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सोमवार, दिसंबर 06, 2010

सात फेरे और सात वचन

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सात फेरे और सात वचन


हिंदु संस्कृति में विवाह के समय वर-वधू पवित्र अग्नि के समक्ष सात फेरे के साथ में सात वचन लेते हैं जिसे आने वाले सात जन्मों तक दोनो को एक साथ इसी पवित्र रिश्ते में बंधे रहने का प्रतीक माना जाता हैं। इस विवाह विशेष अंक के साथ हम आपको इन सातो वचनो से अवगत करने का प्रयाश कर रहें हैं। विभिन्न हिंदू सभ्यता में विवाह में 4,5 और 7 फेरे लिये जाते हैं। इस सभ्यता के अनुरुप वचनो में उयोग में लाये जाने वाले मंत्रो में भी भिन्नता पाई जाती हैं।

विवाह के समय फेर इत्यादि आवश्यक कार्य संपम्म हो जाने पर भी विवाह संपन्न नहीं मानाजाता जब तक कन्या वर के वाम (बाऎं) भाग में नहीं आती। जबतक कन्या वर के वाम (बाऎं) भाग में नहीं आती तब उसे कुमारी ही मानाजाता हैं। एसे में विवाह को विधि विधान से संपन्न करने के लिये कन्या को वर से सात वचन माँगने का विधान बताया गया हैं। जिससे कन्या के भावी जीवन की सुख, सुरक्षा, मान-सम्मान, गरिमा-गौरव तथा अस्मिता की पूर्णता से रक्षा हो सके। वर द्वारा सात वचनों को स्वीकारने के पश्चात हिं कन्या निश्चिंत होकर भावी जीवन का प्रारम्भ करती हैं अर्थातः विवाह को संपन्न मानाजाता हैं। साधारण रुप से सात वचन को सप्तपदी रूप जानाजाता हैं।

प्राचीनकाल से सात वचनों का भारतीय समाज में अधिक महत्व रहा हैं। इस सात वचनों का तात्पर्य वर-वधू को श्रेष्ठ और सुखी दांपत्य जीवन की ओर प्रेरित करना होता हैं।

अपनी कन्या का विवाह करते समय हर माता-पिता के मन में यह आशंका अवश्य रहती हैं, कि विवाह पश्चात उनकी पुत्री का दांपत्य जीवन कैसा व्यतीत होगा? ससुराल में सुख से रह पायेगी या नहीं? कन्या के माता-पिता की इसी आशंका को दूर करने के लिए ही हजारो पूर्व हमारे विद्वान ऋषि-मुनियों द्वारा सात वचनों को रखा गया था। जिसके फलस्वरुप कन्या को विवाह पश्चात किसी कष्ट का सामना न करना पडे इस लिये कन्या अपने पति के वामांग (बाऎं) में आने से पूर्व उससे सात वचन मांगती हैं।

विवाह के पश्चयात पत्नि की समस्त आवश्यकताओं को पूरा करने के साथ उसकी अस्मिता तथा गरिमा की रक्षा करने का दायित्व भी पति का ही होता हैं। दांपत्य सम्बंधों में भी मधुरता, प्रेम, अनुराग, त्याग, समर्पण आदि कि भावना हो इसी उद्देश्य से इन वचनो को स्वीकार करना हीं नहीं उसे निभाना भी अति आवश्यक होता हैं।

हिंदु संस्कृति में वरवधू पवित्र अग्नि के सात फेरे लेते है। फेरे लेते समय वधू वर से सात वचन और वर वधू से पांच वचन मांगता हैं।

कन्या द्वारा वर से लिये जाने वाले सात वचन इस प्रकार हैं।

• प्रथम वचनः यदि यज्ञं कुर्यात्तस्मिन्मम सम्मतिं गृहणीयात
अर्थातः यज्ञादि शुभ कार्य मेरी सम्मति से ही करेंगे।

• द्वितीय वचनः यदि दानं कुर्यात्तस्मिन्नपि मम सम्मति गृहणियात
अर्थातः दानादि मेरी सम्मति से ही करेंगे।

• तृतीय वचनः अवस्थात्रये मम पालनां कुर्यात
अर्थातः युवा, प्रौढ़ और वृद्ध तीनों अवस्थाओं में मेरा पालन करेंगे।

• चतुर्थ वचनः धनादिगोपने मम सम्मतिं गृहणीयात
अर्थातः गुप्त रूप से धनादि संचय मेरी सम्मति से ही करेंगे।

• पंचम वचनः गवादि पशु क्रय-विक्रये मम सम्मतिं गृहणीयात।
अर्थातः गाय, बैल, घोडा आदि पशुओं (वर्तमान में वाहनादि) के क्रय विक्रय में भी मेरी सम्मति लेंगे।

• षष्ठम वचनः बसन्तादि षटऋतुषु मम पालनं कुर्यात
अर्थातः वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमन्त, शिशिर इन छहों ऋतुओं में मेरा पालन करेंगे।

• सप्तम वचनः सखीष्य मम हास्यं कटुवाक्यम न वदेत न कुर्यात! तद्दहं भवतां वामांगें आगच्छामि
अर्थातः मेरे साथ की सखी सहेलियों के सामने मेरी हँसीं न उडाएं और न ही कठोर कटु वचनों का प्रयोग करें।

इन वचनो में कन्या कहती हैं यदि आप उपरोक्त सातों वचनों का पालन करेंगे तो ही मैं आपके वामांग में आ सकती हूँ।

वर द्वारा कन्या से लिये जाने वाले वचन इस प्रकार हैं।

उद्याने मद्यपाने च पितागृहगमनेन च
आज्ञा भंगो न कर्तव्यं वरवाक्यचतुष्टयकम!!
अर्थातः निर्जन स्थान, उद्यान, वनादि में न जाए, मद्य (शराब) पीने वाले मनुष्य के सामने न जाए, अपने पिता के घर भी मेरी आज्ञा के बिना न जाए, धर्म शास्त्रोचित कभी भी मेरी आज्ञा भंग न करे तो ही तुम मेरे वामांग में स्थान ग्रहण कर सकती हो।

राशि से जानिये उत्तम जीवन साथी

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राशि से जानिये उत्तम जीवन साथी


ज्योतिष के विद्वानो के अनुशार अलग-अलग राशियों का प्रेम जीवन और उनकी शारीरिक आवश्यकताऎ भी अलग-अलग होती हैं।

यदि जीवन में कोई प्रतिकूल स्वभाव वाला जीवन साथी मिल जाए तो उसका पारिवारीक जीवन दुखमय हो जाता हैं। क्योकिं दांपत्य जीवन में उचित तालमेल में कमी होने पर पति-पत्नी दोनो तनाव से ग्रस्त रहते हैं। दोनों में छोटी-छोटी बातो पर विवाद इत्यादी क्लेश होते रहते हैं जिस्से उनके दांपत्य जीवन में और पारस्परिक संबंधो के दौरान पूर्ण संतुष्टि प्राप्त नहीं हो पाती। जिस्से उनका जीवन अधिक प्रभावित होता हैं। सुखमय जीवन के लिये आपकी राशि के के अनुशार कोनसी राशि का जीवनसाथी साथी आपके लिये उपयुक्त रहेगा।


• मेष राशि: मेष राशि के व्यक्ति के लिये मेष, कर्क, मिथुन, तुला, मकर और कुम्भ राशि के जीवन साथी उपयुक्त रहते हैं।
• वृषभ राशि: वृषभ राशि के व्यक्ति के लिये वृषभ, कर्क, सिंह, वृश्चिक, कुम्भ और मीन राशि के जीवन साथी उपयुक्त रहते हैं।
• मिथुन राशि: मिथुन राशि के व्यक्ति के लिये मेष, मिथुन, सिंह, कन्या, धनु और मीन राशि के जीवन साथी उपयुक्त रहते हैं।
• कर्क राशि: कर्क राशि के व्यक्ति के लिये मेष, वृषभ, कर्क, कन्या, तुला और मकर राशि के जीवन साथी उपयुक्त रहते हैं।
• सिंह राशि: सिंह राशि के व्यक्ति के लिये मिथुन, सिंह, तुला, वृश्चिक और कुम्भ राशि के जीवन साथी उपयुक्त रहते हैं।
• कन्या राशि: कन्या राशि के व्यक्ति के लिये मिथुन, कर्क, कन्या, वृश्चिक और धनु राशि के जीवन साथी उपयुक्त रहते हैं।
• तुला राशि: तुला राशि के व्यक्ति के लिये मेष, कर्क, सिंह, तुला, धनु और मकर राशि के जीवन साथी उपयुक्त रहते हैं।
• वृश्चिक राशि: वृश्चिक राशि के व्यक्ति के लिये वृषभ, सिंह, कन्या, वृश्चिक, मकर और कुम्भ राशि के जीवन साथी उपयुक्त रहते हैं।
• धनु राशि: धनु राशि के व्यक्ति के लिये मिथुन, कन्या, तुला, धनु, कुम्भ और मीन राशि के जीवन साथी उपयुक्त रहते हैं।
• मकर राशि: मकर राशि के व्यक्ति के लिये मेष, कर्क, तुला, वृश्चिक, मकर और मीन राशि के जीवन साथी उपयुक्त रहते हैं।
• कुंभ राशि: कुंभ राशि के व्यक्ति के लिये मेष, वृषभ, सिंह, वृश्चिक, धनु, कुंभ राशि के जीवन साथी उपयुक्त रहते हैं।
• मीन राशि: मीन राशि के व्यक्ति के लिये वृषभ, मिथुन, कन्या, धन, मकर राशि के जीवन साथी उपयुक्त रहते हैं।

कुंडली मिलान में वर-वधु के ग्रहों का मिलान करने का तत्पर्य उनके स्वभाव, विचार, भाग्य, संतान, आयु, स्वास्थ्य आदि का ही मिलान होता हैं जिस्से दोनो का आपसी तालमेल एवं जीवन केसा रहेगा इसका पूवानुमान लगाया जाता हैं।

रविवार, दिसंबर 05, 2010

ज्योतिष से जाने जीवनसाथी कि दिशा?

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ज्योतिष से जाने जीवनसाथी कि दिशा?


जन्म कुंडली में जीवनसाथी से संबंधित जानकारी देने वाला प्रमुख स्थान सप्तम भाव होता हैं । सप्तम भाव कि बल और निर्बल होने के आधार पर जातक का विवाहित और अविवाहित रहना। वैवाहिक जीवन में सफलता या असफलता के बारे में जाना जाता हैं।

जन्म कुंडली में सप्तम भाव से जीवन साथी की दिशा और स्थान का अंतर निर्धारित किया जाता हैं।

जन्म कुंडली में सप्तम भाव में स्थित ग्रह और सप्तम भाव के स्वामी अर्थात सप्तमेश कि प्रबलता या शुभ ग्रहो के साथ में या प्रभाव में अच्छी स्थिति में होने से इस ग्रह कि राशि कि दिशा के अनुसार जीवन साथी के मिलने कि दिशा के बारे में पता लगाया जा सकता हैं।

इसके उपरांत सप्तम भाव में स्थित ग्रह के बल और प्रभाव का भी अवलोकन करें।

• यदि जन्म कुंडली में सप्तम भाव में स्थित ग्रह सप्तमेश के स्वामी से अधिक बलवान हो, तो इस ग्रह की दिशा के अनुसार साथी की दिशा माननी चाहिये।
• यदि जन्म कुंडली में सप्तम भाव में स्थित ग्रह और सप्तमेश दोनो समान रूप से प्रभावशाली होने पर दोनों ग्रहो के मध्य की दिशा जाननी चाहिए।
• यदि जन्म कुंडली में ग्रह कमजोर हो, और सप्तमेश बलशाली हों, तो सप्तमेश के अनुशार हि जीवनसाथी की दिशा मानना चाहिए।

यहां विभिन्न ग्रहों की दिशा दी जा रही है :-

सूर्य : पूर्व दिशा
चन्द्र : वायव्य दिशा
मंगल : दक्षिण दिशा
बुध : ईशान दिशा
गुरु : उत्तर दिशा
शुक्र : आग्नेय दिशा
शनि : पश्चिम दिशा
राहू-केतु : नैऋत्य दिशा
कितनी दूर होगा लडके-लड़की का ससूराल?

• जन्म कुंडली में सप्तम भाव में वृष राशि, कुंभ राशि अथवा वृश्चिक राशि का प्रभाव हो, तो उसके घर या पैतृक निवास से जीवनसाथी के घर या पैतृक निवास कि दूरी 0-90किलोमीटर के करीब हो सकती है।
• जन्म कुंडली में सप्तम भाव में मिथुन राशि, कन्या राशि, धनु राशि अथवा मीन राशि का प्रभाव हो, तो उसके घर या पैतृक निवास से जीवनसाथी के घर या पैतृक निवास कि दूरी 90-190 किलोमीटर के करीब हो सकती है।
• जन्म कुंडली में सप्तम भाव में मेष राशि, कर्क राशि, तुला राशि अथवा मकर राशि का प्रभाव हो, तो उसके घर या पैतृक निवास से जीवनसाथी के घर या पैतृक निवास कि दूरी 190 या उस्से से अधिक किलोमीटर कि दूरी पर हो सकता है।

विवाह से पूर्व कुंडली मिलान में अल्पायु-दीर्धायु योग भी देख लें।

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विवाह से पूर्व कुंडली मिलान में अल्पायु-दीर्धायु योग भी देख लें।


अल्पायु योग
ज्योतिष से जाने कितना जीएँगा आपका साथी जीवन-मृत्यु ईश्वर की ही इच्छानुसार होती हैं। परंतु एक कुशल ज्योतिष मनुष्य के अल्पायु-दीर्धायु योग से उसकी आयु कि जानकारी दे सकता हैं। योग के आधार पर आयु से संबंधित जानकारी देने का उद्देश्य केवल सचेतना एवं पूर्व सूचना मात्र होता हैं। यदि अल्प आयु के योग बन रहें हो तो उस्से बचाव के इष्ट आराधना आराधना के उपाय करने चाहिये जिससे दीर्धायु कि प्राप्ती हो सके। क्योकि अल्पायु योग के कारणा वर को विदुर और कन्या को विधवा होने कि नौबत आजाती हैं। क्योकि मृत्यु तो निश्चित होती हैं उसे कोई नहीं टाल सकता किन्तु यदि कुंडली मिलान में वर या वधु कि

कुंडली में एसे योग पाये जाये तो सोच समझ कर ही विवाह करना उचित होता हैं।
ज्योतिष सिद्धांतो के आधार पर केवल व्यक्ति के जीवन पर उसकी जन्म कुंडली का ही नहीं, उसके संबंधियों की जन्म कुंडली के योगों का भी असर अवश्य पड़ता हैं। जैसे किसी व्यक्ति की कुंडली में कोई वर्ष विशेष मारक हो परंतु उसके पत्नी की कुंडली में पति का योग बलवान हो, तो उपाय इत्यादी करने पर यह मारक योग केवल स्वास्थ्य कष्ट, अकस्मात दुर्धटना में छोटी-मोटी चोट इत्यादि का योग मात्र बन जाता हैं। अतः आयु निर्धारण हेतु इन सब बातों का ध्यान अवश्य रखना चाहिये। हमारे विद्वानो ने आयु निर्धारण के दीधार्यु, मध्यमायु, अल्पायु के कुछ सामान्य नियम बताते हैं।

अल्पायु योगों
आयु निर्धारण हेतु जन्म कुंडली में लग्न के स्वामी कि स्थिती का अधिक महत्व मान गया हैं। यदि लग्नेश षष्टम, अष्टम या द्वादश भाव में स्थित हों, तो जातक स्वास्थ्य से संबंधित परेशानी से ग्रस्त होता हैं। जातक अपने जीवन में स्वास्थ्य से संबंधित विभिन्न समस्या, आकस्मिक दुर्घटना इत्या से से अधिक समय सम्मुखीन होता हैं। व्यक्ति को अपने लग्नेश को अनुकूल बनाने हेतु उपाय करना चाहिये।
• कुंडली में सभी पाप ग्रह शनि, राहू, सूर्य, मंगल, केतु और चंद्रमा कि सूर्य से युक्त होकर तृतीय, षष्टम, द्वादश भाव में स्थित हों, तो आयु पक्ष कमजोर होता हैं।
• कुंडली में लग्नेश और सूर्य लग्न भाव में स्थित हो और उस पर पाप ग्रह कि दृष्टि हो तो आयु योग कमजोर होता हैं।
• कुंडली में अष्टमेश षष्टम या द्वादश भाव में पाप ग्रह के साथ या पाप ग्रह के प्रभाव में हो, तो आयु पक्ष कमजोर होता हैं।
• कुंडली में लग्नेश निर्बल हो और सभी पाप ग्रह केंद्र में स्थित हो, और उस पर शुभ दृष्टि न हो अशुभ ग्रह कि द्दष्टि हो तो आयु योग कमजोर होता हैं।
कुंडली में लग्नेश कमजोर हो एवं धन (द्वितीय) और व्यय (द्वादश) भाव में पाप ग्रह स्थित हो तो आयु ……………..>>


कुंडली से जानें दीर्घायु योग
कुंडली में कुछ योग ऐसे होते है जो मनुष्य को दीर्घायु बनाते है।
• ज्योतिष शास्त्र के अनुशार कुंडली में अष्टम स्थान आयु का होता हैं और अष्टम से अष्टम अर्थात तीसरा स्थान भी आयु का माना जाता हैं।
• दीर्घायु योग उन जातको कि कुंडली मे होते हैं जिनका लग्नेश अर्थात लग्न का स्वामी ग्रह का बलाबल होना एवं शुभ ग्रहों के प्रभाव में होना अति आवश्य होता हैं।
• कुंडली में लग्नेश प्रबल बलवान हों एवं अन्य सभी ग्रह बलवान हो, तो जातक दीर्घायु होता हैं।
• कुंडली में पंचम भाव में चंद्रमा, नवम भाव में गुरु, दशम भाव में मंगल स्थित होने पर दीर्घायु योग होता हैं।
कुंडली में लग्नेश, अष्टमेश और दशम स्थान का स्वामी शनि के साथ केंद्र में स्थित हो, तो दीर्घायु योग ……………..>>


पूर्णायु योग
• कुंडली में लग्नेश और अष्टमेश दोनों चर राशि में स्थित हों, या एक द्विस्वभाव राशि में दूसरा स्थिर राशि में हों तो दीधायु योग होता हैं।
• कुंडली में लग्न और चन्द्र दोनों चर राशि में स्थित हों, या एक द्विस्वभाव राशि में दूसरा स्थिर राशि में हों तो दीधायु योग होता हैं।
• कुंडली में लग्न और होरा लग्न दोनों चर राशि में स्थित हों, या एक द्विस्वभाव राशि में दूसरा स्थिर राशि में हों तो दीधायु योग होता हैं।
• कुंडली में लग्नेश और शुभ ग्रह पणफर भाव में स्थित हों, या अष्टमेश और सभी पाप ग्रह पणफर भाव में हों तो दीधायु योग होता हैं।
कुंडली में अष्टमेश उच्च का होकर केन्द्र में स्थित हों, या त्रिकोण में शुभ ग्रहों से युत हो तो दीधायु ……………..>>


महादीर्घायु योग
• कुंडली में सूर्य, बृहस्पति और मंगल नवम भाव में स्थित हों, वर्गोत्तम में हों, मकर या कुंभ राशि में हों जबकि चन्द्र बली होकर लग्न में हों तो यह योग होता है ।
• कुंडली में शनि और बृहस्पति लग्न से दशम अथवा नवम भाव में स्थित हों और नवमांश में भी ऎसा ही हो, शुभ ग्रहों से द्रष्ट हों एवं सूर्य लग्न में स्थित हो तो महादीर्घायु योग बनता हैं।
लग्न में कर्क राशि हो चन्द्र या बृहस्पति लग्न में स्थित हों और शुक्र और बुध केन्द्र में हों और शेष ग्रह एकादश, षष्टम और तृतीय भाव में हों तो महादीर्घायु योग ……………..>>

विशेष : कुंडली मिलान करते समय इनमें से कोई एक योग कुंडली में हों, तो जातक पूर्ण आयु प्राप्त करता हैं एसा ज्योतिष विद्वानो का कथन हैं। पूर्ण आयु के योग बनने पर भी सावधानी आवश्य होती हैं। क्योकि अनउचित व्यवहार एवं सोच के कारण व्यक्ति व्यसनों या गलत खान-पान के चलते उस्का शरीर बीमारियों का घर बन सकता हैं। गलत कर्मों से आयु योग क्षीण हो जाता हैं। आकस्मिक घटनाओं को भी अवश्य ध्यान में रखते हुवे आयु निर्धारण करें। अतः कोई भी भविष्यवक्ता इस बारे में घोषणा न करें ऐसा गुरुओं का निर्देश होता है। हाँ, खतरे की दी जा सकती है। किए जा सके। ……………..>>
संपूर्ण लेख पढने के लिये कृप्या गुरुत्व ज्योतिष ई-पत्रिका दिसम्बर-2010 का अंक पढें।

इसलेख को प्रतिलिपि संरक्षण (Copy Protection) के कारणो लेख को यहां संक्षिप्त में प्रकाशित किया गया हैं।

>> गुरुत्व ज्योतिष पत्रिका (दिसम्बर-2010)
http://gk.yolasite.com/resources/GURUTVA%20JYOTISH%20DEC-2010.pdf

शास्त्रों के अनुसार विवाह के प्रकार

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शास्त्रों के अनुसार विवाह के प्रकार


सभी धर्म में विवाह कि अलग-अलग विधियां होती हैं। विवाह का तात्पर्य होता हैं कि स्त्री-पुरुष को जीवनभर के एक पवित्र रिश्ते में बांधा जाय। हिंदू शास्त्रों के अनुसार विवाह कि प्रमुख आठ विधियों का वर्णन किया गया हैं। इन आठ विधियों में 4 विधियों को श्रेष्ठ और नैतिक माना गया हैं। और अन्य 4 विधियों को पूर्णतः अनैतिक माना गया हैं।

शास्त्रों में ब्राह्म विवाह, देव विवाह, आर्श विवाह और प्राजान्य विवाह को श्रेष्ठ मानागया हैं।
शास्त्रों में असुर विवाह, गंधर्व विवाह, राक्षस विवाह और पिशाच विवाह को अनैतिक मानागया हैं।

भारतीय समाज में श्रेष्ठ और नैतिक विधियों से ही विवाह कराये जाते हैं।

ब्रह्म विवाह :
हिन्दु समाज में ब्रह्म विवाह (ब्राह्म विवाह) आदर्श, सबसे लोकप्रिय और प्रतिष्ठित विवाह का स्वरूप माना जाता हैं क्योकि ब्रह्म विवाह दोनो पक्ष की सहमति से किया जाता हैं। ब्रह्म विवाह में कन्या का पिता अपनी कन्या के लिए विद्ववान, सामर्थ्यवान एवं उत्तम चरित्र वाला सबसे सुयोग्य वर को अपनी कन्या से विवाह के लिए आमंत्रित कर अपनी पुत्री का कन्यादान करता हैं। ब्रह्म विवाह आजकल सामाजिक विवाह या कन्यादान विवाह कहा जाता हैं।

देव विवाह :
शास्त्रों के अनुशार देव विवाह के अंतर्गत कन्या का पिता अपनी सुपुत्री का विवाह यज्ञ (विशेषतः धार्मिक अनुष्टान) कराने वाले पुरोहित को सेवा कार्य के मूल्य के रूप अपनी कन्या को दान में दे देता था। देव विवाह को प्राचिन काल में एक आदर्श विवाह माना जाता था। आजकल देव विवाह आज लुप्त हो गया है।

आर्श विवाह :
शास्त्रों के अनुशार आर्श विवाह प्राचीन काल में सन्यासियों तथा ऋषियों में गृहस्थ बनने की इच्छा जागृत होने पर उन्हें विवाह कि स्वीकृती दिजाती थी। आर्श विवाह के अंतर्गत सन्यासि या ऋषि अपनी पसन्द की कन्या के पिता को गाय और बैल का एक जोड़ा भेंट स्वरुप देता था अर्थात कन्या-पक्ष वालों को कन्या का मूल्य दे कर (गौदान करके) विवाह प्रस्ताव रखे जाते थे। यदि कन्या के पिता को यह रिश्ता मंजूर होता था, तो वह गाय और बैल के जोडे कि भेंट स्वीकार कर लेता था और अपनी सुपुत्री का विवाह कर देता था। लेकिन रिश्ता मंजूर नहीं होने पर गाय और बैल के जोडे कि भेंट सादर लौटा दी जाती थी।

प्रजापत्य विवाह :
शास्त्रों के अनुशार प्रजापत्य विवाह ब्रह्म विवाह का एक कम विस्तृत, संशोधित रूप था। दोनों में मूल अंतर सपिण्ड बहिर्विवाह के नियम तक सीमित था। ब्राह्म विवाह में पिता की तरफ से सात एवं माता की तरफ से पांच पीढ़ियों तक जुड़े लोगों से विवाह संबंध निषेध होता था। लेकिन प्रजापत्य विवाह में पिता की तरफ से पांच एवं माता की तरफ से तीन पीढ़ियों के सपिण्डों में ही विवाह निषेध होता था। प्रजापत्य विवाह में पिता अपनी कन्या की सहमति के बिना उसका विवाह अभिजात्य वर्ग के वर से कर देना 'प्रजापत्य विवाह' कहलाता था।

आसुर विवाह :
शास्त्रों के अनुशार आसुर विवाह ब्रह्म विवाह से विपरीत कन्या के पिता को दान या कन्या का मूल्य देख उसे खरीदा जाता था या विवाह में कन्या के भाई और वर की बहन कि अदला-बदली कि जाती थी। ब्रह्म विवाह में कन्या मूल्य लेना कन्या के पिता के लिए निषिद्ध होता था। ब्रह्म विवाह में कन्या के भाई और वर की बहन का विवाह (अदला-बदली) भी निषिध्द होता है।

गंधर्व विवाह :
शास्त्रों के अनुशार गंधर्व विवाह को आधुनिक युग के प्रेम विवाह का पारंपरिक रूप था। पौराणिक काल में गंधर्व विवाह के अंतर्गत अपने परिवार वालों की सहमति के बिना वर और कन्या का बिना किसी रीति-रिवाज के आपस में विवाह कर लेते थे। उस काल में गंधर्व विवाह की कुछ विशेष परिस्थितियों एवं विशेष वर्गों में स्वीकृति थी परन्तु परंपरा में इसे आदर्श विवाह नहीं माना जाता था।

राक्षस विवाह :
शास्त्रों के अनुशार राक्षस विवाह को पौराणिक काल में कन्या की सहमति के बिना उसका अपहरण करके जबरदस्ती विवाह कर लेना जो लोकप्रिय हरण विवाह के रुप में प्रचलन में रहा
था। पौराणिक काल में राजाओं और दिवासि कबीलों ने युध्द में हारे राजा तथा सरदारों ने मैत्री संबंध बनाने के उद्देश्य से उनकी पुत्रियों से विवाह करने की प्रथा चलायी थी। राक्षस विवाह में स्त्री को युध्द में जीत के प्रतीक के रूप में पत्नी बनाया जाता था। यह स्वीकृत था परंतु आदर्श नहीं माना जाता था।

पैशाच विवाह :
शास्त्रों के अनुशार पैशाच विवाह को विवाह का निकृष्टतम रूप माना गया हैं। जिस के अंतर्गत कन्या की मदहोशी, गहन निद्रा, मानसिक दुर्बलता इत्यादि का लाभ उठा कर जबरदस्ती से शीलहरण कर उससे शारीरिक सम्बंध बना लेना और लड़की के अधिकारों की रक्षा के लिए अंतिम विकल्प के रूप में उसे विवाह रूप में स्वीकार किया जाता था। इस विवाह से उत्पन्न संतान को वैध संतान के सारे अधिकार प्राप्त होते थे।

कुंडली से जाने विवाह का सही समय

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कुंडली से जाने विवाह का सही समय


अक्सर बच्चों के बड़े होते ही माता-पिता को उनकी शादी के लिए चिंता होने लगती हैं। कि उनके बच्चों की शादी कब होगी। इश्चर द्वारा निर्मित इस सृष्टी में व्यक्ति के हर कार्य अपने निश्चित समय पर होते हैं। इसी प्रकार व्यक्ति कि शादी कब होगी, होगी भी या नहीं यह ईश्वर ने पहले से लिख कर रखा होता हैं। इस इश्चर द्वारा लिखे इस समय को यदि व्यक्ति चाहे तो किसी जानकार ज्योतिषी से अपनी जन्म कुंडली दिखवाकर विवाह के समय के बारे में जान सकता हैं। यदि जन्म कुंडली विवाह से संबंधित भाव में शुभ ग्रहों कि अच्छी स्थिती या द्रष्टि हों, जन्म कुंडली में अच्छे योग हो तो शीध्र विवाह के योग बनते हैं। जन्म कुंडली में विवाह से संबंधित भाव में अशुभ ग्रहों का प्रभाव हो, तो शादी विलंब से होती हैं।

• यदि किसी व्यक्ति कि कुंडली में गुरु सप्तम भाव में स्थित हों कर किसी शुभ ग्रह से दृ्ष्टि संबंध बना कर सप्तम भावमें उच्च का हों, तो व्यक्ति का विवाह 21 वर्ष की आयु में होने कि अधिक संभावनाएं बनती हैं।
• कुंडली में सप्तम भाव में स्वगृही शुक्र हो और द्वितीय भाव में लग्न द्वारा दृष्ट हों, तो किशोर अवस्था या युवान अवस्था में हि व्यक्ति का विवाह होने के योग बनने लगते हैं।
• यदि किसी व्यक्ति कि कुंडली में शुभ ग्रहों से लग्नेश व सप्तमेश का आपस में स्थान परिवर्तन या दृष्टि हो, विशेष कर गुरु का स्थान परिवर्तन या दृष्टि संबंध होने से कन्या का विवाह योग 18 से 20 वर्ष के मध्य होने की संभावना बनाता हैं एवं पुरुष का विवाह योग 21 से 23 वर्ष के मध्य होने की संभावना बनाता हैं।
• यदि किसी व्यक्ति कि कुंडली में सप्तमेश और लग्नेश दोनों जब निकट भावों में स्थित हों तो व्यक्ति का विवाह योग 21 वें वर्ष में होने की संभावना बनाता हैं।
यदि किसी व्यक्ति कि कुंडली में लग्नेश बलशाली हो और लग्नेश द्वितीय भाव में स्थित हो तो व्यक्ति का विवाह शीघ्र ……………..>>

विवाह के लिये सप्तम भाव, सप्तमेश और शुक्र का विचार किया जाता हैं। सप्तम भाव, सप्तमेश और शुक्र शुभ स्थिति में हों तो विवाह शीघ्र होता है तथा वैवाहिक जीवन भी सुखमय रहने कि अधिक संभावनाएं होती हैं।
इसके विपरीत यदि सप्तम भाव, सप्तमेश और शुक्र तीनों किसी भी प्रकार के पाप ग्रह के प्रभाव में हों तो विवाह में विलम्ब होने की संभावना बनती हैं। विवाह के समय का निर्धारण करने के लिये कुंडली में बन रहे योग विशेष भूमिका निभाते हैं।
किसी व्यक्ति को जीवन में कितना वैवाहिक सुख मिलेगा यह सब कुंडली में बन रहे योग पर निर्भर करता हैं। यदि शुभ ग्रह, शुभ भावों के स्वामी होकर जब शुभ भावों में स्थित होंता हो, और अशुभ ग्रह निर्बल होकर अशुभ भावों के स्वामी होकर, अशुभ भावों में स्थित हों तो व्यक्ति को अनुकुल फल देते हैं।

कुंडली के योग विवाह समय को किस प्रकार प्रभावित करते हैं।
• यदि जन्म कुंडली में अष्टमेश पंचम भाव में हों तो व्यक्ति का विवाह विलम्ब से होने की संभावना बनती हैं।
• यदि जन्म कुंडली में सूर्य एवं चन्द्र का शनि से पूर्ण दृष्टि संबंध रखते हों तो व्यक्ति का विवाह देर से होने के योग बनते हैं।
• यदि सप्तम भाव का स्वामी सूर्य या चन्द्र दोनों में से कोई हो तभी इस प्रकार कि संभावना विशेष बनती हैं।
• यदि जन्म कुंडली में शुक्र केन्द्र में स्थित हों और शुक्र से सप्तम भाव में शनि स्थित हों तो व्यक्ति का विवाह वयस्क आयु में प्रवेश के बाद ही होने की संभावना बनती हैं।

यदि जन्म कुंडली में शनि सप्तमेश होकर एकादश भाव में स्थित हों और एकादशेश दशम भाव में स्थित हों तो व्यक्ति का विवाह 21 से 23 वर्ष में होने की संभावना ……………..>>


सप्तम भाव के स्वामी ग्रहों के अनुसार विवाह समय का निर्णय:-
1. सप्तम भाव का स्वामी सूर्य हों तो व्यक्ति का विवाह 24 से 26 वर्ष के मध्य होने की संभावना होती हैं।
2. चन्द्र सप्तमेश होने पर व्यक्ति का विवाह 21 से 22 वें वर्ष के मध्य होने की संभावना होती हैं।
3. मंगल सप्तमेश हो तो 24 से 27 के मध्य की आयु में विवाह ……………..>>

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विवाह से संबंधित स्वप्न

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विवाह से संबंधित स्वप्न


कुछ प्रकार के स्वप्न एक विशेष प्रकार का फल देते हैं। आपके मार्ग दर्शन के लिये ज्योतिष के ग्रंथो में उल्लेखित दांपत्य जीवन एवं प्रेम-प्रसंगों से सम्बंधित स्वप्न फल का विचार यहा दर्शाएं गएं हैं।

• स्वप्न शास्त्र के अनुसार नींद में दिखाई देने वाले सपनों से भी प्रेम विवाह होने या ना होने के संकेत प्राप्त होते हैं।
• लडकी का स्वप्न में किसी चिडिय़ा को चहचहाती हुई देखना प्रेम विवाह होने का संकेत हैं।
• लड़की का स्वप्न में स्वयं को बिस्तर पर चद्दर बिछाते हुए देखना किसी से जल्दी प्रेम होने का या अपना प्रेम विवाह होने का संकेत हैं
• स्वप्न में स्वयं को संगीत सुनते हुए देखना प्रेम संबंध में सफलता प्राप्ति का संकेत हैं।
• स्वप्न में सर्कस जेसी कलाबाजी देखना उसके प्रेम में कोई तीसरा व्यक्ति दखल देने का संकेत हैं।
• स्वप्न में प्रणय दृश्य देखना प्रेम संबंध में परेशानि आने के संकेत हैं।
• स्वप्न में हीरे-जवाहरात या हीरे के आभूषण उपहार में प्राप्त होते देखना दांपत्य जीवन में परेशानियां आसकती हैं।
• स्वप्न में सोने के आभूषण देखना समृद्ध परिवार में विवाह होने का संकेत हैं।
• स्वप्न में बाजार में घुमते देखे देखना मनपसंद जीवन साथी ……………..>>


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>> गुरुत्व ज्योतिष पत्रिका (दिसम्बर-2010)

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