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मंगलवार, मार्च 01, 2011

महाशिवरात्रि महत्व

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महाशिवरात्रि महत्व

महाशिवरात्रि को हिंदू धर्म में एक प्रमुख त्योहार के रूप में मनाय जाता हैं। महाशिवरात्रि को कालरात्रि के नाम से भी जान जाता हैं।
महाशिवरात्रि पर्व प्रति वर्ष फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को मनाया जाता हैं। एसी मान्यता हैं कि सृष्टि के प्रारंभ में इसी दिन मध्य रात्रि भगवान शिवजी का ब्रह्मा रुप से रुद्र रूप में अवतार हुआ था। प्रलय के समय में इसी दिन प्रदोष के समय भगवान शिव तांडव करते हुए समग्र ब्रह्मांड को अपने तीसरे नेत्र की ज्वाला से समाप्त कर देते हैं। इसीलिए इसे महाशिवरात्रि कहाजाता हैं।
तीनों लोक की सुंदरी तथा शीलवती गौरां को अपनी अर्धांगिनी बनाने वाले शिव सर्वदा प्रेतों व पिशाचों से घिरे रहते हैं। उनका रूप अनोखा हैं। शरीर पर स्मसान की भस्म, और गले में सर्पों की माला, कंठ में विष, जटा में शशी (चंद्र) एवं पतित पावनी गंगा तथा मस्तक पर प्रलय कारी ज्वाला हैं। नंदि (बैल) को वाहन बनाने वाले हैं।
शिव अमंगल रूप होकर भी अपने भक्तों का अमंगल दूर कर मंगल करते हैं और सुख-संपत्ति एवं शांति प्रदान करते हैं।

शिवरात्रि व्रत का लाभ:
हिंदू संस्कृति में महाशिवरात्रि भगवान शंकर का सबसे पवित्र दिन माना जाता हैं। शिवरात्रि पर अपनी आत्मा को निर्मल करने का महाव्रत माना जाता हैं। महाशिव रात्रि व्रत से मनुष्य के सभी पापों का नाश हो जाता हैं। व्यक्ति की हिंसक प्रवृत्ति बदल जाती हैं। समस्त जीवों के प्रति उसके भितर दया, करुणा इत्यादि सद्द भावो का आगमन होता है।

ईशान संहिता में शिवरात्रि के बारे मे उल्लेख इस प्रकार किया गया है-

शिवरात्रि व्रतम् नाम सर्वपाम् प्रणाशनम्।
आचाण्डाल मनुष्याणम् भुक्ति मुक्ति प्रदायकं॥

भावार्थ:- शिव रात्रि नाम वाला व्रत समस्त पापों का शमन करने वाला हैं। इस दिन व्रत कर ने से दुष्ट मनुष्य को भी भक्ति मुक्ति प्राप्त होती हैं।

ज्योतिष शास्त्र के अनुशार शिवरात्री व्रत का महत्व और लाभ:
चतुर्दशी तिथि के स्वामी शिवजी हैं। ज्योतिष शास्त्रों में चतुर्दशी तिथि को परम शुभ फलदायी मना गया हैं। वैसे तो शिवरात्रि हर महीने चतुर्दशी तिथि को होती हैं। परंतु फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि कहा गया हैं। ज्योतिषी शास्त्र के अनुसार विश्व को उर्जा प्रदान करने वाले सूर्य इस समय तक उत्तरायण में आ होते हैं, और ऋतु परिवर्तन का यह समय अत्यंत शुभ कहा माना जाता हैं। शिव का अर्थ ही है कल्याण करना, एवं शिवजी सबका कल्याण करने वाले देवो के भी देव महादेव हैं। अत: महा शिवरात्रि के दिन शिव कृपा प्राप्त कर व्यक्ति को सरलता से इच्छित सुख की प्राप्ति होती हैं। ज्योतिषीय सिद्धंत के अनुसार चतुर्दशी तिथि तक चंद्रमा अपनी क्षीणस्थ अवस्था में पहुंच जात्ता हैं। अपनी क्षीण अवस्था के कारण बलहीन होकर चंद्रमा सृष्टि को ऊर्जा(प्रकाश) देने में असमर्थ हो जाते हैं।

चंद्र का सीधा संबंध मनुष्य के मन से बताया गया हैं। ज्योतिष सिद्धन्त से जब चंद्र कमजोर होतो मन थोडा कमजोर हो जाता हैं, जिस्से भौतिक संताप प्राणी को घेर लेते हैं, और विषाद, मान्सिक चंचल्ता-अस्थिरता एवं असंतुलन से मनुष्य को विभिन्न प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ता हैं।
धर्म ग्रंथोमे चंद्रमा को शिव के मस्तक पर सुशोभित बताय गया हैं। जिस्से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होने से चंद्रदेव की कृपा स्वतः प्राप्त हो जाती हैं। महाशिवरात्रि को शिव की अत्यंत प्रिय तिथि बताई गई हैं। ज्यादातर ज्योतिषी शिवरात्रि के दिन शिव आराधना कर समस्त कष्टों से मुक्ति पाने की सलाह देते हैं।

शिव उपासना का महत्व

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शिव महत्व

धर्म शास्त्रो में भगवान शिव को जगत पिता बताया गया हैं। क्योकि भगवान शिव सर्वव्यापी एवं पूर्ण ब्रह्म हैं। हिंदू संस्कृति में शिव को मनुष्य के कल्याण का प्रतीक माना जाता हैं। शिव शब्द के उच्चारण या ध्यान मात्र से ही मनुष्य को परम आनंद प्रदान करता हैं। भगवान शिव भारतीय संस्कृति को दर्शन ज्ञान के द्वारा संजीवनी प्रदान करने वाले देव हैं। इसी कारण अनादि काल से भारतीय धर्म साधना में निराकार रूप में होते हुवे भी शिवलिंग के रूप में साकार मूर्ति की पूजा होती हैं। देश-विदेश में भगवान शिव के मंदिर हर छोटे-बडे शहर एवं कस्बो में मोजुद हैं, जो भगवान महादेव की व्यापकता को एवं उनके भक्तो कि आस्था को प्रकट करते हैं।

भगवान शिव एक मात्र एसे देव हैं जिसे भोले भंडारी कहा जाता हैं, भगवान शिव थोङी सी पूजा-अर्चना से ही वह प्रसन्न हो जाते हैं। मानव जाति की उत्पत्ति भी भगवान शिव से मानी जाती हैं। अतः भगवान शिव के स्वरूप को जानना प्रत्येक शिव भक्त के लिए परम आवश्यक हैं। भगवान भोले नाथ ने समुद्र मंथन से निकले हुए समग्र विष को अपने कंठ में धारण कर वह नीलकंठ कहलाये।

शिव उपासना का महत्व

भगवान शिव का सतो गुण, रजो गुण, तमो गुण तीनों पर एक समान अधिकार हैं। शिवने अपने मस्तक पर चंद्रमा को धारण कर शशि शेखर कहलाये हैं। चंद्रमा से शिव को विशेष स्नेह होने के कारण चंद्र सोमवार का अधिपति हैं इस लिये शिव का प्रिय वार सोमवार हैं। शिव कि पूजा-अर्चना के लिये सोमवार के दिन करने का विशेष महत्व हैं, इस दिन व्रत रखने से या शिव लिंग पर अभिषेक करने से शिवकी विशेष कृपा प्राप्त होती हैं।

सभी सोमवार शिव को प्रिय हैं, परंतु पूरे श्रावण मास के सभी सोमवार को किये गये व्रत-पूजा अर्चना अभिषेक पूरे वर्ष किये गये व्रत के समान फल प्रदान करने वाली होती हैं।

शिव को श्रावण मास इस लिये अधिक प्रिय हैं क्योकि श्रावण मास में वातावरण में जल तत्व कि अधिकता होती हैं एवं चंद्र जलतत्व का अधिपती ग्रह हैं। जो शिव के मस्तक पर सुशोभित हैं।

शिव उपासना के विभिन्न रूप वेदों में वर्णित हैं। शिव मंत्र उपासना में पंचाक्षरी "नम: शिवाय" या "ॐ नम: शिवाय" और महामृत्युंजय इत्यादि मंत्रों के जप का भी श्रावण मास में विशेष महत्व हैं, श्रावण मास में किय गये मंत्र जाप कई गुना अधिक प्रभाव शाली सिद्ध होते देखे गये हैं। जहा शिव पंचाक्षरी मंत्र मनुष्य को समस्त भौतिक सुख साधनो कि प्राप्ति हेतु विशेष लाभकारी हैं, वहीं महामृत्युंजय मंत्र के जप से मनुष्य के सभी प्रकार के मृत्यु भय-रोग-कष्ट-दरिद्रता दूर होकर उसे दीर्घायु की प्राप्ति होती हैं। महामृत्युंजय मंत्र, रूद्राभिषेक आदि का सामुहिक अनुष्ठान करने से अतिवृष्टि, अनावृष्टि एवं महामारी आदि से रक्षा होती हैं एवं अन्य सभी प्रकार के उपद्रवों की शांति होती हैं।

गुरुत्व ज्योतिष ई पत्रीका मार्च 2011 में प्रकशित लेख

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गुरुत्व ज्योतिष ई पत्रीका मार्च 2011 में प्रकशित लेख

विशेष लेख
शिव महत्व,  शिव उपासना का महत्व6महामृत्युंजय मंत्र जाप किस समय करें?29
महाशिवरात्रि महत्व7शिव पुराण कि महिमा30
महाशिवरात्रि  आध्यात्मिक आस्था का महापर्व हैं9रुद्राक्ष धारण से कामनापूर्ति34
शिवलिंग पूजा का महत्व क्या हैं?12एक मुखी से 12 मुखी रुद्राक्ष धारण करने के लाभ36
शिवलिंग के विभिन्न प्रकार लाभ16शिव मंत्र 40
कैसे करें शिव का पूजन17रुद्राभिषेक से कामनापूर्ति41
शिव पूजन से कामना सिद्धि19रुद्राभिषेकस्तोत्र43
शिवपूजन से नवग्रह शांति23होलिका उत्सव का महत्व44
आपकी राशि और शिव पूजा25होलाष्टक एवं मान्यता46
महामृत्युंजय मंत्र27शिव पंचदेवों में देवो के देव महादेव हैं।48

अनुक्रम
संपादकीय4राशि रत्न62
साक्षात ब्रह्म हैं शिवलिंग13मार्च 2011 मासिक पंचांग63
शिवरात्रि पूजन विधान15मार्च -2011 मासिक व्रत-पर्व-त्यौहार65
क्यों शिव को प्रिय हैं बेल पत्र?20ग्रह चलन मार्च -201168
शिव पूजन में कोन से फूल चढाएं?22मार्च 2011 -विशेष योग69
शिवपच्चाक्षर स्तोत्रम्39दैनिक शुभ एवं अशुभ समय ज्ञान तालिका69
शिवषडक्षर स्तोत्रम्39दिन-रात के चौघडिये 70
सोमवार व्रत कथा49दिन-रात कि होरा सूर्योदय से सूर्यास्त तक72
शिव के दस  प्रमुख अवतार50सर्व रोगनाशक यंत्र/कवच 72
जब शिवजी नें ब्रह्माजी की आलोचना की?51मंत्र सिद्ध कवच 74
जब शिवजी ने चंद्रमा को शाप मुक्त किया52YANTRA LIST 75
दारिद्र्य दहन शिवस्तोत्रं53GEM STONE 77
द्वादश ज्योतिर्लिङ्ग स्तोत्रम्54BOOK PHONE/ CHAT CONSULTATION78
शिवाष्टकं55सूचना79
वैद्यनाथाष्टकम्55हमारा उद्देश्य81
मासिक राशि फल58








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शनिवार, फ़रवरी 19, 2011

प्रश्न ज्योतिष से जाने विद्या प्राप्ति के योग

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प्रश्न ज्योतिष से जाने विद्या प्राप्ति के योग

ज्योतिष शास्त्र में कुण्डली के पंचम भाव को महत्वपूर्ण माना जाता हैं। क्योकि पंचम भाव जातक के जीवन में महत्वपूर्ण स्थान रखता हैं। क्योकि पंचम भाव शिक्षा, बुद्धि और ज्ञान का भाव है, जिससे जातक के जीवन की दिशा निर्धारित होती हैं। ज्योतिष में पंचम भाव को त्रिकोण स्थान भी कहा जाता हैं। पंचम भाव को ज्योतिष में बहुत ही शुभ माना गया है। जातक के शिक्षा से सम्बन्ध में भी विचार पंचम भाव से ही किया जाता हैं। इस लिए प्रश्न ज्योतिष या प्रश्न कुंडली से शिक्षाका आंकलन करने हेतु भी पंचम भाव ही प्रमुख माना गया हैं।
  • पश्न ज्योतिष में शिक्षा का आंकलन करने हेतु लग्न में स्थित ग्रह एवं लग्नेश की स्थिती, पंचम भाव में स्थित ग्रह एवं पंचमेश की स्थिती तथा शिक्षा के कारक ग्रह बुध एवं बृहस्पति की स्थिति से विद्या का आंकल किया जासकता हैं।
  • प्रश्न कुंडली में लग्न, लग्नेश, पंचम भाव, पंचमेश, बुध और बृहस्पति यदि शुभ ग्रहो के साथ हो या शुभ ग्रहो से द्रष्ट हो तो शिक्षा के संबंधित कार्यो में बड़ी सफलता अवश्य मिलती हैं।
  • प्रश्न कुंडली में लग्न, लग्नेश, पंचम भाव, पंचमेश, बुध और बृहस्पति यदि कमजोर स्थिति में हों या या अशुभ ग्रहो से युक्त या द्रष्टी के कारण पीडित हो, तो शिक्षा संबंधित कार्यो में रूकावटों का सामना करना पड सकता हैं।
  • प्रश्न कुंडली का विश्लेषण करते समय अन्य शुभ, अशुभ ग्रहों का दृष्टि या युति संबंध एवं संबंधित ग्रह के मित्र एवं शत्रु ग्रहो का उनपर प्रभाव देखना भी अति आवश्यक होता हैं।
नोट: ज्योतिष शास्त्रो के अनुशार लग्न के साथ में भाव कारक भी बदल जाते हैं। इस लिए प्रश्न कुंडली का विश्लेषण सावधानी से करना उचित रहता हैं। विद्वानो के अनुशार प्रश्न कुंडली का विश्लेषण करते समय संबंधित भाव एवं भाव के स्वामी ग्रह अर्थातः भावेश एवं भाव के कारक ग्रह को ध्यान में रखते हुए आंकलन कर किया गया विश्लेषण स्पष्ट होता हैं। प्रश्न कुंडली का फलादेश करते समय हर छोटी छोटी बातों का ख्याल रखना आवश्यक होता हैं अन्यथा विश्लेषण किये गये प्रश्न का उत्तर स्टिक नहीं होता।

जब लक्ष्मी, सरस्वती और गंगा को मिला शाप

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जब लक्ष्मी, सरस्वती और गंगा को मिला शाप


लक्ष्मी, सरस्वती और गंगा तीनो नारायण के निकट निवास करती थीं। एक बार गंगा ने नारायण के प्रति अनेक कटाक्ष किये। नारायण तो बाहर चले गये किन्तु इस बात से सरस्वती रुष्ट हो गयी। सरस्वती को लगता था कि नारायण गंगा और लक्ष्मी से अधिक प्रेम करते हैं। लक्ष्मी ने दोनों का बीच-बचाव करने का प्रयत्न किया। सरस्वती ने लक्ष्मी को निर्विकार जड़वत् मौन देखा तो जड़ वृक्ष अथवा सरिता होने का शाप दिया। सरस्वती को गंगा की निर्लज्जता तथा लक्ष्मी के मौन रहने पर क्रोध था। उसने गंगा को पापी जगत का पाप समेटने वाली महानदी बनने का शाप दिया। गंगा ने भी सरस्वती को मृत्युलोक में नदी बनकर जनसमुदाय का पाप प्राक्षालन करने का शाप दिया। तभी नारायण भी वापस आ पहुँचे।

उन्होंने सरस्वती को शांत किया तथा कहा एक पुरुष अनेक नारियों के साथ निर्वाह नहीं कर सकता। परस्पर शाप के कारण तीनों को अंश रूप में वृक्ष अथवा सरिता बनकर मृत्युलोक में प्रकट होना पड़ेगा। लक्ष्मी! तुम एक अंश से पृथ्वी पर धर्म-ध्वज राजा के घर अयोनिसंभवा कन्या का रूप धारण करोगी, भाग्य-दोष से तुम्हें वृक्ष तत्व की प्राप्ति होगी। मेरे अंश से जन्मे असुरेंद्र शंखचूड़ से तुम्हारा पाणिग्रहण होगा। भारत में तुम तुलसी नामक पौधे तथा पदमावती नामक नदी के रूप में अवतरित होगी। किन्तु पुन: यहाँ आकर मेरी ही पत्नी रहोगी। गंगा, तुम सरस्वती के शाप से मनुष्यो के पाप नाश करने वाली नदी का रूप धारण करके अंश रूप से अवतरित होगी। तुम्हारे अवतरण के मूल में भागीरथ की तपस्या होगी, अत: तुम भागीरथी कहलाओगी। मेरे अंश से उत्पन्न राजा शांतनु तुम्हारे पति होंगे। अब तुम पूर्ण रूप से शिव के समीप जाओ। तुम उन्हीं की पत्नी होगी। सरस्वती, तुम भी पापनाशिनी सरिता के रूप में पृथ्वी पर अवतरित होगी। तुम्हारा पूर्ण रूप ब्रह्मा की पत्नी के रूप में रहेगा। तुम उन्हीं के पास जाओ। उन तीनों ने अपने कृत्य पर क्षोभ प्रकट करते हुए शाप की अवधि जाननी चाही। कृष्ण ने कहा कलि के दस हज़ार वर्ष बीतने के उपरान्त ही तुम सब शाप-मुक्त हो सकोगी। सरस्वती ब्रह्मा की प्रिया होने के कारण ब्राह्मी नाम से विख्यात हुई।

शुक्रवार, फ़रवरी 11, 2011

ज्योतिष और शिक्षा विचार

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ज्योतिष और विद्या विचार


हर माता-पिता की कामना होती है कि उनका बच्चें परीक्षा में उच्च अंकों से उत्तीर्ण हो एवं उसे सफलता मिले। उच्च अंकों का प्रयास तो सभी बच्चें करते हैं पर कुछ बच्चें असफल भी रह जाते हैं। कई बच्चों की समस्या होती है कि कड़ी मेहनत के बावजूद उन्हें अधिक याद नहीं रह पाता, वे कुछ जबाव भूल जाते हैं। जिस वजह से वे बच्चें परीक्षा में उच्च अंकों से उत्तीर्ण नहीं होपाते या असफल होजाते हैं।

ज्योतिष शास्त्र के अनुशार विद्या का विचार जन्म कुंडली में पंचम भाव से किया जाता हैं। विद्या एवं वाणी का निकटस्थ संबध होता हैं। अतः विद्या योग का विचार करने के लिए द्वितीय भाव भी सहायक होता हैं।

चन्द्र और बुध की स्थिति से विद्या प्राप्ति के लिये उपयोगी जातक का मानसिक संतुलन एवं मन की स्थिती का आंकलन किया जाता हैं। कई विद्वानो के अनुशार बुध तथा शुक्र की स्थिति से व्यक्ति की विद्वता एवं सोचने की शक्ति का विचार किया जाता है।
  • शास्त्रो के अनुशार बुध विद्या, बुद्धि और ज्ञान का स्वामी ग्रह हैं, इस लिये 12 वर्ष से 24 वर्ष की उम्र विद्याध्ययन की होती है, चाहे वह किसी प्रकार की विद्या हो, इस अविध को बुध का दशा काल माना जाता हैं।
  • जातक में विद्या की स्थिरता, अस्थिरता एवं विकास का आंकलन बृहस्पति (गुरु) से किया जाता हैं।
  • विदेशी भाषा एवं शिक्षा का विचार शनि की स्थिति से किया जाता हैं।
  • ज्योतिष के अनुशार असफलता का कारण बच्चें की जन्मकुंडली में चंद्रमा और बुध का अशुभ प्रभाव है।
चंद्रमा और बुध का संबंध विद्या से हैं, क्योकि मन-मस्तिष्क का कारक चंद्रमा है, और जब चंद्र अशुभ हो तो चंचलता लिए होता है तो मन-मस्तिष्क में स्थिरता या संतुलन नहीं रहता हैं, एवं बुध की अशुभता की वजह से बच्चें में तर्क व कुशाग्रता की कमी आती है। इस वजह से बच्चें का मन पढाई मे कम लगता हैं और अच्छे अंकों से बच्चा उत्तीर्ण नहीं हो पाता।
भारतीय ऋषि मुनिओं ने विद्या का संबंध विद्या की देवी सरस्वती से बताय हैं। तो जिस बच्चें की जन्मकुंडली में चंद्रमा और बुध का अशुभ प्रभावो हो उसे विद्या की देवी सरस्वती की कृपा भी नहीं होती। एसे मे मां सरस्वती को प्रसन्न कर उनकी कृपा प्राप्त चंद्रमा और बुध ग्रहों के अशुभ प्रभाव कम कर शुभता प्राप्त की जा सकती है।

मां सरस्वती को प्रसन्न कर उनकी कृपा प्राप्त करने का तत्पर्य यह कतई ना समजे की सिर्फ मां की पूजा-अर्चना करने से बच्चा परीक्षा में अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हो एवं उसे सफलता मिल जायेगी क्योकि मां सरस्वती उन्हीं बच्चों की मदद करती हैं, जो बच्चे मेहनत मे विश्वास करेते और मेहनत करते हैं। बिना मेहनत से कोइ मंत्र-तंत्र-यंत्र परीक्षा में अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होने मे सहायता नहीं करता है। मंत्र-तंत्र-यंत्र के प्रयोग से एक तरह की सकारत्मक सोच उत्पन्न होती है जो बच्चें को पढाई मे उस्की स्मरण शक्ती का विकास करती हैं।

• जन्म कुंडली में यदि बुध स्वग्रही, मित्रग्रही, उच्चस्थ हो या शुभ ग्रहो से द्रष्ट हो तो जातक की लिखावट एवं लेखन कला उच्च कोटी कि होती हैं।
• जन्म कुंडली में पंचम भाव में यदि बृहस्पति (गुरु) अकेला स्थित हो तो जातक के विद्या प्राप्ति स्थाई या अस्थाई रुप से प्राभावित हो सकती हैं
• जन्म कुंडली में पंचम भाव में बुध एवं शुक्र की युति को भी विद्या प्राप्ति के लिये बाधन माना गया हैं।
• जन्म कुंडली में पंचम भाव का स्वामी 6,8 या 12 भाव में हो तो जातक की मध्य भाग कि माध्यमिक शिक्षा प्राभावित हो सकती हैं।
• जन्म कुंडली में बलवान शनि का प्रभाव भी परीक्षा में हमेशा माना गया हैं। इस योग में ज्यादातर बच्चे परीक्षा में असफल होते देखे गए हैं।

बुधवार, फ़रवरी 09, 2011

विद्या प्राप्ति में रुकावट के योग

विद्या प्राप्ति में बाधा विद्या प्राप्ति में विद्या प्राप्ति में विद्या प्राप्ति में रुकावट के योग-उपाय, વિદ્યા પ્રાપ્તિ મેં રુકાવટ કે યોગ-ઉપાય, ವಿದ್ಯಾ ಪ್ರಾಪ್ತಿ ಮೇಂ ರುಕಾವಟ ಕೇ ಯೋಗ-ಉಪಾಯ, வித்யா ப்ராப்தி மேம் ருகாவட கே யோக-உபாய, విద్యా ప్రాప్తి మేం రుకావట కే యోగ-ఉపాయ, വിദ്യാ പ്രാപ്തി മേം രുകാവട കേ യോഗ-ഉപായ, ਵਿਦ੍ਯਾ ਪ੍ਰਾਪ੍ਤਿ ਮੇਂ ਰੁਕਾਵਟ ਕੇ ਯੋਗ-ਉਪਾਯ, ৱিদ্যা প্রাপ্তি মেং রুকাৱট কে যোগ-উপায, ବିଦ୍ଯା ପ୍ରାପ୍ତି ମେ ରୁକାବଟ ୟୋଗ- ଉପାଯ, vidya prapti me rukavata ke yoga-upaya, unsucess yoga in astrology,education interruption Yoga In astrology, education interruption Yoga In Vedic astrology, higher education ObstructionYoga In vedic astrology, higher education blockage Yoga In lal kitab, higher education interruption Yoga In red astro, education interruption Yoga In indian astrology, education interruption Yoga In horoscope, education interruption Yoga In kundli, education interruption Yoga In kunadli, education interruption Yoga In zodiac, education interruption Yoga in janm patrika, education interruption Yoga In janam kundli, education interruption Yoga In patrika, education interruption Yoga In horoscope, study achieve interruption yoga, remedy for remove education interruption, Easy remedy for remove education obstruction, Astrology remedy for remove Study obstruction, Astrology remedy for remove education blockage, Red Astrology remedy for remove education interruption, Vedic astrology remedy for remove education interruption, indian astrology remedy for remove education interruption, yantra-mantra, tantra remedy for remove education interruption, असफलता के योग, विघ्न बाधा के योग-उपाय, के योग-उपाय,

विद्या प्राप्ति में रुकावट के योग


शिक्षा प्राप्ति में बाधा के योग
जन्म कुंडली में उच्च शिक्षा का योग होने पर भी कभी-कभी उच्च शिक्षा प्राप्त नहीं कर पाता। इस का कारण हैं, शिक्षा प्राप्ति में रुकावट करने वाले योग।
विद्वानो के मत से ज्यादातर शिक्षा प्राप्ति के समय यदि राहु की महादशा चल रही हो पढ़ाई में रुकावट आती है।
यदि पंचमेश 6, 8 या 12 वें भाव में स्थित हो या किसी अशुभ ग्रह के साथ स्थित हो या अशुभ ग्रह से द्दष्ट हो, तो जातक उचित शिक्षा प्राप्त नहीं कर या उसकी शिक्षा प्राप्ति बाधा आती हैं।
यदि जातक में गुरु या बुध 3, 6, 8 या 12 वें भाव में स्थित हो, शतृगृही हो, तो शिक्षा प्राप्ति में बाधा उत्पन्न करता है।

फलदीपिका के अनुशार
वित्तम् विद्या स्वान्नपानानि भुक्तिम् दक्षाक्ष्यास्थम् पत्रिका वाक्कुटुबम्म॥
(फलदीपिका अध्याय १ श्लोक १०)
अर्थातः धन, विद्या, वाणी एवं स्वयं के अधिकार की वस्तु इत्यादि का विचार द्वितीय भाव से करना चाहिए।

यदि जन्म कुंडली में अष्टम भाव में नीच ग्रह, अशुभ, पापी या क्रूर ग्रह स्थित होने से भी जातक कई बार उच्च शिक्षा की प्राप्ति कर लेता हैं। इस स्थिती में जातक को दूरस्थ स्थान या विदेश में विद्याध्ययन के योग बनते हैं।
यदि जन्म कुंडली में द्वितीय भाव में अशुभ ग्रह स्थित हो या अशुभ ग्रहो का प्रभाव हो, तो विद्या प्राप्ति में बाधा हो सकती हैं।
यदि जन्म कुंडली में सूर्य, शनि एवं राहु की अलग-अलग द्रष्टी ……………..>>
यदि जन्म कुंडली में अकेला गुरु द्वितीय भाव में स्थित हो, तो ……………..>>
यदि जन्म कुंडली में अकेला शुक्र द्वितीय ……………..>>
यदि जन्म कुंडली में शुक्र अष्टम भाव में स्थित हो कर द्वितीय भाव ……………..>>
यदि जन्म कुंडली में राहु 6,8 या 10 भाव में स्थित हो, तो जातक का ……………..>>
यदि जन्म कुंडली में शनि पंचम भाव या अष्टम भाव में स्थित हो, तो भी शिक्षा अधुरी रहती हैं ……………..>>

शिक्षा में अवरोध उत्पन्न करने वाले कारण
यदि जातक में राहु अगर पंचम भाव में पंचमेश से युत या दृष्ट हो और ……………..>>
यदि जातक में पंचमेश द्वादश भाव में स्थित होकर अस्त हो या नीच राशि में स्थित हो, या अन्य ……………..>>यदि जातक में द्वितीय भाव का स्वामी नवम भाव में निर्बल हो, पाप पीड़ित हो तो ……………..>>
यदि जातक में बुध और गुरु निर्बल हो, त्रिक भाव में हो, अस्त हो, अशुभ ग्रह से पीड़ित हो……………..>>
विद्या अध्ययन की आयु में यदि अशुभ ग्रह की महादशा, अंतरदशा, शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव ……………..>>
शनि पंचम भाव से त्रिकोण में गोचर कर रहा हो या गुरु पंचमेश से त्रिकोण में गोचर ……………..>>
यदि जातक में पंचम भाव, पंचमेश, तृतीयेश, बुध या गुरु पर एकाधिक ग्रहों का अशुभ प्रभाव हो, तो विद्या प्राप्ति में व्यवधान आता हैं और ……………..>>


विद्या प्राप्ति में आनेवाली बाधाओं से मुक्ति के लिये ग्रह शांति के उपाय करने चाहिए।

नोट : यदि ग्रहों की अशुभ स्थिति के कारण या अन्य कारणों से विद्या प्राप्ति में बाधा आ रही हो अथवा स्मरण शक्ति कमजोर हो या एकाग्रता की कमी हो, सरस्वती कवच एवं यंत्र का प्रयोग करने से लाभ प्राप्त होता हैं।


शिक्षा प्राप्ति की बाधाएं दूर करने के उपाय
यदि जन्म कुंडली में उच्च शिक्षा का योग हो, किंतु विद्याध्ययन के समय अशुभ ग्रह की दशा के कारण रुकावटे आने का योग हो या रुकावटे आरही हो, तो संबंधित ग्रह की शांति हेतु ग्रह से संबंधित यंत्र को अपने घर में स्थापित करना लाभदायक होता हैं। ग्रहो के अशुभ प्रभाव को कम करने हेतु अन्य उपायो को भी अपनाया जासकता हैं।
बच्चे को विद्वान बनाने के लिये प्रति बुधवार या पंचमी के दिन चांदी की शलाका को मधु में डुबाकर बच्चे की जिह्वा(जीभ) पर "ऎं" मंत्र लिखे।

लग्न के अनुशार रत्न धारण से विद्या प्राप्ति
मेष लग्न वाले जातक को विद्या प्राप्ति हेतु माणिक्य धारण करना चाहिये।
वृष लग्न वाले जातक को विद्या प्राप्ति हेतु पन्ना धारण करना चाहिये।
मिथुन लग्न वाले जातक को विद्या प्राप्ति हेतु हीरा धारण करना चाहिये।
कर्क लग्न वाले जातक को विद्या प्राप्ति हेतु मूंगा धारण करना चाहिये।
सिंह लग्न वाले जातक को विद्या प्राप्ति हेतु पीला पुखराज धारण करना चाहिये।
कन्या लग्न वाले जातक को विद्या प्राप्ति हेतु नीलम धारण करना चाहिये।
तुला लग्न वाले जातक को विद्या प्राप्ति हेतु नीलम धारण करना चाहिये।
वृश्चिक लग्न वाले जातक को विद्या प्राप्ति हेतु पीला पुखराज धारण करना चाहिये।
धनु लग्न वाले जातक को विद्या प्राप्ति हेतु मूंगा धारण करना चाहिये।
धनु लग्न वाले जातक को विद्या प्राप्ति हेतु हीरा धारण करना चाहिये।
कुंभ लग्न वाले जातक को विद्या प्राप्ति हेतु पन्ना धारण करना चाहिये।
मीन लग्न वाले जातक को विद्या प्राप्ति हेतु मोती धारण करना चाहिये।

परीक्षा में मनोनुकूल फल प्राप्त करने हेतु तो किसी मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी से लेकर अगले कृष्ण पक्ष की पंचमी तक अर्थात 15 दिन तक गणेश जी को १०८ दूर्वा ……………..>>
वसंत पंचमी के दिन सरस्वती जी की पूजा करने के बाद स्फटिक माला ……………..>>
गुरुवार के दिन धर्मिक स्थान पर ……………..>>
बुधवार एवं गुरुवार को किसी जरुर मंद बच्चे को शिक्षा से सांबंधित सहायता करने से लाभ प्राप्त होता हैं।

विद्या प्राप्ति हेतु श्री गणेशजी के द्वादश नाम का स्मरण करने से शिक्षा से सांबंधित संमस्याएं दूर होती हैं। अतः प्रतिदिन स्नान कर स्वच्छ कपडे पहन कर गणेशजी की प्रतिमा या चित्र के सामने इस श्लोक का अपनी श्रद्धा के अनुशार पाठ करें।

शुक्लाम्बरं धरंदेव शशिवर्णं चतुर्भुजम। प्रसन्नवदनं ध्यायेत सर्वाविनोपशान्तये॥
सुमुखश्चैक दन्तश्च कपिलो गजकर्णकः। लंबोदरश्च विकटो विन नाशो विनायकः॥
धूम्र केतुर्गणाध्यक्षो भाल चंद्रो गजाननः। द्वादशैतानि नामानियः पठेच्छुणयादडिप॥
प्रतिमाह दोनो पक्षो की गणेश चतुर्थी को गणेश जी की विधिवत पूजा-अर्चना करके ॐ गं गणेशाय नमः या गं गणेपतये नमः मंत्र का १०८ बार जप करने से विद्या लाभ होता हैं।

अन्य उपाय
सरस्वती से संबंधित मंत्र का नियमित जप करने से विद्या में सफलता के लिए निम्नोक्त मंत्र का जप करना चाहिए।

"ॐ ह्रीं श्रीं ऐं वागवादिनि भगवती अर्हनमुख निवासिनि सरस्वती ममास्ये प्रकाशं कुरू कुरू स्वाहा ऐं नमः।"

इसके साथ ही बुद्धि के प्रमुख देवता प्रथम पूज्य विध्न विनाशक श्री गणेशजी का ध्यान करने से विद्या और बुद्धि का विकास होता हैं एवं विद्याअध्ययन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं।

यदि जातक में शिक्षा से संबंधित ग्रह शुभ हो कर निर्बल हो और अपना शुभ प्रभाव देने में असमर्थ हो, तो उसे बल प्रदान करने के लिए उससे संबंधित ग्रह का रत्न भी धारण किया जा सकता है।
यदि जातक का की रुचि शिक्षा के प्रति कम हो, तो उसे ……………..>>

यदि जातक का की रुचि शिक्षा के प्रति कम हो, स्मरण शक्ति एवं तर्क शक्ति बढाने के लिए ……………..>>


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