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बुधवार, अप्रैल 28, 2010

आंखो से व्यक्तित्व भाग:३

Ankho se Vyaktitva bhaga:3, Part:3


आंखो से व्यक्तित्व भाग:३

  • जिस व्यक्ति कि आंखों के डोरे आगे कि और अधिक उभरे हो तो एसा व्यक्ति ज्ञानी व विद्या प्रेमी होती हैं।
  • जिस व्यक्ति कि आंखे ज्यादा बडी होती हैं वह व्यक्ति हर समय सत्ता वैभव, सुख ऐश्वर्य एवं भोगविलास में लिप्त रेहने वाले होते हैं
  • जिस व्यक्ति कि आंखे ज्यादा छोटी होती हैं वह व्यक्ति खिलाड़ी होते हैं।
  • जिस व्यक्ति कि आंखे अधिक अंदार हो वह व्यक्ति डरपोक, काम से दूर रहने वाला, निन्दक स्वभाव का होता हैं।
पलक और भौहें
  • जिस व्यक्ति कि भौहे के बाल कम हो वह व्यक्ति डरपोक होते हैं।
  • जिस व्यक्ति कि भौहे के अधिक हो वह व्यक्ति धनी, निडर होता हैं।
  • जिस व्यक्ति कि भौहे हल्के रंग की होती हैं वह आकर्षक स्वभाव के होते हैं।
  • जिस व्यक्ति कि पलके बडी होते हैं वह व्यक्ति विद्वान, विचारो मे विचरण करने वाले तथा साधु स्वभाव वाले होते हैं।
  • जिस व्यक्ति कि पलके छोटी हो वह व्यक्ति स्वस्थ, लालची, भोजन प्रेमी व बेचैन स्वभाव के होते हैं।
  • जो व्यक्ति जल्दी-जल्दी पलकें झपकता है वह शेखी मारने वालम, झूठे तथा स्वप्न लोक मे रहने वाल होता है।
  • जो व्यक्ति अधिक देर से पलकें नहीं झपकाता वह व्यक्ति सुस्त लेकिन विचारवान होता हैं।

>> आंखो से व्यक्तित्व भाग:1
>> आंखो से व्यक्तित्व भाग:2

क्षमा-प्रार्थना

Khama prathana,
क्षमा-प्रार्थना


अपराधसहस्त्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया।
दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वरि॥१॥

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि॥२॥

मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि।
यत्पूजितं मया देवि परिपूर्ण तदस्तु मे॥३॥

अपराधशतं कृत्वा जगदम्बेति चोच्चरेत्।
यां गतिं समवापनेति न तां ब्रह्मादय: सुराः॥४॥
सापराधोऽस्मि शरणं प्राप्तस्त्वां जगदम्बिके।
इदानीमनुकम्प्योऽहं यथेच्छसि तथा कुरु॥५॥

अज्ञानाद्विस्मृतेभ्र्रान्त्या यन्न्‍‌यूनमधिकं कृतम्।
तत्सर्व क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरि॥६॥

कामेश्वरि जगन्मात: सच्चिदानन्दविग्रहे।
गृहाणार्चामिमां प्रीत्या प्रसीद परमेश्वरि॥७॥

गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम्।
सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादात्सुरेश्वरि॥८॥

मंगलवार, अप्रैल 27, 2010

हनुमत्पञ्रत्‍‌न स्तोत्रम्

Hanumant Pancharatna stotram

हनुमत्पञ्रत्‍‌न स्तोत्रम्



वीताखिलविषयेच्छं जातानन्दाश्रुपुलकमत्यच्छम्।
सीतापतिदूताद्यं वातात्मजमद्य भावये हृद्यम्॥

तरुणारुणमुखकमलं करुणारसपूरपूरितापाङ्गम्।
संजीवनमाशासे मञ्जुलमहिमानमञ्जनाभाग्यम्॥

शम्बरवैरिशरातिगमम्बुजदलविपुललोचनोदारम्।
कम्बुगलमनिलदिष्टं विम्बज्वलितोष्ठमेकमवलम्बे॥

दूरीकृतसीतार्ति: प्रकटीकृतरामवैभवस्फूर्ति:।
दारितदशमुखकीर्ति: पुरतो मम भातु हनुमतो मूर्ति:॥

वानरनिकराध्यक्षं दानवकुलकुमुदरविकरसदृक्षम्।
दीनजनावनदीक्षं पावनतप:पाकपुञ्जमद्राक्षम्॥

एतत् पवनसुतस्य स्तोत्रं य: पठति पञ्चरत्‍‌नाख्यम्।
चिरमिह निखिलान् भोगान् भुक्त्वा श्रीरामभक्तिभाग् भवति॥

॥श्रीमद् आदि शंकराचार्य श्रीहनुमत्पञ्चर स्तोत्रम् सम्पूर्णम्॥


हनुमानजी के इस पञ्चरत्‍‌न स्तोत्र का जो नियमित पाठ करता हैं, वह इस लोक में चिर-काल तक समस्त भोगों को भोगकर श्रीराम-भक्ति का भागी बनता हैं।

रविवार, अप्रैल 25, 2010

यज्ञोपवीत संस्कार (भाग:3)

Yagnopavit Sanskar part:3
यज्ञोपवीत संस्कार (भाग:3)

 
 नौ धागों में नौ गुणों के प्रतीक हैं।

 
  •  अहिंसा
  • सत्य
  • अस्तेय
  • तितिक्षा
  • अपरिग्रह
  • संयम
  • आस्तिकता
  • शान्ति
  • पवित्रता।
अन्य नौ गुण बताये गये हैं।
  • हृदय से प्रेम
  • वाणी में माधुर्य
  • व्यवहार में सरलता
  • नारी मात्र में मातृत्व की भावना
  • कर्म में कला और सौन्दर्य की अभिव्यक्ति
  • सबके प्रति उदारता और सेवा भावना
  • गुरुजनों का सम्मान एवं अनुशासन
  • सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय एवं सत्संग
  • स्वच्छता, व्यवस्था और निरालस्यता का स्वभाव। 

 
यज्ञोपवीत पहनने का अर्थ है, नैतिकता एवं मानवता के पुण्य कर्तव्यों को अपने कन्धों पर परम पवित्र उत्तरदायित्व के रूप में अनुभव करते रहना। अपनी गतिविधियों का सारा ढाँचा इस आदर्शवादिता के अनुरुप ही खड़ा करना। इस उत्तरदायित्व के अनुभव करते रहने की प्रेरणा का यह प्रतीक सत्र धारण किये रहने प्रत्येक हिन्दू का आवश्यक धर्म-कर्तव्य माना गया है। इस लक्ष्य से अवगत कराने के लिए समारोहपूर्वक उपनयन किया जाता है।

 

 
यज्ञोपवीत धारण करने हेतु नियम 

 
बालक जब यज्ञोपवीत के आदर्शों को समझने एवं नियमों को पालन करने योग्य हो जाय तो उसका उपनयन संस्कार किया जाना चाहिए।

  • मल-मूत्र त्यागते समय जनेऊ को कान पर चढ़ाना चाहिये।
  • गायत्री की प्रतिमा समक्ष यज्ञोपवीत की पूजा प्रतिष्ठा के लिए एक माला (108 बार) गायत्री मंत्र का नित्य जप करना चाहिये।
  • कण्ठ से बिना बाहर निकाले ही साबुन आदि से उसे धोनाते रहना चाहिये।
  • एक भी सूत टूट जाने पर उसे निकाल कर दूसरा पहनना चाहिये।
  • घर में जन्म-मरण, सूतक, हो जाने पर अथवा छ: महीने बीत जाने पर पुराना जनेऊ हटाकर नया पहनना चाहिये।
  • चाबी आदि कोई वस्तु उसमें नहीं बाँधना चाहिये।
  • बिना यज्ञोपवीत धारण कये अन्न जल ग्रहण वर्जित माना गया।


 
>> यज्ञोपवीत संस्कार भाग:१

>> यज्ञोपवीत संस्कार भाग:२

 

शनिवार, अप्रैल 24, 2010

आंखो से व्यक्तित्व भाग:२

Ankho se Vyaktitva bhaga:2, Part:2


 
आंखो से व्यक्तित्व भाग:२

 
आंखो के रंग
  • स्याह काली पुतलियां वाले व्यक्ति कठोरता, फुर्ती और ताकत के स्वामी होते हैं।
  • गाढे नीले रंग की पुतली वाले व्यक्ति विश्वासु होते हैं।
  • हल्के नीले रंग की पुतली वाले व्यक्ति स्थिर विचारशील, धैर्यवान एवं मधुर स्वभाव के लेकिन थोडे स्वार्थी एवं कंजूस स्वभाव के होते हैं।
  • हरे रंग की पुतली वाले व्यक्ति दुराचारी, अविश्वासी, स्वार्थी तथा विश्वासघाती होते हैं। पश्चयात संस्कृति में शैतान की आंखों को हरी बताया गया है।
  • पीले रंग की पुतली वाले व्यक्ति चंचल स्वभाव के होते हैं।
  • नारंगी रंग की पुतली वाले व्यक्ति ज्यादा भावुक स्वभाव के होते हैं।
  • बिल्ली जेसी आंख वाले व्यक्ति बिल्ली जैसे ही धूर्त एवं अविश्वासी होते हैं।
  • चंचल द्रष्टि वाले व्यक्ति लोभी, अनैतिक कार्य मे लिप्त, भिक्षुक या कपटी होते हैं।
  • बगैर काम के घूरकर देखने वाले खयालो के घोडे दौडाने वाले, कामी, ठग विद्या मे माहिर, बेवकूफी भरे कार्य करने वाले होते हैं।
  • तिरछी निगाह से देखने वाले व्यक्ति निष्ठुर, क्रूर मानसिकता वाले एवं झगडालू प्रवृति वाले होते हैं।

 

रात्रि सूक्तम्

Ratri Suktam, tantrokt ratree shuktam

रात्रि सूक्तम्

विश्वेश्वरीं जगद्धात्रीं स्थितिसंहारकारिणीम्।
निद्रां भगवतीं विष्णोरतुलां तेजसं: प्रभुः॥१॥

त्वं स्वाहा त्वं स्वधा त्वं हि वषट्कार: स्वरात्मिका।
सुधा त्वमक्षरे नित्ये त्रिधा मात्रात्मिका स्थिता॥२॥

अर्धमात्रास्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः।
त्वमेव सन्ध्या सावित्री त्वं देवि जननी परा॥३॥

त्वयैतद्धार्यते विश्वं त्वयैतत्सृज्यते जगत्।
त्वयैतत्पाल्यते देवि त्वमत्स्यन्ते च सर्वदा॥४॥

विसृष्टौ सृष्टिरूपा त्वं स्थितिरूपा च पालने।
तथा संहृतिरूपान्ते जगतोऽस्य जगन्मये॥५॥

महाविद्या महामाया महामेधा महास्मृतिः।
महामोहा च भवती महादेवी महासुरी॥६॥

प्रकृतिस्त्वं च सर्वस्य गुणत्रयविभाविनी।
कालरात्रिर्महारात्रिर्मोहरात्रिश्च दारुणा॥७॥

त्वं श्रीस्त्वमीश्वरी त्वं ह्रीस्त्वं बुद्धिर्बोधलक्षणा।
लज्जा पुष्टिस्तथा तुष्टिस्त्वं शान्ति: क्षान्तिरेव च॥८॥

खड्गिनी शूलिनी घोरा गदिनी चक्रिणी तथा।
शङ्खिनी चापिनी बाणभुशुण्डीपरिघायुधा॥९॥

सौम्या सौम्यतराशेषसौम्येभ्यस्त्वतिसुन्दरी।
परापराणां परमा त्वमेव परमेश्वरी॥१०॥

यच्च किञ्चित् क्वचिद्वस्तु सदसद्वाखिलात्मिके।
तस्य सर्वस्य या शक्ति : सा त्वं किं स्तूयसे तदा॥११॥

यया त्वया जगत्स्त्रष्टा जगत्पात्यत्ति यो जगत्।
सोऽपि निद्रावशं नीत: कस्त्वां स्तोतुमिहेश्वरः॥१२॥

विष्णु: शरीरग्रहणमहमीशान एव च।
कारितास्ते यतोऽतस्त्वां क: स्तोतुं शक्ति मान् भवेत्॥१३॥

सा त्वमित्थं प्रभावै: स्वैरुदारैर्देवि संस्तुता।
मोहयैतौ दुराधर्षावसुरौ मधुकैटभौ॥१४॥

प्रबोधं च जगत्स्वामी नीयतामच्युतो लघु।
बोधश्च क्रियतामस्य हन्तुमेतौ महासुरौ॥१५॥

॥अथ श्री तन्त्रोक्तं रात्रि सूक्तम् संपूर्णम्॥

यज्ञोपवीत संस्कार (भाग:2)

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यज्ञोपवीत संस्कार (भाग:2) 

 सामवेदीय छान्दोग्य सूत्र में लिखा है कि यज्ञोपवीत के नौ धागों में नौ देवता निवास करते हैं।
  • ॐ कार
  • अग्नि
  • अनन्त
  • चन्द्र
  • पितृ
  • प्रजापति
  • वायु
  • सूर्य
  • रिक्त सभी देवताओं का समूह।
वेद मंत्रों से अभिमंत्रित एवं संस्कारपूर्वक कराये यज्ञोपवीत में 9 शक्तियों का निवास होता हैं। जिस व्यक्ति के शरीर पर ऐसी समस्त देवों की सम्मिलित प्रतिमा की स्थापना हैं, उस शरीर रूपी देवालय को परम श्रेष्ठ साधना ही समझना चाहिए।

सामवेदीय छान्दोग्य सूत्र में यज्ञोपवीत के संबंध में एक और महत्वपूर्ण उल्लेख है-

ब्रह्मणोत्पादितं सूत्रं विष्णुना त्रिगुणी कृतम्।
कृतो ग्रन्थिस्त्रनेत्रेण गायत्र्याचाभि मन्त्रितम्।।

 अर्थात:- ब्रह्माजी ने तीन वेदों से तीन धागे का सूत्र बनाया। विष्णु ने ज्ञान, कर्म, उपासना इन तीनों काण्डों से तिगुना किया और शिवजी ने गायत्री से अभिमंत्रित कर उसे मे ब्रह्म गाँठ लगा दी। इस प्रकार यज्ञोपवीत नौ तार और ग्रंथियों समेत बनकर तैयार हुआ।


यज्ञोपवीत के लाभों का वर्णन शास्त्रों में इस प्रकार मिलता है-
 

येनेन्द्राय वृहस्पतिवृर्व्यस्त: पर्यद धाद मृतं नेनत्वा।
परिदधाम्यायुष्ये दीर्घायुत्वाय वलायि वर्चसे।। (पारस्कर गृह सूत्र)

 अर्थात:- जिस प्रकार इन्द्र को वृहस्पति ने यज्ञोपवीत दिया था उसी तरह आयु, बल, बुद्धि और सम्पत्ति की वृद्धि के लिए यज्ञोपवीत पहना जाय।


देवा एतस्यामवदन्त पूर्वे सप्तत्रपृषयस्तपसे ये निषेदु:।
भीमा जन्या ब्राह्मणस्योपनीता दुर्धां दधति परमे व्योमन्।। (ऋग्वेद)

अर्थात:- तपस्वी ऋषि और देवता गणों ने कहा कि यज्ञोपवीत की शक्ति महान हैं। यह शक्ति शुद्ध चरित्र और कठिन कर्त्तव्य पालन की प्रेरणा देती हैं। इस यज्ञोपवीत को धारण करने से जीव परम पद को पहुँच जाते हैं।



  
यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात्।
आयुष्यमग्रयं प्रति मुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेज:।। (ब्रह्मोपनिषद्)

 अर्थात:- यज्ञोपवीत परम पवित्र है, प्रजापति ईश्वर ने इसे सबके लिए सहज बनाया है। यह आयु वर्धक, स्फूर्तिदायक, बन्धनों से छुड़ाने वाला एवं पवित्रता, बल और तेज देता है।
त्रिरस्यता परमा सन्ति सत्या स्यार्हा देवस्य जनि मान्यग्ने:।
अनन्ते अन्त: परिवीत आगाच्छुचि: शुक्रो अर्थो रोरुचान:।।

 अर्थात:- इस यज्ञोपवीत के परम श्रेष्ठ तीन लक्षण हैं। सत्य व्यवहार की आकांक्षा, अग्नि जैसी तेजस्विता, दिव्य गुणों से युक्त प्रसन्नता इसके द्वारा भली प्रकार प्राप्त होती हैं।

शुक्रवार, अप्रैल 23, 2010

आंखो से व्यक्तित्व भाग:१

Ankho se Vyaktitva bhaga:1, Part:1


आंखो से व्यक्तित्व भाग:१

आंख मनुष्य के व्यक्तित्व का आईना हैं। जिस्से व्यक्ति प्रेम, द्वेश, क्रोध, अहम इत्यादि सभी प्रकार के दोष-गुण व्यक्ति कि आंख पर प्रति बिंब स्पष्ट स्वरुप से दिखाई देते हैं। चाहे वह पुरुष हो स्त्री उसके संपूर्ण चरित्र का मापदंड उसकी आंख पर से सरलता से जान सकते हैं।

सामुद्रिक शास्त्र के अनुशार आंखे साधारणतः दो प्रकार कि होती हैं बडी और छोटी आंख।

बडी आंख:- बडी आंख वाले व्यक्ति हर कार्य को करने हेतु आतुर, सदायक, परिश्रमी, अपना काम निकलने मे चतुर, अपनी योजनाओ को शीघ्र अमल में लाने वाले उद्यमी होते हैं।

छोटी आंख:- छोटी आंख वाले व्यक्ति आलसी, मंद गती से कार्य करने वाले, द्वि स्वभावी, एसे व्यक्ति पर लोग सरलता से विश्वास नहीं करते।


आंखो के विविध प्रकार
  • ज्यादा खुल्ली और चौडी आंखो वाले व्यक्ति निर्दोष एवं कठोर स्वभाव के होते हैं, एसे व्यक्ति को अच्छे बुरे का भेद करने मे अधिक समय लगता हैं।
  • लंबी आंखो वाले व्यक्ति ज्यादा चालाक, कार्य कूशल, थोडे स्वार्थी, कपट रखने वाले समझते हैं।
  • लंबी एवं पतली आंखो वाले व्यक्ति स्वभाव से कपटी, दुष्ट एवं अती लोभी होते हैं।
  • बदाम जेसी आंखो वाले व्यक्ति अविश्वासी होने से सर्वदा अपने ही स्वार्थ साधने हेतु प्रयास रत रहते हैं।
  • गोल आंखो वाले व्यक्ति ज्यादा भावुक, हर समय नया कार्य करने हेतु अधिक उत्साही होते हैं।

गुरुवार, अप्रैल 22, 2010

यज्ञोपवीत संस्कार (भाग:१)

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यज्ञोपवीत संस्कार (भाग:१)


यज्ञोपवीत को ब्रहासूत्र, जनेऊ, उपवीत, यज्ञसूत्र भी कहा जाता हैं।


यज्ञोपवीत का अर्थ है
यज्ञ + उपवती अर्थात जिसे व्यक्ति को यज्ञ कराने का पूर्ण अधिकार प्राप्त हो वह व्यक्ति यज्ञोपवीत धारण कर बीना किसी को यज्ञ या किसी भी प्रकार के मंत्र या वेद का पाठ नहीं करवा सकता क्योकि ऎसा करना हिन्दू संस्कृति में वर्जित माना गया हैं।

यज्ञोपवीत धारण करने बाले व्यक्ति को नियमों का पालन करना परम आवस्यक होता हैं

जो व्यक्ति ब्रह्मचारी हो उसे तीन धागों वाली यज्ञोपवीत धारण करनी चाहिये।
शेष सभी को छे या नौ धागों वाली यज्ञोपवीत धारण करनी चाहिये ।


यज्ञोपवीत के धागों में नीति का सार समाहित कर दिया गया हैं। शास्त्रोक्त उल्लेख हैं कि सूत के नौ धागों में मनुष्य के जीवन में सुघड विकास का सुगम मार्गदर्शन समाहित कर दिया गया हैं। यज्ञोपवीत के धागों को कन्धों पर, हृदय पर, कलेजे पर, पीठ पर प्रतिष्ठापित करने से शिक्षा एवं दिक्षा के समय यज्ञोपवीत के ये धागे हर समय धारण करता को जीवन के सूत्र स्मरण करायें जिस्से वह उन्हीं सिद्धांतो के आधार पर अपनी रीति एवं नीति का निर्धारण कर सके शायद इस लिये यज्ञोपवीत धारण करने का प्रयोजन यह हैं।

उपनयन संस्कार जिसमें बच्चेका मुंडन और पवित्र जल में स्नान कराकर जनेऊ पहनाई जाती हैं उसके पश्च्यात विद्यारंभ किया जाता हैं।

यज्ञोपवीत को यज्ञ द्वारा संस्कारीत किया जाता हैं यदि किसी कारण वश यज्ञ द्वारा संस्कार किया गया जनेऊ अपवित्र होने पर यज्ञोपवीत को बदल ना आवश्यक होता हैं।

शास्त्रोंक्त वचन

मातुरग्रेऽधिजननम् द्वितीयम् मौञ्जि बन्धनम्।

अर्थात:- व्यक्तिका पहला जन्म माता के गर्भ से और दूसरा यज्ञोपवीत धारण से होता हैं।



आचार्य उपनयमानो ब्रह्मचारिणम् कृणुते गर्भमन्त:।
त रात्रीस्तिस्र उदरे विभत्ति तं जातंद्रष्टुमभि संयन्ति देवा:।। (अथर्व)

अर्थात:- गर्भ में रहकर माता और पिता के संबंध से मनुष्य का पहला जन्म होता हैं। दूसरा जन्म विद्या रूपी माता और आचार्य रूप पिता द्वारा गुरुकुल में उपनयन और विद्याभ्यास द्वारा होता हैं।

बुधवार, अप्रैल 21, 2010

22-April-2010 गुरुपुष्यामृत योग

 गुरुपुष्यामृत योग के विषय मे अधिक जानकारी हेतु (यहा क्लिक करे)


http://gurutvakaryalay.blogspot.com/2009/12/blog-post_18.html

परशुरामकृतं कालीस्तोत्रम्

parsuram krut kali stotram

परशुरामकृतं कालीस्तोत्रम्


परशुराम उवाच

नम: शंकरकान्तायै सारायै ते नमो नमः।
नमो दुर्गतिनाशिन्यै मायायै ते नमो नमः॥

नमो नमो जगद्धायै जगत्कर्यै नमो नमः।
नमोऽस्तु ते जगन्मात्रे कारणायै नमो नमः॥

प्रसीद जगतां मात: सृष्टिसंहारकारिणि।
त्वत्पादे शरणं यामि प्रतिज्ञां सार्थिकां कुरु॥

त्वयि मे विमुखायां च को मां रक्षितुमीश्वरः।
त्वं प्रसन्ना भव शुभे मां भक्तं भक्तवत्सले॥

युष्माभि: शिवलोके च मह्यं दत्तो वर: पुरा।
तं वरं सफलं कर्तु त्वमर्हसि वरानने॥

जामदग्न्यस्तवं श्रुत्वा प्रसन्नाभवदम्बिका।
मा भैरित्येवमुक्त्वा तु तत्रैवान्तरधीयत॥

एतद् भृगुकृतं स्तोत्रं भक्तियुक्तश्च य: पठेत्।
महाभयात् समुत्तीर्ण: स भवेदवलीलया॥

स पूजितश्च त्रैलोक्ये त्रैलोक्यविजयी भवेत्।
ज्ञानिश्रेष्ठो भवेच्चैव वैरिपक्षविमर्दकः॥

मंगलवार, अप्रैल 20, 2010

नवग्रह एवं दान

Navgrah Evm dan

नवग्रह एवं दान


कुंडली (जातक/ जन्म पत्री) में यदि कोई ग्रह कमजोर है या अशुभ भाव का स्वामी हो एवं अन्य भाव को देख कर अपना अशुभ प्रभाव दे रहा हो तो उस ग्रह को शांत करना आवश्यक होता हैं जिस्से ग्रह अपना प्रतिकूल प्रभाव के स्थान पर अनुकूल प्रभाव प्रदान करें।

किसी भी ग्रह के प्रभाव को अनुकूल बनाने का सरल उपाय हैं उस ग्रह से संबंधिक वस्तु विशेष का जल प्रवाह या दान करना, जिस्से ग्रह के अशुभ प्रभाव को कम किया जासके।

ग्रह:- सूर्य
वार:- रविवार
सूर्य ग्रह कि शांति हेतु गेहूँ, ताँबा, घी, गुड़, माणिक्य, लाल कपड़ा, मसूरकी दाल, कनेर या कमल के फूल, गौ दान करने से शुभ फल कि प्राप्ति होती हैं
ग्रह:- चंद्र
वार:- सोमवार
चंद्र ग्रह कि शांति हेतु मोती, चाँदी, चावल, चीनी, जल से भरा हुवा कलश, सफेद कपड़ा, दही, शंख, सफेद फूल, साँड आदि का दान करने से शुभ फल कि प्राप्ति होती हैं
ग्रह:- मंगल
वार:- मंगलवार
मंगल ग्रह कि शांति हेतु मूंगा, मसूर, घी, गुड़, लाल कपड़ा, रक्त चंदन, गेहूँ, केसर, ताँबा, लाल फूल का दान करने से शुभ फल कि प्राप्ति होती हैं
ग्रह:- बुध
वार:- बुधवार
बुध ग्रह कि शांति हेतु हरे पन्ना, मूँग, घी, हरा कपड़ा, चाँदी, फूल, काँसे का बर्तन, कपूर का दान करने से शुभ फल कि प्राप्ति होती हैं
ग्रह:- बृहस्पति (गुरु)
वार:- गुरुवार
बृहस्पति ग्रह कि शांति हेतु पुखराज, चने की दाल, हल्दी, पीला कपड़ा, गुड़, केसर, पीला फूल, घी और सोने की वस्तुओं का दान करने से शुभ फल कि प्राप्ति होती हैं
ग्रह:- शुक्र
वार:- शुक्रवार
शुक्र ग्रह कि शांति हेतु श्वेत रत्न, चाँदी, चावल, दूध, सफेद कपड़ा, घी, सफेद फूल, धूप, अगरबत्ती, इत्र, सफेद चंदन दान करने से शुभ फल कि प्राप्ति होती हैं
ग्रह:- शनि
वार:- शनिवार
शनि ग्रह कि शांति हेतु निलम, काला कपड़ा, साबुत उड़द, लोहा, यथा संभव दक्षिणा, तेल, काला पुष्प, काले तिल, चमड़ा, काले कंबल का दान करने से शुभ फल कि प्राप्ति होती हैं
ग्रह:- राहु
वार:- शनिवार
राहु ग्रह कि शांति हेतु काला एवं नीला कपड़ा, गोमेद, कंबल, साबूत सरसों (राई), ऊनी कपड़ा, काले तिल व तेल का दान करने से शुभ फल कि प्राप्ति होती हैं
ग्रह:- केतु
वार:- मंगलवार
केतु कि शांति हेतु सात प्रकार के वैदूर्य, अनाज, काजल, झंडा, ऊनी कपड़ा, तिल आदि का दान करने से शुभ फल कि प्राप्ति होती हैं
  • कृप्या दान अपनी श्रद्धा एवं क्षमता के अनुसार एक या अधिक वस्तुओं का कर सकते हैं।
  • दान ग्रहों के तय वार के अनुशार हि करें।
  • किसी गरीब या जरुरतमंद व्यक्ति को दान करना चाहिए।
  • अपने द्वारा दान का बखान या दिखावा करने हेतु दान करने से पुण्य कम हो जाता हैं।

देवी सूक्तम्

rugvedokt devi suktam



ऋग्वेदोक्त देवी सूक्तम्

अहमित्यष्टर्चस्य सूक्त स्य वागाम्भृणी ऋषि:
सच्चित्सुखात्मक: सर्वगत: परमात्मा देवता,
द्वितीयाया ऋचो जगती, शिष्टानां त्रिष्टुप् छन्द:, देवीमाहात्म्य पाठे विनियोगः।

ध्यानम्
सिंहस्था शशिशेखरा मरकतप्रख्यैश्चतुर्भिर्भुजै: शङ्खं चक्रधनु:शरांश्च दधती नेत्रैस्त्रिभि: शोभिता।
आमुक्ताङ्गदहारकङ्कणरणत्काञ्चीरणन्नूपुरा दुर्गा दुर्गतिहारिणी भवतु नो रत्‍‌नोल्लसत्कुण्डला॥

॥देवीसूक्तम्॥

अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः।
अहं मित्रावरुणोभा बिभ‌र्म्यहमिन्द्राग्नी अहमश्रि्वनोभा॥१॥

अहं सोममाहनसं बिभ‌र्म्यहं त्वष्टारमुत पूषणं भगम्।
अहं दधामि द्रविणं हविष्मते सुप्राव्ये यजमानाय सुन्वते॥२॥

अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम्।
तां मा देवा व्यदधु: पुरुत्रा भूरिस्थात्रां भूय्र्यावेशयन्तीम्॥३॥

मया सो अन्नमत्ति यो विपश्यति य: प्राणिति य ई श्रृणोत्युक्त म्।
अमन्तवो मां त उप क्षियन्ति श्रुधि श्रुत श्रद्धिवं ते वदामि॥४॥

अहमेव स्वयमिदं वदामि जुष्टं देवेभिरुत मानुषेभिः।
यं कामये तं तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम्॥५॥

अहं रुद्राय धनुरा तनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ।
अहं जनाय समदं कृणोम्यहंद्यावापृथिवीआविवेश॥६॥

अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन्मम योनिरप्स्वन्त: समुद्रे।
ततो वि तिष्ठे भुवनानु विश्वोतामूं द्यां व‌र्ष्मणोप स्पशमि॥७॥

अहमेव वात इव प्रवाम्यारभमाणा भुवनानि विश्वा।
परो दिवा पर एना पृथिव्यैतावती महिना संबभूव॥८॥

सोमवार, अप्रैल 19, 2010

वास्तु एवं रोग

vastu evm roga, vastu or rog, vastu and roga,

वास्तु एवं रोग


भवन के उत्तर-पश्चिम भाग(वायव्य कोण) का संबंध वायु तत्त्व के साथ होता हैं।
वायु का प्राण के साथ संबंध हैं। इस लिये भवन के वायव्य कोण के ज्यादा से ज्यादा स्थानको खुल्ला राखना चाहिये। इस कोने में भारी सामन नहिं रखना चाहिये या भारी भवन का निर्माण नहिं करना चाहिये अन्यथा श्वास से संबंधित परेशानी, वायुविकार तथा मानसिक रोग होने कि संभावना अधिक बढ़ जाती हैं।

जिस भवन के वायव्य कोण कि सतह उत्तर-पूर्व कि सतह से थोडी ऊचाई पर एवं दक्षिण-पश्चिम कि सतह से थोडी नीची हो वह भवन निवास हेतु शुभ होता हैं।

जिस भवन में उत्तर दिशा कि जगह अधिक होतो परिवार में महिला वर्ग में त्वचा संबंधी रोग एक्झिमा, एलर्जी इत्यादि होने का खतरा बढ जाता हैं।

यदि भवन के पश्चिम में जगह उत्तर से अधिक होतो पुरुष वर्ग के लिये शारीरिक कष्ट होने का खतरा बढ जाता हैं।


 
भवन के उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) का संबंध जल तत्त्व के साथ होता हैं।
जिस भवन का ईशान कोण भारी हो तो भवन में रेहने वाले लोगो के शरीर में जल तत्व के असंतुलन के कारण विभिन्न प्रकार के रोग एवं परेशानियां उतपन्न होती हैं।

यदि भवन का ईशान कोणजितना होसके खुला एवं हलका रखा जाये उतना शुभ होता हैं।

यदि भवन में ईशान कोण में रसोई घर होतो घरके सदस्यो में पेट से संबंधित रोग एवं परिवार के सदस्यो के बिचमें तनाव होता हैं।

ईशान कोण में भूमिगत जल भंडार या घरमें आनेवाले पानी कि लाइन इस दिशा मे होतो अति उत्तम होता हैं।

यदि घरमें बीमारी घर कर गई होतो रोगी को घर के ईशान कोण कि और मुख करके दवाई का सेवन कराने से रोग जल्द थीक होजाता हैं।

यदि भवन का ईशान कोण कटा हो तो भवन में निवास करने वाले लोग रक्त-विकार एवं यौन रोग हो सकता हैं एवं व्यक्ति कि प्रजनन क्षमता कमजोर होसकती हैं।

यदि ईशान कोण से उत्तर का भाग ऊंचा होय तो परिवार में स्त्री वर्ग का स्वास्थ्य पर खराब असर होता हैं।

यदि ईशान कोण से पूर्वनुं का भाग ऊंचा होय तो परिवार में पुरुषो के स्वास्थ्य पर खराब असर होता हैं।


भवन के पूर्वी-दक्षिण (अग्नि कोण) का संबंध अग्नि तत्व के साथ होता हैं।
जिस भवन के अग्नि कोण में रसोई घरको वास्तु कि द्रष्टि से शुभ मानागया हैं।

जिस भवन के अग्नि कोण में जल भंडार या स्त्रोत हो वहा निवास करने वाले उदर रोग एवं पित्त विकार होने कि संभावना होती हैं।

भवन के दक्षिण-पूर्व दिशामे यदि दक्षिण का स्थान ज्यादा होतो परिवार के पुरुष सदस्यो में मानसिक परेशानी होती हैं।


 
वास्तुशास्त्र के अनुसार भवन का केन्द्र स्थान(ब्रह्म स्थान) को ज्यदा महत्व हिया गया हैं। जो वास्तु में आकाश तत्त्व से संबंध रखता हैं। इस लिये इस स्थान को यथा संभव खाली रखना आवश्यक हैं जिस्से परिवार के लोगो का स्वाश्थ्य उत्तम होता हैं एवं परिवार का विकास शीघ्र होता हैं।

भवन के ब्रह्म स्थान पर किसी भी प्रकार कि अस्वच्छता होने से परिवार के सदस्यो के स्वास्थ्य पर बुरा असर देखा गया हैं।

भवन के ब्रह्म स्थान पर शौचालय, पगथियां (सीडी), गटर, सेफ्टी टेन्क आदि होने से सदस्यो में कान कि परेशानी, बदनामी, धन हानि एवं परिवार के विकास में रुकावट होते देखा गया हैं।

रविवार, अप्रैल 18, 2010

वरदविनायक चतुर्थी

vainayaki chaturthee vrat, vainayakee chaturthi vrata, varad vinayak vhaturthi,

वैनायकी चतुर्थी व्रत(वरद विनायक चतुर्थी)





पूजा व्रतेषु सर्वेषुमध्याह्नव्यापिनीतिथि:।

प्रति माह कि शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मध्याहन के समय वरदविनायक चतुर्थी या वैनायकीचतुर्थी का व्रत किया जाता हैं।
जो व्यक्ति वरदविनायक चतुर्थी का व्रत पूर्ण श्रद्धा से नियम पूर्वक सालभर करता हैं उसकी समस्त मनोकामनाएं स्वतः सिद्ध होने लगती हैं ऎसा शास्त्रोक्त वचन हैं।

वैनायकीचतुर्थी में गणेषजी की षोडशोपचार विधि से पूजा-अर्चना करने का विधान हैं।

पूजन में गणेशजी के विग्रह को दूर्वा, गुड या मोदक का भोग, सिंदूर या लाल चंदन चढाना चाहिए।

गणपति की आराधना हेतु तुलसी दलका प्रयोग वर्जित हैं।

एवं गणेश मंत्र का १०८ बार जाप करें

शनिवार, अप्रैल 17, 2010

अंग फड़कने से शुकन अपशुकन

Ang Fadakane se shukan apashukan, anga phadakane se shukan apshukan

अंग फड़कने से शुकन अपशुकन

 
मानव शरीर के विभिन्न अंगों में कभी कभी फड़क होती हैं।

अंग फड़क्ने का कारण मानव शरीर में उतपन्न होने वाले वायु-विकार आदि के कारण शरीर कि माशपेशी में रह रहकर थोडा उभरना और दबना बताया जाता हैं।

हमारे भारत में अंगो के फड़कने के आधार पर शुभ-अशुभ ज्ञात करने की धारणा सालो से प्रचलित रही हैं।

प्रायः पुरुष का दाहिना (Right) अंग और स्री का बांया (Left) अंग फड़कना शुभ माना जाता हैं।

  • यदि बाएं पैर की पहली और आखिरी उंगली फड़के, तो लाभ होता हैं।
  • यदि दाएं पैर की पहली और आखिरी उंगली फड़के तो अशुभ होता हैं।
  • यदि पांव की पिंडलीयां फड़कने से काम में बाधा उतपन्न होती हैं एवं यह शत्रु द्वारा परेशानी का संकेत हैं। दायां घुटना फड़के, तो अशुभ फल कि प्राप्ति और बायां फड़के, तो शुभ फल कि प्राप्ति होती हैं।
  • यदि बायां पैर फड़कना शुभ होता हैं, दायां पैर फड़कने से मुसीबतों का अंत होने का संकेत हैं।
  • यदि बाईं जांघ के फड़कने से दोस्त से सहायता मिलने का संकेत हैं।
  • यदि दाईं जांघ फड़कने से शत्रु शांत होने का संकेत हैं।
  • यदि दाएं हाथ का अंगूठा फड़कने से शुभ समाचार मिलने का संकेत हैं।
  • यदि बाएं हाथ का अंगूठा फड़कने से हानी होने का संकेत हैं।
  • यदि यदि मस्तक फड़के तो भूमि लाभ मिलने का संकेत हैं।
  • यदि यदि कंधा फड़के तो भोग-विलास में वृद्धि होने का संकेत हैं।
  • यदि दोनों भौंहों के मध्य भाग में फड़कन होतो सुख प्राप्ति का संकेत हैं।
  • यदि कपाल फड़के तो शुभ कार्य होने का संकेत हैं।
  • यदि आँख का फड़कना धन प्राप्ति का संकेत हैं।
  • यदि आँख के कोने फड़के तो आर्थिक उन्नति होने का संकेत हैं।
  • यदि आँखों के पास का हिस्सा फड़के तो प्रिय व्यक्ति से मिलन होने का संकेत हैं।
  • यदि हाथों का फड़कना उत्तम कार्य द्वारा धन प्राप्ति का संकेत हैं।
  • यदि वक्षःस्थल का फड़कना विजय प्राप्ति का संकेत हैं।
  • यदि हृदय फड़के तो इष्ट सिद्धी प्राप्त होने का संकेत हैं।
  • यदि नाभि के फड़क्ने से स्त्री वर्ग को हानि होने का संकेत हैं।
  • यदि पेट का फड़कना कोष वृद्धि होने का संकेत हैं।
  • यदि गुदा का फड़कना वाहन सुख कि प्राप्ति का संकेत हैं।
  • यदि कण्ठ के फड़कने से ऐश्वर्य लाभ कि प्राप्ति का संकेत हैं।
  • यदि मुख के फड़कने से मित्र द्वारा लाभ होने का संकेत हैं।
  • यदि होठों का फड़कना प्रिय वस्तु की प्राप्ति का संकेत हैं।

चेहरे पर तिल का प्रभाव

Chehare par til ka prabhav, chehare par tila ka prabhav,

चेहरे पर तिल का प्रभाव


यदि चेहरे पर दाहिने भाग में लाल या काले रंग का तिल हो, तो व्यक्ति

यशस्वी, धनवान तथा सुखी होता हैं।

यदि नीचे के होठ पर तिल का चिन्ह हो, तो ऐसा व्यक्ति निर्धन होता हैं

तथा जीवन भर गरीबी में दिन व्यतीत करता हैं। होठ और तिल के बिच जितनि दूरी हो प्रभाव उतना कम होता जाता हैं।

यदि ऊपर के होंठ पर तिल का चिन्ह हो, तो ऐसा व्यक्ति अत्यधिक

विलासी और काम पिपासु लेकिन धनवान होता हैं।

यदि बायें कान के ऊपरी सिरे पर तिल का चिन्ह हो, तो व्यक्ति दीर्घायु होता हैं लेकिन उसका शरीर थोडा कमजोर होता हैं।

यदि नासिका के मध्य भाग में तिल हो, तो व्यक्ति अधिक यात्रा करने वाला भ्रमण प्रिय एवं दुष्ट स्वभाव का होता हैं।

यदि दाहिनी कनपटी पर तिल हो, तो व्यक्ति प्रेमी, समृद्ध तथा सुखपूर्ण अपना जीवन व्यतीत करने वाला होता हैं।

यदि बायें गाल पर तिल का चिन्ह हो, तो गृहस्थ जीवन सुखमय रहता हैं लेकिन जीवन में धन का अभाव रहता हैं।

यदि ठोड़ी पर तिल हो, तो वह व्यक्ति थोडा स्वार्थी एवं अपने काम में ही लगा रहने वाला होता हैं।

यदि दाहिने कान के पास तिल हो, तो व्यक्ति साहसी होते हैं।

यदि दाहिनी और भौंह के पास में तिल हो, तो व्यक्ति कि आंखें कमजोर होती हैं।

यदि दाहिने गाल पर तिल का चिन्ह हो, तो ऐसा व्यक्ति बुद्धिमान तथा जीवन के हर क्षेत्र में उन्नति करने वाला होता है।

यदि गर्दन पर तिल हो, तो व्यक्ति बुद्धिमान होते हैं और अपने प्रयत्नों से धन संचय करने वाला होता हैं।

यदि दाहिनी आंख के नीचले हिस्से पर तिल का चिन्ह हो, तो वे समृद्ध तथा सुखी होते हैं।

यदि नासिका के बाएं भाग पर तिल हो, तो व्यक्ति अधिक प्रयत्न करने के बाद सफलता प्राप्त होती है।

यदि बाएं आंख की भौंहों के पास में तिल हो, तो व्यक्ति एकान्त प्रिय एवं सामान्य जीवन निर्वाह करने वाला होता है।

यदि दोनों भौंहों के बीच के हिस्से में तिल का चिन्ह हो, तो व्यक्ति दीर्घायु धार्मिक एवं उदार हृदय के स्वामी होते हैं।


नोट:- उपरोक्त जानकारी शास्त्र के आधार पर दि गई हैं।

शुक्रवार, अप्रैल 16, 2010

विष्णुकृतं गणेशस्तोत्रम्

Vishnu Krut Ganesh stotram

विष्णुकृतं गणेशस्तोत्रम्




श्री नारायण उवाच

अथ विष्णु: सभामध्ये सम्पूज्य तं गणेश्वरम्।
तृष्टाव परया भक्त्या सर्वविघन्विनाशकम्॥

श्री विष्णु उवाच

ईश त्वां स्तोतुमिच्छामि ब्रह्मज्योति: सनातनम्।
निरूपितुमशक्तोऽहमनुरूपमनीहकम्॥

प्रवरं सर्वदेवानां सिद्धानां योगिनां गुरुम्।
सर्वस्वरूपं सर्वेशं ज्ञानराशिस्वरूपिणम्॥

अव्यक्तमक्षरं नित्यं सत्यमात्मस्वरूपिणम्।
वायुतुल्यातिनिर्लिप्तं चाक्षतं सर्वसाक्षिणम्॥

संसारार्णवपारे च मायापोते सुदुर्लभे।
कर्णधारस्वरूपं च भक्तानुग्रहकारकम्॥

वरं वरेण्यं वरदं वरदानामपीश्वरम्।
सिद्धं सिद्धिस्वरूपं च सिद्धिदं सिद्धिसाधनम्॥

ध्यानातिरिक्तं ध्येयं च ध्यानासाध्यं च धार्मिकम्।
धर्मस्वरूपं धर्मज्ञं धर्माधर्मफलप्रदम्॥

बीजं संसारवृक्षाणामङ्कुरं च तदाश्रयम्।
स्त्रीपुन्नपुंसकानां च रूपमेतदतीन्द्रियम्॥

सर्वाद्यमग्रपूज्यं च सर्वपूज्यं गुणार्णवम्।
स्वेच्छया सगुणं ब्रह्म निर्गुणं चापि स्वेच्छया॥

स्व्यं प्रकृतिरूपं च प्राकृतं प्रकृते: परम्।
त्वां स्तोतुमक्षमोऽनन्त: सहस्त्रवदनेन च॥

न क्षम: पञ्चवक्त्रश्च न क्षमश्चतुराननः।
सरस्वती न शक्ता च न शक्तोऽहं तव स्तुतौ॥

न शक्ताश्च चतुर्वेदा: के वा ते वेदवादिनः॥

इत्येवं स्तवनं कृत्वा सुरेशं सुरसंसदि।
सुरेशश्च सुरै: साद्र्ध विरराम रमापतिः॥

इदं विष्णुकृतं स्तोत्रं गणेशस्य च य: पठेत्।
सायंप्रातश्च मध्याह्ने भक्तियुक्त : समाहितः॥

तद्विघन्निघन् कुरुते विघनेश्वःसततं मुने।
वर्धते सर्वकल्याणं कल्याणजनक: सदा॥

यात्राकाले पठित्वा तु यो याति भक्तिपूर्वकम्।
तस्य सर्वाभीष्टसिद्धिर्भवत्येव न संशयः॥

तेन दृष्टं च दु:स्वपन् सुस्वपन्मुपजायते।
कदापि न भवेत्तस्य ग्रहपीडा च दारुणा॥

भवेद् विनाश: शत्रूणां बन्धूनां च विवर्धनम्।
शश्वद्विघन्विनाशश्च शश्वत् सम्पद्विवर्धनम्॥

स्थिरा भवेद् गृहे लक्ष्मी: पुत्रपौत्रविवर्धिनी।
सर्वैश्वर्यमिह प्राप्य ह्यन्ते विष्णुपदं लभेत्॥

फलं चापि च तीर्थानां यज्ञानां यद् भवेद् ध्रुवम्।
महतां सर्वदानानां श्री गणेशप्रसादतः॥

बुधवार, अप्रैल 14, 2010

गणपतिस्तोत्रम्

Ganapati Stotram

गणपतिस्तोत्रम्


सुवर्णवर्णसुन्दरं सितैकदन्तबन्धुरं गृहीतपाशकाङ्कुशं वरप्रदाभयप्रदम्।
चतुर्भुजं त्रिलोचनं भुजङ्गमोपवीतिनं प्रफुल्लवारिजासनं भजामि सिन्धुराननम्॥

किरीटहारकुण्डलं प्रदीप्तबाहुभूषणं प्रचण्डरत्‍‌नकङ्कणं प्रशोभिताङ्घियष्टिकम्।
प्रभातसूर्यसुन्दराम्बरद्वयप्रधारिणं सरत्‍‌नहेमनूपुरप्रशोभिताङ्घ्रिपङ्कजम्॥

सुवर्णदण्डमण्डितप्रचण्डचारुचामरं गृहप्रदेन्दुसुन्दरं युगक्षणप्रमोदितम्।
कवीन्द्रचित्तरञ्जकं महाविपत्तिभञ्जकं षडक्षरस्वरूपिणं भजे गजेन्द्ररूपिणम्॥

विरिञ्चविष्णुवन्दितं विरूपलोचनस्तुतं गिरीशदर्शनेच्छया समर्पितं पराम्बया।
निरन्तरं सुरासुरै: सपुत्रवामलोचनै: महामखेष्टकर्मसु स्मृतं भजामि तुन्दिलम्॥

मदौघलुब्धचञ्चलालिमञ्जुगुञ्जितारवं प्रबुद्धचित्तरञ्जकं प्रमोदकर्णचालकम्।
अनन्यभक्तिमानवं प्रचण्डमुक्तिदायं नमामि नित्यमादरेण वक्रतुण्डनायकम्॥

दारिद्रयविद्रावणमाशु कामदं स्तोत्रं पठेदेतदजस्त्रमादरात्।
पुत्री कलत्रस्वजनेषु मैत्री पुमान् भवेदेकवरप्रसादात्॥

इस स्तोत्रा का प्रतिदिन पाठ करने से गणेशजी की कृपा से उसे संतान लाभम स्त्री प्रति, मित्र एवं स्वजनो से एवं परिवार में प्रेम भाव बढता हैं।

मन्द्दात्मकं मारुतिस्तोत्रम्

 manddatmakam maruti stotram

 मन्द्दात्मकं मारुतिस्तोत्रम्



नमो वायुपुत्राय भीमरूपाय धीमते।
नमस्ते रामदूताय कामरूपाय श्रीमते॥

मोह शोकविनाशाय सीताशोकविनाशिने।
भगनशोकवनायास्तु दग्धलङ्काय वाग्मिने॥

गतिनिर्जितवाताय लक्ष्मणप्राणदाय च।
वनौकसां वरिष्ठाय वशिने वनवासिने॥

तत्त्‍‌वज्ञानसुधासिन्धुनिमगनय महीयते।
आञ्जनेयाय शूराय सुग्रीवसचिवाय ते॥

जन्ममृत्युभयघनय सर्वकष्टहराय च।
नेदिष्ठाय प्रेतभूतपिशाचभयहारिणे॥

यातनानाशनायास्तु नमो मर्कटरूपिणे।
यक्षराक्षसशार्दूलसर्पवृश्चिकभीहृते॥

महाबलाय वीराय चिरंजीविन उद्धते।
हारिणे वज्रदेहाय चोल्लङ्घितमहाब्धये॥

बलिनामग्रगण्याय नमो न: पाहि मारुते।
लाभदोऽसि त्वमेवाशु हनुमन् राक्षसान्तक॥

यशो जयं च मे देहि शत्रून् नाशय नाशय।
स्वाश्रितानामभयदं य एवं स्तौति मारुतिम्।

हानि: कुतो भवेत्तस्य सर्वत्र विजयी भवेत्॥



इस स्तोत्रका प्रतिदिन पाठ करने से मृत्यु , यक्ष, राक्षस, सिंह, सर्प, बिच्छू भूत, प्रेत और पिशाच इत्यादि भयका नाश होकर उसकी समस्त पीड़ा का निराकरण होता हैं। उसे समस्त कार्यो मे विजय प्राप्त होती हैं

राधाकृत गणेशस्तोत्रम्

Radha krut ganesh stotram

राधाकृत गणेशस्तोत्रम्


श्रीराधिकोवाच:

परम् धाम परम् ब्रह्म परेशम् परमीश्वरम्। विघन्निघन्करम् शान्तम् पुष्टम् कान्तमनन्तकम्॥

सुरासुरेन्द्रै: सिद्धैन्द्रै: स्तुतम् स्तौमि परात्परम्। सुरपद्मदिनेशम् च गणेशम् मङ्गलायनम्॥
इदम् स्तोत्रम् महापुण्यम् विघन्शोकहरम् परम्। य: पठेत् प्रातरुत्थाय सर्वविघनत् प्रमुच्यते॥



इस स्तोत्र का प्रति दिन पाठ करने से मनुष्य के सारे विघ्नो एवं शोको का नाश होता हैं।

अधिक मास (15 Apr- 14 May

adhik masa, adhik maha

अधिक मास (15 Apr- 14 May)
 
हिन्दु पंचागों के अनुसार एक वर्ष १२ मास का होता हैं लेकिन यह विक्रम संवत् 2067 में 2 बैशाख मास होंगे।

इस लिये यह वर्ष १२ वर्ष कि जगह १३ मास का होगा। एवं यह अधिक मास 15 अप्रैल से प्रारंभ होकर 14 मई तक रहेगा। इस्से पूर्व २ वैशाख माह एक साथ में सन १९७२ में एवं सन १९९१ वर्ष में थे।
 
धार्मिक द्रष्टि से देखे तो इस अधिक मास का विशेष महत्व हमारे धर्म शास्त्रो में बताया गया हैं। अधिक मास के दौरान किसी भी तरह के शुभ कार्य प्रतिबंधित माने जाते रहते हैं लेकिन धार्मिक अनुष्ठान जेसे इष्ट आराधना, जप, तप करने से विशेष लाभदायी सिद्ध होते देखा गया हैं।
 
जिस मास के दोनो पक्ष (शुक्ल एवं कृष्ण पक्ष) में सूर्य की संक्रांति का अभाव होता हैं, उसे अधिक मास कहा जाता हैं। सूर्य के एक राशि से दूसरी राशि में होने वाले परिवर्तन को संक्रांति कहाजाता हैं। एवं जिस मास में सूर्य का राशि-परिवर्तन नहीं होता है तो उस मास को अधिकमास (मलमास एवं पुरुषोत्तम मास) कहा जाता हैं।
  • अधिक मास में सांसारिक कर्म जैसे विवाह, गृहारंभ, गृह-प्रवेश, मुंडन, यज्ञोपवीत, व्यापार का शुभारंभ, नववधू का प्रवेश, देव प्रतिष्ठा, यज्ञ, भूमि, आभूषण, वस्त्र, गाडी खरीदना आदि को वर्जित माना गया हैं।
  • अधिक मास में निष्काम भाव से पूजा-अर्चना, सत्संग, भजन-कीर्तन, तीर्थयात्रा और दान आदि करने से अत्याधिक लाभ कि प्राप्ति होती हैं।

मंगलवार, अप्रैल 06, 2010

ज्योतिष एवं रोग

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ज्योतिष एवं रोग


ज्योतिष द्रष्टि कोण के अनुसार व्यक्ति को अपने पूर्व जन्म में अर्जित किये गये पाप कर्मों के आधार पर उसे फल प्राप्त होता हैं, जो उसे समय समय पर विभिन्न रोगों के रूप में व्यक्ति के शरीर में उत्पन्न होतें हैं ।

जन्मान्तर कृतम् पापम् व्याधिरुपेण बाधते
तच्छान्तिरौष धैर्दानर्जपहोम सुरार्चनै :   
                                                              (हरित सहिंता )
                                                                 

भावार्थ:- व्यक्ति को अपने पूर्व जन्म में किया गया पाप कर्म ही व्याधि के रूप में उसके शरीर में उत्पन्न हो कर उसके लिय६ए कष्ट कारक होता हैं और औषध, दान ,जप ,होम व देवपूजा से रोग की शांति होती हैं

ज्योतिष के साथ हि आयुर्वेद में भी कर्मदोष को ही रोग की उत्पत्ति का कारण माना गया हैं
भारतिय परंपरा में व्यक्ति कि द्वारा किये गये कर्म के तीन भेद माने गए हैं ;

संचित कर्म

प्रारब्ध कर्म

क्रियमाण कर्म

आयुर्वेद के मत से संचित कर्म ही कर्म जन्य रोगों के कारण होते हैं जिसके एक हिस्से को व्यक्ति प्रारब्ध के रूप में भोगता हैं।

वर्तमान समय में किए जाने वाला कर्म ही क्रियमाण कर्म हैं । वर्तमान काल में अन-उचित आहार विहार के कारण भी मानवशरीर में रोग उत्पन्न होते हैं ।

हमारे यहा तो प्राचिन काल से हि विद्वान ऋषि मुनि एवं आचार्यो का मत हैं कि कुष्ठ रोग, उदर रोग गुदा रोग, पागलपन, पंगुता, भगन्दर, प्रमेह, द्रष्टि हिनता, अर्श, देह में कंपन, श्रवण व वाणी दोष के रोग व्यक्ति द्वारा किये गये परस्त्री गमन, ब्रह्म हत्या, दूसरे के धन का हरण, बालक-स्त्री-निर्दोष एवं असहाय व्यक्ति की हत्या आदि दुष्कर्मों के प्रभाव से उत्पन्न होते हैं। इसलिये मानव द्वारा इस जन्म या पूर्व जन्म में किया गया पापकर्म ही रोगों का कारण होता है । तभी तो ऐसे मनुष्य भी कभी-कभी असाध्य रोगों का शिकार हो कर जीवन भर कष्ट भोगतें रहते हैं।

शुक्रवार, अप्रैल 02, 2010

भूमि का शुद्धि करण

bhumi ka shuddhi karan, bhoomi ka shuddhi karan,

भूमि का शुद्धि करण


 
किसी भी भूमि पर भवन निर्माण करने से पूर्व उसका शुद्धि करण करना वास्तु ग्रंथो में आवश्यक बताया गया हैं।

 

 
सम्मार्जनोपाञ्ञनेन सेकेनोल्लेखनेन च।
गवां च परिवासेन भूमिः शुद्धयाति पञ्चभिः॥ (मनुस्मृति ५।१२५)

 
अर्थातः :-  भूमि का शुद्धि करण सम्मार्जन (झाड़ना- भूमि के सतह कि मिट्टी को झाडकर शुद्ध करना), लीपना ( गोबर आदिसे लीप कर भूमि को शुद्ध करना) , सींचना ( गोमूत्र, गंगाजल आदिसे सीच कर भूमि को शुद्ध करना), खोदना ( ऊपरकी कुछ मिट्टी खोदकर निकाल कर भूमि को शुद्ध करना ) और गौ सेवा ( एक दिन और रात गाय को लाकर उसे ठहराकर उस कि सेवा कर भूमि को शुद्ध करना) - इस प्रकार से भूमि का शुद्धि करण होता हैं ।

 

 यदि भूमि को खोदने पर उसमे से गाय कि हड्डी निकले तो राजभय होता हैं।
 
यदि मानव कि हड्डी निकले तो संतान का नाश होता हैं।

यदि बकरी कि हड्डी निकले तो अग्नि का भय होता हैं।

यदि घोड़े कि हड्डी निकले तो रोग भय होता हैं।

यदि गधे या ऊँटका कि हड्डी निकले तो धन संपदा कि हानि होती हैं।

यदि श्वान (कुत्ते) कि हड्डी निकले तो गृह में रहने वालो के मध्य कलह एवं सदस्यो का नाश होता हैं।

 

हड्डी यदि एक पुरुष कि उच्चता के अनुपात के भीतर निकले तो हि दोष होता हैं। यदि पुरुष कि उच्चता के अनुपात के नीचे से मिले तो उस भूमि पर दोष नहि लगता।

 

 

 
उपाय :-  भवन निर्माण हेतु किसी भी भूमि पर भवन बनाने से पूर्व उस जगह कि एक पुरुष कि उच्चता के अनुपात कि मिट्टी को खोद कर उसमे नई मिट्टी को शुद्धिकरण कर भरवा दि जाये तो वह भूमि भवन निर्माण हेतु अति उत्तम होती हैं।

गुरुवार, अप्रैल 01, 2010

ग्रह एवं रोग भाग:१

Grah evm rog Bhag:1, Grah or roga Part:1

ग्रह एवं रोग भाग:१


हमारे ऋषि-मुनि और ज्योतिषाचार्योने बडी ही सरलता से हर बीमारी का संबंध ग्रहो के साथ होने का उल्लेख ज्योतिष ग्रंथो मे किया हैं।

व्यक्ति की जन्म कुंडली में जन्म समय में स्थित ग्रहो कि स्थिती, ग्रहोकि महादशा, अंतर दशा एवं ग्रहो के वर्तमान समय के ग्रहो की स्थिति से व्यक्ति के स्वास्थ्य एवं रोग का आंकलन होता हैं।

आपने प्रायः देखा होगा स्वस्थ व्यक्ति भी कभी-कभी अचानक बीमार पड़ जाता हैं। जो दरसल खान-पान में बरती गई कोई लापरवाही हो सकती हैं। कभी-कभी व्यक्ति को आनुवांशिक यानी माता-पितासे प्राप्त रोग हो सकते है।

ज्योतिष विद्वान के मत से व्यक्ति के जन्म समय पर ग्रहों कि स्थिति एवं प्रभाव से व्यक्ति को उम्र के किस मोड़ पर उसे कोनसी बीमारी हो यह सुनिश्चित कर सकते हैं। यदि समय से पहले पता चल जाये व्यक्ति कब किस रोग से पीडि़त हो सकता हैं, तो पहले से सचेत होकर रोग का से बचाव हेतु या उसका निदान किया जा सकता हैं। क्योकि समय से पूर्व रोग के बारे में पता चलने से व्यक्ति खान-पान में परहेज कर बीमारी को कम करने या टालने का प्रयास कर सकता हैं।

जन्म कुंडली मे रोग का निर्णय कुंडली के छठे भाव में स्थित ग्रह, छठे भाव के स्वामी कि स्थिति छठे भाव पर ग्रह कि द्रष्टि, छठे भाव का कारक ग्रह के आधार पर जान सकते हैं, कि भविष्य में जातक किस रोग से पीडित हो सकता हैं।

कुछ मुख्य बातों को समझ कर आप किसी भी व्यक्ति कि जन्म कुंडली से होने वाले रोगों के बारे में सचेत कर सकते हैं। वैसे भी आकाश में भ्रमण करते सभी ग्रह और नक्षत्र रोग उत्पन्न कर सकते हैं। कौन-सा ग्रह किस प्रकार के रोग का कारण होता हैं उसके बारे में विस्तार से जाने।

(क्रमशः.........)