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सोमवार, जुलाई 04, 2011

महामृत्युंजय जपविधि


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महामृत्युंजय जपविधि
लेख साभार: गुरुत्व ज्योतिष पत्रिका (मई-2011)
॥ इति महामृत्युंजय जपविधिः ॥
विद्वानो के अनुशार महामृत्युंजय मंत्र के जप और उपासना साधक को अपनी आवश्यकता के अनुरूप करने से विशेष लाभप्रद होते हैं। आवश्यक्ता के अनुशार जप के लिए अलग-अलग मंत्रों का प्रयोग होता हैं। मंत्र के अक्षरों में संख्या के कारण मंत्रों में विविधता हो जाती हैं।

मंत्र निम्न प्रकार से है-

एकाक्षरी (1) मंत्र- 'हौं' ।
त्र्यक्षरी(3) मंत्र- 'ॐ जूं सः'।
चतुराक्षरी(4) मंत्र- 'ॐ वं जूं सः'।
नवाक्षरी(9) मंत्र- 'ॐ जूं सः पालय पालय'।
दशाक्षरी(10) मंत्र- 'ॐ जूं सः मां पालय पालय'।

(दशाक्षरी मंत्र का जप स्वयं के लिए उक्त क्रम में करें। यदि किसी अन्य व्यक्ति के लिए दशाक्षरी मंत्र का जप किया जा रहा हो तो 'मां' के स्थान पर उस व्यक्ति का नाम लेना चाहिए)


वेदोक्त मंत्र-
महामृत्युंजय का वेदोक्त मंत्र निम्न लिखित हैं।

त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌॥

महामृत्युंजय मंत्र में 32 शब्दों का प्रयोग हुआ है और महामृत्युंजय मंत्र में ॐ लगा देने से 33 शब्द हो जाते हैं।

इसे 'त्रयस्त्रिशाक्षरी या तैंतीस अक्षरी मंत्र कहते हैं।
श्री वशिष्ठजी ने 33 अक्षर के 33 देवता अर्थात्‌ शक्तियाँ निश्चित की हैं जो निम्नलिखित हैं।

महामृत्युंजय मंत्र में 8 वसु, 11 रुद्र, 12 आदित्य 1 प्रजापति तथा 1 वषट को माना हैं।

मंत्र विचार :महामृत्युंजय मंत्र के प्रत्येक शब्द को स्पष्ट करना अति आवश्यक हैं। क्योंकि शब्द से ही मंत्र है और मंत्र से ही शक्ति हैं।
महामृत्युंजय मंत्र में प्रयोग किए गए प्रत्येक शब्द अपने आप में एक संपूर्ण अर्थ लिए हुए होता हैं और इसी में देवादि का बोध कराता है।

शब्द बोधक
'त्र' ध्रुव वसु
'यम' अध्वर वसु
'ब' सोम वसु
'कम्‌' .. ……………..>>


 



उक्त बोधक को देवताओं के नाम माने जाते हैं।

शब्द की शक्ति-
महामृत्युंजय मंत्र में प्रयोग हुए शब्द की शक्ति निम्न प्रकार से मानी गई हैं।

शब्द शक्ति


'त्र' त्र्यम्बक, त्रि-शक्ति तथा त्रिनेत्र
'य' यम तथा यज्ञ
'म' मंगल ……………..>>

'तात' चरणों में स्पर्श

महामृत्युंजय मंत्र के शब्दो का यह पूर्ण विवरण 'देवो भूत्वा देवं यजेत' के अनुसार पूर्णतः सत्य प्रमाणित मानेगये हैं।
महामृत्युंजय के अलग-अलग मंत्र का उल्लेख मिलता हैं।

साधक अपनी आवश्यक्ता/सुविधा के अनुसार चाहें जो भी मंत्र चुन लें और उस मंत्र का नित्य पाठ कर सकते हैं या अपनी आवश्यकता के अनुशार उचित समय प्रयोग कर सकते हैं।
मंत्र निम्नलिखित हैं-

तांत्रिक बीजोक्त मंत्र:
ॐ भूः भुवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ॥

संजीवनी मंत्र:
ॐ ह्रौं जूं सः। ॐ भूर्भवः स्वः। ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्‌। उर्वारुकमिव बन्धनांन्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्‌। स्वः भुवः भूः ॐ। सः जूं ह्रौं ॐ ।

महामृत्युंजय का प्रभावशाली मंत्र:……….. ……………..>>

महामृत्युंजय मंत्र जाप में सावधानियाँ
महामृत्युंजय मंत्र का जप करना मनुष्य के लिये परम फलदायी और कल्याणकारी माना गया हैं।
लेकिन महामृत्युंजय मंत्र का जप कुछ सावधानियाँ रख कर करना चाहिए। जिससे मंत्र का संपूर्ण लाभ प्राप्त हो सके और किसी भी प्रकार के अनिष्ट की संभावना न रहें।

इस लिए महामृत्युंजय मंत्र का जप करने से पूर्व निम्न बातों का ध्यान रखना चाहिए।

1. साधक को महामृत्युंजय मंत्र का जो भी मंत्र जपना हो उसका उच्चारण पूर्ण शुद्धता से करें।
2. मंत्र जप एक निश्चित संख्या में करें। पूर्व दिवस में जपे गए मंत्रों से, आगामी दिनों में कम संख्या में मंत्रों का जप नहीं करना चाहिए। यदि चाहें तो अधिक संख्या में जप सकते हैं।
3. विशेष प्रयोजन के किए जा रहे मंत्र का उच्चारण होठों से बाहर नहीं जाना चाहिए। यदि अभ्यास न हो तो धीमे स्वर में जप करें।
4. जप काल में धूप और दीप ……………..>>

कब करें महामृत्युंजय मंत्र जाप?

·        शास्त्रोक्त विधान के अनुशार महामृत्युंजय मंत्र जप से अकाल मृत्यु तो टलने के उपरांत आरोग्यता की भी प्राप्ति होती हैं।
·        यदि स्नान करते समय शरीर पर पानी डालते समय  महामृत्युंजय मंत्र का जप करने से स्वास्थ्य-लाभ होता हैं।
·        दूध को देखते हुए  महामृत्युंजय मंत्र ……………..>>

महामृत्युंजय जपविधि - (मूल संस्कृत में)
         कृतनित्यक्रियो जपकर्ता स्वासने पांगमुख उदहमुखो वा उपविश्य धृतरुद्राक्षभस्मत्रिपुण्ड्रः । आचम्य । प्राणानायाम्य। देशकालौ संकीर्त्य मम वा यज्ञमानस्य अमुक कामनासिद्धयर्थ श्रीमहामृत्युंजय मंत्रस्य अमुक संख्यापरिमितं जपमहंकरिष्ये वा कारयिष्ये।

॥ इति प्रात्यहिकसंकल्पः॥
·        ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॐ गुरवे नमः। ……………..>>
·        आसनः
ॐ पृथ्वि त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता। ……………..>>


॥ इति भूतशुद्धिः ॥

·        अथ प्राण-प्रतिष्ठा……………..>>


·        विनियोगः ……………..>>


अथ ध्यानम्‌:
·        ……………..>>


जप‍
अथ महामृत्युंजय जपविधि
संकल्पतत्र संध्योपासनादिनित्यकर्मानन्तरं भूतशुद्धिं प्राण प्रतिष्ठां च कृत्वा प्रतिज्ञासंकल्प कुर्यात ॐ तत्सदद्येत्यादि सर्वमुच्चार्य मासोत्तमे मासे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुकतिथौ अमुकवासरे अमुकगोत्रो अमुकनाम मम शरीरे ज्वरादि-

रोगनिवृत्तिपूर्वकमायुरारोग्यलाभार्थं वा धनपुत्रयश सौख्यादिकिकामनासिद्धयर्थ श्रीमहामृत्युंजयदेव प्रीमिकामनया यथासंख्यापरिमितं महामृत्युंजयजपमहं करिष्ये।

(अमुक के स्थान पर वर्तमान मास-पक्ष-तिथि-वास- का उचारण करें और अमुक गोत्रो व नाम के स्थान पर जिसके लिये जप किया जा रहा हो उस व्यक्ति के गोत्र व नाम का उचारण करना चाहिए)
·        विनियोग ……………..>>
·        अथ यष्यादिन्यासः ……………..>>
·        अथ करन्यासः ……………..>>

·        अथांगन्यासः ……………..>>
·        अथाक्षरन्यासः……………..>>

·        अथ पदन्यासः……………..>>
·        मृत्युंजयध्यानम्‌ ……………..>>
·        अथ बृहन्मन्त्रः ……………..>>
·        समर्पण……………..>>



संपूर्ण लेख पढने के लिये कृप्या गुरुत्व ज्योतिष ई-पत्रिका मई-2011 का अंक पढें।

इस लेख को प्रतिलिपि संरक्षण (Copy Protection) के कारणो से यहां संक्षिप्त में प्रकाशित किया गया हैं।


>> गुरुत्व ज्योतिष पत्रिका (मई-2011)
MAY-2011


महामृत्युंजय अकाल मृत्यु एवं असाध्य रोगों से मुक्ति

महामृत्युंजय
अकाल मृत्यु एवं असाध्य रोगों से मुक्ति के लिये शीघ्र प्रभावि उपाय


महामृत्युंजय अकाल मृत्यु एवं असाध्य रोगों से मुक्ति के लिये शीघ्र प्रभावि उपाय, महामृत्युंजय अकाल मृत्यु एवं असाध्य रोगों, महामृत्युन्जय कवच, मन्त्र, मंत्र, यन्त्र, यंत्र, अकाल असाध्य रोगों अकाल मृत्यु से मुक्ति, મહામૃત્યુંજય અકાલ મૃત્યુ એવં અસાધ્ય રોગોં સે મુક્તિ, યન્ત્ર, યંત્ર, મહામૃત્યુન્જય અસાધ્ય રોગોં અકાલ મૃત્યુ સે મુક્તિ, કવચ, મન્ત્ર, મંત્ર, ಮಹಾಮೃತ್ಯುಂಜಯ ಅಕಾಲ ಮೃತ್ಯು ಏವಂ ಅಸಾಧ್ಯ ರೋಗೋಂ ಸೇ ಮುಕ್ತಿ, ಯನ್ತ್ರ, ಯಂತ್ರ, ಮಹಾಮೃತ್ಯುನ್ಜಯ ಅಸಾಧ್ಯ ರೋಗೋಂ ಅಕಾಲ ಮೃತ್ಯು ಸೇ ಮುಕ್ತಿ, ಕವಚ, ಮನ್ತ್ರ, ಮಂತ್ರ, மஹாம்ருத்யும்ஜய அகால ம்ருத்யு ஏவம் அஸாத்ய ரோகோம் ஸே முக்தி, யந்த்ர, யம்த்ர, மஹாம்ருத்யுந்ஜய அஸாத்ய ரோகோம் அகால ம்ருத்யு ஸே முக்தி, கவச, மந்த்ர, மம்த்ர, మహామృత్యుంజయ అకాల మృత్యు ఏవం అసాధ్య రోగోం సే ముక్తి, యన్త్ర, యంత్ర, మహామృత్యున్జయ అసాధ్య రోగోం అకాల మృత్యు సే ముక్తి, కవచ, మన్త్ర, మంత్ర, മഹാമൃത്യുംജയ അകാല മൃത്യു ഏവം അസാധ്യ രോഗോം സേ മുക്തി, യന്ത്ര, യംത്ര, മഹാമൃത്യുന്ജയ അസാധ്യ രോഗോം അകാല മൃത്യു സേ മുക്തി, കവച, മന്ത്ര, മംത്ര, ਮਹਾਮ੍ਰੁਤ੍ਯੁਂਜਯ ਅਕਾਲ ਮ੍ਰੁਤ੍ਯੁ ਏਵਂ ਅਸਾਧ੍ਯ ਰੋਗੋਂ ਸੇ ਮੁਕ੍ਤਿ, ਯਨ੍ਤ੍ਰ, ਯਂਤ੍ਰ, ਮਹਾਮ੍ਰੁਤ੍ਯੁਨ੍ਜਯ ਅਸਾਧ੍ਯ ਰੋਗੋਂ ਅਕਾਲ ਮ੍ਰੁਤ੍ਯੁ ਸੇ ਮੁਕ੍ਤਿ, ਕਵਚ, ਮਨ੍ਤ੍ਰ, ਮਂਤ੍ਰ, মহামৃত্যুংজয অকাল মৃত্যু এৱং অসাধ্য রোগোং সে মুক্তি, যন্ত্র, যংত্র, মহামৃত্যুন্জয অসাধ্য রোগোং অকাল মৃত্যু সে মুক্তি, কৱচ, মন্ত্র, মংত্র, mahAmRutyuMjay akAl mRutyu evaM asAdhy rogoM se mukti, yantr, yaMtr, mahAmRutyunjay asAdhy rogoM akAl mRutyu se mukti, kavac, mantr, maMtr, ମହାମୃତ୍ଯୁଂଜଯ ଅକାଲ ମୃତ୍ଯୁ ଏବଂ ଅସାଧ୍ଯ ରୋଗୋଂ ସେ ମୁକ୍ତି, ଯନ୍ତ୍ର, ଯଂତ୍ର, ମହାମୃତ୍ଯୁନ୍ଜଯ ସାଧ୍ଯ ରୋଗୋଂ ଅକାଲ ମୃତ୍ଯୁ ସେ ମୁକ୍ତି, କବଚ, ମନ୍ତ୍ର, ମଂତ୍ର,
ମହାମୃତ୍ୟୁନ୍ଜୟ ଅକାଲ ମୃତ୍ୟୁ ଏବଂ ଅସାଧ୍ଯ ରୋଗ ରୁ ମୁକ୍ତି mahamrutyunjay akala mrutyu evam asadhy rogon se mukti, yantr, yantr, mahamrutyunjay asadhy rogon akal mrutyu se mukti, kavac, mantr, maMtr, maha mrutyunjay roga nidana, maha mrutyunjay roga nivarana, maha mrutyunjay roga, maha mrutyunjay svasthya, maha mrutyunjay va rogake samaya kA gnna, maha mrutyunjay prabhava aura roga, roga ke prabhava ka maha mrutyunjay se nivaaran,maha mrutyunjay roga Shanti ke upaya, maha mrutyunjay roga Shanti, maha mrutyunjay roga nivarana, Healing maha mrutyunjay, maha mrutyunjay prevention, maha mrutyunjay disease, maha mrutyunjay disease, maha mrutyunjay and Arogce time, knowledge of planetary effects on the body part and disease, maha mrutyunjay while the impact of disease, maha mrutyunjay and disease of peace Measures, disease, maha mrutyunjay peace, maha mrutyunjay disease prevention

मानव शरीर में जो भी रोग उत्पन्न होते हैं उसके बारे में शास्त्रो में जो उल्लेख हैं वह इस प्रकार हैं
"शरीरं व्याधिमंदिरम्" अर्थात् ब्रह्मांड के पंच तत्वों से उत्पन्न शरीर में समय के अंतराल पर नाना प्रकार की आधि-व्यघि पीडा़ए उत्पन्न होती रहती हैं।

ज्योतिष शास्त्र एवं आयुर्वेद के अनुसार मनुष्य द्वारा पूर्वकाल में किये गयें कर्मो का फल ही व्यक्ति के शरीर में विभिन्न रोगों के रूप में प्रगट होतें हैं।

हरित सहिंता के अनुशार:
जन्मान्तर कृतम् पापम् व्याधिरुपेण बाधते।
तच्छान्तिरौषधैर्दानर्जपहोमसुरार्चनैः॥
अर्थातः पूर्व जन्म में किये गये पाप कर्म ही व्याधि के रूप में हमारे शरीर में उत्पन्न हो कर कष्टकारी हो जाता हैं। तथा औषध, दान, जप, होम व देवपूजा से रोग की शांति होती हैं।

शास्त्रोक्त विधान के अनुशार देवी भगवती ने भगवान शिव से कहा कि, हे देव! आप मुझे मृत्यु से रक्षा करने वाला और सभी प्रकार के अशुभों का नाश करने वाल कवच बतलाईये? तब शिवजी ने महामृत्युंजय कवच ……………..>>


अमोद्य् महामृत्युंजय कवच व उल्लेखित अन्य सामग्रीयों को शास्त्रोक्त विधि-विधान से विद्वान ब्राह्मणो द्वारा सवा लाख महामृत्युंजय मंत्र जप एवं दशांश हवन द्वारा निर्मित कवच अत्यंत प्रभावशाली होता हैं।
अमोद्य महामृत्युंजय कवच धारण कर अन्य सामग्री को अपने पूजा स्थान में स्थापित ……………..>>
मृत्यु पर विजय प्राप्त करने के कारण ही इस मंत्र को मृत्युंजय कहा जाता है। महामृत्यंजय मंत्र की महिमा का वर्णन शिव पुराण, काशीखंड और महापुराण ……………..>>


महामृत्युंजय मंत्र का महत्व:
मृत्युर्विनिर्जितो यस्मात् तस्मान्मृत्युंजय: स्मृत: या मृत्युंजयति इति मृत्युंजय,
अर्थात: जो मृत्यु को जीत ले, उसे ही मृत्युंजय कहा जाता है।

मंत्र जप के लिए विशेष:
यः शास्त्रविधि मृत्सृज्य वर्तते काम कारतः। न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परांगतिम्॥ (श्रीमद् भगवद् गीता:षोडशोऽध्याय)
भावार्थ : जो पुरुष शास्त्र विधि को त्यागकर अपनी इच्छा से मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि को प्राप्त होता है, न परमगति को और न सुख को ही॥23॥

ज्योतिषशास्त्र के अनुशार दुख, विपत्ति या मृत्य के प्रदाता एवं निवारण के देवता शनिदेव हैं, क्योकि शनि व्यक्ति के कर्मो के अनुरुप व्यक्ति को फल प्रदान करते हैं। शास्त्रो के अनुशार मार्कण्डेय ऋषि का जीवन अत्यंत अल्प था, परंतु महामृत्युंजय मंत्र के जप से शिव कृपा प्राप्त कर उन्हें चिरंजीवी ……………..>>


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शुक्रवार, जुलाई 01, 2011

गुरुत्व ज्योतिष ई पत्रीका जूलाई 2011 में प्रकशित लेख


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विशेष लेख
गुरु प्रार्थना
5
जब दुर्वासाजी ने श्री कृष्ण की परिक्षाली।
7
गुरुमंत्र के प्रभाव से ईष्ट दर्शन
11
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गुरुमंत्र के जप से अलौकिक सिद्धिया प्राप्त होती हैं
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रुद्राभिषेक से कामनापूर्ति
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रुद्राभिषेकस्तोत्र
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सोमवार को शिवपूजन का महत्व क्या हैं?
36
शिव कृपा हेतु उत्तम श्रावण मास
37
श्रावण मास के सोमवार व्रत से भौतिक कष्टो से मुक्ति मिलती हैं
40
आध्यात्मिक उन्नति हेतु उत्तम चातुर्मास व्रत
41
क्यों शिव को प्रिय हैं बेल पत्र?
43
श्रावण सोमवार व्रत कैसे करें?
45
रुद्राक्ष धारण से कामनापूर्ति
46
एक मुखी से 12 मुखी रुद्राक्ष धारण करने के लाभ
48
चातुर्मास में मांगलिक कार्य वर्जित हैं।
50
अनुक्रम
संपादकीय
4
गुर्वष्टकम्
6
श्रीकृष्ण बीसा यंत्र
10
श्री गुरु स्तोत्रम्
31
हस्तरेखा ज्ञान
32
सर्व कार्य सिद्धि कवच
51
राम रक्षा यंत्र
42
विद्या प्राप्ति हेतु सरस्वती कवच और यंत्र
53
मंत्र सिद्ध पन्ना गणेश
53
मंत्र सिद्ध सामग्री
54
मासिक राशि फल
57
राशि रत्न
61
जुलाई 2011 मासिक पंचांग
60
जुलाई -2011 मासिक व्रत-पर्व-त्यौहार
64
मंत्र सिद्ध सामग्री
67
जुलाई 2011 -विशेष योग
68
दैनिक शुभ एवं अशुभ समय ज्ञान तालिका
68
दिन-रात के चौघडिये
69
दिन-रात कि होरा सूर्योदय से सूर्यास्त तक
70
ग्रह चलन जुलाई -2011
71
सर्व रोगनाशक यंत्र/कवच
72
मंत्र सिद्ध कवच
74
YANTRA LIST
75
GEM STONE
77
BOOK PHONE/ CHAT CONSULTATION
78
सूचना
79
हमारा उद्देश्य
81



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सोमवार, जून 13, 2011

महाकाल शनि मृत्युंजय स्तोत्र

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महाकाल शनि मृत्युंजय स्तोत्र
लेख साभार: गुरुत्व ज्योतिष पत्रिका (जून-2011)
महाकाल शनि मृत्युंजय स्तोत्र

विनियोगः-
ॐ अस्य श्री महाकाल शनि मृत्युञ्जय स्तोत्र मन्त्रस्य पिप्लाद ऋषिरनुष्टुप्छन्दो महाकाल शनिर्देवता शं बीजं मायसी शक्तिः काल पुरुषायेति कीलकं मम अकाल अपमृत्यु निवारणार्थे पाठे विनियोगः।
श्री गणेशाय नमः।

ॐ महाकाल शनि मृत्युञ्जायाय नमः।
नीलाद्रीशोभाञ्चितदिव्यमूर्तिः खड्गो त्रिदण्डी शरचापहस्तः।
शम्भुर्महाकालशनिः पुरारिर्जयत्यशेषासुरनाशकारी ।।१
मेरुपृष्ठे समासीनं सामरस्ये स्थितं शिवम् ।
प्रणम्य शिरसा गौरी पृच्छतिस्म जगद्धितम् ।।२
।।पार्वत्युवाच।।
भगवन् ! देवदेवेश ! भक्तानुग्रहकारक ! ।
अल्पमृत्युविनाशाय यत्त्वया पूर्व सूचितम् ।।३।।
तदेवत्वं महाबाहो ! लोकानां हितकारकम् ।
तव मूर्ति प्रभेदस्य महाकालस्य साम्प्रतम् ।।४
शनेर्मृत्युञ्जयस्तोत्रं ब्रूहि मे नेत्रजन्मनः ।
अकाल मृत्युहरणमपमृत्यु निवारणम् ।।५
शनिमन्त्रप्रभेदा ये तैर्युक्तं यत्स्तवं शुभम् ।
प्रतिनाम चथुर्यन्तं नमोन्तं मनुनायुतम् ।।६
।।श्रीशंकर उवाच।।
नित्ये प्रियतमे गौरि सर्वलोक-हितेरते ।
गुह्याद्गुह्यतमं दिव्यं सर्वलोकोपकारकम् ।।७
शनिमृत्युञ्जयस्तोत्रं प्रवक्ष्यामि तवऽधुना ।
सर्वमंगलमांगल्यं सर्वशत्रु विमर्दनम् ।।८
सर्वरोगप्रशमनं सर्वापद्विनिवारणम् ।
शरीरारोग्यकरणमायुर्वृद्धिकरं नृणाम् ।।९
यदि भक्तासि मे गौरी गोपनीयं प्रयत्नतः ।
गोपितं सर्वतन्त्रेषु तच्छ्रणुष्व महेश्वरी ! ।।१०
ऋषिन्यासं करन्यासं देहन्यासं समाचरेत् ।
महोग्रं मूर्घ्नि विन्यस्य मुखे वैवस्वतं न्यसेत् ।।११
गले तु विन्यसेन्मन्दं बाह्वोर्महाग्रहं न्यसेत् ।
हृदि न्यसेन्महाकालं गुह्ये कृशतनुं न्यसेत् ।।१२
जान्वोम्तूडुचरं न्यस्य पादयोस्तु शनैश्चरम्।
एवं न्यासविधि कृत्वा पश्चात् कालात्मनः शनेः ।।१३
न्यासं ध्यानं प्रवक्ष्यामि तनौ श्यार्वा पठेन्नरः ।
कल्पादियुगभेदांश्च करांगन्यासरुपिणः ।।१४
कालात्मनो न्यसेद् गात्रे मृत्युञ्जय ! नमोऽस्तु ते ।
मन्वन्तराणि सर्वाणि महाकालस्वरुपिणः ।।१५
भावयेत्प्रति प्रत्यंगे महाकालाय ते नमः ।
भावयेत्प्रभवाद्यब्दान् शीर्षे कालजिते नमः ।।१६
नमस्ते नित्यसेव्याय विन्यसेदयने भ्रुवोः ।
सौरये च नमस्तेऽतु गण्डयोर्विन्यसेदृतून् ।।१७
श्रावणं भावयेदक्ष्णोर्नमः कृष्णनिभाय च ।
महोग्राय नमो भार्दं तथा श्रवणयोर्न्यसेत् ।।१८
नमो वै दुर्निरीक्ष्याय चाश्विनं विन्यसेन्मुखे ।
नमो नीलमयूखाय ग्रीवायां कार्तिकं न्यसेत् ।।१९
मार्गशीर्ष न्यसेद्-बाह्वोर्महारौद्राय ते नमः ।
ऊर्द्वलोक-निवासाय पौषं तु हृदये न्यसेत् ।।२०
नमः कालप्रबोधाय माघं वै चोदरेन्यसेत् ।
मन्दगाय नमो मेढ्रे न्यसेर्द्वफाल्गुनं तथा ।।२१
ऊर्वोर्न्यसेच्चैत्रमासं नमः शिवोस्भवाय च ।
वैशाखं विन्यसेज्जान्वोर्नमः संवर्त्तकाय च ।।२२
जंघयोर्भावयेज्ज्येष्ठं भैरवाय नमस्तथा ।
आषाढ़ं पाद्योश्चैव शनये च नमस्तथा ।।२३
कृष्णपक्षं च क्रूराय नमः आपादमस्तके ।
न्यसेदाशीर्षपादान्ते शुक्लपक्षं ग्रहाय च ।।२४
नयसेन्मूलं पादयोश्च ग्रहाय शनये नमः ।
नमः सर्वजिते चैव तोयं सर्वांगुलौ न्यसेत् ।।२५
न्यसेद्-गुल्फ-द्वये विश्वं नमः शुष्कतराय च ।
विष्णुभं भावयेज्जंघोभये शिष्टतमाय ते ।।२६
जानुद्वये धनिष्ठां च न्यसेत् कृष्णरुचे नमः ।
ऊरुद्वये वारुर्णांन्यसेत्कालभृते नमः ।।२७
पूर्वभाद्रं न्यसेन्मेढ्रे जटाजूटधराय च ।
पृष्ठउत्तरभाद्रं च करालाय नमस्तथा ।।२८
रेवतीं च न्यसेन्नाभो नमो मन्दचराय च ।
गर्भदेशे न्यसेद्दस्त्रं नमः श्यामतराय च ।।२९
नमो भोगिस्त्रजे नित्यं यमं स्तनयुगे न्यसेत् ।
न्येसत्कृत्तिकां हृदये नमस्तैलप्रियाय च ।।३०
रोहिणीं भावयेद्धस्ते नमस्ते खड्गधारीणे ।
मृगं न्येसतद्वाम हस्ते त्रिदण्डोल्लसिताय च ।।३१
दक्षोर्द्ध्व भावयेद्रौद्रं नमो वै बाणधारिणे ।
पुनर्वसुमूर्द्ध्व नमो वै चापधारिणे ।।३२
तिष्यं न्यसेद्दक्षबाहौ नमस्ते हर मन्यवे ।
सार्पं न्यसेद्वामबाहौ चोग्रचापाय ते नमः ।।३३
मघां विभावयेत्कण्ठे नमस्ते भस्मधारिणे ।
मुखे न्यसेद्-भगर्क्ष च नमः क्रूरग्रहाय च ।।३४
भावयेद्दक्षनासायामर्यमाणश्व योगिने ।
भावयेद्वामनासायां हस्तर्क्षं धारिणे नमः ।।३५
त्वाष्ट्रं न्यसेद्दक्षकर्णे कृसरान्न प्रियाय ते ।
स्वातीं न्येसद्वामकर्णे नमो बृह्ममयाय ते ।।३६
विशाखां च दक्षनेत्रे नमस्ते ज्ञानदृष्टये ।
विष्कुम्भं भावयेच्छीर्षेसन्धौ कालाय ते नमः ।।३७
प्रीतियोगं भ्रुवोः सन्धौ महामन्दं ! नमोऽस्तु ते ।
नेत्रयोः सन्धावायुष्मद्योगं भीष्माय ते नमः ।।३८
सौभाग्यं भावयेन्नासासन्धौ फलाशनाय च ।
शोभनं भावयेत्कर्णे सन्धौ पिण्यात्मने नमः ।।३९
नमः कृष्णयातिगण्डं हनुसन्धौ विभावयेत् ।
नमो निर्मांसदेहाय सुकर्माणं शिरोधरे ।।४०
धृतिं न्यसेद्दक्षवाहौ पृष्ठे छायासुताय च ।
तन्मूलसन्धौ शूलं च न्यसेदुग्राय ते नमः ।।४१
तत्कूर्परे न्यसेदगण्डे नित्यानन्दाय ते नमः ।
वृद्धिं तन्मणिबन्धे च कालज्ञाय नमो न्यसेत् ।।४२
ध्रुवं तद्ङ्गुली-मूलसन्धौ कृष्णाय ते नमः ।
व्याघातं भावयेद्वामबाहुपृष्ठे कृशाय च ।।४३
हर्षणं तन्मूलसन्धौ भुतसन्तापिने नमः ।
तत्कूर्परे न्यसेद्वज्रं सानन्दाय नमोऽस्तु ते ।।४४
सिद्धिं तन्मणिबन्धे च न्यसेत् कालाग्नये नमः ।
व्यतीपातं कराग्रेषु न्यसेत्कालकृते नमः ।।४५
वरीयांसं दक्षपार्श्वसन्धौ कालात्मने नमः ।
परिघं भावयेद्वामपार्श्वसन्धौ नमोऽस्तु ते ।।४६
न्यसेद्दक्षोरुसन्धौ च शिवं वै कालसाक्षिणे ।
तज्जानौ भावयेत्सिद्धिं महादेहाय ते नमः ।।४७
साध्यं न्यसेच्च तद्-गुल्फसन्धौ घोराय ते नमः ।
न्यसेत्तदंगुलीसन्धौ शुभं रौद्राय ते नमः ।।४८
न्यसेद्वामारुसन्धौ च शुक्लकालविदे नमः ।
ब्रह्मयोगं च तज्जानो न्यसेत्सद्योगिने नमः ।।४९
ऐन्द्रं तद्-गुल्फसन्धौ च योगाऽधीशाय ते नमः ।
न्यसेत्तदंगुलीसन्धौ नमो भव्याय वैधृतिम् ।।५०
चर्मणि बवकरणं भावयेद्यज्वने नमः ।
बालवं भावयेद्रक्ते संहारक ! नमोऽस्तु ते ।।५१
कौलवं भावयेदस्थ्नि नमस्ते सर्वभक्षिणे ।
तैत्तिलं भावयेन्मसि आममांसप्रियाय ते ।।५२
गरं न्यसेद्वपायां च सर्वग्रासाय ते नमः ।
न्यसेद्वणिजं मज्जायां सर्वान्तक ! नमोऽस्तु ते ।।५३
विर्येविभावयेद्विष्टिं नमो मन्यूग्रतेजसे ।
रुद्रमित्र ! पितृवसुवारीण्येतांश्च पञ्च च ।।५४
मुहूर्तांश्च दक्षपादनखेषु भावयेन्नमः ।
खगेशाय च खस्थाय खेचराय स्वरुपिणे ।।५५
पुरुहूतशतमखे विश्ववेधो-विधूंस्तथा ।
मुहूर्तांश्च वामपादनखेषु भावयेन्नमः ।।५६
सत्यव्रताय सत्याय नित्यसत्याय ते नमः ।
सिद्धेश्वर ! नमस्तुभ्यं योगेश्वर ! नमोऽस्तु ते ।।५७
वह्निनक्तंचरांश्चैव वरुणार्यमयोनकान् ।
मुहूर्तांश्च दक्षहस्तनखेषु भावयेन्नमः ।।५८
लग्नोदयाय दीर्घाय मार्गिणे दक्षदृष्टये ।
वक्राय चातिक्रूराय नमस्ते वामदृष्टये ।।५९
वामहस्तनखेष्वन्त्यवर्णेशाय नमोऽस्तु ते ।
गिरिशाहिर्बुध्न्यपूषाजपष्द्दस्त्रांश्च भावयेत् ।।६०
राशिभोक्त्रे राशिगाय राशिभ्रमणकारिणे ।
राशिनाथाय राशीनां फलदात्रे नमोऽस्तु ते ।।६१
यमाग्नि-चन्द्रादितिजविधातृंश्च विभावयेत् ।
ऊर्द्ध्व-हस्त-दक्षनखेष्वत्यकालाय ते नमः ।।६२
तुलोच्चस्थाय सौम्याय नक्रकुम्भगृहाय च ।
समीरत्वष्टजीवांश्च विष्णु तिग्म द्युतीन्नयसेत् ।।६३
ऊर्ध्व-वामहस्त-नखेष्वन्यग्रह निवारिणे ।
तुष्टाय च वरिष्ठाय नमो राहुसखाय च ।।६४
रविवारं ललाटे च न्यसेद्-भीमदृशे नमः ।
सोमवारं न्यसेदास्ये नमो मृतप्रियाय च ।।६५
भौमवारं न्यसेत्स्वान्ते नमो ब्रह्म-स्वरुपिणे ।
मेढ्रं न्यसेत्सौम्यवारं नमो जीव-स्वरुपिणे ।।६६
वृषणे गुरुवारं च नमो मन्त्र-स्वरुपिणे ।
भृगुवारं मलद्वारे नमः प्रलयकारिणे ।।६७
पादयोः शनिवारं च निर्मांसाय नमोऽस्तु ते ।
घटिका न्यसेत्केशेषु नमस्ते सूक्ष्मरुपिणे ।।६८
कालरुपिन्नमस्तेऽस्तु सर्वपापप्रणाशकः !।
त्रिपुरस्य वधार्थांय शम्भुजाताय ते नमः ।।६९
नमः कालशरीराय कालनुन्नाय ते नमः ।
कालहेतो ! नमस्तुभ्यं कालनन्दाय वै नमः ।।७०
अखण्डदण्डमानाय त्वनाद्यन्ताय वै नमः ।
कालदेवाय कालाय कालकालाय ते नमः ।।७१
निमेषादिमहाकल्पकालरुपं च भैरवम् ।
मृत्युञ्जयं महाकालं नमस्यामि शनैश्चरम् ।।७२
दातारं सर्वभव्यानां भक्तानामभयंकरम् ।
मृत्युञ्जयं महाकालं नमस्यामि शनैश्चरम् ।।७३
कर्त्तारं सर्वदुःखानां दुष्टानां भयवर्धनम् ।
मृत्युञ्जयं महाकालं नमस्यामि शनैश्चरम् ।।७४
हर्त्तारं ग्रहजातानां फलानामघकारिणाम् ।
मृत्युञ्जयं महाकालं नमस्यामि शनैश्चरम् ।।७५
सर्वेषामेव भूतानां सुखदं शान्तमव्ययम् ।
मृत्युञ्जयं महाकालं नमस्यामि शनैश्चरम् ।।७६
कारणं सुखदुःखानां भावाऽभाव-स्वरुपिणम् ।
मृत्युञ्जयं महाकालं नमस्यामि शनैश्चरम् ।।७७
अकाल-मृत्यु-हरणऽमपमृत्यु निवारणम् ।
मृत्युञ्जयं महाकालं नमस्यामि शनैश्चरम् ।।७८
कालरुपेण संसार भक्षयन्तं महाग्रहम् ।
मृत्युञ्जयं महाकालं नमस्यामि शनैश्चरम् ।।७९
दुर्निरीक्ष्यं स्थूलरोमं भीषणं दीर्घ-लोचनम् ।
मृत्युञ्जयं महाकालं नमस्यामि शनैश्चरम् ।।८०
ग्रहाणां ग्रहभूतं च सर्वग्रह-निवारणम् ।
मृत्युञ्जयं महाकालं नमस्यामि शनैश्चरम् ।।८१
कालस्य वशगाः सर्वे न कालः कस्यचिद्वशः ।
तस्मात्त्वां कालपुरुषं प्रणतोऽस्मि शनैश्चरम् ।।८२
कालदेव जगत्सर्वं काल एव विलीयते ।
कालरुपं स्वयं शम्भुः कालात्मा ग्रहदेवता ।।८३
चण्डीशो रुद्रडाकिन्याक्रान्तश्चण्डीश उच्यते ।
विद्युदाकलितो नद्यां समारुढो रसाधिपः ।।८४
चण्डीशः शुकसंयुक्तो जिह्वया ललितः पुनः ।
क्षतजस्तामसी शोभी स्थिरात्मा विद्युता युतः ।।८५
नमोऽन्तो मनुरित्येष शनितुष्टिकरः शिवे ।
आद्यन्तेऽष्टोत्तरशतं मनुमेनं जपेन्नरः ।।८६
यः पठेच्छ्रणुयाद्वापि ध्यात्त्वा सम्पूज्य भक्तितः ।
त्रस्य मृत्योर्भयं नैव शतवर्षावधिप्रिये !।।८७
ज्वराः सर्वे विनश्यन्ति दद्रु-विस्फोटकच्छुकाः ।
दिवा सौरिं स्मरेत् रात्रौ महाकालं यजन् पठेत ।।८८
जन्मर्क्षे च यदा सौरिर्जपेदेतत्सहस्त्रकम् ।
वेधगे वामवेधे वा जपेदर्द्धसहस्त्रकम् ।।८९
द्वितीये द्वादशे मन्दे तनौ वा चाष्टमेऽपि वा ।
तत्तद्राशौ भवेद्यावत् पठेत्तावद्दिनावधि ।।९०
चतुर्थे दशमे वाऽपि सप्तमे नवपञ्चमे ।
गोचरे जन्मलग्नेशे दशास्वन्तर्दशासु च ।।९१
गुरुलाघवज्ञानेन पठेदावृत्तिसंख्यया ।
शतमेकं त्रयं वाथ शतयुग्मं कदाचन ।।९२
आपदस्तस्य नश्यन्ति पापानि च जयं भवेत् ।
महाकालालये पीठे ह्यथवा जलसन्निधौ ।।९३
पुण्यक्षेत्रेऽश्वत्थमूले तैलकुम्भाग्रतो गृहे ।
नियमेनैकभक्तेन ब्रह्मचर्येण मौनिना ।।९४
श्रोतव्यं पठितव्यं च साधकानां सुखावहम् ।
परं स्वस्त्ययनं पुण्यं स्तोत्रं मृत्युञ्जयाभिधम् ।।९५
कालक्रमेण कथितं न्यासक्रम समन्वितम् ।
प्रातःकाले शुचिर्भूत्वा पूजायां च निशामुखे ।।९६
पठतां नैव दुष्टेभ्यो व्याघ्रसर्पादितो भयम् ।
नाग्नितो न जलाद्वायोर्देशे देशान्तरेऽथवा ।।९७
नाऽकाले मरणं तेषां नाऽपमृत्युभयं भवेत् ।
आयुर्वर्षशतं साग्रं भवन्ति चिरजीविनः ।।९८
नाऽतः परतरं स्तोत्रं शनितुष्टिकरं महत् ।
शान्तिकं शीघ्रफलदं स्तोत्रमेतन्मयोदितम् ।।९९
तस्मात्सर्वप्रयत्नेन यदीच्छेदात्मनो हितम् ।
कथनीयं महादेवि ! नैवाभक्तस्य कस्यचित् ।।१००
।। इति मार्तण्ड-भैरव-तन्त्रे महाकाल-शनि-मृत्युञ्जय-स्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।