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शुक्रवार, मई 21, 2010

रामचन्द्र स्तुति

Ram Stuti , rama chandra stuti
रामचन्द्र स्तुति


नमामि भक्तवत्सलं कृपालु शील कोमलं
भजामि ते पदांबुजं अकामिनां स्वधामदं।
निकाम श्याम सुंदरं भवांबुनाथ मन्दरं
प्रफुल्ल कंज लोचनं मदादि दोष मोचनं॥१॥

प्रलंब बाहु विक्रमं प्रभोडप्रमेय वैभवं
निषंग चाप सायकं धरं त्रिलोक नायकं।
दिनेश वंश मंडनं महेश चाप खंडनं
मुनींद्र संत रंजनं सुरारि वृंद भंजनं॥२॥

मनोज वैरि वंदितं अजादि देव सेवितं
विशुद्ध बोध विग्रहं समस्त दूषणापहं।
नमामि इंदिरा पतिं सुखाकरं सतां गतिं
भजे सशक्ति सानुजं शची पति प्रियानुजं॥३॥

त्वदंघ्रि मूल ये नरा: भजन्ति हीन मत्सरा:
पतंति नो भवार्णवे वितर्क वीचि संकुले।
विविक्त वासिन: सदा भजंति मुक्तये मुदा
निरस्य इंद्रियादिकं प्रयांति ते गतिं स्वकं॥४॥

तमेकमद्भुतं प्रभुं निरीहमीश्वरं विभुं
जगद्गरुं च शाश्व तं तुरीयमेव मेवलं।
भजामि भाव वल्लभं कुयोगिनां सुदुर्लर्भ
स्वभक्त कल्प पादपं समं सुसेव्यमन्वहं॥५॥

अनूप रूप भूपतिं नतोडहमुर्विजा पतिं
प्रसीद मे नमामि ते पदाब्ज भक्ति देहि मे।
पठंति ये स्वतं इदं नरादरेण ते पदं
व्रजंति नात्र संशयं त्वदीय भक्ति संयुता:॥६॥


इस स्तोत्र का नित्य आदरपूर्वक पाठ करने से व्यक्ति को पद कि निसंदेः प्राप्ति होती हैं

रविवार, मई 09, 2010

गृह प्रवेश एवं वास्तु (भाग:२)

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गृह प्रवेश एवं वास्तु (भाग:२)

शास्त्रोक्त मत से गृहारम्भ या गृहप्रवेश हेतु उत्तम समय तब होता हैं जब सूर्य मेष, वृष, कर्क, सिंह, तुला, वृश्चिक, मकर और कुम्भ इन राशियों में से किसी एक मे होता हैं। और गृहारम्भ या गृहप्रवेश अशुभ होता हैं जब सूर्य मिथुन, कन्या, धनु और मीन - इन राशि में होता हैं।

 
  • मेष राशि के सूर्यमें गृहारम्भ करने से शुभ फल प्राप्त होता हैं।
  • वृष राशि के सूर्य में गृहारम्भ करने से धन की वृद्धि होती हैं ।
  • मिथुन राशि के सूर्य में गृहारम्भ करने से परिवार में मृत्यु होती हैं।
  • कर्क राशि के सूर्य में गृहारम्भ करने से शुभ फल प्राप्त होता हैं।
  • सिंह राशि के सूर्य में गृहारम्भ करने से सेवक द्वारा लाभ प्राप्त होता हैं।
  • कन्या राशि के सूर्य में गृहारम्भ करने से परिवार में रोग होता है।
  • तुला राशि के सूर्य में गृहारम्भ करने से सभी सुख प्राप्त होता हैं।
  • वृश्चिक राशि के सूर्य में गृहारम्भ करने से धनकी वृद्धि होती हैं।
  • धनु राशिके सूर्य में गृहारम्भ सम्मान की हानि होती हैं।
  • मकर राशि के सूर्य में गृहारम्भ करने से धन की प्राप्ति होती हैं।
  • कुम्भ राशि के सूर्य में गृहारम्भ करने से रत्न एवं द्रव्य लाभ प्राप्त होता हैं।
  • मीन राशि के सूर्य में गृहारम्भ करने से रोग तथा भय की प्राप्ति होती हैं।

पंच महाभूत तत्व एवं वास्तु (भाग:१)

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पंच महाभूत तत्व एवं वास्तु (भाग:१)

जिस भूमि पर भवन बनकर तैयार हो जाता है वहा पंचभूत का समनवय होता हैं। जिस प्रकार मानव शरीर में जो पंच माहाभूत (आकश, पृथवी, जल, वायु, अग्नि) तत्व समाहित होते हैं , यह पंच माहाभूत तत्व व्यक्ति द्वारा किये गये कर्म के अनुरुप उसका प्रभाव शुभ-अशुभ व्यक्ति के निवास स्थान पर पड़ता हैं। क्योकि मनुष्य एवं बह्याण्ड की संरचना पंच महाभूतों के आधार पर हुई हैं।

यदि प्रकृति के विरूद्ध इन पच महाभूत तत्व का संतुलन बिगड़ जाये तो व्यक्ति द्वारा किये जारहे कर्म गलत दिशामें होते हैं, जिस्से हमारी उर्जा यातो अधिक खर्च होती हैं या उर्जा गलत दिशा में व्यय होक

शरीर में अस्वस्थता पैदा होकर शारीरिक संतुलन को बिगाड़ देती है, जिस्से पारिवारिक कलह, आर्थिक तंगी, मानसिक तनाव, अशांति, रोग इत्यादि अनेक प्रकार कि व्याधि उतपन्न होती है।

इस लिए यह जरूरी है कि हम पंच महाभूत तत्वों का सन्तुलन रखे तो हमे जीवन में सभी प्रकार से सुख शांति एवं समृद्धि सरलता से प्राप्त होती हैं।

भवन निर्माण के बाद पंच तत्वों का गृह में अस्तित्व होता हैं इस लिये यह जरूरी हो जाता हैं कि इन पंच महाभूत तत्वों का सही सन्तुलन बना रहे। अगर यह जरा भी बिगड़ जाए तो भवन मे निवास करने वाला व्यक्ति सुख-शांति से नहीं रह पाएगा।

सोमवार, मई 03, 2010

गृह प्रवेश एवं वास्तु भाग:१

Gruha pravesha evm vastu bhag:1, gruh arambha evm vastu part:1


गृह प्रवेश एवं वास्तु भाग:१

गृहारम्भ और गृह प्रवेश करते समय अपने कुलदेवता, ईष्ट देवता, गणेश, क्षेत्रपाल, वास्तुदेवता और दिक्पतिकी विधिवत् पूजा करनी चहिये ।

विद्वान ब्राह्मण, घर बनाने वाले कारीगर, द्विज और शिल्पी को धन, वस्त्र और अलंकार भेट स्वरुप देकर उन्हे विधिवत् सन्तुष्ट करने से घरमें सदा सुख शांति एवं समृद्धि बनी रहती हैं ।

जिस भवन मे गृहारम्भ या गृहप्रवेश करते समय वास्तुपूजा करता हैं, उस भवन में सर्वदा आरोग्य, पुत्र, धन और धान्य से परिपूर्ण एवं सुखी होता हैं ।

जिस भवन मे बिना वास्तु पूजा कराके गृहारम्भ और गृह प्रवेश होता हैं उस भवन में रहने वाले व्यक्ति नाना प्रकारके रोग, क्लेश और संकटो से संम्मुखिन होते हैं ।

दुर्गाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रम्

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दुर्गाष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रम्



शतनाम प्रवक्ष्यामि शृणुष्व कमलानने।
यस्य प्रसादमात्रेण दुर्गा प्रीता भवेत् सती॥१॥

सती साध्वी भवप्रीता भवानी भवमोचनी।
आर्या दुर्गा जया चाद्या त्रिनेत्रा शूलधारिणी॥२॥

पिनाकधारिणी चित्रा चण्डघण्टा महातपाः।
मनो बुद्धिरहंकारा चित्तरूपा चिता चितिः॥३॥

सर्वमन्त्रमयी सत्ता सत्यानन्दस्वरूपिणी।
अनन्ता भाविनी भाव्या भव्याभव्या सदागतिः॥४॥

शाम्भवी देवमाता च चिन्ता रत्‍‌नप्रिया सदा।
सर्वविद्या दक्षकन्या दक्षयज्ञविनाशिनी॥५॥

अपर्णानेकवर्णा च पाटला पाटलावती।
पट्टाम्बरपरीधाना कलमञ्जीररञ्जिनी॥६॥

अमेयविक्रमा क्रूरा सुन्दरी सुरसुन्दरी।
वनदुर्गा च मातङ्गी मतङ्गमुनिपूजिता॥७॥

ब्राह्मी माहेश्वरी चैन्द्री कौमारी वैष्णवी तथा।
चामुण्डा चैव वाराही लक्ष्मीश्च  पुरुषाकृतिः॥८॥

विमलोत्कर्षिणी ज्ञाना क्रिया नित्या च बुद्धिदा।
बहुला बहुलप्रेमा सर्ववाहनवाहना॥९॥

निशुम्भशुम्भहननी महिषासुरमर्दिनी।
मधुकैटभहन्त्री च चण्डमुण्डविनाशिनी॥१०॥

सर्वासुरविनाशा च सर्वदानवघातिनी।
सर्वशास्त्रमयी सत्या सर्वास्त्रधारिणी तथा॥११॥

अनेकशस्त्रहस्ता च अनेकास्त्रस्य धारिणी।
कुमारी चैककन्या च कैशोरी युवती यतिः॥१२॥

अप्रौढा चैव प्रौढा च वृद्धमाता बलप्रदा।
महोदरी मुक्त केशी घोररूपा महाबला॥१३॥

अग्निज्वाला रौद्रमुखी कालरात्रिस्तपस्विनी।
नारायणी भद्रकाली विष्णुमाया जलोदरी॥१४॥

शिवदूती कराली च अनन्ता परमेश्वरी।
कात्यायनी च सावित्री प्रत्यक्षा ब्रह्मवादिनी॥१५॥

य इदं प्रपठेन्नित्यं दुर्गानामशताष्टकम्।
नासाध्यं विद्यते देवि त्रिषु लोकेषु पार्वति॥१६॥

धनं धान्यं सुतं जायां हयं हस्तिनमेव च।
चतुर्वर्ग तथा चान्ते लभेन्मुक्तिं च शाश्वतीम्॥१७॥

कुमारीं पूजयित्वा तु ध्यात्वा देवीं सुरेश्वरीम्।
पूजयेत् परया भक्त्या पठेन्नामशताष्टकम्॥१८॥

तस्य सिद्धिर्भवेद् देवि सर्वै: सुरवरैरपि।
राजानो दासतां यान्ति राज्यश्रियमवापनुयात्॥१९॥

गोरोचनालक्त ककुङ्कुमेन सिन्दूरकर्पूरमधुत्रयेण।
विलिख्य यन्त्रं विधिना विधिज्ञो भवेत् सदा धारयते पुरारिः॥२०॥

भौमावास्यानिशामग्रे चन्द्रे शतभिषां गते।
विलिख्य प्रपठेत् स्तोत्रं स भवेत् सम्पदां पदम्॥२१॥