो वाग्मी सत्यवाक् सत्यविक्रमः ।
सत्यव्रतो व्रतधरः सदा हनुमदाश्रितः ॥३॥

कौसलेयः खरध्वंसी विराधवधपण्डितः ।
विभीषणपरित्राता हरकोदण्डखण्डनः ॥४॥

सप्ततालप्रभेत्ता च दशग्रीवशिरोहरः ।
जामदग्न्यमहादर्पदलनस्ताटकान्तकः ॥५॥

वेदान्तसारो वेदात्मा भवरोगस्य भेषजम् ।
दूषणत्रिशिरो हन्ता त्रिमूर्तिस्त्रिगुणात्मकः ॥६॥

त्रिविक्रमस्त्रिलोकात्मा पुण्यचारित्रकीर्तनः ।
त्रिलोकरक्षको धन्वी दण्डकारण्यपावनः ॥७॥

अहल्याशापशमनः पितृभक्तो वरप्रदः ।
जितेन्द्रियो जितक्रोधो जितामित्रो जगद्गुरुः ॥८॥

ऋक्षवानरसंघाती चित्रकूटसमाश्रयः ।
जयन्तत्राणवरदः सुमित्रापुत्रसेवितः ॥९॥

सर्वदेवादिदेवश्च मृतवानरजीवनः ।
मायामारीचहन्ता च महादेवो महाभुजः ॥१०॥

सर्वदेवस्तुतः सौम्यो ब्रह्मण्यो मुनिसंस्तुतः ।
महायोगी महोदारः सुग्रीवेप्सितराज्यदः ॥११॥

सर्वपुण्याधिकफलः स्मृतसर्वाघनाशनः ।
आदिदेवो महादेवो महापूरुष एव च ॥१२॥

पुण्योदयो दयासारः पुराणपुरुषोत्तमः ।
स्मितवक्त्रो मिताभाषी पूर्वभाषी च राघवः ॥१३॥

अनन्तगुणगम्भीरो धीरोदात्तगुणोत्तमः ।
मायामानुषचारित्रो महादेवादिपूजितः ॥१४॥

सेतुकृज्जितवारीशः सर्वतीर्थमयो हरिः ।
श्यामाङ्गः सुन्दरः शूरः पीतवासा धनुर्धरः ॥१५॥

सर्वयज्ञाधिपो यज्वा जरामरणवर्जितः ।
शिवलिङ्गप्रतिष्ठाता सर्वावगुणवर्जितः ॥१६॥

परमात्मा परं ब्रह्म सच्चिदानन्दविग्रहः ।
परं ज्योतिः परंधाम पराकाशः परात्परः ॥१७॥

परेशः पारगः पारः सर्वदेवात्मकः परः ॥

श्री राम के सिद्ध मंत्र भाग: २

Ram Mantra, Shri ram ke siddha mantra, shree rama ke siddha mantra, rama mantra, shree ram charitmanas ke siddha mantra Part: 2 , Bhag : 2

श्री राम के सिद्ध मंत्र भाग: २
साभार:- श्री रामचरित मानस

नजर झाड़ने हेतु
मंत्र :-
स्याम गौर सुंदर दोउ जोरी।
निरखहिं छबि जननीं तृन तोरी॥

विष प्रभाव नाश हेतु
मंत्र :-
नाम प्रभाउ जान सिव नीको।
कालकूट फलु दीन्ह अमी को॥

चिन्ता निवारण हेतु
मंत्र :-
जय रघुवंश बनज बन भानू।
गहन दनुज कुल दहन कृशानू॥

मस्तिष्क पीड़ा निवारण हेतु
मंत्र :-
हनूमान अंगद रन गाजे।
हाँक सुनत रजनीचर भाजे॥

रोगों निवारण एवं उपद्रव शांति हेतु
मंत्र :-
दैहिक दैविक भौतिक तापा।
राम राज काहूहिं नहि ब्यापा॥

अकाल मृत्यु भय निवारण हेतु
मंत्र :-
नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहि बाट॥

दरिद्रता निवारण हेतु
मंत्र :-
अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के।
कामद धन दारिद दवारि के॥


आवश्यक्ता के अनुशार उपरोक्त मंत्र का नियमित जाप करने से लाभ प्ताप्त होता हैं।

श्री रामचरित मानस मे गहरी आस्था रखने वाले व्यक्ति को विशेष एवं शीघ्र लाभ प्राप्त होता हैं।

श्री राम ह्रदयम्

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श्री राम ह्रदयम्

श्री गणेशाय नमः ।
श्री महादेव उवाच ।

ततो रामः स्वयं प्राह हनूमंतमुपस्थितम् ।
श्रृणु तत्त्वं प्रवक्ष्यामि ह्यात्मानात्मपरात्मनाम् ॥ १ ॥

आकाशस्य यथा भेदस्त्रिविधो दृश्यते महान् ।
जलाशये महाकाशस्तदवच्छिन्न एव हि ॥ २ ॥

प्रतिबिंबाख्यमपरं दृश्यते त्रिविधं नभः ।
बुद्ध्यवचिन्नचैतन्यमेकं पूर्णमथापरम् ॥ ३ ॥

आभासस्त्वपरं बिंबभूतमेवं त्रिधा चितिः ।
साभासबुद्धेः कर्तुत्वमविच्छिन्नेविकारिणि ॥ ४ ॥

साक्षिण्यारोप्यते भ्रांत्या जीवत्वं च तथाऽबुधैः ।
आभासस्तु मृषाबुद्धिरविद्याकार्यमुच्यते ॥ ५ ॥

अविच्छिन्नं तु तद् ब्रह्म त्रिच्छेदस्तु विकल्पितः ।
विच्छिन्नस्य पूर्णेन एकत्वं प्रतिपाद्यते ॥ ६ ॥

तत्त्वमस्यादिवाक्यैश्‍च साभासस्याहमस्तथा ।
ऐक्यज्ञानं यदोत्पन्नं महावाक्येन चात्मनोः ॥ ७ ॥

तदाऽविद्या स्वकार्येश्च नश्यत्येव न संशयः ।
एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ॥ ८ ॥

मद्भक्‍तिविमुखानां हि शास्त्रगर्तेषु मुह्यताम् ।
न ज्ञानं न च मोक्षःस्यात्तेषां जन्मशतैरपि ॥ ९ ॥

इदं रहस्यं ह्रदयं ममात्मनो मयैव साक्षात्कथितं तवानघ ।
मद्भक्तिहीनाय शठाय च त्वया दातव्यमैन्द्रादपि राज्यतोऽधिकम् ॥ १० ॥


॥  इति श्रीमदध्यात्मरामायण-बालकांडोक्तं श्रीरामह्रदयं संपूर्णम् ॥

सोमवार, मार्च 22, 2010

अथ श्रीरामस्तोत्र

Atha shree rama stotra, ram stotra, rama strotra,

अथ श्री रामस्तोत्र


कल्याणानां निधानं कलिमलमथनं पावनं पावनानां
पाथेयं यन्मुमुक्षोः सपदि परमपदप्राप्तये प्रस्थितस्य ।
विश्रामस्थानमेकं कविवरवचसां जीवनं सज्जनानां
बीजं धर्मद्रुमस्य प्रभवतु भवतां भूतये रामनाम ॥

श्री राम के सिद्धमंत्र भाग: १

Ram Mantra, Shri ram ke siddha mantra, shree rama ke siddha mantra, rama mantra, shree ram charitmanas ke siddha mantra Part: 1 , Bhag : 1

श्री राम के सिद्धमंत्र भाग: १
साभार:- श्री रामचरित मानस


विपत्ति नाश हेतु
मंत्र :-
राजिव नयन धरें धनु सायक।
भगत बिपति भंजन सुखदायक॥

संकट नाश हेतु
मंत्र :-
जौं प्रभु दीन दयालु कहावा।
आरति हरन बेद जसु गावा॥
जपहिं नामु जन आरत भारी।
मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी॥
दीन दयाल बिरिदु संभारी।
हरहु नाथ मम संकट भारी॥

क्लेश निवारण हेतु
मंत्र :-
हरन कठिन कलि कलुष कलेसू।
महामोह निसि दलन दिनेसू॥

विघ्न नाश हेतु
मंत्र :-
सकल विघ्न व्यापहिं नहिं तेही।
राम सुकृपाँ बिलोकहिं जेही॥

आपत्ति के विनाश हेतु
मंत्र :-
प्रनवउँ पवन कुमार,खल बन पावक ग्यान घन।
जासु ह्रदयँ आगार, बसहिं राम सर चाप धर॥



अपनी आवश्यक्ता के अनुशार उपरोक्त मंत्र का नियमित जाप करने से लाभ प्ताप्त होता हैं।

श्री रामचरित मानस मे गहरी आस्था रखने वाले व्यक्ति को विशेष एवं शीघ्र लाभ प्राप्त होता हैं।

शुक्रवार, मार्च 19, 2010

भूमि परीक्षण और वास्तु भाग: ६

Bhoomi Parikshan aur vastu bhaga :6 , Bhumi Pareekshan or Vastu Part: 6

 

 
भूमि परीक्षण और वास्तु भाग: ६

 
जिस भूमि को खोदने पर उसमे से यदि भस्म, अंगार, हड्डियाँ, सर्प, भूसी, केश, कोयला इआदि निकलें, वह भूमि को अशुभ समझना चाहिये ।

 
जिस भूमि को खोदने पर उसमे से काष्ट पदार्थ (लकड़ी) मिलेतो वहा अग्नि भय होता हैं। हड्डियाँ मिलेतो तो कुलका नाश होता हैं। सर्प दिखे तो चोरका भय होता हैं। यदि कोयला मिलेतो रोग एवं मृत्यु भय होता हैं। भूसी मिलेतो धन-संपदा का नाश होता हैं ।

 
जिस भूमि को खोदने पर उसमे से यदि पत्थर, ईंट, कंकड़, शंख आदि निकलें तो उस भूमिको शुभ समझना चाहिये ।

 
भविष्यपुराण के अनुशार जलके ऊपर निवास हेतु भवन नहीं बनवाना चाहिये।

 
मंदिर या देव स्थान के ऊपर निवास हेतु भवन नहीं बनवाना चाहिये।

 
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निवास हेतु उत्तम भूमि

  • ब्राह्मण के लिये घृत के समान गन्धवाली भूमि उत्तम एवं शुभ होती हैं।
  • क्षत्रिय के लिये रक्त के समान गन्धवाली भूमि उत्तम एवं शुभ होती है।
  • वैश्य के लिये अन्न के समान गन्धवाली भूमि उत्तम एवं शुभ होती हैं।
  • शूद्र के लिये मद्य(मधु/महु) के समान गन्धवाली भूमि उत्तम एवं शुभ होती हैं।

 
स्वाद एवं भूमि परिक्षण
  • मीठे स्वाद वाली भूमि सब वर्णों के उत्तम एवं शुभ होती हैं।
  • ब्राह्मण के लिये मीठे स्वाद वाली मिट्टी उत्तम एवं शुभ होती हैं।
  • क्षत्रिय के लिये कषैले स्वाद वाली मिट्टी उत्तम एवं शुभ होती हैं।
  • वैश्य के लिये खट्टे स्वाद वाली मिट्टी उत्तम एवं शुभ होती है।
  • शूद्र के लिये कड़वे स्वाद वाली मिट्टी उत्तम एवं शुभ होती हैं।

भवान्यष्टकम्‌

BhavanyaShtakam, Bhavani Ashtakam, Bhavany aShtakam,

॥ भवान्यष्टकम्‌ ॥

न तातो न माता न बन्धुर्न दाता
न पुत्रो न पुत्री न भृत्यो न भर्ता।
न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥१॥

भवाब्धावपारे महादुःखभीरुः
पपात प्रकामी प्रलोभी प्रमत्तः।
कुसंसार-पाश-प्रबद्धः सदाऽहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥२॥

न जानामि दानं न च ध्यान-योगं
न जानामि तंत्र न च स्तोत्र-मन्त्रम्‌।
न जानामि पूजां न च न्यासयोगं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥३॥

न जानामि पुण्यं न जानानि तीर्थं
न जानामि मुक्तिं लयं वा कदाचित्‌।
न जानामि भक्ति व्रतं वाऽपि मात-
र्गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥४॥

कुकर्मी कुसंगी कुबुद्धि कुदासः
कुलाचारहीनः कदाचारलीनः।
कुदृष्टिः कुवाक्यप्रबंधः सदाऽह
गतिस्त्व गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥५॥

प्रजेशं रमेशं महेशं सुरेशं
दिनेशं निशीथेश्वरं वा कदाचित्‌।
न जानामि चाऽन्यत्‌ सदाऽहं शरण्ये
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥६॥

विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे
जले चाऽनले पर्वते शत्रुमध्ये।
अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥७॥

अनाथो दरिद्रो जरा-रोगयुक्तो
महाक्षीणदीनः सदा जाड्यवक्त्रः।
विपत्तौ प्रविष्टः प्रणष्टः सदाऽहं
गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि॥८॥

॥ इति श्रीभवान्यष्टकं संपूर्णम्‌ ॥

बुधवार, मार्च 17, 2010

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दुर्गाष्टकम्‌

Durga Ashtakam, Durgasthkam

दुर्गाष्टकम्‌

दुर्गे परेशि शुभदेशि परात्परेशि।
वन्द्ये महेशदयितेकरुणार्णवेशि।
स्तुत्ये स्वधे सकलतापहरे सुरेशि।
कृष्णस्तुते कुरु कृपां ललितेऽखिलेशि॥१॥

दिव्ये नुते श्रुतिशतैर्विमले भवेशि।
कन्दर्पदारशतयुन्दरि माधवेशि।
मेधे गिरीशतनये नियते शिवेशि।
कृष्णस्तुते कुरु कृपां ललितेऽखिलेशि॥२॥

रासेश्वरि प्रणततापहरे कुलेशि।
धर्मप्रिये भयहरे वरदाग्रगेशि।
वाग्देवते विधिनुते कमलासनेशि।
कृष्णस्तुतेकुरु कृपां ललितेऽखिलेशि॥३॥

पूज्ये महावृषभवाहिनि मंगलेशि।
पद्मे दिगम्बरि महेश्वरि काननेशि।
रम्येधरे सकलदेवनुते गयेशि।
कृष्णस्तुते कुरु कृपा ललितेऽखिलेशि॥४॥

श्रद्धे सुराऽसुरनुते सकले जलेशि।
गंगे गिरीशदयिते गणनायकेशि।
दक्षे स्मशाननिलये सुरनायकेशि।
कृष्णस्तुते कुरु कृपां ललितेऽखिलेशि॥५॥

तारे कृपार्द्रनयने मधुकैटभेशि।
विद्येश्वरेश्वरि यमे निखलाक्षरेशि।
ऊर्जे चतुःस्तनि सनातनि मुक्तकेशि।
कृष्णस्तुते कुरु कृपां ललितऽखिलेशि॥६॥

मोक्षेऽस्थिरे त्रिपुरसुन्दरिपाटलेशि।
माहेश्वरि त्रिनयने प्रबले मखेशि।
तृष्णे तरंगिणि बले गतिदे ध्रुवेशि।
कृष्णस्तुते कुरु कृपां ललितेऽखिलेशि॥७॥

विश्वम्भरे सकलदे विदिते जयेशि।
विन्ध्यस्थिते शशिमुखि क्षणदे दयेशि।
मातः सरोजनयने रसिके स्मरेशि।
कृष्णस्तुते कुरु कृपां ललितेऽखिलेशि॥८॥

दुर्गाष्टकं पठति यः प्रयतः प्रभाते
सर्वार्थदं हरिहरादिनुतां वरेण्याम्‌।
दुर्गां सुपूज्य महितां विविधोपचारैः
प्राप्नोति वांछितफलं न चिरान्मनुष्यः॥९॥

॥ इति श्री दुर्गाष्टकं सम्पूर्णम्‌ ॥

दुर्गा चालीसा

Shree Durga chalisa, shri dirga chalisa,

॥ श्री दुर्गा चालीसा ॥

नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो दुर्गे दुःख हरनी॥

निरंकार है ज्योति तुम्हारी। तिहूँ लोक फैली उजियारी॥

शशि ललाट मुख महाविशाला। नेत्र लाल भृकुटि विकराला॥

रूप मातु को अधिक सुहावे। दरश करत जन अति सुख पावे॥

तुम संसार शक्ति लै कीना। पालन हेतु अन्न धन दीना॥

अन्नपूर्णा हुई जग पाला। तुम ही आदि सुन्दरी बाला॥

प्रलयकाल सब नाशन हारी। तुम गौरी शिवशंकर प्यारी॥

शिव योगी तुम्हरे गुण गावें। ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें॥

रूप सरस्वती को तुम धारा। दे सुबुद्धि ऋषि मुनिन उबारा॥

धरयो रूप नरसिंह को अम्बा। परगट भई फाड़कर खम्बा॥

रक्षा करि प्रह्लाद बचायो। हिरण्याक्ष को स्वर्ग पठायो॥

लक्ष्मी रूप धरो जग माहीं। श्री नारायण अंग समाहीं॥

क्षीरसिन्धु में करत विलासा। दयासिन्धु दीजै मन आसा॥

हिंगलाज में तुम्हीं भवानी। महिमा अमित न जात बखानी॥

मातंगी अरु धूमावति माता। भुवनेश्वरी बगला सुख दाता॥

श्री भैरव तारा जग तारिणी। छिन्न भाल भव दुःख निवारिणी॥

केहरि वाहन सोह भवानी। लांगुर वीर चलत अगवानी॥

कर में खप्पर खड्ग विराजै। जाको देख काल डर भाजै॥

सोहै अस्त्र और त्रिशूला। जाते उठत शत्रु हिय शूला॥

नगरकोट में तुम्हीं विराजत। तिहुँलोक में डंका बाजत॥

शुम्भ निशुम्भ दानव तुम मारे। रक्तबीज शंखन संहारे॥

महिषासुर नृप अति अभिमानी। जेहि अघ भार मही अकुलानी॥

रूप कराल कालिका धारा। सेन सहित तुम तिहि संहारा॥

परी गाढ़ सन्तन पर जब जब। भई सहाय मातु तुम तब तब॥

अमरपुरी अरु बासव लोका। तब महिमा सब रहें अशोका॥

ज्वाला में है ज्योति तुम्हारी। तुम्हें सदा पूजें नर-नारी॥

प्रेम भक्ति से जो यश गावें। दुःख दारिद्र निकट नहिं आवें॥

ध्यावे तुम्हें जो नर मन लाई। जन्म-मरण ताकौ छुटि जाई॥

जोगी सुर मुनि कहत पुकारी। योग न हो बिन शक्ति तुम्हारी॥

शंकर आचारज तप कीनो। काम अरु क्रोध जीति सब लीनो॥

निशिदिन ध्यान धरो शंकर को। काहु काल नहिं सुमिरो तुमको॥

शक्ति रूप का मरम न पायो। शक्ति गई तब मन पछितायो॥

शरणागत हुई कीर्ति बखानी। जय जय जय जगदम्ब भवानी॥

भई प्रसन्न आदि जगदम्बा। दई शक्ति नहिं कीन विलम्बा॥

मोको मातु कष्ट अति घेरो। तुम बिन कौन हरै दुःख मेरो॥

आशा तृष्णा निपट सतावें। मोह मदादिक सब बिनशावें॥

शत्रु नाश कीजै महारानी। सुमिरौं इकचित तुम्हें भवानी॥

करो कृपा हे मातु दयाला। ऋद्धि-सिद्धि दै करहु निहाला।

जब लगि जिऊँ दया फल पाऊँ । तुम्हरो यश मैं सदा सुनाऊँ ॥

दुर्गा चालीसा जो कोई गावै। सब सुख भोग परमपद पावै॥

देवीदास शरण निज जानी। करहु कृपा जगदम्ब भवानी॥

॥ इति श्री दुर्गा चालीसा सम्पूर्णम् ॥

सिद्धकुंजिका स्तोत्रम्‌

Siddha Kunjika Stotra, shiddha kunjika stotra, Siddha Kunjika strotra,
॥ सिद्धकुंजिकास्तोत्रम्‌ ॥
शिव उवाच
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम्‌।
येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत्‌॥१॥

न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्‌।
न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम्‌॥२॥

कुंजिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्‌।
अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्‌॥३॥

गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति।
मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्‌।
पाठमात्रेण संसिद्ध्‌येत्‌ कुंजिकास्तोत्रमुत्तमम्‌॥४॥

अथ मंत्र
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे। ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा

॥ इति मंत्रः॥

नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि।
नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि॥१॥

नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि।
जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे॥२॥

ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका।
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते॥३॥

चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी॥४॥

विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मंत्ररूपिणि।
धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी॥५॥

क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु॥६॥
हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी।

भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः
अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं॥७॥

धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा॥
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा ॥८॥

सां सीं सूं सप्तशती देव्या मंत्रसिद्धिं कुरुष्व मे॥
इदं तु कुंजिकास्तोत्रं मंत्रजागर्तिहेतवे।

अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति॥
यस्तु कुंजिकया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत्‌।
न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा॥

। इति श्री कुंजिकास्तोत्रम् संपूर्णम्‌ ।

मंगलवार, मार्च 16, 2010

दुर्गा के अचुक प्रभावी मंत्र- 4

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माँ दुर्गा के अचुक प्रभावी मंत्र-4


 विश्व की रक्षा हेतु:


या श्री: स्वयं सुकृतिनां भवनेष्वलक्ष्मी: पापात्मनां कृतधियां हृदयेषु बुद्धि:।
श्रद्धा सतां कुलजनप्रभवस्य लज्जा तां त्वां नता: स्म परिपालय देवि विश्वम्॥

भावार्थ :- जो पुण्यात्माओं के घरों में स्वयं ही लक्ष्मीरूप से, पापियों के यहाँ दरिद्रतारूप से, शुद्ध अन्त:करणवाले पुरुषों के हृदय में बुद्धिरूप से, सत्पुरुषों में श्रद्धारूप से तथा कुलीन मनुष्य में लज्जारूप से निवास करती हैं, उन आप भगवती दुर्गा को हम नमस्कार करते हैं। देवि! आप सम्पूर्ण विश्व का पालन कीजिये।


विश्वव्यापी विपत्तियों के नाश हेतु:

देवि प्रपन्नार्तिहरे प्रसीद प्रसीद मातर्जगतोऽखिलस्य।

प्रसीद विश्वेश्वरि पाहि विश्वं त्वमीश्वरी देवि चराचरस्य॥

अर्थ :- शरणागत की पीडा दूर करनेवाली देवि! हमपर प्रसन्न होओ। सम्पूर्ण जगत् की माता! प्रसन्न होओ। विश्वेश्वरि! विश्व की रक्षा करो। देवि! तुम्हीं चराचर जगत् की अधीश्वरी हो।

विश्व के पाप-ताप निवारण हेतु:

देवि प्रसीद परिपालय नोऽरिभीतेर्नित्यं यथासुरवधादधुनैव सद्य:।
पापानि सर्वजगतां प्रशमं नयाशु उत्पातपाकजनितांश्च महोपसर्गान्॥

भावार्थ :-  देवि! प्रसन्न होओ। जैसे इस समय असुरों का वध करके तुमने शीघ्र ही हमारी रक्षा की है, उसी प्रकार सदा हमें शत्रुओं के भय से बचाओ। सम्पूर्ण जगत् का पाप नष्ट कर दो और उत्पात एवं पापों के फलस्वरूप प्राप्त होनेवाले महामारी आदि बडे-बडे उपद्रवों को शीघ्र दूर करो।



विश्व के अशुभ तथा भय का विनाश करने हेतु:

यस्या: प्रभावमतुलं भगवाननन्तो ब्रह्मा हरश्च न हि वक्तु मलं बलं च।
सा चण्डिकाखिलजगत्परिपालनाय नाशाय चाशुभभयस्य मतिं करोतु॥

भावार्थ :- जिनके अनुपम प्रभाव और बल का वर्णन करने में भगवान् शेषनाग, ब्रह्माजी तथा महादेवजी भी समर्थ नहीं हैं, वे भगवती चण्डिका सम्पूर्ण जगत् का पालन एवं अशुभ भय का नाश करने का विचार करें।



सामूहिक कल्याण हेतु:

देव्या यया ततमिदं जगदात्मशक्त्या निश्शेषदेवगणशक्ति समूहमूत्र्या।
तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां भक्त्या नता: स्म विदधातु शुभानि सा न:॥

भावार्थ :- सम्पूर्ण देवताओं की शक्ति का समुदाय ही जिनका स्वरूप है तथा जिन देवी ने अपनी शक्ति से सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त कर रखा है, समस्त देवताओं और महर्षियों की पूजनीया उन जगदम्बा को हम भक्ति पूर्वक नमस्कार करते हैं। वे हमलोगों का कल्याण करें।

विक्रम संवत् 2067 कि शुभ कामना

Vikram Samvat 2067 ki shubha kamana

गुरुत्व कार्यालय परिवार कि और से आपको एवं आपके परिवार को विक्रम संवत् 2067 शुभ कामनाए।
आपका जीवन सुखमय एवं मंगलमय हो। आप दिन प्रति-दिन सफलताको प्राप्त कर आपने जीवन मे समस्त प्रकार कि सुख-समृद्धि एवं ऎश्वर्य को प्राप्त करें।

आप श्री को नवरात्र के पावन अवसर पर माँ दुर्गा- माँ लक्ष्मी एवं माँ सरस्वती का विशेष आशिर्वाद प्राप्त हो एसी शुभ कामना।

सोमवार, मार्च 15, 2010

सोमवती अमावस्या का महत्व

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सोमवती अमावस्या का महत्व

जिस सोमवार को अमावस्या पडती हो उसे सोमवती अमावस्या कहा जाता है। सोमवती अमावस्या के दिन व्रत रखने का विधान है। सोमवती अमावस्या के दिन स्नान-दान को सर्वश्रेष्ठ माना जाता हैं।

धर्म ग्रंथों के मत से सोमवार को अमावस्या बड़े भाग्य से ही पड़ती है, क्योकि पांडव अपने पूरे जीवन में सोमवती अमावस्या के संयोग हेतु तरसते रहें लेकिन उनहे यह अवसर जीवन भर प्राप्त नहीं हुवा।

सोमवती अमावस्या के दिन मौन धारण कर स्नान-ध्यान-दान करने से सहस्त्र्र गौ-दान के समान पुण्य प्राप्त होता हैं एसा महर्षि व्यास का कथन हैं।

सोमवती अमावस्या के अवसर पर पवित्र तीर्थ स्थलो-नदि एवं जल कुंड-सरोवर में श्रद्धालु प्रातः ब्रह्म मुहूर्त के साथ स्नान प्रांरभ करते हैं एवं देर शाम तक यह चलता हैं।

सोमवती अमावस्या पर पीपल कि १०८ बार परिक्रमा करते हुए पीपल तथा विष्णु के पूजन का विधान बताया हैं। परिक्रमा के साथ में फल या अन्य कुछ दान स्वरुप विद्वान ब्राह्मण को देना चाहिये इस्से सोमवती अमावस्या के पूणय का विशेष लाभ प्राप्त होता हैं।

सोमवती अमावस्या के दिन भारत कि प्रमुख नदियों एवं तीर्थ स्थानो पर स्नान, गौदान, अन्नदान, ब्राह्मण भोजन, वस्त्र, स्वर्ण आदि दान का विशेष महत्व माना गया है।

इसी वजह से हर सोमवती अमावस्या पर गंगा तट पर श्रद्धालुओ का ताता लगा रहता हैं।

दुर्गा के अचुक प्रभावी मंत्र-3

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माँ दुर्गा के अचुक प्रभावी मंत्र-3


आरोग्य और सौभाग्य की प्राप्ति हेतु:


देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥

भावार्थ :-मुझे सौभाग्य और आरोग्य दो। परम सुख दो, रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि मेरे शत्रुओं का नाश करो।

महामारी नाश हेतु:

जयन्ती मङ्गला काली भद्रकाली कपालिनी।

दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधा नमोऽस्तु ते॥

भावार्थ :-जयन्ती, मङ्गला, काली, भद्रकाली, कपालिनी, दुर्गा, क्षमा, शिवा, धात्री, स्वाहा और स्वधा- इन नामों से प्रसिद्ध जगदम्बिके! तुम्हें मेरा नमस्कार हो।



रोग नाश हेतु:

रोगानशेषानपहंसि तुष्टा रुष्टा तु कामान् सकलानभीष्टान्।
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति॥

भावार्थ :-देवि! तुमहारे प्रसन्न होने पर सब रोगों को नष्ट कर देती हो और कुपित होने पर मनोवाछित सभी कामनाओं का नाश कर देती हो। जो लोग तुम्हारी शरण में जा चुके हैं, उन पर विपत्ति तो आती ही नहीं। तुम्हारी शरण में गये हुए मनुष्य दूसरों को शरण देनेवाले हो जाते हैं।

शुक्रवार, मार्च 12, 2010

दुर्गा के अचुक प्रभावी मंत्र - 2

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माँ दुर्गा के अचुक प्रभावी मंत्र-2

सर्व प्रकार के कल्याण हेतु:


सर्वमङ्गलमङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

भावार्थ :- नारायणी! आप सब प्रकार का मङ्गल प्रदान करनेवाली मङ्गलमयी हो। कल्याणदायिनी शिवा हो। सब पुरुषार्थो को सिद्ध करनेवाली, शरणागतवत्सला, तीन नेत्रोंवाली एवं गौरी हो। आपको नमस्कार हैं।

व्यक्ति दु:ख, दरिद्रता और भय से परेशान हो चाहकर भी या परीश्रम के उपरांत भी सफलता प्राप्त नहीं होरही हों तो इस मत्र का प्रयोग करें।




सुलक्षणा पत्‍‌नी की प्राप्ति हेतु:


पत्‍‌नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्।
तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्॥

भावार्थ :-  मन की इच्छा के अनुसार चलनेवाली मनोहर पत्‍‌नी प्रदान करो, जो दुर्गम संसारसागर से तारनेवाली तथा उत्तम कुल में उत्पन्न हुई हो।



रक्षा प्राप्ति हेतु:

शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके।
घण्टास्वनेन न: पाहि चापज्यानि:स्वनेन च॥

भावार्थ :- देवि! आप शूल से हमारी रक्षा करें। अम्बिके! आप खड्ग से भी हमारी रक्षा करें तथा घण्टा की ध्वनि और धनुष की टंकार से भी हमलोगों की रक्षा करें।
 
देह को सुरक्षित रखने हेतु एवं उसे किसी भी प्रकार कि चोट या हानी या किसी भी प्रकार के अस्त्र-सस्त्र से सुरक्षित रखने हेतु इस मंत्र का श्रद्धा से नियम पूर्वक जाप करें।
 

 
विद्या प्राप्ति एवं मातृभाव हेतु:

विद्या: समस्तास्तव देवि भेदा: स्त्रिय: समस्ता: सकला जगत्सु।
त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् का ते स्तुति: स्तव्यपरा  परोक्तिः॥

भावार्थ :- देवि! विश्वकि सम्पूर्ण विद्याएँ तुम्हारे ही भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं। जगत् में जितनी स्त्रियाँ हैं, वे सब तुम्हारी ही मूर्तियाँ हैं। जगदम्ब! एकमात्र तुमने ही इस विश्व को व्याप्त कर रखा है। तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है? तुम तो स्तवन करने योग्य पदार्थो से परे हो।
 
समस्त प्रकार कि विद्याओं की प्राप्ति हेतु और समस्त स्त्रियों में मातृभाव की प्राप्ति के लिये इस मंत्रका पाठ करें।



शक्ति प्राप्ति हेतु:


सृष्टिस्थितिविनाशानां शक्ति भूते सनातनि।
गुणाश्रये गुणमये नारायणि नमोऽस्तु ते॥

भावार्थ :- तुम सृष्टि, पालन और संहार करने वाली शक्ति भूता, सनातनी देवी, गुणों का आधार तथा सर्वगुणमयी हो। नारायणि! तुम्हें नमस्कार है।



प्रसन्नता की प्राप्ति हेतु:

प्रणतानां प्रसीद त्वं देवि विश्वार्तिहारिणि।
त्रैलोक्यवासिनामीडये लोकानां वरदा भव॥

भावार्थ :- विश्व की पीडा दूर करनेवाली देवि! हम तुम्हारे चरणों पर पडे हुए हैं, हमपर प्रसन्न होओ। त्रिलोकनिवासियों की पूजनीय परमेश्वरि! सब लोगों को वरदान दो।

दुर्गा के अचुक प्रभावी मंत्र -1

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माँ दुर्गा के अचुक प्रभावी मंत्र

     ब्रह्माजी ने मनुष्यों कि रक्षा हेतु मार्कण्डेय पुराण में कुछ परमगोपनीय साधन-कल्याणकारी देवी कवच एवं परम पवित्र उपायो का उल्लेख किया गया हैं, जिस्से साधारण से साधारण व्यक्ति जिसे माँ दुर्गा पूजा अर्चना के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं होने पर भी विशेष लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
 माँ दुर्गा के इन मंत्रो का जाप प्रति दिन भी कर सकते हैं। पर नवरात्र में जाप करने से शीघ्र प्रभाव देखा गया हैं।

सर्व प्रकार कि बाधा मुक्ति हेतु:

  
 सर्वाबाधाविनिर्मुक्तो धनधान्यसुतान्वितः।
मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशयः॥

  
भावार्थ :- मनुष्य मेरे प्रसाद से सब बाधाओं से मुक्त तथा धन, धान्य एवं पुत्र से सम्पन्न होगा- इसमें जरा भी संदेह नहीं है।

किसी भी प्रकार के संकट या बाधा कि आशंका होने पर इस मंत्र का प्रयोग करें।
उक्त मंत्र का श्रद्धा से जाप करने से व्यक्ति सभी प्रकार की बाधा से मुक्त होकर धन-धान्य एवं पुत्र की प्राप्ति होती हैं।


बाधा शान्ति हेतु:


सर्वाबाधाप्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरि।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्॥

भावार्थ :-सर्वेश्वरि! तुम इसी प्रकार तीनों लोकों की समस्त बाधाओं को शान्त करो और हमारे शत्रुओं का नाश करती रहो।


विपत्ति नाश हेतु:


शरणागतदीनार्तपरित्राणपरायणे।
सर्वस्यार्तिहरे देवि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

भावार्थ :-शरण में आये हुए दीनों एवं पीडितों की रक्षा में संलग्न रहनेवाली तथा सबकी पीडा दूर करनेवाली नारायणी देवी! तुम्हें नमस्कार है।

 

पाप नाश हेतु:


हिनस्ति दैत्यतेजांसि स्वनेनापूर्य या जगत्।
सा घण्टा पातु नो देवि पापेभ्योऽन: सुतानिव॥

भावार्थ :- देवि! जो अपनी ध्वनि से सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त करके दैत्यों के तेज नष्ट किये देता है, वह तुम्हारा घण्टा हमलोगों की पापों से उसी प्रकार रक्षा करे, जैसे माता अपने पुत्रों की बुरे कर्मो से रक्षा करती है।
 
 
भय नाश हेतु:

सर्वस्वरूपे सर्वेशे सर्वशक्ति समन्विते।
भयेभ्याहि नो देवि दुर्गे देवि नमोऽस्तु ते॥

एतत्ते वदनं सौम्यं लोचनत्रयभूषितम्।
पातु न: सर्वभीतिभ्य: कात्यायनि नमोऽस्तु ते॥

ज्वालाकरालमत्युग्रमशेषासुरसूदनम्।
त्रिशूलं पातु नो भीतेर्भद्रकालि नमोऽस्तु ते॥

भावार्थ :- सर्वस्वरूपा, सर्वेश्वरी तथा सब प्रकार की शक्ति यों से सम्पन्न दिव्यरूपा दुर्गे देवि! सब भयों से हमारी रक्षा करो; तुम्हें नमस्कार है। कात्यायनी! यह तीन लोचनों से विभूषित तुम्हारा सौम्य मुख सब प्रकार के भयों से हमारी रक्षा करे। तुम्हें नमस्कार है। भद्रकाली! ज्वालाओं के कारण विकराल प्रतीत होनेवाला, अत्यन्त भयंकर और समस्त असुरों का संहार करनेवाला तुम्हारा त्रिशूल भय से हमें बचाये। तुम्हें नमस्कार है।
 
 
 
विपत्तिनाश और शुभ की प्राप्ति हेतु:


करोतु सा न: शुभहेतुरीश्वरी शुभानि भद्राण्यभिहन्तु चापदः।

भावार्थ :- वह कल्याण की साधनभूता ईश्वरी हमारा कल्याण और मङ्गल करे तथा सारी आपत्तियों का नाश कर डाले।

वास्तु एवं भोजन

Vastu evm Bhojan , vaastu and Food
वास्तु एवं भोजन


  • भोजन की सामग्री रसोई घर में ही रहती हो तो उसे हटा दें और दक्षिण दिशा में रखे।
  • घर के ब्रह्म स्थान पर बैठकर भोजन ग्रहण नहीं करना चाहिये। और नाहीं रखना चाहिये।
  • ब्रह्म स्थान पर बैठकर भोजन करने से रसोई का खर्च बढ़ता रहता हैं एवं घर मे अनावश्यक वाद-विवाद बढते हैं।
  • घर के वायव्य कोण में बैठकर भोजन ग्रहण करने से जरुरत से ज्यादा खाने की आदत होजाती हैं।
  • घर के नैऋत्य कोण में बैठकर भोजन ग्रहण करने से कहाजाता हैं व्यक्ति में आसुरी शक्ति प्रवृत होति हैं एवं उस्का मोटापा बढने कि संभावना अधिक रहती हैं।

गुरुवार, मार्च 11, 2010

भारतिय संस्कृति मे मुहूर्त का महत्व

Bharatiya sanskruti me mahurat ka mahatva
भारतिय संस्कृति मे मुहूर्त का महत्व


भारतिय संस्कृति मे मुहूर्त का विशेष महत्व हैं। हमारे ऋषि-मुनि विद्वान आचार्यों ने जन्म से अंत्येष्टि(मृत व्यक्ति कि अंतिम क्रिया) तक सभी संस्कारों एवं अन्य सभी मांगलिक कार्यों के लिए मुहूर्त का विधान आवश्यक बताया गया हैं।

किसी कार्य विशेष में सफलता कि प्ताप्ति हेतु निश्चित मुहूर्त का चुनाव किया जाता हैं।
भारतीय ज्योतिष सिद्धान्त के अनुशार हर मुहूर्त का अपना वैज्ञानिक प्रभाव एवं महत्व हैं।
कोई भी व्यक्ति इन मुहूर्त के प्रभाव एवं महत्व के बारे मे पूर्ण जानकारी प्राप्त कर व्यक्ति अपने किसी भी कार्य उद्देश्य में विशेष सफलता प्राप्ति हेतु उचित मुहूर्त का चुनाव कर सफलता प्राप्ति कि संभावना बढा सकते हैं। एवं ज्योतिषीय मत से शुभ फल प्रदान करने वाले मुहूर्त में किये गये कार्यो में उस कार्य की सफलता की संभावना कई गुणा बढ़ जाती है।

प्रायः हर मुहूर्त का निर्णय ब्रह्मांड में स्थित ग्रहो कि स्थितियों कि गणना कर किया जाता हैं। भारतिय संस्कृति में प्रायः हर शुभ कार्य में भारत के प्रमुख 16 संस्कारो को संपन्न करने हेतु मुहूर्त का चुनाव अति आवश्यक माना गया हैं। क्योकि शुभा मुहूर्त में किये गये हर शुभ कार्य अत्याधिक शुभ फल प्रदान करने वाले होते हैं।