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सोमवार, अगस्त 02, 2010

शिव कृपा हेतु उत्तम श्रावण मास

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शिव कृपा हेतु उत्तम श्रावण मास


भारत वर्ष में अनादिकाल से विभिन्न पर्व मनाये जाते हैं, एवं भगवान शिव से संबंधी अनेक व्रत-त्यौहात मनाए जाते रहे हैं। इन उतसवो में श्रावण मास का अपना विशेष महत्व हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुशार श्रावण मास में चार सोमवार (कभी-कभी पांच सोमवार होते हैं) , एक प्रदोष व्रत तथा एक शिवरात्रि शामिल होत हैं इन सबका संयोग एकसाथ श्रावण महीने में होता हैं, इसलिए श्रावण का महीना शिव कृपा हेतु शीघ्र शुभ फल देने वाला मानागया हैं।

शिवपुराण के अनुशार श्रावण माह में द्वादश ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने से समस्त तीर्थों के दर्शन का पूण्य एक साथ हि प्राप्त हो जाता हैं।

पद्म पुराण के अनुशार श्रावण माह में द्वादश ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने से मनुष्य कि समस्त शुभ कामनाएं पूर्ण होती हैं एवं उसे संसार के समस्त सुखों कि प्ताप्ति होकर उसे शिव कृपा से मोक्ष कि प्राप्ति हो जाती हैं।

• प्रथम सोमवार को- कच्चे चावल एक मुट्ठी शिव लिंग पर चढाया जाता हैं।
• दूसरे सोमवार को- सफेद तिल्ली एक मुट्ठी शिव लिंग पर चढाया जाता हैं।
• तीसरे सोमवार को- ख़ड़े मूँग एक मुट्ठी शिव लिंग पर चढाया जाता हैं।
• चौथे सोमवार को- जौ एक मुट्ठी शिव लिंग पर चढाया जाता हैं।
• यदि पाँचवाँ सोमवार आए तो एक मुट्ठी कच्चा सत्तू चढाया जाता हैं।

शिव की पूजा में बिल्वपत्र अधिक महत्व रखता है। शिव द्वारा विषपान करने के कारण शिव के मस्तक पर जल की धारा से जलाभिषेक शिव भक्तों द्वारा किया जाता है। शिव भोलेनाथ ने गंगा को शिरोधार्य किया है।

श्रावण मास में शिवपुराण, शिवलीलामृत, शिव कवच, शिव चालीसा, शिव पंचाक्षर मंत्र, शिव पंचाक्षर स्तोत्र, महामृत्युंजय मंत्र का पाठ एवं जाप करना विशेष लाभ प्रद होता हैं।

शिव उपासना का महत्व

SHIV UPASNA KA MAHATVA

शिव उपासना का महत्व


भगवान शिव का सतो गुण, रजो गुण, तमो गुण तीनों पर एक समान अधिकार हैं। शिवने अपने मस्तक पर चंद्रमा को धारण कर शशि शेखर कहलाये हैं। चंद्रमा से शिव को विशेष स्नेह होने के कारण चंद्र सोमवार का अधिपति हैं इस लिये शिव का प्रिय वार सोमवार हैं। शिव कि पूजा-अर्चना के लिये सोमवार के दिन करने का विशेष महत्व हैं, इस दिन व्रत रखने से या शिव लिंग पर अभिषेक करने से शिवकी विशेष कृपा प्राप्त होती हैं।

सभी सोमवार शिव को प्रिय हैं, परंतु पूरे श्रावण मास के सभी सोमवार को किये गये व्रत-पूजा अर्चना अभिषेक पूरे वर्ष किये गये व्रत के समान फल प्रदान करने वाली होती हैं।

शिव को श्रावण मास इस लिये अधिक प्रिय हैं क्योकि श्रावण मास में वातावरण में जल तत्व कि अधिकता होती हैं एवं चंद्र जलतत्व का अधिपती ग्रह हैं। जो शिव के मस्तक पर सुशोभित हैं।

शिव उपासना के विभिन्न रूप वेदों में वर्णित हैं। शिव मंत्र उपासना में पंचाक्षरी "नम: शिवाय" या "ॐ नम: शिवाय" और महामृत्युंजय इत्यादि मंत्रों के जप का भी श्रावण मास में विशेष महत्व हैं, श्रावण मास में किय गये मंत्र जाप कई गुना अधिक प्रभाव शाली सिद्ध होते देखे गये हैं। जहा शिव पंचाक्षरी मंत्र मनुष्य को समस्त भौतिक सुख साधनो कि प्राप्ति हेतु विशेष लाभकारी हैं, वहीं महामृत्युंजय मंत्र के जप से मनुष्य के सभी प्रकार के मृत्यु भय-रोग-कष्ट-दरिद्रता दूर होकर उसे दीर्घायु की प्राप्ति होती हैं। महामृत्युंजय मंत्र, रूद्राभिषेक आदि का सामुहिक अनुष्ठान करने से अतिवृष्टि, अनावृष्टि एवं महामारी आदि से रक्षा होती हैं एवं अन्य सभी प्रकार के उपद्रवों की शांति होती हैं।

शिव महत्व

SHIV MAHATVA,

शिव महत्व


धर्म शास्त्रो में भगवान शिव को जगत पिता बताया गया हैं। क्योकि भगवान शिव सर्वव्यापी एवं पूर्ण ब्रह्म हैं। हिंदू संस्कृति में शिव को मनुष्य के कल्याण का प्रतीक माना जाता हैं। शिव शब्द के उच्चारण या ध्यान मात्र से ही मनुष्य को परम आनंद प्रदान करता हैं। भगवान शिव भारतीय संस्कृति को दर्शन ज्ञान के द्वारा संजीवनी प्रदान करने वाले देव हैं। इसी कारण अनादि काल से भारतीय धर्म साधना में निराकार रूप में होते हुवे भी शिवलिंग के रूप में साकार मूर्ति की पूजा होती हैं। देश-विदेश में भगवान शिव के मंदिर हर छोटे-बडे शहर एवं कस्बो में मोजुद हैं, जो भगवान महादेव की व्यापकता को एवं उनके भक्तो कि आस्था को प्रकट करते हैं।

भगवान शिव एक मात्र एसे देव हैं जिसे भोले भंडारी कहा जाता हैं, भगवान शिव थोङी सी पूजा-अर्चना से ही वह प्रसन्न हो जाते हैं। मानव जाति की उत्पत्ति भी भगवान शिव से मानी जाती हैं। अतः भगवान शिव के स्वरूप को जानना प्रत्येक शिव भक्त के लिए परम आवश्यक हैं। भगवान भोले नाथ ने समुद्र मंथन से निकले हुए समग्र विष को अपने कंठ में धारण कर वह नीलकंठ कहलाये।

सोमवार, जुलाई 26, 2010

वैद्यनाथ अष्टकम्

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पोस्ट सौजन्य: स्वस्तिक

॥वैद्यनाथाष्टकम्॥

श्रीरामसौमित्रिजटायुवेद षडाननादित्य कुजार्चिताय।
श्रीनीलकण्ठाय दयामयाय श्रीवैद्यनाथाय नमःशिवाय॥१॥

गङ्गाप्रवाहेन्दु जटाधराय त्रिलोचनाय स्मर कालहन्त्रे।
समस्त देवैरभिपूजिताय श्रीवैद्यनाथाय नमः शिवाय॥२॥

भक्तःप्रियाय त्रिपुरान्तकाय पिनाकिने दुष्टहराय नित्यम्।
प्रत्यक्षलीलाय मनुष्यलोके श्रीवैद्यनाथाय नमः शिवाय॥३॥

प्रभूतवातादि समस्तरोग प्रनाशकर्त्रे मुनिवन्दिताय।
प्रभाकरेन्द्वग्नि विलोचनाय श्रीवैद्यनाथाय नमः शिवाय॥४॥

वाक् श्रोत्र नेत्राङ्घ्रि विहीनजन्तोः वाक्श्रोत्रनेत्रांघ्रिसुखप्रदाय।
कुष्ठादिसर्वोन्नतरोगहन्त्रे श्रीवैद्यनाथाय नमः शिवाय॥५॥

वेदान्तवेद्याय जगन्मयाय योगीश्वरद्येय पदाम्बुजाय।
त्रिमूर्तिरूपाय सहस्रनाम्ने श्रीवैद्यनाथाय नमः शिवाय॥६॥

स्वतीर्थमृद्भस्मभृताङ्गभाजां पिशाचदुःखार्तिभयापहाय।
आत्मस्वरूपाय शरीरभाजां श्रीवैद्यनाथाय नमः शिवाय॥७॥
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय स्रक्गन्ध भस्माद्यभिशोभिताय।
सुपुत्रदारादि सुभाग्यदाय श्रीवैद्यनाथाय नमः शिवाय॥८॥
वालाम्बिकेश वैद्येश भवरोगहरेति च।
जपेन्नामत्रयं नित्यं महारोगनिवारणम्॥९॥

॥इति श्री वैद्यनाथाष्टकम्॥

चन्द्रशेखर अष्टकम्

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पोस्ट सौजन्य: स्वस्तिक
॥ चन्द्रशेखराष्टकं ॥

चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर पाहिमाम् ।
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ १॥

रत्नसानुशरासनं रजतादिशृङ्गनिकेतनं
सिञ्जिनीकृतपन्नगेश्वरमच्युताननसायकम् ।
क्षिप्रदघपुरत्रयं त्रिदिवालयैभिवन्दितं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ २॥

पञ्चपादपपुष्पगन्धपदाम्बुजदूयशोभितं
भाललोचनजातपावकदग्धमन्मथविग्रह।म् ।
भस्मदिग्धकलेवरं भवनाशनं भवमव्ययं
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ ३॥

मत्त्वारणमुख्यचर्मकृतोत्तरीमनोहरं
पङ्कजासनपद्मलोचनपुजिताङ्घ्रिसरोरुहम् ।
देवसिन्धुतरङ्गसीकर सिक्तशुभ्रजटाधरं
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ ४॥

यक्षराजसखं भगाक्षहरं भुजङ्गविभूषणं
शैलराजसुता परिष्कृत चारुवामकलेवरम् ।
क्ष्वेडनीलगलं परश्वधधारिणं मृगधारिणं
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ ५॥

कुण्डलीकृतकुण्डलेश्वरकुण्डलं वृषवाहनं
नारदादिमुनीश्वरस्तुतवैभवं भुवनेश्वरम् ।
अन्धकान्धकामा श्रिता मरपादपं शमनान्तकं
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ ६॥

भषजं भवरोगिणामखिलापदामपहारिणं
दक्षयज्ञर्विनाशनं त्रिगुणात्मकं त्रिविलोचनम् ।
भुक्तिमुक्तफलप्रदं सकलाघसङ्घनिवर्हनं
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ ७॥

भक्त वत्सलमचिञ्तं निधिमक्षयं हरिदम्वरं
सर्वभूतपतिं परात्पर प्रमेयमनुत्तमम् ।
सोमवारिज भूहुताशनसोमपानिलखाकृतिं
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ ८॥

विश्वसृष्टिविधालिनं पुनरेव पालनतत्परं
संहरन्तमपि प्रपञ्चम शेषलोकनिवासिनम् ।
क्रिडयन्तमहर्निशं गणनाथयूथ समन्वितं
चन्द्रशेखर चन्द्रशेकर चन्द्रशेकर रक्षमाम् ॥ ९॥

मृत्युभीतमृकण्डसूनुकृतस्तव शिव सन्निधौ
यत्र कुत्र च पठेन्नहि तस्य मृत्युभयं भवेत् ।
पूर्णमायुररोगितामखिलाथ सम्पदमादरं
चन्द्रशेखर एव तस्य ददाति मुक्तिमयत्नतः ॥ १०॥

॥ इति श्री चन्द्रशेखराष्टकम् संपूर्णम् ॥

दरिद्रता निवारक शिव स्तोत्र

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॥दारिद्र्य दहन शिवस्तोत्रं॥

विश्वेश्वराय नरकार्णव तारणाय कणामृताय शशिशेखरधारणाय।
कर्पूरकान्तिधवलाय जटाधराय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय॥१॥

गौरीप्रियाय रजनीशकलाधराय कालान्तकाय भुजगाधिपकङ्कणाय।
गंगाधराय गजराजविमर्दनाय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय॥२॥

भक्तिप्रियाय भवरोगभयापहाय उग्राय दुर्गभवसागरतारणाय।
ज्योतिर्मयाय गुणनामसुनृत्यकाय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय॥३॥

चर्मम्बराय शवभस्मविलेपनाय भालेक्षणाय मणिकुण्डलमण्डिताय।
मंझीरपादयुगलाय जटाधराय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय॥४॥

पञ्चाननाय फणिराजविभूषणाय हेमांशुकाय भुवनत्रयमण्डिताय।
आनन्दभूमिवरदाय तमोमयाय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय॥५॥

भानुप्रियाय भवसागरतारणाय कालान्तकाय कमलासनपूजिताय।
नेत्रत्रयाय शुभलक्षण लक्षिताय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय॥६॥

रामप्रियाय रघुनाथवरप्रदाय नागप्रियाय नरकार्णवतारणाय।
पुण्येषु पुण्यभरिताय सुरार्चिताय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय॥७॥

मुक्तेश्वराय फलदाय गणेश्वराय गीतप्रियाय वृषभेश्वरवाहनाय।
मातङ्गचर्मवसनाय महेश्वराय दारिद्र्य दुःखदहनाय नमः शिवाय॥८॥

वसिष्ठेन कृतं स्तोत्रं सर्वरोगनिवारणं। सर्वसंपत्करं शीघ्रं पुत्रपौत्रादिवर्धनम्।
त्रिसंध्यं यः पठेन्नित्यं स हि स्वर्गमवाप्नुयात्॥९॥

॥इति वसिष्ठ विरचितं दारिद्र्यदहनशिवस्तोत्रं सम्पूर्णम्॥

फल: एसा शास्रोक्त वचन हैं जो व्यक्ति श्रद्धा भाव से तीनोकाल सुबह, संध्या एवं रात्री के समय दारिद्र्य दहन शिवस्तोत्रं का पाठ करते उनके दुख एवं सर्व रोग का निवारण होकर उसे, संपत्ति एवं संतान लाभ प्राप्त होता हैं।

शिव अष्टकम्

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शिवाष्टकं

प्रभुं प्राणनाथं विभुं विश्वनाथं जगन्नाथनाथं सदानन्दभाजाम् ।
भवद्भव्यभूतेश्वरं भूतनाथं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ १॥

गले रुण्डमालं तनौ सर्पजालं महाकालकालं गणेशाधिपालम् ।
जटाजूटभङ्गोत्तरङ्गैर्विशालं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ २॥

मुदामाकरं मण्डनं मण्डयन्तं महामण्डल भस्मभूषधरंतम् ।
अनादिह्यपारं महामोहहारं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ३॥

तटाधो निवासं महाट्टाट्टहासं महापापनाशं सदासुप्रकाशम् ।
गिरीशं गणेशं महेशं सुरेशं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ४॥

गिरिन्द्रात्मजासंग्रहीतार्धदेहं गिरौ संस्थितं सर्वदा सन्नगेहम् ।
परब्रह्मब्रह्मादिभिर्वन्ध्यमानं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ५॥

कपालं त्रिशूलं कराभ्यां दधानं पदाम्भोजनम्राय कामं ददानम् ।
बलीवर्दयानं सुराणां प्रधानं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ६॥

शरच्चन्द्रगात्रं गुणानन्द पात्रं त्रिनेत्रं पवित्रं धनेशस्य मित्रम् ।
अपर्णाकलत्रं चरित्रं विचित्रं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ७॥

हरं सर्पहारं चिता भूविहारं भवं वेदसारं सदा निर्विकारम् ।
श्मशाने वदन्तं मनोजं दहन्तं शिवं शङ्करं शम्भुमीशानमीडे ॥ ८॥

स्तवं यः प्रभाते नरः शूलपाणे पठेत् सर्वदा भर्गभावानुरक्तः ।
स पुत्रं धनं धान्यमित्रं कलत्रं विचित्रं समासाद्य मोक्षं प्रयाति ॥ ९॥

॥ इति शिवाष्टकम् संपूर्णम्॥