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शुक्रवार, नवंबर 19, 2010

शान्ताकारम स्लोक

Shantakaram

॥शान्ताकारम॥


स्लोकः
शान्ताकारम भुजगशयनम पद्मनाभम सुरेशं ।
विश्वधारम गगन सदृशं मेघवर्णम शुभान्गम ।।

लक्ष्मिकानतम कमलनयनम योगभिरध्यानगम्य्म ।
वंदे विष्णुँ भवभयहरम सर्वलोकैकनाथम ।।

जन्म कुंडली में नीच लग्नेश से रोग और परेशानी? (भाग:२)

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जन्म कुंडली में नीच लग्नेश से रोग और परेशानी? (भाग:२)

सिंह लग्न :
सिंह लग्न वाले जातकों का सूर्य तृतीय में होगा तो नीच का होगा या नेत्र, हृदय एवं हड्डी से संबंधित बीमारी अवश्य होगी। ऐसा जातक कुंठित होगा। पराक्रमहीन होगा व बुरे कार्य में बल दिखाने वाला होगा। ऐसा जातक व्यर्थ की बातों को लेकर झगड़े में पड़ने वाला होगा। इनके छोटे भाई-बहन नहीं होंगे। यदि किसी कारणवश हुए भी तो उनसे लड़ता-झगड़ता रहेगा, लेकिन ये स्वयं भाग्यशाली होंगे क्योंकि भाग्य पर उच्च दृष्टि पड़ेगी। अनिष्ट प्रभाव को कम करने के लिए माणिक स्वर्ण में बनवाकर शुक्ल पक्ष को 9 से 10 के बीच पहनें व सूर्यदेव को प्रातः दूध मिला जल चढ़ाएँ।उपरोक्त परेशानी होने पर व्यक्ति को
सूर्य ग्रह कि शांति हेतु गेहूँ, ताँबा, घी, गुड़, माणिक्य, लाल कपड़ा, मसूरकी दाल, कनेर या कमल के फूल, गौ दान करने से शुभ फल कि प्राप्ति होती हैं

कन्या लग्न :
कन्या लग्न वाले जातकों का बुध दशमेश होकर सप्तम भाव में नीच का होने से दैनिक व्यापार-व्यवसाय में हानि, पार्टनर से धोखा, बेवफा पत्नी या पति मिलता है। ऐसा जातक शारीरिक दृष्टि से प्रभावी होता है, लेकिन नौकरी में सदैव परेशानियों से गुजरने वाला तथा शासन से अपयश ही मिलता है। ऐसे जातक को पन्ना पहनना चाहिए। सवा किलो हरे खड़े मूँग बहते पानी में बहाएँ व प्रति बुधवार मूँग की दाल का सेवन अवश्य सेवन करें व कोई भी एक हरा कपड़ा अवश्य पहनें या रुमाल या पेन रखें। उपरोक्त परेशानी होने पर व्यक्ति को

तुला लग्न
तुला लग्न वालों का स्वामी शुक्र अष्टमेश होकर द्वादश भाव में होगा, जो नीच का होगा। ऐसे जातक दुव्यर्सनों में खर्च करने वाले होंगे एवं इन्हें अनैतिक कार्यों में जेल भी जाना पड़ सकता है। ऐसा व्यक्ति नशीले पदार्थों का सेवन करने वाला, अनेक स्त्रियों से संपर्क रखने वाला व तस्कर भी हो सकता है। ऐसे जातक को हीरा तर्जनी में चाँदी में जड़वाकर शुक्रवार को धारण करना चाहिए। उपरोक्त परेशानी होने पर व्यक्ति को शुक्र ग्रह कि शांति हेतु श्वेत रत्न, चाँदी, चावल, दूध, सफेद कपड़ा, घी, सफेद फूल, धूप, अगरबत्ती, इत्र, सफेद चंदन दान करने से शुभ फल कि प्राप्ति होती हैं

वृश्चिक लग्न :
वृश्चिक लग्न वाले जातकों को षष्ठेश होकर नवम भाग्य भाव में नीच का मंगल होगा। ऐसे जातकों को भाग्योन्नति में बाधा आती है। धर्म के प्रति लापरवाह होते हैं। इन्हें अनेक बार गिरने से चोट लगती है एवं ऑपरेशन भी करना पड़ सकता है। ब्लडप्रेशर के शिकार भी हो सकते हैं। इनको भाइयों से उत्तम सहयोग मिलता है। वहीं ये पराक्रमी भी होते हैं। माता से शत्रुता रखने वाले भी हो सकते हैं। मूँगा पहनना इनके लिए श्रेयस्कर होता है। इनके लिए गुड़ का सेवन व गुड़ दान करना शुभ रहेगा।उपरोक्त परेशानी होने पर व्यक्ति को
(क्रमश.....)
>> जन्म कुंडली में नीच लग्नेश से रोग और परेशानी? (भाग:१)
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रविवार, नवंबर 14, 2010

जन्म कुंडली में नीच लग्नेश से रोग और परेशानी? (भाग:१)

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जन्म कुंडली में नीच लग्नेश से रोग और परेशानी? (भाग:१)

मेष लग्न:
मेष लग्न में जन्म लेने वाले जातक कि कुंडली में लग्नेश मंगल लग्न भाव और अष्टम भाव का स्वामी होता हैं। कुंडली में चतुर्थ भाव में मंगल नीच का होने पर ज्यादातर व्यक्ति को छोटी-मोटी चोट लगती राहती हैं, उसे शल्य चिकित्सा(ऑपरेशने) भी करवानी पड सकती हैं। व्यक्ति को हृदय में दर्द, उच्च रक्तचाप (हाई बी.पी), जलीय स्थान से भय, जहरीले जीवजंतु के काटने और जहरीले पदार्थ से से कष्ट हो सकता हैं। मातृ पक्ष से परेशानी, भूमि-भवन इत्यादी संपती से हानि हो सकती हैं। उपरोक्त परेशानी होने पर व्यक्ति को मंगल ग्रह कि शांति हेतु मंगलवार को मूंगा, मसूर, घी, गुड़, लाल कपड़ा, रक्त चंदन, गेहूँ, केसर, ताँबा, लाल फूल का दान करने से शुभ फल कि प्राप्ति होती हैं।
वृषभ लग्न:
वृषभ लग्न में जन्म लेने वाले जातक कि कुंडली में लग्नेश शुक्र लग्न भाव और षष्ठम भाव का स्वामी होता हैं। कुंडली में पंचम भाव में शुक्र नीच का होने, पर शास्त्रोंक्त मत से शुक्र व्यक्ति को जड़ बुद्धि अर्थात मूर्ख बनाता हैं। एसे व्यक्ति का दिमाग गलत कार्यों कि और ज्यादा अग्रस्त रहता हैं, जिस्से व्यक्ति अधिक से अधिक लाभ प्राप्त करना चाहता हैं, और सफलता भी प्राप्त करता हैं। उसकी मित्रता निम्न-स्तर के लोगों के साथ होती हैं। व्यक्ति नीच स्त्री-पुरुष से संपर्क रखने वाला हो सकता हैं। व्यक्ति को स्त्री वर्ग के कारण कारावास कि सजा हो सकती हैं। शुक्र सौंदर्य, भोग-विलास, ऎश्वर्य, अलंकार, रति सुख, ऎशो-आराम, स्त्री वर्ग इत्यादी पर अपना स्वामीत्व रखता हैं। इस लिये इन सबके प्रति व्यक्ति का अधिक झुकाव चरित्र से कमजोर कर देता हैं, जिस्से वह गलत कार्यों में सलग्न हो सकता हैं। उपरोक्त परेशानी होने पर व्यक्ति को शुक्र ग्रह कि शांति हेतु शुक्रवार को श्वेत रत्न, चाँदी, चावल, दूध, सफेद कपड़ा, घी, सफेद फूल, धूप, अगरबत्ती, इत्र, सफेद चंदन दान करने से शुभ फल कि प्राप्ति होती हैं।

मिथुन लग्न:
मिथुन लग्न में जन्म लेने वाले जातक कि कुंडली में लग्नेश बुध लग्न भाव और चतुर्थ भाव का स्वामी होता हैं। कुंडली में दशम में बुध नीच का होने, पर व्यक्ति सांस की नली, आंतड़ियाँ, दमा, कफ जनीत रोग, गुह्य रोग, गैस, सांस फूलना, उदर रोग, वातरोग, कृष्ठ रोग, मंदाग्नि, शूल, फेफड़े इत्यादी के रोग से पीड़ित हो सकता हैं। व्यक्ति को व्यापार, नौकरी, साझेदारी से भी परेशानी उठानी पड़ सकती हैं। व्यक्ति को खासकर अपने पिता से संबंधो में कठिनाईया आसकती हैं। उपरोक्त परेशानी होने पर व्यक्ति को बुध ग्रह कि शांति हेतु बुधवार को हरा पन्ना, मूँग, घी, हरा कपड़ा, चाँदी, फूल, काँसे का बर्तन, कपूर का दान करने से शुभ फल कि प्राप्ति होती हैं।

कर्क लग्न:
कर्क लग्न में जन्म लेने वाले जातक कि कुंडली में लग्नेश चंद्र पंचम भाव में स्थित हों ने पर चंद्रमा नीचका होता हैं। कुंडली में पंचम में चंद्र नीच का होने, पर व्यक्ति को ज्यादातर गैस, रक्तचाप (ब्लड प्रेशर), पेट के रोग, मानसिक अशांति, देहीक सौंदर्य, कफ, वात प्रकृति, अनिंद्रा, पांडुरोग, स्त्री संबंधित रोग इत्यादी से कष्ट हो सकता हैं। चंद्र पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव होने पर व्यक्ति को पर पागलपन भी हो सकता हैं। उपरोक्त परेशानी होने पर व्यक्ति को चंद्र ग्रह कि शांति हेतु सोमवार को मोती, चाँदी, चावल, चीनी, जल से भरा हुवा कलश, सफेद कपड़ा, दही, शंख, सफेद फूल, साँड आदि का दान करने से शुभ फल कि प्राप्ति होती हैं।

(क्रमश.....)

गुरुवार, नवंबर 04, 2010

मन्त्र सिद्ध सामग्री (नवम्बर-2010),




द्वादश महा यंत्र
यंत्र को अति प्राचिन एवं दुर्लभ यंत्रो के संकलन से हमारे वर्षो के अनुसंधान द्वारा बनाया गया हैं।
• परम दुर्लभ वशीकरण यंत्र
• भाग्योदय यंत्र
• मनोवांछित कार्य सिद्धि यंत्र
• राज्य बाधा निवृत्ति यंत्र
• गृहस्थ सुख यंत्र
• शीघ्र विवाह संपन्न गौरी अनंग यंत्र
• सहस्त्राक्षी लक्ष्मी आबद्ध यंत्र
• आकस्मिक धन प्राप्ति यंत्र
• पूर्ण पौरुष प्राप्ति कामदेव यंत्र
• रोग निवृत्ति यंत्र
• साधना सिद्धि यंत्र
• शत्रु दमन यंत्र

उपरोक्त सभी यंत्रो को द्वादश महा यंत्र के रुप में शास्त्रोक्त विधि-विधान से मंत्र सिद्ध पूर्ण प्राणप्रतिष्ठित एवं चैतन्य युक्त किये जाते हैं। जिसे स्थापीत कर बिना किसी पूजा अर्चना-विधि विधान विशेष लाभ प्राप्त कर सकते हैं।

सर्व कार्य सिद्धि कवच
जिस व्यक्ति को लाख प्रयत्न और परिश्रम करने के बादभी उसे मनोवांछित सफलताये एवं किये गये कार्य में सिद्धि (लाभ) प्राप्त नहीं होती, उस व्यक्ति को सर्व कार्य सिद्धि कवच अवश्य धारण करना चाहिये।
कवच के प्रमुख लाभ: सर्व कार्य सिद्धि कवच के द्वारा सुख समृद्धि और नव ग्रहों के नकारात्मक प्रभाव को शांत कर धारण करता व्यक्ति के जीवन से सर्व प्रकार के दु:ख-दारिद्र का नाश हो कर सुख-सौभाग्य एवं उन्नति प्राप्ति More........

सर्व रोगनाशक यंत्र/कवच
मनुष्य अपने जीवन के विभिन्न समय पर किसी ना किसी साध्य या असाध्य रोग से ग्रस्त होता हैं। उचित उपचार से ज्यादातर साध्य रोगो से तो मुक्ति मिल जाती हैं, लेकिन कभी-कभी साध्य रोग होकर भी असाध्या होजाते हैं, या कोइ असाध्य रोग से ग्रसित होजाते हैं। हजारो लाखो रुपये खर्च करने पर भी अधिक लाभ प्राप्त नहीं हो पाता। डॉक्टर द्वारा दिजाने वाली दवाईया अल्प समय More.... 

मंत्र सिद्ध स्फटिक श्री यंत्र
"श्री यंत्र" सबसे महत्वपूर्ण एवं शक्तिशाली यंत्र है। "श्री यंत्र" को यंत्र राज कहा जाता है क्योकि यह अत्यन्त शुभ फ़लदयी यंत्र है। जो न केवल दूसरे यन्त्रो से अधिक से अधिक लाभ देने मे समर्थ है एवं संसार के हर व्यक्ति के लिए फायदेमंद साबित होता है। पूर्ण प्राण-प्रतिष्ठित एवं पूर्ण चैतन्य युक्त "श्री यंत्र" जिस व्यक्ति के घर मे होता है उसके लिये "श्री यंत्र" अत्यन्त फ़लदायी सिद्ध होता है उसके दर्शन मात्र से अन-गिनत लाभ एवं सुख की प्राप्ति होति है। "श्री यंत्र" मे समाई अद्रितिय एवं अद्रश्य शक्ति मनुष्य की समस्त शुभ इच्छाओं को पूरा करने मे समर्थ होति है। जिस्से उसका जीवन से हताशा और निराशा दूर होकर वह मनुष्य असफ़लता से सफ़लता कि और निरन्तर गति करने लगता है एवं उसे जीवन मे समस्त भौतिक सुखो कि प्राप्ति होति है। "श्री यंत्र" मनुष्य जीवन में उत्पन्न होने वाली समस्या-बाधा एवं नकारात्मक उर्जा को दूर कर सकारत्मक उर्जा का निर्माण करने मे समर्थ है। "श्री यंत्र" की स्थापन से घर या व्यापार के स्थान पर स्थापित करने से वास्तु दोष य वास्तु से सम्बन्धित परेशानि मे न्युनता आति है व सुख-समृद्धि, शांति एवं ऐश्वर्य कि प्रप्ति होती है। गुरुत्व कार्यालय मे "श्री यंत्र" 12 ग्राम से 75 ग्राम तक कि साइज मे उप्लब्ध है
.मूल्य:- प्रति ग्राम Rs. 8.20 से Rs.28.00


कुबेर यंत्र
कुबेर यंत्र के पूजन से स्वर्ण लाभ, रत्न लाभ, पैतृक सम्पत्ती एवं गड़े हुए धन से लाभ प्राप्ति कि कामना करने वाले व्यक्ति के लिये कुबेर यंत्र अत्यन्त सफलता दायक होता हैं। एसा शास्त्रोक्त वचन हैं। कुबेर यंत्र के पूजन से एकाधिक स्त्रोत्र से धन का प्राप्त होकर धन संचय होता हैं।
मूल्य: Rs.550 से Rs.8200 तक

कनकधारा यंत्र
आज के युग में हर व्यक्ति अतिशीघ्र समृद्ध बनना चाहता हैं। धन प्राप्ति हेतु प्राण-प्रतिष्ठित कनकधारा यंत्र के सामने बैठकर कनकधारा स्तोत्र का पाठ करने से विशेष लाभ प्राप्त होता हैं। इस कनकधारा यंत्र कि पूजा अर्चना करने से ऋण और दरिद्रता से शीघ्र मुक्ति मिलती हैं। व्यापार में उन्नति होती हैं, बेरोजगार को रोजगार प्राप्ति होती हैं।
श्री आदि शंकराचार्य द्वारा कनकधारा स्तोत्र कि रचना कुछ इस प्रकार कि हैं, जिसके श्रवण एवं पठन करने से आस-पास के वायुमंडल में विशेष अलौकिक दिव्य उर्जा उत्पन्न होती हैं। ठिक उसी प्रकार से कनकधारा यंत्र अत्यंत दुर्लभ यंत्रो में से एक यंत्र हैं जिसे मां लक्ष्मी कि प्राप्ति हेतु अचूक प्रभावा शाली माना गया हैं।
कनकधारा यंत्र को विद्वानो ने स्वयंसिद्ध तथा सभी प्रकार के ऐश्वर्य प्रदान करने में समर्थ माना हैं। जगद्गुरु शंकराचार्य ने दरिद्र ब्राह्मण के घर कनकधारा स्तोत्र के पाठ से स्वर्ण वर्षा कराने का उल्लेख ग्रंथ शंकर दिग्विजय में मिलता हैं।

कनकधारा मंत्र:- ॐ वं श्रीं वं ऐं ह्रीं-श्रीं क्लीं कनक धारयै स्वाहा'
मूल्य: Rs.550 से Rs.8200 तक

गणेश लक्ष्मी यंत्र
प्राण-प्रतिष्ठित गणेश लक्ष्मी यंत्र को अपने घर-दुकान-ओफिस-फैक्टरी में पूजन स्थान, गल्ला या अलमारी में स्थापित करने व्यापार में विशेष लाभ प्राप्त होता हैं। यंत्र के प्रभाव से भाग्य में उन्नति, मान-प्रतिष्ठा एवं व्यापर में वृद्धि होती हैं एवं आर्थिक स्थिमें सुधार होता हैं। गणेश लक्ष्मी यंत्र को स्थापित करने से भगवान गणेश और देवी लक्ष्मी का संयुक्त आशीर्वाद प्राप्त होता हैं।
Rs.550 से Rs.8200 तक

मंगल यंत्र 
मंगल यंत्र को जमीन-जायदाद के विवादो को हल करने के काम में लाभ देता हैं, इस के अतिरिक्त व्यक्ति को ऋण मुक्ति हेतु मंगल साधना से अति शीध्र लाभ प्राप्त होता हैं। विवाह आदि में मंगली जातकों के कल्याण के लिए मंगल यंत्र की पूजा करने से विशेष लाभ प्राप्त होता हैं।
प्राण प्रतिष्ठित मंगल यंत्र के पूजन से भाग्योदय, शरीर में खून की कमी, गर्भपात से बचाव, बुखार, चेचक, पागलपन, सूजन और घाव, यौन शक्ति में वृद्धि, शत्रु विजय, तंत्र मंत्र के दुष्ट प्रभा, भूत-प्रेत भय, वाहन दुर्घटनाओं, हमला, चोरी इत्यादी से बचाव होता हैं।
मूल्य मात्र Rs- 550


दुर्गा बीसा यंत्र
शास्त्रोक्त मत के अनुशार दुर्गा बीसा यंत्र दुर्भाग्य को दूर कर व्यक्ति के सोये हुवे भाग्य को जगाने वाला माना गया हैं। दुर्गा बीसा यंत्र द्वारा व्यक्ति को जीवन में धन से संबंधित संस्याओं में लाभ प्राप्त होता हैं। जो व्यक्ति आर्थिक समस्यासे परेशान हों, वह व्यक्ति यदि नवरात्रों में प्राण प्रतिष्ठित किया गया दुर्गा बीसा यंत्र को स्थाप्ति कर लेता हैं, तो उसकी धन, रोजगार एवं व्यवसाय से संबंधी सभी समस्यों का शीघ्र ही अंत होने लगता हैं। नवरात्र के दिनो में प्राण प्रतिष्ठित दुर्गा बीसा यंत्र को अपने घर-दुकान-ओफिस-फैक्टरी में स्थापित करने से विशेष लाभ प्राप्त होता हैं, व्यक्ति शीघ्र ही अपने व्यापार में वृद्धि एवं अपनी आर्थिक स्थिती में सुधार होता देखेंगे। संपूर्ण प्राण प्रतिष्ठित एवं पूर्ण चैतन्य दुर्गा बीसा यंत्र को शुभ मुहूर्त में अपने घर-दुकान-ओफिस में स्थापित करने से विशेष लाभ प्राप्त होता हैं।
मूल्य: Rs.550 से Rs.8200 तक
अष्ट लक्ष्मी कवच
अष्ट लक्ष्मी कवच को धारण करने से व्यक्ति पर सदा मां महा लक्ष्मी की कृपा एवं आशीर्वाद बना रहता हैं। जिस्से मां लक्ष्मी के अष्ट रुप (१)-आदि लक्ष्मी, (२)-धान्य लक्ष्मी, (३)-धैरीय लक्ष्मी, (४)-गज लक्ष्मी, (५)-संतान लक्ष्मी, (६)-विजय लक्ष्मी, (७)-विद्या लक्ष्मी और (८)-धन लक्ष्मी इन सभी रुपो का स्वतः अशीर्वाद प्राप्त होता हैं।
मूल्य मात्र: Rs-1050

धन वृद्धि डिब्बी
धन वृद्धि डिब्बी को अपनी अलमारी, कैश बोक्स, पूजा स्थान में रखने से धन वृद्धि होती हैं जिसमें लाल- पीला-सफेद लक्ष्मी कारक हकीक (अकीक), लक्ष्मी कारक स्फटिक रत्न, 3 पीली कौडी, 3 सफेद कौडी, गोमती चक्र, सफेद गुंजा, रक्त गुंजा, काली गुंजा, इंद्र जाल, माया जाल, इत्यादी दुर्लभ वस्तुओं को शुभ महुर्त में तेजस्वी मंत्र द्वारा अभिमंत्रित किय जाता हैं।
मूल्य मात्र Rs-550


मंत्र सिद्ध रूद्राक्ष
एकमुखी रूद्राक्ष-Rs- 1250,2800
दो मुखी रूद्राक्ष-Rs- 100,151
तीन मुखी रूद्राक्ष-Rs- 100,151
चार मुखी रूद्राक्ष-Rs- 55,100
पंच मुखी रूद्राक्ष-Rs- 28,55
छह मुखी रूद्राक्ष-Rs- 55,100
सात मुखी रूद्राक्ष-Rs- 120,190
आठ मुखी रूद्राक्ष-Rs- 820,1250
नौ मुखी रूद्राक्ष-Rs- 820,1250
दसमुखी रूद्राक्ष-Rs- ........
ग्यारहमुखी रूद्राक्ष-Rs- 2800
बारह मुखी रूद्राक्ष-Rs- 3600
तेरह मुखी रूद्राक्ष-Rs- 6400
चौदह मुखी रूद्राक्ष-Rs- 19000
गौरीषंकर रूद्राक्ष-Rs- .....



नवरत्न जड़ित श्री यंत्र
शास्त्र वचन के अनुसार शुद्ध सुवर्ण या रजत में निर्मित श्री यंत्र के चारों और यदि नवरत्न जड़वा ने पर यह नवरत्न जड़ित श्री यंत्र कहलाता हैं। सभी रत्नो को उसके निश्चित स्थान पर जड़ कर लॉकेट के रूप में धारण करने से व्यक्ति को अनंत एश्वर्य एवं लक्ष्मी की प्राप्ति होती हैं। व्यक्ति को एसा आभास होता हैं जैसे मां लक्ष्मी उसके साथ हैं। नवग्रह को श्री यंत्र के साथ लगाने से ग्रहों की अशुभ दशा का धारण करने वाले व्यक्ति पर प्रभाव नहीं होता हैं। गले में होने के कारण यंत्र पवित्र रहता हैं एवं स्नान करते समय इस यंत्र पर स्पर्श कर जो जल बिंदु शरीर को लगते हैं, वह गंगा जल के समान पवित्र होता हैं। इस लिये इसे सबसे तेजस्वी एवं फलदायि कहजाता हैं। जैसे अमृत से उत्तम कोई औषधि नहीं, उसी प्रकार लक्ष्मी प्राप्ति के लिये श्री यंत्र से उत्तम कोई यंत्र संसार में नहीं हैं एसा शास्त्रोक्त वचन हैं। इस प्रकार के नवरत्न जड़ित श्री यंत्र गुरूत्व कार्यालय द्वारा शुभ मुहूर्त में प्राण प्रतिष्ठित करके बनावाए जाते हैं।

पन्ना गणेश
भगवान श्री गणेश बुद्धि और शिक्षा के कारक ग्रह बुध के अधिपति देवता हैं। पन्ना गणेश बुध के सकारात्मक प्रभाव को बठाता हैं एवं नकारात्मक प्रभाव को कम करता हैं।. पन्न गणेश के प्रभाव से व्यापार और धन में वृद्धि में वृद्धि होती हैं। बच्चो कि पढाई हेतु भी विशेष फल प्रद हैं पन्ना गणेश इस के प्रभाव से बच्चे कि बुद्धि कूशाग्र होकर उसके आत्मविश्वास में भी विशेष वृद्धि होती हैं। मानसिक अशांति को कम करने में मदद करता हैं, व्यक्ति द्वारा अवशोषित हरी विकिरण शांती प्रदान करती हैं, व्यक्ति के शारीर के तंत्र को नियंत्रित करती हैं। जिगर, फेफड़े, जीभ, मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र इत्यादि रोग में सहायक होते हैं। कीमती पत्थर मरगज के बने होते हैं।
Rs.550 से Rs.8200 तक


मंगल यंत्र
(त्रिकोण) मंगल यंत्र को जमीन-जायदाद के विवादो को हल करने के काम में लाभ देता हैं, इस के अतिरिक्त व्यक्ति को ऋण मुक्ति हेतु मंगल साधना से अति शीध्र लाभ प्राप्त होता हैं। विवाह आदि में मंगली जातकों के कल्याण के लिए मंगल यंत्र की पूजा करने से विशेष लाभ प्राप्त होता हैं।
मूल्य मात्र Rs- 550

वास्तु दोष निवारक यंत्र
भवन छोटा होया बडा यदि भवन में किसी कारण से निर्माण में वास्तु दोष लगरहा हो, तो शास्त्रों में उसके निवारण हेतु वास्तु देवता को प्रसन्न एवं सन्तुष्ट करने के लिए अनेक उपाय का उल्लेख मिलता हैं। उन्हीं उपायो में से एक हैं वास्तु यंत्र कि स्थापना जिसे घर-दुकान-ओफिस-फैक्टरी में स्थापित करने से संबंधित समस्त परेशानीओं का शमन होकर वास्तु दोष का निवारण होजाता हैं एवं भवन में सुख समृद्धि का आगमन होता हैं।
मूल्य मात्र Rs : 550


व्यापार वृद्धि कवच
व्यापार वृद्धि कवच व्यापार के शीघ्र उन्नति के लिए उत्तम हैं। चाहें कोई भी व्यापार हो अगर उसमें लाभ के स्थान पर बार-बार हानि हो रही हैं। किसी प्रकार से व्यापार में बार-बार बांधा उत्पन्न हो रही हो! तो संपूर्ण प्राण प्रतिष्ठित मंत्र सिद्ध पूर्ण चैतन्य युक्त व्यापात वृद्धि यंत्र को व्यपार स्थान या घर में स्थापित करने से शीघ्र ही व्यापार वृद्धि एवं नितन्तर लाभ प्राप्त होता हैं।
मूल्य मात्र- Rs.370 & 730

तंत्र रक्षा कवच
तंत्र रक्षा कवच को धारण करने से व्यक्ति के उपर किगई समस्त तांत्रिक बाधाएं दूर होती हैं, उसी के साथ ही धारण कर्ता व्यक्ति पर किसी भी प्रकार कि नकारत्मन शक्तियो का कुप्रभाव नहीं होता। इस कवच के प्रभाव से इर्षा-द्वेष रखने वाले सभी लोगो द्वारा होने वाले दुष्ट प्रभावो से रक्षाहोती हैं।
मूल्य मात्र: Rs.730


क्या आपको उच्च अधिकारी से परेशानी हैं?
क्या आपकी अपने सहकर्मचारी से अनबन होती हैं?
क्या आपके अधिनस्थ कर्मचारी आपकी बात नही मानते?
यदि आपको अपने उच्च अधिकारी, सहकर्मचारी, अधिनस्थ कर्मचारी से परेशानी हैं। आपके अनूकुल कार्य नहीं करते या आपको करने नहीं देते? वह आपकी बात नहीं मानतें? बिना वजह आपको परेशान करते हैं? अन आवश्यक कार्य आपसे करवाते हैं। आपका प्रमोशन रुकवादेते हैं। उचित कार्य करने पर भी आपके कार्य में नुक्श निकालते हैं? यदि आप इसी तरह कि किसी समस्या से ग्रस्त हैं तो आप उन अधिकारी, सहकर्मी, अधिनस्थकर्मी या अन्य किसी व्यक्ति विशेष के नाम से गुरुत्व कार्यालत द्वारा शास्त्रोक्त विधि-विधान से मंत्र सिद्ध प्राण-प्रतिष्ठित पूर्ण चैतन्य युक्त वशीकरण कवच एवं एस.एन.डिब्बी बनवाले एवं उसे अपने घर-ओफिस में स्थापित कर अल्प पूजा, विधि-विधान से आप विशेष लाभ प्राप्त कर सकते हैं। यदि आप मंत्र सिद्ध वशीकरण कवच एवं एस.एन.डिब्बी बनवाना चाहते हैं, तो संपर्क करें।

GURUTVA KARYALAY



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जब रुक्मणी जी ने प्रश्न किया किसे प्राप्त होती हैं लक्ष्मीजी ?

जब रुक्मणी जी ने प्रश्न किया किसे प्राप्त होती हैं लक्ष्मीजी ?


          भगवान श्रीकृष्ण के साथ उपस्थित रुक्मणी जी ने लक्ष्मी जी से पूछाः हैं भगवान नारायण की प्रियतमे ! आप इस जगत में किन प्राणियों पर कृपा करके उनके यहाँ रहती हो? किस स्थान निवास करती हो और किन-किनका पदार्थो का सेवन करती हो? उन सबके विषय में आप मुझे विस्तार से बताओ।

          रुक्मणी जी के इस प्रकार पूछने पर लक्ष्मी जी ने प्रसन्न होकर भगवान श्री कृष्ण के सामने ही मीठी वाणी में लक्ष्मीजी बोलीं- देवि ! मैं प्रतिदिन ऐसे पुरुष में निवास करती हूँ, जो सौभाग्यशाली, निर्भीक, कार्यकुशल, कर्मपरायण, क्रोधरहित, भगवत्परायण, कृतज्ञ, जितेन्द्रिय तथा बढ़े हुए सत्त्वगुण से युक्त हों।

          जो पुरुष अकर्मण्य, नास्तिक, वर्णसंकर, कृतघ्न, दुराचारी, क्रूर, चोर तथा गुरुजनों के दोष देखनेवाला हो, उसके भीतर मैं निवास नहीं करती हूँ। जिनमें तेज, बल और सत्त्व की मात्रा बहुत अल्प हो, जो हर बात में खिन्न हो उठते हों, जो मन में दूसरा भाव रखते हैं और ऊपर कुछ और ही दिखाते हैं, ऐसे मनुष्यों में मैं निवास नहीं करती हूँ। जिसका अंतःकरण मूढ़ता से आच्छान्न है, ऐसे मनुष्यों में मैं भलीभाँति निवास नहीं करती हूँ।

          जो स्वभावतः स्वधर्मपरायण, धर्मज्ञ, बड़े-बूढ़ों कि सेवा में तत्पर, जितेन्द्रिय, मन को वश में रखने वाले, क्षमाशील और सामर्थ्यशाली हैं, ऐसे पुरुषों में मैं निवास करती हूँ। जो स्त्रियाँ स्वभावतः सत्यवादिनी तथा सरलता से संयुक्त हैं, जो देवताओं और द्विजों की पूजा करने वालीं, उनमें भी मैं निवास करती हूँ।

          जो अपने समय को कभी व्यर्थ नहीं जाने देते, सदा दान और शौचाचार में तत्पर रहते हैं, जिन्हें ब्रह्मचर्य, तपस्या, ज्ञान, गौ और द्विज परम प्रिय हैं, ऐसे पुरुषों में मैं निवास करती हूँ। जो स्त्रियाँ, देवताओं तथा ब्राह्मणों कि सेवा में तत्पर, घर के बर्तन-भाँडों को शुद्ध तथा स्वच्छ रखने वाली और गौओं कि सेवा तथा धान्य के संग्रह में तत्पर होती हैं, उनमें भी मैं सदा निवास करती हूँ।

          जो घर के बर्तनों को सुव्यवस्थित रूप से न रखकर इधर-उधर बिखेरे रहती हैं, सोच-समझकर काम नहीं करती हैं, सदा अपने पति के प्रतिकूल ही बोलती हैं, दूसरों के घरों में घूमने फिरने में आसक्त रहती हैं और लज्जा को सर्वथा छोड़ बैठती हैं, उनको मैं त्याग देती हूँ।

          जो स्त्री निर्दयतापूर्वक पापाचार में तत्पर रहने वाली, अपवित्र, चटोर, धैर्यहीन, कलहप्रिय, नींद में बेसुध होकर सदा खाट पर पड़ी रहने वाली होती हैं, ऐसी नारी से मैं सदा दूर ही रहती हूँ।

          जो स्त्रियाँ सत्यवादिनी और अपनी सौम्य वेश-भूषा के कारण देखने में प्रिय होती हैं, जो सौभाग्यशालिनी, सदगुणवती, पतिव्रता और कल्याणमय आचार-विचार वाली होती हैं तथा जो सदा वस्त्राभूषणों से सुसज्जित रहती हैं, ऐसी स्त्रियों में सदा निवास करती हूँ।

          जहाँ हँसों की मधुर ध्वनि गूँजती रहती है, पक्षी के कलरव जिनकी शोभा बढ़ाते हैं, जो अपने तटों पर फैले हुए वृक्षों कि श्रेणियों से शोभायमान हैं, जिनके किनारे तपस्वी, सिद्ध और ब्राह्मण निवास करते हैं, जिनमें बहुत जल भरा रहता है तथा सिंह और हाथी जिनके जल में अवगाहन करते रहते हैं, ऐसी नदियों में भी मैं सदा निवास करती रहती हूँ।

          सत्पुरुषों में मेरा नित्य निवास है। जिस घर में लोग अग्नि में आहुति देते हैं, गौ, ब्राह्मण तथा देवताओं की पूजा करते हैं और समय-समय पर जहाँ फूलों से देवताओं को उपहार समर्पित किये जाते हैं, उस घर में मैं नित्य निवास करती हूँ। सदा वेदों के स्वाध्याय में तत्पर रहने वाले ब्राह्मणों, स्वधर्मपरायण क्षत्रियों, कृषि-कर्म में लगे हुए वैश्यों तथा नित्य सेवापरायण शूद्रों के यहाँ भी मैं सदा निवास करती हूँ।

          मैं मूर्तिमति तथा अनन्यचित्त होकर तो भगवान नारायण में ही संपूर्ण भाव से निवास करती हूँ, क्योंकि उनमें महान धर्म समाहित है। उनका ब्राह्मणों के प्रति प्रेम है और उनमें स्वयं सर्वप्रिय होने का गुण भी है।

देवी ! मैं नारायण के अलावा अन्यत्र शरीर से नहीं निवास करती हूँ। मैं यहाँ ऐसा नहीं कह सकती कि सर्वत्र इसी रूप में रहती हूँ। जिस पुरुष में भावना द्वारा निवास करती हूँ, वह, धर्म, यश और धन से संपन्न होकर सदा बढ़ता रहता है।
(महाभारत, अनुशासन पर्व, अध्यायः11)

देवकृत लक्ष्मी स्तोत्रम्

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॥देवकृत लक्ष्मी स्तोत्रम्॥

क्षमस्व भगवंत्यव क्षमाशीले परात्परे।
शुद्धसत्त्वस्वरूपे च कोपादिपरिवर्जिते॥
उपमे सर्वसाध्वीनां देवीनां देवपूजिते।
त्वया विना जगत्सर्वं मृततुल्यं च निष्फलम्॥
सर्वसंपत्स्वरूपा त्वं सर्वेषां सर्वरूपिणी।
रासेश्वर्यधि देवी त्वं त्वत्कलाः सर्वयोषितः॥
कैलासे पार्वती त्वं च क्षीरोदे सिन्धुकन्यका।
स्वर्गे च स्वर्गलक्ष्मीस्त्वं मर्त्यलक्ष्मीश्च भूतले॥
वैकुंठे च महालक्ष्मीर्देवदेवी सरस्वती।
गंगा च तुलसी त्वं च सावित्री ब्रह्मालोकतः॥
कृष्णप्राणाधिदेवी त्वं गोलोके राधिका स्वयम्।
रासे रासेश्वरी त्वं च वृंदावन वने- वने॥
कृष्णा प्रिया त्वं भांडीरे चंद्रा चंदनकानने।
विरजा चंपकवने शतशृंगे च सुंदरी॥
पद्मावती पद्मवने मालती मालतीवने।
कुंददंती कुंदवने सुशीला केतकीवने॥
कदंबमाला त्वं देवी कदंबकाननेऽपि च।
राजलक्ष्मी राजगेहे गृहलक्ष्मीगृहे गृहे॥
इत्युक्त्वा देवताः सर्वा मुनयो मनवस्तथा।
रूरूदुर्नम्रवदनाः शुष्ककंठोष्ठ तालुकाः॥
इति लक्ष्मीस्तवं पुण्यं सर्वदेवैः कृतं शुभम्।
यः पठेत्प्रातरूत्थाय स वै सर्वै लभेद् ध्रुवम्॥
अभार्यो लभते भार्यां विनीतां सुसुतां सतीम्।
सुशीलां सुंदरीं रम्यामतिसुप्रियवादिनीम्॥
पुत्रपौत्रवतीं शुद्धां कुलजां कोमलां वराम्।
अपुत्रो लभते पुत्रं वैष्णवं चिरजीविनम्॥
परमैश्वर्ययुक्तं च विद्यावंतं यशस्विनम्।
भ्रष्टराज्यो लभेद्राज्यं भ्रष्टश्रीर्लभते श्रियम्॥
हतबंधुर्लभेद्बंधुं धनभ्रष्टो धनं लभेत्।
कीर्तिहीनो लभेत्कीर्तिं प्रतिष्ठां च लभेद् ध्रुवम्॥
सर्वमंगलदं स्तोत्रं शोकसंतापनाशनम्।
हर्षानंदकरं शश्वद्धर्म मोक्षसुहृत्प्रदम्॥
|| इति श्रीदेवकृत लक्ष्मीस्तोत्रं संपूर्णम् ||

दीपक कि महिमा

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दीपक कि महिमा


           प्रकाश, तेज ऊर्जा के कुदरति स्त्रोत हैं। ऊर्जा के बिना मानव जीवन का कोई अस्तित्व नहीं हैं। समग्र ब्रह्मांड में प्रकाश ऊर्जा का प्रमुख स्त्रोत एक मात्र सूर्य हैं, उस के अलावा कोई और प्रमुख स्त्रोत का अस्तित्व नहीं हैं। यही कारण हैं कि आज सूर्य के तेज से ही हमारा जीवन सुचारु रुप से प्रकाशमान हैं। वायु मंडल में व्याप्त वायुकण (धूल) और बादल इत्यादि सभी में अपनी चुम्बकीय शक्ति होती हैं जिसके कारण सब एक दूसरे की ओर आकर्षित होते रहते हैं। इसी आकर्षित होने के कारण कण एक दूसरे से पास आते और दूर होते रहते हैं, जिसके बल के कारण हि ऊर्जा उत्पन्न होती हैं। इस्से उत्पन्न होने वाली उर्जा को हि प्रकाश कहा जाता हैं।

           प्रकाश का हमारे जीवन में बहुत महत्व हैं, इस महत्व से हर व्यक्ति भली भाति वाकिफ हैं। हमारी भारतिय संस्कृति के धार्मिक कार्यक्रम में भी अग्नि का विशेष महत्व हैं। एवं अग्नि प्रकाश का प्रतिक हैं जो यज्ञ, हवन, विवाह, संस्कार जेसे अन्य धार्मिक कर्मकांडो में बिना अग्नि के बिना संपन्न होना असंभव सा प्रतित होता हैं। इसी कारण भारतिय सभ्यताओं में अग्नि को देव कहा गया हैं।

           अग्नि को देवता मनकर उसका पूजन किया जाता हैं। क्योकि एसा माना जाता हैं, कि यदि अग्नि देव क्रोधित होजाये तो बड़े-बड़े महलों व ऊंचे-ऊंचे भवनों को धूलमें उडादे और राख बनादे।
इस लिये प्रकाश का पूजन कर उन्हें शांत रखने का प्रयास किया जाता हैं।
           
हमारे प्रमुख धर्म ग्रंथो में एक ऋग्वेद का सर्व प्रथम मंत्र ही प्रकाश से शुरू होता है।
मंत्र:
प्रकाशमीले पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम्। होतारं रत्नधातमम्॥
भावार्थ:- सर्वप्रथम आराधन किए जाने वाले, यज्ञ को प्रकाशित करने वाले, ऋतुओं के अनुसार यज्ञ सम्पादित करने वाले, देवताओं का आह्वान करने वाले तथा धन प्रदान करने वालों में सर्वश्रेष्ठ अग्नि देवता की मैं स्तुति करता हूं।
           
           अनादिकाल से मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु अंधकार रुपी अज्ञानता रही हैं। इस लिये पुरातन कालसे हि अंधकार को दूर करने वाला प्रकाश मनुष्य का सबसे बड़ा मित्र रहा है। क्योकि प्रकाश हमें देखने की शक्ति देता हैं। वायुमंडल में वस्तु कि सही पहचान करने के लिये प्रकाश आवश्यक है।

उपनिषद में इसी लिये अंधकार से ज्योति की ओर जाने की कामना की गई है।
असतो मा सद्गमय
तमसो मां ज्योतिर्गमय
मृत्योर्मा अमृतं गमय

शास्त्रो में अग्नि के तीन रूपों वर्णन किया गया हैं।
पृथ्वी पर अग्नि, अन्तरिक्ष में विद्युत और आकाश में सूर्य। प्रकाश के उद्दगम के विषय में कहा गया है कि काल के संघर्ष-मंथन से उसका जन्म हुआ। सूर्य कि अग्नि अंधकार को मिटाता है, असुरी शक्ति को डराता, प्रकाश का आह्वान करता, चिर युवा और प्राचीन पुरोहित है। ऋग्वेद के अनुशार महार्षि भृगु ऋषि ने अग्नि की खोज की।

अग्नि के लिये ऋग्वेद में कहा गया हैं।

अग्निमीळे पुरोहितं (ऋग्वेद)

ऋग्वेद
इंद्र ज्योतिः अमृतं मर्तेषु
सूर्यांश संभवो दीपः

अर्थात: सूर्य के अंश से दीप की उत्पत्ति हुई।
दीप जीवन की पवित्रता, भक्ति, अर्चना और आशीर्वाद स्वरुप माना जाता हैं।

सूर्य के अंश से उत्पन्न पृथ्वी की अग्नि को जिस पात्र में स्थापित किया गया उसे आज दीपक के रूप में हमारे घरों में पूजा जाता है ।

शुभम करोति कलयाणम् आरोग्यम् धन सम्पदा
शत्रुबुध्दि विनाशाय दीपज्योति नमस्तुते ।।

अर्थात: हमे शुभ, सुन्दर और कल्याणकारी, आरोग्य और संपदा को देने वाले हे दीपक कि ज्योति, हमारे शत्रों कि बुद्धि के विनाश के लिए हम तुम्हें नमस्कार करते हैं।

           पूरातन काल में दीप का पात्र स्फटिक, पाषाण या सीप का होता था। कालान्तर में मिट्टी को गढने और पकाने के आविष्कार के साथ दीप मिट्टी का बनने लगा। प्राचीन काल से धनिकों द्वारा बड़े कलात्मक दियों का प्रयोग किया जाता था, जो पत्थर, धातु, कीमती रत्नों, सोने और चांदी के होते थे। ये छोटे बड़े सभी आकारों के थे।

समय के साथ साथ दीप स्तंभ भी प्रचलन में आए।

           रामायण में उल्लेख मिलता हैं कि जब हनुमान लंका पहुँचे तो उन्हें सुनहरे दीपों को देख कर भ्रम हुआ कि कहीं वे स्वर्ग में तो नहीं आ गए। उन्हें वहां पीले और जलते हुए स्वर्णदीप दिखाई दिए।

           भारतीय शास्त्रो मे उल्लेख मिलता है, कि अग्नि का संबंध मनुष्य के जन्म से लेकर मरण तक होता हैं। यही कारण हैं हमारी संस्कृति में विभिन्न व्रत-त्योहार इत्यादि में दीप क महत्व हैं। दीपवली भी हमारे प्रमुख त्यौहारो में से एक है, जिस में उर्जा के प्रतिक के रुप में दीपक जलाने कि परंपरा हैं।

           हमारे शास्त्रों में दीपज्योति कि महिमा का विस्तृत वर्णन किया गया हैं। शास्त्रों में दीपज्योति को पापनाशक, शत्रुओं कि वृद्धि रोकने वाली, आयु एवं आरोग्य प्रदान करने वाली हैं।

दीपो ज्योतिः परम् ब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दनः।
दीपो हरतु में पापम् साध्यदीप नमोऽस्तु ते।।
शुभम् करोतु कल्याणम् आरोग्यम् सुखसम्पदम्।
शत्रुबुद्धिविनाशम् च दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते।।

• मान्यता हैं कि यदि घर में दीपक की लौ पूर्व दिशा की ओर हो, तो आयु कि वृद्धि करती हैं।
• दीपक की लौ पश्चिम दिशा की ओर हो, तो दुःख की वृद्धि करती हैं।
• दीपक की लौ उत्तर दिशा की ओर हो, तो स्वास्थ्य और प्रसन्नता कि वृद्धि करती हैं।
• दीपक की लौ दक्षिण दिशा की ओर हो, तो हानि करती हैं।

यदि घर में आप दीपक जलायें तो उसे आपके घरके उत्तर अथवा पूर्व कोने में होना चाहिए। दीपज्योति के प्रभाव से पाप-ताप का हरण होता है, शत्रुबुद्धि का शमन होता है और पुण्यमय, सुखमय जीवन की वृद्धि होती है।

पुरूषोत्तम महात्त्म्य में दीपक कि ज्योति के लिये कहा गया हैं।

रूक्षैर्लक्ष्मी विनाशःस्यात श्वैतेरन्नक्षयो भवेत्
अति रक्तेषु युध्दानि मृत्युःकृष्ण शिखीषु च।।

अर्थात: कोरी शुष्क (रूखी) ज्योति लक्ष्मी का नाश, श्वेतज्योति अन्नक्षय, अति लाल ज्योति युद्ध और काली ज्योति मृत्यु की द्योतक होती हैं।

अष्टलक्ष्मी स्तोत्र

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अष्टलक्ष्मी स्तोत्र

सुमनसवंदित सुंदरि माधवि चंद्र सहोदरि हेममये ।
मुनिगण वंदित मोक्षप्रदायिनि मंजुळभाषिणि वेदनुते ॥
पंकजवासिनि देवसुपूजित सदगुणवर्षिणि शांतियुते ।
जय जय हे मधुसूदन कामिनि आदिलक्ष्मि जय पालय माम् ॥1॥

अयिकलि कल्मषनाशिनि कामिनि वैदिकरूपिणि वेदमये ।
क्षीरसमुदभव मंगलरूपिणि मंत्रनिवासिनि मंत्रनुते ॥
मंगलदायिनि अंबुजवासिनि देवगणाश्रित पादयुते ।
जय जय हे मधुसूदन कामिनि धान्यलक्ष्मि जय पालय माम् ॥2॥

जयवर वर्णिनि वैष्णविभार्गवि मंत्रस्वरूपिणि मंत्रमये ।
सुरगण पूजित शीघ्र फलप्रद ज्ञानविकासिनि शास्त्रनुते ॥
भवभयहारिणि पापविमोचनि साधुजनाश्रित पादयुते ।
जय जय हे मधुसूदन कामिनि धैर्यलक्ष्मि जय पालय माम् ॥3॥

जय जय दुर्गतिनाशिनि कामिनि सर्वफलप्रद शास्त्रमये ।
रथगज तुरग पदादिसमानुत परिजनमंडित लोकनुते ॥
हरि-हर ब्रह्म सुपूजित सेवित तापनिवारिणि पादयुते ।
जय जय हे मधुसूदन कामिनि श्री गजलक्ष्मि पालय माम् ॥4॥

अयि खगवाहिनि मोहिनि चक्रिणि राग विवर्धिनि ज्ञानमये ।
गुणगणवारिधि लोकहितैषिणि सप्तस्वरवर गाननुते ॥
सकल सुरासुर देव मुनीश्वर मानववंदित पादयुते ।
जय जय हे मधुसूदन कामिनि संतानलक्ष्मि पालय माम् ॥5॥

जय कमलासनि सदगतिदायिनि ज्ञान विकासिनि गानमये ।
अनुदिनमर्चित कुकुंमधूसर भूषितवासित वाद्यनुते ॥
कनक धरा स्तुति वैभव वंदित शंकर देशिक मान्य पते।
जय जय हे मधुसूदन कामिनि विजयलक्ष्मि जय पालय माम् ॥6॥

प्रणत सुरेश्वरि भारति भार्गवि शोकविनाशिनि रत्नमये ।
मणिमय भूषित कर्णविभूषण शांतिसमावृत हास्यमुखे ॥
नवनिधि दायिनि कलिमलहारिणि काम्य फलप्रद हस्तयुते ।
जय जय हे मधुसूदन कामिनि विद्यालक्ष्मि पालय माम् ॥7॥

धिमि धिमि धिम् धिमि धिंधिमि धिंधिमि दुंदुभि्नाद सुपूर्णमये ।
घुमघुम घुंघुम घुंघुम घुंघुम शंखनिनाद सुवाद्यनुते ॥
वेदपुराणेति हास सुपूजित वैदिकमार्ग प्रदर्शयुते ।
जय जय हे मधुसूदन कामिनि श्री धनलक्ष्मि पालय माम् ॥8॥

स्वप्न द्वारा जाने धनप्राप्ति के योग

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स्वप्न द्वारा जाने धनप्राप्ति के योग


  • स्वप्न में देवी-देवता के दर्शन होने से धन लाभ के साथ-साथ सफलता दर्शाता है।
  • स्वप्न में गाय का दूध निकालना य निकालते देखना धन प्राप्ति का संकेत है।
  • सफेद घोडे को देखना धन की प्राप्ति एवं उज्जवल भविष्य का संकेत है।
  • स्वप्न में नीलकण्ठ या सारस पक्षी को देखना धन लाभ एवं राज सम्मान कि प्राप्ति का संकेत है।
  • स्वप्न में कदम्ब के वृक्ष को देखना धन प्राप्ति, स्वास्थ्य लाभ, राजसम्मान प्राप्ति का संकेत है।
  • स्वप्न में कानों में बाली या धारण किये देखना धन प्राप्ति का संकेत है।
  • स्वप्न में नृत्य करती स्त्री/कन्या को देखना धन प्राप्ति का संकेत है।
  • स्वप्न में किसान को खेत में काम करते देखना धन प्राप्ति का संकेत है।
  • स्वप्न में मृत पक्षी को देखना आकस्मिक धन प्राप्ति का संकेत है।
  • स्वप्न में जलता हुवा दीपक देखना धन प्राप्ति का संकेत है।
  • स्वप्न में स्वर्ण को देखना धन प्राप्ति का संकेत है।
  • स्वप्न में चूहों को देखना धन प्राप्ति का संकेत है।
  • स्वप्न में सफेद चीटियाँ देखना धन लाभ का संकेत है।
  • स्वप्न में काले बिच्छू को देखना धन लाभ का संकेत है।
  • स्वप्न में नेवले का को देखना हीरे-ज्वाहरात कि प्राप्ति का संकेत है।
  • स्वप्न में मधुमक्खी का छत्ता देखना धन लाभ का संकेत है।
  • स्वप्न में सर्प को फन उठाये देखना धन प्राप्ति का संकेत है।
  • स्वप्न में हाथी को देखना धन प्राप्ति का संकेत है।
  • स्वप्न में महल को देखना धन प्राप्ति का संकेत है।
  • स्वप्न में तोते को खाते देखना प्रबल धन प्राप्ति के योग का संकेत है।
  • स्वप्न में अंगुली में अंगूठी पहनें हुवे देखना धन प्राप्ति का संकेत है।
  • स्वप्न में आम का बगिचा देखना आकस्मिक धन प्राप्ति का संकेत है।
  • स्वप्न में सर्प को बिल के साथ देखना आकस्मिक धन प्राप्ति का संकेत है।
  • स्वप्न में गाय के दर्शन होने से अत्यन्त शुभ होता हैं, व्यक्ति को यश, वैभव एवं परिवार वृद्घि से लाभ प्राप्त होती है।
  • स्वप्न में पर्वत और वृक्ष पर चढ़ते देखना धन प्राप्ति का संकेत है।
  • स्वप्न में गौ दुग्ध, घी, फल वाले वृक्ष देखना धन प्राप्ति का संकेत है।
  • स्वप्न में आंवले और कमल को देखना धन प्राप्ति का संकेत है।

धनलक्ष्मी स्तोत्र

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धनलक्ष्मी स्तोत्र

नमो कल्याणदायिके । महासम्पत्प्रदे देवि धनदायै नमोऽस्तुते॥
महाभोगप्रदे देवि महाकामप्रपूरिते । सुखमोक्षप्रदे देवि धनदायै नमोऽस्तुते॥
ब्रह्मरूपे सदानन्दे सच्चिदानन्दरूपिणी । धृतसिद्धिप्रदे देवि धनदायै नमोऽस्तुते॥
उद्यत्सूर्यप्रकाशाभे उद्यदादित्यमण्डले । शिवतत्वप्रदे देवि धनदायै नमोऽस्तुते॥
शिवरूपे शिवानन्दे कारणानन्दविग्रहे । विश्वसंहाररूपे च धनदायै नमोऽस्तुते॥
पञ्चतत्वस्वरूपे च पञ्चाचारसदारते । साधकाभीष्टदे देवि धनदायै नमोऽस्तुते॥श्रीं ॐ॥
ॐ श्री ललिता महात्रिपुरसुन्दरी पराभट्टारिका ।
समेताय श्री चन्द्रमौळीश्वर परब्रह्मणे नमः॥जय जय शङ्कर हर हर शङ्कर॥

॥श्री सूक्त॥

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॥श्री सूक्त॥
ॐ हिरण्य-वर्णां हरिणीं, सुवर्ण-रजत-स्त्रजाम्। चन्द्रां हिरण्यमयीं लक्ष्मीं, जातवेदो म आवह॥
तां म आवह जात-वेदो, लक्ष्मीमनप-गामिनीम्। यस्यां हिरण्यं विन्देयं, गामश्वं पुरूषानहम्॥
अश्वपूर्वां रथ-मध्यां, हस्ति-नाद-प्रमोदिनीम्। श्रियं देवीमुपह्वये, श्रीर्मा देवी जुषताम्॥
कांसोऽस्मि तां हिरण्य-प्राकारामार्द्रा ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीं।
पद्मे स्थितां पद्म-वर्णां तामिहोपह्वये श्रियम्॥
चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देव-जुष्टामुदाराम्।
तां पद्म-नेमिं शरणमहं प्रपद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणोमि॥
आदित्य-वर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽक्ष बिल्वः।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः॥
उपैतु मां दैव-सखः, कीर्तिश्च मणिना सह। प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन्, कीर्तिं वृद्धिं ददातु मे॥
क्षुत्-पिपासाऽमला ज्येष्ठा, अलक्ष्मीर्नाशयाम्यहम्। अभूतिमसमृद्धिं च, सर्वान् निर्णुद मे गृहात्॥
गन्ध-द्वारां दुराधर्षां, नित्य-पुष्टां करीषिणीम्। ईश्वरीं सर्व-भूतानां, तामिहोपह्वये श्रियम्॥
मनसः काममाकूतिं, वाचः सत्यमशीमहि। पशूनां रूपमन्नस्य, मयि श्रीः श्रयतां यशः॥
कर्दमेन प्रजा-भूता, मयि सम्भ्रम-कर्दम। श्रियं वासय मे कुले, मातरं पद्म-मालिनीम्॥
आपः सृजन्तु स्निग्धानि, चिक्लीत वस मे गृहे। निच-देवी मातरं श्रियं वासय मे कुले॥
आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं, सुवर्णां हेम-मालिनीम्। सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो ममावह॥
आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं, पिंगलां पद्म-मालिनीम्। चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं, जातवेदो ममावह॥
तां म आवह जात-वेदो लक्ष्मीमनप-गामिनीम्।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान् विन्देयं पुरूषानहम्॥
यः शुचिः प्रयतो भूत्वा, जुहुयादाज्यमन्वहम्। श्रियः पंच-दशर्चं च, श्री-कामः सततं जपेत्॥

श्री कनकधारा स्तोत्र

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श्री कनकधारा स्तोत्र

अंगहरे पुलकभूषण माश्रयन्ती भृगांगनैव मुकुलाभरणं तमालम।
अंगीकृताखिल विभूतिरपांगलीला मांगल्यदास्तु मम मंगलदेवताया:॥1॥
मुग्ध्या मुहुर्विदधती वदनै मुरारै: प्रेमत्रपाप्रणिहितानि गतागतानि।
माला दृशोर्मधुकर विमहोत्पले या सा मै श्रियं दिशतु सागर सम्भवाया:॥2॥ विश्वामरेन्द्रपदविभ्रमदानदक्षमानन्द हेतु रधिकं मधुविद्विषोपि।
ईषन्निषीदतु मयि क्षणमीक्षणार्द्धमिन्दोवरोदर सहोदरमिन्दिराय:॥3॥
आमीलिताक्षमधिगम्य मुदा मुकुन्दमानन्दकन्दम निमेषमनंगतन्त्रम्।
आकेकर स्थित कनी निकपक्ष्म नेत्रं भूत्यै भवेन्मम भुजंगरायांगनाया:॥4॥
बाह्यन्तरे मधुजित: श्रितकौस्तुभै या हारावलीव हरि‍नीलमयी विभाति।
कामप्रदा भगवतो पि कटाक्षमाला कल्याण भावहतु मे कमलालयाया:॥5॥
कालाम्बुदालिललितोरसि कैटभारेर्धाराधरे स्फुरति या तडिदंगनेव्।
मातु: समस्त जगतां महनीय मूर्तिभद्राणि मे दिशतु भार्गवनन्दनाया:॥6॥
प्राप्तं पदं प्रथमत: किल यत्प्रभावान्मांगल्य भाजि: मधुमायनि मन्मथेन।
मध्यापतेत दिह मन्थर मीक्षणार्द्ध मन्दालसं च मकरालयकन्यकाया:॥7॥
दद्याद दयानुपवनो द्रविणाम्बुधाराम स्मिभकिंचन विहंग शिशौ विषण्ण।
दुष्कर्मधर्ममपनीय चिराय दूरं नारायण प्रणयिनी नयनाम्बुवाह:॥8॥
इष्टा विशिष्टमतयो पि यथा ययार्द्रदृष्टया त्रिविष्टपपदं सुलभं लभंते।
दृष्टि: प्रहूष्टकमलोदर दीप्ति रिष्टां पुष्टि कृषीष्ट मम पुष्कर विष्टराया:॥9॥
गीर्देवतैति गरुड़ध्वज भामिनीति शाकम्भरीति शशिशेखर वल्लभेति।
सृष्टि स्थिति प्रलय केलिषु संस्थितायै तस्यै ‍ नमस्त्रि भुवनैक गुरोस्तरूण्यै ॥10॥
श्रुत्यै नमोस्तु शुभकर्मफल प्रसूत्यै रत्यै नमोस्तु रमणीय गुणार्णवायै।
शक्तयै नमोस्तु शतपात्र निकेतानायै पुष्टयै नमोस्तु पुरूषोत्तम वल्लभायै ॥11॥
नमोस्तु नालीक निभाननायै नमोस्तु दुग्धौदधि जन्म भूत्यै ।
नमोस्तु सोमामृत सोदरायै नमोस्तु नारायण वल्लभायै ॥12॥
सम्पतकराणि सकलेन्द्रिय नन्दानि साम्राज्यदान विभवानि सरोरूहाक्षि।
त्व द्वंदनानि दुरिता हरणाद्यतानि मामेव मातर निशं कलयन्तु नान्यम् ॥13॥
यत्कटाक्षसमुपासना विधि: सेवकस्य कलार्थ सम्पद:।
संतनोति वचनांगमानसंसत्वां मुरारिहृदयेश्वरीं भजे ॥14॥
सरसिजनिलये सरोज हस्ते धवलमांशुकगन्धमाल्यशोभे।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरि प्रसीद मह्यम् ॥15॥
दग्धिस्तिमि:कनकुंभमुखा व सृष्टिस्वर्वाहिनी विमलचारू जल प्लुतांगीम।
प्रातर्नमामि जगतां जननीमशेष लोकाधिनाथ गृहिणी ममृताब्धिपुत्रीम् ॥16॥
कमले कमलाक्षवल्लभे त्वं करुणापूरतरां गतैरपाड़ंगै:।
अवलोकय माम किंचनानां प्रथमं पात्रमकृत्रिमं दयाया : ॥17॥
स्तुवन्ति ये स्तुतिभिर भूमिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम्।
गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो भवन्ति ते बुधभाविताया: ॥18॥

दरिद्रता से मुक्ति

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दरिद्रता से मुक्ति


अगष्ट 2010 अंक में प्रकाशित दरिद्रता से मुक्ति लेख को पसंद कर प्रतिक्रिया एवं सुझाव भेजने वाले सभी पाठक बंधु/ बहनो का धन्यवाद। आप सभी पाठक बंधु/ बहनो के मार्गदर्शन हेतु किस कारणो से आती हैं दरिद्रता एवं दरिद्रता निवारण के उपाय का विस्तृत वर्णन करने का प्रयास गुरुत्व ज्योतिष ई-पत्रिका के नवम्बर-2010 अंक में किया गया हैं।

• प्रतिदिन देर उठने से दरिद्रता आती हैं।
• घर का सारा कचरा झाडू लगाकर एक कोने में समेट कर रखने से आती हैं। कचरे को घर से बाहर फेक दें।
• संध्या समय घरमें दीपक नहीं जलाने से दरिद्रता आती हैं।
• गुरुवार के दिन बाल-दाढीं(हजामत) काटने से निर्धनता आती हैं।
• दीप से अगरबत्ती जलाने से दरिद्रता आती हैं। (अगरबत्ती अलग माचिस से जलाये)
• गुरुवार के दिन भोजन में मांसाहार खाने से दरिद्रता आती हैं।
• गुरुवार के दिन धोबी को कपड़े धोने के …….
गुरुवार के दिन पीली मिट्टी से ......................आगे


दरिद्रता निवारण के उपाय
• प्रतिदिन प्रात: जल्दी उठ कर इष्ट आराधना करने से दरिद्रता दूर होती हैं।
• गुरुवार के दिन घर में गाय के गोबर का लेपन आदि करने से दरिद्रता दूर होती हैं।
• गुरुवार के दिन पीली वस्तु का भोजन ……………..
दान-पुण्य इत्यादि कर्म करते रहने से…………………आगे

लक्ष्मी मंत्र

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लक्ष्मी मंत्र


मंत्र :
1. ॐ श्री महालक्ष्म्यै नमः।
2. श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये।
3. श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं कमलवासिन्यै स्वाहा ।
4. ह्रीं श्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः।
5. ॐ श्रीं श्रियै नमः।
6. ॐ ह्री श्रीं क्रीं श्रीं क्रीं क्लीं श्रीं महालक्ष्मी मम गृहे धनं पूरय पूरय चिंतायै दूरय दूरय स्वाहा ।
7. धन लाभ एवं समृद्धि मंत्र
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं त्रिभुवन महालक्ष्म्यै अस्मांक दारिद्र्य नाशय प्रचुर धन देहि देहि क्लीं ह्रीं श्रीं ॐ ।
8. अक्षय धन प्राप्ति मंत्र
ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौं ॐ ह्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं सौं ऐं क्लीं ह्रीं श्री ॐ ।

कैसे करें मंत्र जाप :-
धनतेरस या दीपावली के दिन संकल्प लेकर प्रातःकाल स्नान करके पूर्व या उत्तर दिशा कि और मुख करके लक्ष्मी कि मूर्ति या चित्र की पंचोपचार या दक्षोपचार या षोड्षोपचार से पूजा करें।

शुद्ध-पवित्र आसन ग्रहण कर स्फटिक कि माला से मंत्र का जाप १,५,७,११ माला जाप पूर्ण कर अपने कार्य उद्देश्य कि पूर्ति हेतु मां लक्ष्मी से प्राथना करें।

अधिकस्य अधिकं फलम्।
जप जितना अधिक हो सके उतना अच्छा है। यदि मंत्र अधिक बार जाप कर सकें तो श्रेष्ठ।

प्रतिदिन स्नान इत्यादिसे शुद्ध होकर उपरोक्त किसी एक लक्ष्मी मंत्र का जाप 108 दाने कि माला से कम से कम एक माला जाप अवश्य करना चाहिए।

उपरोक्त मंत्र के विधि-विधान के अनुसार जाप करने से मां लक्ष्मी कि कृपा से व्यक्ति को धन की प्राप्ति होती है और निर्धनता का निवारण होता है।

सरल उपाय से लक्ष्मी प्राप्ति

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सरल उपाय से लक्ष्मी प्राप्ति


जो लोग भौतिक सुख मृद्धि के कारक श्रीयंत्र, दक्षिणा वर्ति शंख इत्या आदि घर में स्थापित कर पूज नही कर पाते अथवा इन वस्तुओं को खरिदने में असमर्थ हो वह उपायोको को अपनाकर जीवन में सुख-समृद्धि एवं ऎश्वर्य प्राप्त कर सकते हैं।

• प्रातः उठते ही हस्तदर्शन (प्रातः कर दर्शनम्) कर दोनों हथेलियों को 2-3 बार मुंह पर फेरना चाहिये।
• जब भी किसी कार्य से बाहर निकले तो घर पर आते समय कुछ ना कुछ साथ लेकर ही आए खाली हाथ नहीं आए चाहे पेड का पत्ता-अखबार या जीवन जरुरत कि वस्तुएं लेकर आयें। (सूर्यास्त के बाद में पेड के पत्ते तोडना हानी कारक होता हैं।)
• धन या व्यापार से संबंधीत लेन-देन के खाते पर या पत्र व्यवहार करते समय हल्दी या केशर लगायें।
• गल्ले में, पैसे के लेन-देन से संबंधित, चैक बुक-पासबुक, पूंजी निवेश से संबंधित कागजात इत्यादि श्री यंत्र के साथ में रखें।
• प्रतिदिन भोजन के लिए बनी पहली रोटी गाय को खिलाये।
• शुक्रवार को सफेद वस्तुओं का दान करने से धन योग बनता हैं।
• प्रात : काल नाशता करने से पूर्व झाडू अवश्य लगाये।
• रात को झूठे बर्तन, कचरा इत्यादि रसोई में नहीं रखे।
• प्रतिदिन संध्या समय घर पर पूजा नियत समय पर करे।
• नियमित रुप से शनिवार के दिन घर कि साफ़-सफाई करें।
• रुपया पैसा धन को थूक लगाकर गिनने से दरिद्रता आती हैं।
• बुधवार को धन का संचय करें। बैंक में धन जमा करवाते समय लक्ष्मी मंत्र जपा करे।
• घर में किसी भी देवी देवता कि एक से ज्यादा तस्वीर,मूर्ति पूजा स्थान नहीं रखे।
• जरुरत मंद व्यक्ति, गरिबो को यथासक्ति मदद कर उन्हें दान इत्यादि समय-समय पर देते रहें।
• पुरानी, रद्दी भंगार इत्यादि शनिवार के दिन घर से बाहर निकाल देनी चाहिये।
• शनिवार के दिन काले रंग कि वस्तु, स्टील, लोहा इत्यादि उपहार में नहीं लेनी चाहिये।
• किसी कर्य के लिये जाते समय खाली पेट कभी भी घर से ना निकले। कार्य में बाधा विघ्न आते हैं, असफलता प्राप्त होती हैं।
• मंगलवार, गुरुवार, शनिवार को बाल-नाखून नहीं काटने चाहिये।
• स्थिर लक्ष्मी कि कामना हेतु रुपया-पैसा-हीरे जवाहरात पीला कपडा बिछाकर या पीले कपडे में लपेटकर रखें।
• वर्ष में कम से कम एक बार परिवार के साथ तीर्थ यात्रा अवश्य करें। परिवार के साथ किसी देवी मेंदिर महिने में कम से कम एक बार में अवश्य जाये।
• सूर्योदय के समय यदि घर की छत पर काले तिल बिखेरने से घर में सुख समृद्धि होती हैं।
• अशोक का पेड़ लगाकर उसको सींचने से धन में वृद्धि होती हैं।
• सुबह मुख्य दरवाजे के बाहर से झाडू से सफाई करके थोडा पानी छिड़क ने से घर में धन कि वृद्धि होती हैं।
• प्रति सोमवार, बुधवार, शुक्रवार अशोक वृक्ष के अखंडित पत्ते घरमें लाकर शुद्ध जल या गंगाजल से धोकर लाल कपडेसे पोछकर घर में या व्यवसायीक स्थान पर रखने से धनलाभ होता हैं।
• प्रति सोमवार के दिन अशोक वृक्ष के अखंडित पत्ते लाकर शुद्ध जल या गंगाजल से धोकर लाल कपडेसे पोछकर दुकान में या व्यवसायीक स्थल पर माल सामान रखने कि जगह पर रखने से व्यापर में वृद्धि होती हैं।
• प्रति बुधवार के दिन अशोक वृक्ष के अखंडित पत्ते लाकर शुद्ध जल या गंगाजल से धोकर लाल कपडेसे पोछकर अलमारी, गल्ले में या धन रखने के बक्से में रखने से धन बृद्धि होती हैं।
• अशोक के मूल की जड़ का एक टुकड़ा पूजा घर में रखने और रोजाना धूप-दीप से पूजन करने से धन कि कमी नहीं खोती।
• तिजोरी के लॉकर में हमेशा दो बॉक्स रखें। एक में रोजाना कुछ रूपये रख कर बंद कर दें, उसमें से रूपये नहीं निकालें या अत्याधिक आवश्यकता होने पर निकाले। दूसरे बॉक्स में से काम के लेन-देन के लिए रूपए निकालें।
• प्रतिदिन आमदनी का कलेक्शन दूसरे दिन स्वयं के खर्चे के लिये या किसी व्यापारी को चुकाने हेतु निकाले। आमदनी या कलेक्शन को कम से कम 24 घंटे के बाद ही खर्च के लिये निकालने से अत्याधिक धन लाभ होता हैं।
• जो लोग नौकरी लरते हैं वह भी अपना पैसा बैंक में आने के या घर में लाने के 24 घंटे के बाद ही खर्च के लिये निकालने से अत्याधिक धन लाभ होता हैं।

वास्तु सिद्धांत से धन प्राप्ति और सुख समृद्धि

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वास्तु सिद्धांत से धन प्राप्ति और सुख समृद्धि

लेख साभार: गुरुत्व ज्योतिष पत्रिका (नवम्बर-2010)
http://gurutvajyotish.blogspot.com/


आज के भौतिक युग में हर कार्य धन के उपर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुपसे निर्भर करता हैं इस लिये प्रत्येक व्यक्ति कि यही इच्छा होती हैं कि उसके पास अपार धन दौलत एवं जीवन उपयोगी सारी सुख सुविधाए उप्लब्ध हो जो एक समृद्ध व्यक्ति के पास में होती हैं, एवं उसकी समृद्धि एवं उन्नति दिन प्रतिदिन बढती जाए।

आप अपने घर में धन एवं बहुमूल्य आभूषण, जवाहरात इत्यादि कि सुरक्षा हेतु अलमारी या कैश बोक्स रखते हैं, जिस्से धन सुरक्षित रहे और उसमे बढ़त होती रहें। इसके लिये वास्तु से संबंधित धन संचय हेतु कुछ उपाय।

वास्तु के अनुशार धन एवं बहु मूल्य सामग्री को उत्तर दिशा में रखे। उत्तर दिशा में कुबेर का वास होता हैं। एवं कुबेर धन के देवता हैं एवं उत्तर दिशा पर उनका प्रभाव रहता हैं। इस लिये अपने व्यवसाय स्थान या घर में धन को सुरक्षित रखने हेतु उत्तर दिशा का चुनाव करें।

उत्तर - व्यवसाय स्थान या घर में अलमारी को उत्तर दिशा के कमरे में उसे दक्षिण दिशा की दीवार से सटाकर एसे रखे कि उसका मुख उत्तर कि तरफ रहे या आपका मुख अलमारी खोलते या बंध करते समय दक्षिण दिशा कि और रहें। उत्तर कि और खुलने वाली अलमारी एवं कैश बोक्स में रखे गये धन एवं आभूषण कि निरंतर वृद्धि होती रहती हैं।

पूर्व - पूर्व कि और खुलने वाली अलमारी एवं कैश बोक्स में धन रखने से उसमें बढ़ोतरी होती रहती है। लेकिन उत्तर को सर्व श्रेष्ठ मानागया हैं।

दक्षिण - दक्षिण कि और खुलने वाली अलमारी एवं कैश बोक्स में धन रखने से धन एवं आभूषण जो हैं उसमे में कमी आजाति हैं क्योकि एसी स्थिति मे अलमारी या कैश बोक्स होने से आमदनी से खर्चा अधिक होता हैं एवं संचय किये गये धन में भी कमी आजाती हैं। एवं व्यक्ति पर कर्ज चढ जाता हैं।

पश्चिम - पश्चिम कि और खुलने वाली अलमारी एवं कैश बोक्स में धन एवं आभूषण रखने से उस घर मे धन कडी मेहनत से कभी कभार प्राप्त होता हैं एवं टिक पाता हैं, अन्य था अन्य संबंधि या मित्र वर्ग से सहायता से प्राप्त होने वाला धन भी टिकता नहीं हैं।

दीपावली का महत्व और लक्ष्मी पूजन विधि

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दीपावली का महत्व और लक्ष्मी पूजन विधि

लेख साभार: गुरुत्व ज्योतिष पत्रिका (नवम्बर-2010)
http://gurutvajyotish.blogspot.com/

प्राचिन काल से हि भारतीय संस्कृति में अनेक पर्व-त्यौहार मनाए जाते हैं। इन त्यौहारों में कार्तिक मास कि अमावस्या को दीपावली का विशेष महत्व हैं। क्योकि दीपावली खुशियों का त्यौहार हैं। दीपावली के दिन भगवान गणेश व लक्ष्मी के पूजन का विशेष महत्व हैं। इस दिन गणेश जी कि पूजा से ऋद्धि-सिद्धि कि प्राप्ति होती हैं एवं लक्ष्मी जी के पूजन से धन, वैभव, सुख, संपत्ति कि प्राप्ति होती हैं।

दीपावली के दिन किये जाने वाले मंत्र-यंत्र-तंत्र का प्रयोग अत्यधिक प्रभावी माना जाता हैं। दीपावली अर्थातः दीपकों कि माला।

दीपावली के दिन प्रत्येक व्यवसाय-नौकरी से जुडे व्यक्ति अपने व्यवायीक स्थान एवं घर पर मां लक्ष्मी का विधिवत पूजन कर धन कि देवी लक्ष्मी से सुख-समृद्धि कि कामना करते हैं।

पूजन सामग्री :
महालक्ष्मी पूजन में केसर, कूमकूम, चावल, पान, सुपारी, फल, फूल, दूध, बताशे, सिंदूर, मेवे, शहद, मिठाइयां, दही, गंगाजल, धूप, अगरबत्तियां, दीपक, रुई, कलावा(मौली), नारियल और तांबे का कलश।

पूजन विधि :
भूमि को गंगाजल इत्यादी से शुद्ध करके नवग्रह यंत्र बनाएं। यंत्र के साथ ही तांबे के कलश में गंगाजल, दूध, दही, शहद, सुपारी, लौंग आदि डालकर कलश को लाल कपड़े से ढककर एक जटा युक्त नारियल मौली से बांधकर रख दें। नवग्रह यंत्र के पास चांदी का सिक्का और लक्ष्मी गणेश कि प्रतिमा स्थापित कर पंचामृत से स्नान कराकर स्वच्छ लाल कपड़े से पोछ कर लक्ष्मी गणेश को चंदन, अक्षत अर्पित करके फल-फूल आदि अर्पित करें और प्रतिमा के दाहिनी ओर शुद्ध घी का एक दीपक एवं बाई और तेल (मिठेतेल) का एक दीपक जलाएं।
पवित्र आसन पर बैठकर स्वस्ति वाचन करें।

गणेश जी का स्मरण कर अपने दाहिने हाथ में गंध, अक्षत, पुष्प, दूर्वा, द्रव्य आदि लेकर गणेश, महालक्ष्मी, कुबेर आदि देवी-देवताओं के विधिवत पूजन का संकल्प करें।
सर्वप्रथम गणेश और लक्ष्मी का पूजन करें। उसके पश्चयात षोडशमातृका पूजन व नवग्रह पूजन कर अन्य देवी-देवताओं का पूजन करें।

दीपक पूजन :
दीपक जीवन से अज्ञान रुपी अंधकार को दूर कर जीवन में ज्ञान के प्रकाश का प्रतीक हैं। दीपक को इश्वर का तेजस्वी रूप मान कर इसकी पूजा करनी चाहिए। पूजा करते समय अंतःकरण में पूर्ण श्रद्धा एवं शुद्ध भावना रखनी चाहिए। दीपावली के दिन पारिवारिक परंपराओं के अनुसार तिल के तेल के सात, ग्यारह, इक्कीस अथवा इनसे अधिक दीपक प्रज्वलित करके एक थाली में रखकर कर पूजन करने का विधान हैं।

उपरोक्त पूजन के पश्चयात घर कि महिलाएं अपने हाथ से सोने-चांदी के आभूषण इत्यादि सुहाग कि संपूर्ण सामग्रीयां लेकर मां लक्ष्मी को अर्पित करदें। अगले दिन स्नान इत्यादि के पश्चयात विधि-विधान से पूजन के बाद आभूषण एवं सुहाग कि सामग्री को मां लक्ष्मी का प्रसाद समजकर स्वयं प्रयोग करें। एसा करने से मां लक्ष्मी कि कृपा सदा बनी रहती है।

जीवन में सफलता एवं आर्थिक स्थिति में उन्नति के लिए सिंह लग्न अथवा स्थिर लग्न का चुनाव कर श्रीसूक्त, कनकधारा स्तोत्र का पाठ करें।

दीपावली पूजन के समय गणेश एवं लक्ष्मी के साथ विष्णु जी का पूजन अवश्य करें जिस्से घरमें स्थिर लक्ष्मी का निवास हो सके। लक्ष्मी जी के दाहिनी ओर विष्णु जी और बाईं ओर गणेश जी कि स्थापना करनी चाहिए।

स्थिर लक्ष्मी कि कामना हेतु दक्षिणावर्ती शंख, मोती शंख, गोमती चक्र इत्यादि को शास्त्रों में लक्ष्मी के सहोदर भाई माना गया हैं। इन दुर्लभ वस्तुओं कि स्थापना करने से लक्ष्मी जी प्रसन्न होती हैं।

लक्ष्मीजी के स्वर्ग लोक जाने कि कथा

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लक्ष्मीजी के स्वर्ग लोक जाने कि कथा


एक बार की बात है, राजा बलि समय बिताने के लिए एकान्त स्थान पर गधे का वेश लेकर छिपे हुए थे। देवराज इन्द्र उनसे मिलने के लिए जगह-जगह उन्हें ढूँढ रहे थे।

एक दिन इन्द्र ने उन्हें खोज निकाला और उनके छिपने का कारण जानकर उन्हें काल का महत्व बताकर उन्हें तत्वज्ञान का बोध कराया।

तभी राजा बलि के शरीर से एक दिव्य तेज वाली स्त्री निकली। उसे देखकर इन्द्र ने पूछा दैत्यराज! यह स्त्री कौन है? यह देवी, मानुष्य अथवा आसुरी शक्ति में से कौन-सी शक्ति है?” राजा बलि बोले-“देवराज! ये देवी तीनों शक्तियों में से कोई नहीं हैं।

आप स्वयं इनसे पूछ लें। इन्द्र के पूछने पर वे शक्ति बोलीं देवेन्द्र! मुझे न तो दैत्यराज बलि जानते हैं और न ही तुम या कोई अन्य देवगण। पृथ्वी लोक पर लोग मुझे आदिकाल से अनेक नामों से पुकारते हैं। श्री, लक्ष्मी आदि मेरे नाम हैं। इन्द्र बोले देवी! आप इतने समय से राजा बलि के पास हैं लेकिन ऐसा क्या कारण है कि आप राजा बलि को छोड़कर मेरी ओर आ रही हैं?

लक्ष्मी बोलीं देवेन्द्र! मुझे मेरे स्थान से कोई भी हटा या डिगा नहीं सकता है। मैं सभी के पास काल के अनुसार आती-जाती रहती हूँ। जैसा काल का प्रभाव होता है मैं उतने ही समय तक उसके पास रहती हूँ। मैं समय के अनुशार एक को छोड़कर दूसरे के पास निवास करती हूँ।”

इन्द्र बोले देवी! आप असुरों के यहाँ निवास क्यों नहीं करतीं?” लक्ष्मी बोलीं देवेन्द्र! मेरा निवास वहीं होता है जहाँ सत्य एवं धर्म के अनुसार कार्य होते हों, व्रत और दान देने के कार्य होते हों।

असुर सत्यवादी थे, ब्राह्मणों की रक्षा करते थे, पहले इन्द्रियों को वश में कर सकते थे, अब इनके ये गुण नष्ट होते जा रहे हैं। असुर अब तप-उपवास नहीं करते, यज्ञ, हवन, दान आदि से इनका कोई संबंध शेष नहीं है।

पहले ये रोगी, स्त्रियों, वृद्धों, दुर्बलों की रक्षा करते थे, गुरुजन का आदर करते थे, लोगों को क्षमादान देते थे। लेकिन अब अहंकार, मोह, लोभ, क्रोध, आलस्य, अविवेक, काम आदि ने इनके शरीर में जगह बना ली है।

ये लोग पशु तो पाल लेते हैं लेकिन उन्हें चारा नहीं खिलाते, उनका पूरा दूध निकाल लेते हैं और पशुओं के बच्चे भूख से चीत्कारते हुए मर जाते हैं।

ये अपने बच्चों का लालन-पालन करना भूलते जा रहे हैं। इनमें आपसी भाईचारा समाप्त हो गया है। लूट, खसोट, हत्या, व्यभिचार, कलह, स्त्रियों की पतिव्रता नष्ट करना ही इनका धर्म हो गया है। सूर्योदय के बाद तक सोने के कारण स्नान-ध्यान से ये विमुख होते जा रहे हैं। इसलिए मेरा मन इनसे उचट गया।

देवताओं का मन अब धर्म में आसक्त हो रहा है। इसलिए अब मैं इन्हें छोड़कर देवताओं के पास निवास करूँगी। मेरे साथ श्रद्धा, आशा, क्षमा, जया, शान्ति, संतति, धृति और विजति ये आठों देवियाँ भी निवास करेंगी।

देवेन्द्र! अब आपको ज्ञात हो गया होगा कि मैंने इन्हें क्यों छोड़ा है। साथ ही आपको इनके अवगुणों का भी ज्ञान हो गया होगा।” तब इन्द्र ने लक्ष्मी को प्रणाम किया और उन्हें आदर सहित स्वर्ग ले गए।

बुधवार, नवंबर 03, 2010

स्फटिक श्रीयंत्र का पूजन

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स्फटिक श्रीयंत्र का पूजन


आज के भौतिक युग में अर्थ (धन) जीवन कि मुख्य आवश्यक्ताओं में से एक है। धनाढ्य व्यक्तिओं जीवनशैली को देखकर प्रभावित होते हुवे साधारण व्यकि कि भी कामना होती हैं, कि उसके पास भी इतना धन हो कि वह अपने जीवन में समस्त भौतिक सुखो को भोग ने में समर्थ हों। एसी स्थिमें मेहनत, परिश्रम से कमाई करके धन अर्जित करने के बजाय कुछ लोग अल्प समय में ज्यादा कमाने कि मानसिकता के कारण कभी-कभी गलत तरीकें अपनाते हैं।

जिसके फल स्वरुप एसे लोग धन का वास्तविक सुख भोगने से वंचित रह जाते हैं और रोग, तनाव, मानसिक अशांति जेसी अन्य समस्याओं से ग्रस्त हो जाते हैं।
जहां गलत तरीकें से कमाये हुवे धन के कारण समाज एसे लोगो को हीन भाव से देखते हैं। जबकि मेहनत, परिश्रम से कामाये हुवे धन से स्वयं का आत्मविश्वास बढता हैं एवं समाज में प्रतिष्ठा और मान सम्मान भी सरलता से प्राप्त हो जाता हैं।
जो व्यक्ति धार्मिक विचार धाराओं से जुडे हो वह इश्वर में विश्वार रखते हुवे स्वयं कि मेहनत, परिश्रम के बल पर कमाये हुवे धन को हि सच्चा सुख मानते हैं। धर्म में आस्था एवं विश्वास रखने वाले व्यक्ति के लिये मेहनत, परिश्रम करने के उपरांत अपनी आर्थिक स्थिमें उन्नति एवं लक्ष्मी को स्थिर करने हेतु, श्री यंत्र के पूजन का उपाय अपनाकर जीवन में किसी भी सुख से वंचित नहीं रह सकते, उन्हें अपने जीवन में कभी धन का अभाव नहीं रहता। उनके समस्त कार्य सुचारु रुप से चलते हैं। लक्ष्मी कृपा प्राप्ति के लिए श्रीयंत्र का सरल पूजन विधान जिसे अपना कर साधारण व्यक्ति विशेष लाभ प्राप्त कर सकते हैं। इस में जरा भी संशय नहीं हैं।

श्रीयंत्र का पूजन रंक से राजा बनाने वाला एवं व्यक्ति कि दरिद्रता को दूर करने वाला हैं।
• अपने पूजा स्थान में प्राण-प्रतिष्ठित श्रीयंत्र को पूजन के लिये स्थापित करें। (प्राण-प्रतिष्ठित श्रीयंत्र किसी भी योग्य विद्वान ब्राह्मण या योग्य जानकार से सिद्ध करवाले................. >> आगे
संपूर्ण पूजन विधि जानने हेतु कृप्या गुरुत्व ज्योतिष ई-पत्रिका नवम्बर-2010 का अंक पढें।


>> गुरुत्व ज्योतिष पत्रिका (नवम्बर-2010)
http://gk.yolasite.com/resources/GURUTVA%20JYOTISH%20NOV-2010.pdf

जब विष्णुजी ने दी लक्ष्मीजी को सजा?

दीपावली पूजन, Lord Vishnu and Godess laxmi's story

जब विष्णुजी ने दी लक्ष्मीजी को सजा?



       एक दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी भ्रमण करने एवं मनुष्यों को देखने के लिये पृथ्वी पर आयें। किन्तु माता लक्ष्मी को भ्रमण हेतु साथ लाने के कारण भगवान विष्णु ने एक शर्त रखी, और काहा कि तुम उत्तर दिशा कि तरफ नहीं देखोगी ।

       माता लक्ष्मी ने अपनी सहमति दे दी और वे शीघ्र ही पृथ्वी पर भ्रमण के लिये निकल गये । पृथ्वी पर चारों और सुन्दरता दिख रही थी और वहाँ पर बहुत ही शान्ति थी । पृथ्वी का रमणिय द्रश्य देखकर माता लक्ष्मी को बहोत हि प्रशन्न हुई और वह भूल गयी कि भगवान विष्णु ने उनसे क्या कहा था । प्रशन्नता एवं उत्सुकता वश लक्ष्मी जी उत्तर दिशा में देखने लगी । उत्तर दिशा में उन्हों ने अत्यंत खुबसूरत फूलों का एक बगीचा देखा जहाँ से बहुत हि सुंदर खुशबू आ रही थी । माता लक्ष्मी बिना सोचे ही उस बगीचे पर उतरी और वहाँ से एक फूल तोड़ लिये । भगवान विष्णु ने जब यह द्रश्य देखा तो उन्होंने माता लक्ष्मी को अपनी भूल याद दिलाते हुवे कहा कि किसी से बिना पूछे कुछ भी नहीं लेना चाहिये ।

       इतना कहते हुवे भगवान विष्णु कि आंखो से आँसू आ गये ! माता लक्ष्मी ने अपनी भूल स्वीकार कि और भगवान विष्णु से माफी माँगी । तब भगवान विष्णु बोले कि तुमने जो भूल कि हैं उसके लिये तुम्हें सजा भी भुगतनी पड़ेगी । तुम जिस फूल को उसके माली से पूछे बिना लिया हैं अब तुम उसी के घर में 3 साल के लिये वहां काम करोगी उसकी देखभाल करोगी । तभी मैं तुम्हें बैकुण्ड में वापिस बुलाऊंगा। माता लक्ष्मी एक औरत का रुप लेकर उस खेत के मालिक माधवा के पास गयी । वह एक गरीब तथा बड़े परिवार का मुखिया था । उसके साथ उसकी पत्नी, दो बेटे और तीन बेटियां सब मिलकर एक छोटी सी झोपड़ी में रहते थे । उनके पास सम्पत्ति के नाम पर सिर्फ वही एक छोटा सा बगीचे का टुकड़ा था । वे उसी से ही अपना गुजर-बसर करता था । माता लक्ष्मी उसके घर में गयी तो माधवा ने उन्हें देखा और पूछा कि वह कौन हैं । तब माता लक्ष्मी ने कहा कि मेरी देखभाल करने वाला कोई नहीं हैं मुझ पर दया करो और मुझे अपने यहाँ रहने दो मैं आपका सारा काम करुँगी । माधव एक दयालु और उदार इनसान था लेकिन वह गरीब भी था, और वह जो कमाता था उसमें तो बहुत ही मुश्किल से उसी के घर का खर्चा चलता था परन्तु फिर भी उसने सोचा कि यदि मेरे तीन कि जगह चार बेटियाँ होती तब भी तो वह यहाँ रहती यह सोचकर उसने माता लक्ष्मी को अपने यहाँ शरण दे दी और इस तरह माता लक्ष्मी तीन साल तक उसके यहाँ काम करती रही ।
      
       जैसे ही माता लक्ष्मी उसके यहाँ आयी तो उसने एक गाय खरीद ली जिस्से उसकी कमाई भी बढ़ गयी अब तो उसने कुछ जमीन और जेवर भी खरीद लिये थे और इस तरह उसने अपने लिये एक घर और अच्छे कपड़े खरीदे । तथा अब हर किसी के लिये एक अलग से कमरा भी था । इतना सब मिलने पर माधव ने सोचा कि यह सब कुछ मुझे इसी औरत (माता लक्ष्मी) के घर में प्रवेश करने के बाद मिला हैं वही हमारे भाग्य को बदलने वाली हैं । 2.5 साल निकलने के बाद माता लक्ष्मी ने उस नये घर में प्रवेश किया और उनके साथ एक परिवार के सदस्य कि तरह रही परन्तु उन्होंने खेत पर काम करना बंद नहीं किया ।

       उन्हें तो अभी अपने 6 महीने और पूरे करने थे। अब माता लक्ष्मी ने अपने 3 साल पूरे कर लिये थी। एक दिन माधव अपना काम खत्म करके बैलगाड़ी पर अपने घर लौटा तो अपने दरवाजे पर अच्छे रत्न जड़ित पोशाक पहने तथा अनमोल जेवरों से सुसज्जित एक खुबसूरत औरत को देखा ।

       उसने कहा कि वह कोई और नहीं माता लक्ष्मी हैं । तब माधव और उसके घर वाले आश्चर्य चकित ही रह गये कि जो स्त्री हमारे साथ रह रही थी वह कोई और नहीं माता लक्ष्मी स्वयं थी । इस पर उन सभी के नेत्रों से आँसू कि धारा बहने लगी और माधवा बोला कि यह क्या माँ हमसे इतना बड़ा अपराध कैसे हो गया । हमने स्वयं माता लक्ष्मी से ही काम करवाया । माता हमें माफ कर देना । तब माधव बोला कि हे माता हम पर दया करो । हममे से कोई भी नहीं जानता था कि आप माता लक्ष्मी हैं । हे माता हमें वरदान दीजिये । हमारी रक्षा करिये ।

       तब माता लक्ष्मी मुस्कुराते हुवे बोली कि हे माधव तुम किसी प्रकार कि चिन्ता मत करो तुम एक बहुत ही दयालु इनसान हो और तुमने मुझे अपने यहाँ आसरा दिया हैं उन तीन सालों कि मुझे याद हैं मैं तुम लोगों के साथ एक परिवार कि तरह रही हूँ । इसके बदले में मैं तुम्हें वरदान देती हूँ कि तुम्हारे पास कभी भी धन कि और खुशियों कि कमी नहीं होगी । तुम्हें वो सारे सुख मिलेंगे जिसके तुम हकदार हो । इतना कहकर लक्ष्मी जी अपने सोने से बने हुये रथ पर सवार होकर बैकुण्ठ लोक चली गयी । माता लक्ष्मी ने कहा कि जो लोग दयालु, और सच्चे हृदय वाले होते हैं मैं हमेशा वहाँ निवास करती हूँ । हमें गरीबों कि सेवा करनी चाहिये ।

मंगलवार, नवंबर 02, 2010

दीपावली से जुडी लक्ष्मी कथा

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दीपावली से जुडी लक्ष्मी कथा



भारतीय संस्कृति में दीपावली के त्योहार कि बड़ी लोक प्रिय कथा प्रचलित हैं।

कथा: एक बार कार्तिक मास की अमावस को लक्ष्मीजी पृथ्वी भ्रमण पर निकलीं। अमावस कि काली छाया के कारण पृथ्वी के चारों ओर अंधकार व्याप्त था। जिस कारण देवी लक्ष्मी रास्ता भूल गईं। लक्ष्मी जी नी निश्चय किया कि रात्रि का प्रहर वे मृत्युलोक में व्यतीत कर लेंगी और सूर्योदय के पश्चात पुनः बैकुंठधाम लौट जाएँगी, परंतु लक्ष्मी जी ने पाया कि पृथ्वी पर सभी लोग अपने-अपने घरों में द्वार बंद कर सो रहे हैं।

       तभी अंधकार से भरे पृथ्वी लोक में उन्हें एक द्वार खुला दिखा जिसमें एक दीपक कि ज्योति टिमटिमा रही थी। लक्ष्मी जी उस प्रकाश कि ओर पहुंच कर वहाँ उन्होंने एक वृद्ध महिला को चरखा चलाते देखा। वृद्ध महिला से रात्रि विश्राम की अनुमति माँग कर लक्ष्मी जी बुढ़िया की कुटिया में रुकीं।

       वृद्ध महिला ने लक्ष्मी जी को विश्राम के लिये बिस्तर प्रदान कर पुन: अपने कार्य में व्यस्त हो गई। चरखा चलाते-चलाते वृ्‍द्धा की आँख लग गई। दूसरे दिन उठने पर वृद्ध महिला ने पाया कि अतिथि महिला वहां से जा चुकी हैं लेकिन कुटिया के स्थान पर विशालमहल खड़ा था। जिसमें चारों ओर धन-धान्य, रत्न-जेवरात इत्यादि बिखरे हुए थे।

       एसी मान्यता हैं कि तभी से कार्तिक अमावस (दीपावली)कि रात को दीप जलाने की प्रथा चली आरही हैं। दीपावली के रात्री काल में लोग द्वार खोलकर लक्ष्मीदेवी के आगमन कि प्रतीक्षा करने कि परंपरा चली आरही हैं।
       क्योकी लोगो का तत्पर्य यह हैं कि माँ लक्ष्मी देवी जिस प्रकार उस वृद्धा पर प्रसन्न हुईं उसी प्रकार सब पर प्रसन्न हों।

कथा सार: दीपावली कि रात मात्र दीप जलाने और द्वार खुले रखने से लक्ष्मी जी घर में निवास नहीं करती! लक्ष्मी जी विश्राम करती हैं। क्योंकि देवी लक्ष्मी तो चंचल हैं। वह एक स्थान पर अस्थिर नहीं रहती। अपना आशिष देकर चलीजाती हैं। जिसके फल स्वरुप आने वाले वर्ष भव में मां लक्ष्मी के भक्त को किसी प्रकार के दुःख, दरिद्रता एवं आर्थिक संकट का सामना नहीं करना पडता।

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धन तेरस शुभ मुहूर्त (03-नवम्बर-2010)

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धन तेरस शुभ मुहूर्त (03-नवम्बर-2010)

लेख साभार: गुरुत्व ज्योतिष पत्रिका (नवम्बर-2010)
http://gurutvajyotish.blogspot.com/

         एसी पौराणिक मान्यता हैं कि धन तेरस के दिन धनवंतरी नामक देवता अमृत कलश के साथ सागर मंथन से उत्पन्न हुए थे। धनवंतरी धन, स्वास्थय व आयु के अधिपति देवता हैं। धनवंतरी को देवों के वैध व चिकित्सक के रुप में जाना जाता हैं।

         धन तेरस के दिन चांदी के बर्तन-सिक्के खरीदना विशेष शुभ होता हैं। क्योकि शास्त्रों में धनवंतरी देव को चंद्रमा के समान माना गया हैं। धन तेरस के धनवंतरी के पूजन से मानसिक शान्ति, मन में संतोष एव स्वभाव में सौम्यता का भाव आता हैं। जो लोग अधिक से अधिक धन एकत्र करने कि कामना करते हों उन्हें धनवंतरी देव कि प्रतिदिन आराधना करनी चाहिए।

         धनतेरस पर पूजा करने से व्यक्ति में संतोष, स्वास्थय, सुख व धन कि विशेष प्राप्ति होती हैं। जिन व्यक्तियों के उत्तम स्वास्थय में कमी तथा सेहत खराब होने कि आशंकाएं बनी रहती हैं उन्हें विशेष रुप से इस शुभ दिन में पूजा आराधना करनी चाहिए।

धनतेरस में खरीदारी शुभ मानी जाती हैं।
लक्ष्मी जी एवं गणेश जी कि चांदी कि प्रतिमा-सिक्को को इस दिन खरिदना धन प्राप्ति एवं आर्थिक उन्नति हेतु श्रेष्ठ होता हैं। धनतेरस के दिन भगवान धनवन्तरी समुद्र से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिये धनतेरस के दिन खास तौर से बर्तनों कि खरीदारी कि जाती हैं। इस दिन स्टील के बर्तन, चांदी के बर्तन खरीदने से प्राप्त होने वाले शुभ फलो में कई गुणा वृद्धि होने कि संभावना बढ़जाती हैं।

धन तेरस पूजा मुहूर्त
प्रदोष काल 2 घण्टे एवं 24 मिनट का होता हैं। अपने शहर के सूर्यास्त समय अवधि से लेकर अगले 2 घण्टे 24 मिनट कि समय अवधि को प्रदोष काल माना जाता हैं। अलग- अलग शहरों में प्रदोष काल के निर्धारण का आधार सूर्योस्त समय के अनुशार निर्धारीत करना चाहिये। धनतेरस के दिन प्रदोषकाल में दीपदान व लक्ष्मी पूजन करना शुभ रहता है ।

         इस वर्ष 3 नवम्बर 2010 (धनतेरस) को भारतीय समय अनुशार नई दिल्ली में संध्या सूर्यास्त 05 बज कर 38 मिनिट से आरम्भ होकर रात के 08 बजकर 02 मिनट तक का समय प्रदोष काल रहेगा। इस समया अवधि में स्थिर लग्न (वृषभ) भी मुहुर्त समय में होने के कारण घर-परिवार में स्थायी लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।

चौघाडिया मुहूर्त
• लाभ मुहूर्त प्रात:काल 06:47 से 08:11 तक
• अमृत काल मुहूर्त सुबह 08:12 से 09:35 तक
• शुभ काल मुहूर्त दोपहर 11.00 से 12:23 तक
• चल काल मुहूर्त दोपहर 03:11 से 04:35 तक
• लाभ काल मुहूर्त दोपहर 04:36 से 05:59 तक
• संध्या काल 07:35 से 12:23 तक शुभ महूर्त का समय धन तेरस की पूजा के लिये विशेष शुभ रहेगा।

         लाभ मुहूर्त पूजन करने से प्राप्त होने वाले लाभों में वृद्धि होती हैं। शुभ काल मुहूर्त कि शुभता से धन, स्वास्थय व आयु में वृद्धि होती हैं। सबसे अधिक शुभ अमृत काल में पूजा करने का होता हैं।

नोट: उपरोक्त वर्णित सूर्यास्त का समय निरधारण नई दिल्ली के अक्षांश रेखांश के अनुशार आधुनिक पद्धति से किया गया हैं। इस विषय में विभिन्न मत एवं सूर्यास्त ज्ञात करने का तरीका भिन्न होने के कारण सूर्यास्त समय का निरधारण भिन्न हो सकता हैं। सूर्यास्त समय का निरधारण स्थानिय सूर्यास्त के अनुशार हि करना उचित होगा।