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गुरुवार, दिसंबर 09, 2010

दांपत्य जीवन में मंगल, गुरु एवं शुक्र का प्रभाव

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दांपत्य जीवन में मंगल, गुरु एवं शुक्र का प्रभाव


किसी भी कुंडली से दांपत्य का विचार करने के लिये मंगल, गुरु एवं शुक्र इन तीनों ग्रहों कि स्थिति और प्रभाव को देखना आवश्य हैं।

वैवाहिक जीवन में गुरु का प्रभाव
• सुखी दांपत्य जीवन के लिये वर-वधू दोनों की कुंडली में गुरु शुभ प्रभाव युक्त होना चाहिये। माना जाता हैं गुरु किशुभ सप्तम भाव पर दृ्ष्टि हों तो वैवाहिक जीवन परेशानियों व दिक्कतों के उपरांत भी दोनों में अलगाव जेसी स्थिति नहीं बनती हैं।
• गुरु का शुभ प्रभाव वर-वधू को एक साथ एवं उनके वैवाहिक जीवन को सुखमय बनाये रखती हैं। गुरु कि शुभता दांपत्य जीवन की बाधाओं को दूर करने के साथ-साथ, संतान का कारक ग्रह माना जाता हैं।
• यदि किसी व्यक्ति कि कुंडली में गुरु पीडित हों तो सबसे पहले तो जातक के विवाह में विलम्ब होता हैं। यदि विवाह हो गया तो संतान प्राप्ति में परेशानियां होती हैं।
• यदी लडके-लडकी किसी कि भी कुंडली में गुरु किसी पाप ग्रह के प्रभाव में हों तो संतान प्राप्ति में बाधाएं आती हैं। यदी गुरु पर पाप प्रभाव हों या गुरु पापी ग्रह की राशि में स्थित हों तो निश्चित रुप से दांपत्य जीवन में अनेक प्रकार की परेशानियां आती हैं।

वैवाहिक जीवन में शुक्र का प्रभाव
• पूर्ण वैवाहिक सुख की प्राप्ति के लिये विवाह और वैवाहिक संबन्धों का कारक ग्रह शुक्र जन्म कुंडली में शुभ प्रभाव में होना अति आवश्यक माना जाता हैं।
• वर-वधू दोनों की कुंडली में शुक्र शुभ प्रभाव युक्त होने पर दांपत्य जीवन में सुखो कि प्राप्ति होती हैं। इसके लिये शुक्र का पूर्ण बली एवं होना भी आवश्यक होता हैं।
• वर-वधू दोनों की कुंडली में शुक्र का किसी भी प्रकार से अशुभ स्थिति में होना पति-पत्नी में से किसी के अपने साथी के अलावा अन्यत्र अवैध संबन्धों कि ओर झुकाव होने के युग बनाता हैं। इसलिये दांपत्य जीवन में सुख प्राप्ति हेतु शुक्र की शुभ स्थिति आवश्यक होती हैं।
• कुंडली में शुक्र यदि स्वयं बली हैं, स्व राशि या उच्च राशि में स्थित तो दांपत्य जीवन में सुखों कि प्राप्ति होती हैं।
• कुंडली में शुक्र यदि केन्द्र या त्रिकोण में हों तो दांपत्य जीवन में सुखों कि प्राप्ति होती हैं।
• कुंडली में शुक्र यदि त्रिक भाव, नीच का अथवा शत्रु भाव में बैठा हों तो जीवन में दांपत्य सुखों में कमी आती हैं।
• कुंडली में शुक्र यदि अस्त अथवा किसी पापी ग्रह से दृ्ष्ट अथवा पापी ग्रह के साथ में बैठा हों तो जीवन में दांपत्य सुखों में कमी आती हैं।
• शुक्र के अशुभ होने पर पति-पत्नी के अलगाव की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती हैं।

वैवाहिक जीवन में मंगल का प्रभाव
विवाह के लिये वर-वधू दोनों की कुंडली मिलन करते समय सबसे पहले मंगल कि स्थिती देखी जाती हैं। देखा जाता हैं कि कहीं जातक मंगली तो नहीं हैं। मंगल किस भाव में स्थित हैं और मंगल किस ग्रहों से द्रष्टि संबन्ध बना रहा हैं। मंगल कि किस ग्रह से युति हैं। इन सभी बातों का सूक्ष्म अध्ययन आवश्यक होता हैं।

मंगल के कारण जन्म कुंडली में मांगलिक योग का निर्माण होता हैं।
• सभी लडके-लडकी विवाह के बाद सुखी दांपत्य जीवन की कामना करते हैं। यदि लडके या लडकी किसी एक कि मांगलिक योग होने से वैवाहिक सुखों में कमी आती हैं।
• जब मंगल कुंण्डली के लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम व द्वादश भाव में स्थित होता हैं तो जातक मांगलिक होता हैं। लेकिन मंगल अन्य भावों में स्थित होने परभी वैवाहिक जीवन के सुख में कमी आने की अनेक संभावनाये होती हैं।
• कुछ विशेष परिस्थिती में कुंडली में मांगलिक योग बनने पर भी इस योग की अशुभता में कमी हो जाती हैं। ऎसे में अधूरी जानकारी के कारण वर-वधू अपने मन में मांगलिक योग से प्राप्त होने वाले अशुभ फलो के कारण भयभीत होते रहते हैं और मंगली दोष को लेकर अनेक प्रकार के भ्रम अपने मन में पाल कर रखते हैं।

विशेष: कृप्या मंगल से संबंधित योग एवं उसके निवारण के उपायो का विस्तृत वर्णन इसी अंक में पृष्ठ नंबर पर आप पढ सकते हैं।

बुधवार, दिसंबर 08, 2010

9- दिसम्बर - 2010 (गणेश चतुर्थी व्रत)

Ganesh haturthi Vrat, 9-December- 2010 विक्रम संवत 2067,  9- दिसम्बर - 2010


9- दिसम्बर - 2010 (गणेश चतुर्थी व्रत)

>> गणेश चतुर्थी व्रत के बारें में अधिक जानकारे हेतु यहां क्लिक करें
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आपका जीवन साथी कहीं नशे का आदी तो नहीं?

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आपका जीवन साथी कहीं नशे का आदी तो नहीं?


भारतीय समाज में नशेको खराब माना गया हैं। क्योकि नशे कि लत या बूरी आदत के कारण व्यक्ति तन, मन, धन, परिवार सब कुछ दाँव पर लगा देने से पीछे नहीं हटता। आज ज्यादातर व्यक्ति किसी न किसी नशे कि लत का शिकार होता हैं।

शौखिया तौर पर शुरु किया गया नशे का अभ्यास समय के साथ-साथ व्यक्ति को लत का शिकार बना देता हैं। जिस्से उसका आने वाला उज्जवल भविष्य नशे के कारण भविष्य के गर्त अंधेरे कि और अग्रस्त कर देता हैं। व्यक्ति के नशे के आदि होने का एक बड़ा कारणा उसके आस-पास का माहौल होता हैं। क्योकि व्यक्ति अपने आसपास में जो महौल देखता हैं उसी महौल के अनुरुप वह ढलने लगता हैं।

जन्म कुंडली में ग्रहों कि स्थिती के अनुशार जातक कि रुचि नशा करने में रहेगी या नहीं। यदि रहेगी तो जातक किस तरह का नशा करेगा। इसका पूर्वानुमान ज्योतिषी संकेतो के आधार पर सरलता से जान सकते हैं। यदि उचित मार्गदर्शन और उचित उपायो से कोई भी माता-पिता या अन्य कोई व्यक्ति अपने स्वजनो को नशेकी लत में पडने से पहले बचा सकता हैं।

• जन्म कुंडली में लग्न में पाप ग्रह स्थित हो तो व्यक्ति किसी ना किसी नशे का शिकार रखता हैं।
• जन्म कुंडली में लग्नेश कमजोर हो कर पाप ग्रह के प्रभाव में हो, तो व्यक्ति नशे का आदि होता हैं।
• जन्म कुंडली में लग्नेश नीच का हो, शत्रु राशि में स्थित हों और चंद्र भी कमजोर हो तो व्यक्ति नशे का आदि होता हैं।
• जन्म कुंडली में लग्नेश पर मंगल का प्रभाव हो तो व्यक्ति कि व्यसन में रुचि रहती हैं।
• जन्म कुंडली में द्वादश (व्यय) भाव पर पाप ग्रह हो, तो व्यक्ति व्यसन में धन व्यय कराता है।
• जन्म कुंडली में बृहस्पति किसी भी भाव में नीच का हो, तो व्यक्ति कि व्यसन में रुचि रहती है।
• जन्म कुंडली में शुक्र-राहु या शुक्र-केतु के साथ स्थित हो और लग्नेश और चंद्र कमजोर हो या पाप प्रभाव में हो, तो व्यक्ति कि व्यसन में रुचि होती हैं।
• जन्म कुंडली में लग्न में शनि हो, शुक्र अष्टम भाव में स्थित होकर शनि से द्दष्ट होने से व्यक्ति अत्याधिक नशे का आदि होता हैं।
• जन्म कुंडली में लग्न पर किसी भी प्रकार से सूर्य की दृष्टि होने पर व्यक्ति को माँस-मदिरा का आदि होता हैं।
• जन्म कुंडली में लग्न पर किसी भी प्रकार से शनि की दृष्टि होने पर व्यक्ति को सिगरेट-गांजा आदि धुंवे वाले व्यसनो का आदि होता हैं।
• जन्म कुंडली में लग्न पर किसी भी प्रकार से मंगल की दृष्टि होने पर व्यक्ति को शराब जेसे जलीय नशे का आदि बनाती हैं।
• जन्म कुंडली में यदि पितृ दोष लग रहा हो, तो उसकी शांति अवश्य करले क्योकिं पितृ दोष के कारण घर-परिवार के सदस्यो के बिच में नशे के कारण अत्याधिक अशांति बनी रहती हैं।

नोट : संबंधित ग्रहों की शांति कराने व उपाय करने से कष्ट कम हो जाते हैं।

मंगलवार, दिसंबर 07, 2010

विवाह हेतु उचित माह कौन सा होता हैं?

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विवाह हेतु उचित माह कौन सा होता हैं?


भारतीय सामाज में विवाह को पवित्र बंधन माना जाता हैं। इस लिये हिंदू संस्कृति में तलाक जैसे शब्द का कोई नहीं हैं। ज्योतिष शास्त्र में विवाह संस्कार हेतु प्रमुख चार माह निर्धारित किये हैं। इस लिये एसा मानाजाता हैं कि इन चार माह में विवाह होने पर भावी विवाहित दम्पति का जीवन खुशियों भरा रहता हैं।

विद्वानो के मत से इन चार माह में विवाह होने पर अलग-अलग फल प्राप्त होते हैं।
किस माह में विवाह क्या फल देते हैं?

शास्त्रों के अनुसार

माघे धनवती कन्या, फाल्गुने शुभगा भवेत,
वैशाखे तथा ज्येष्ठे पति उत्यन्तवल्लभा।
मार्गशिर्ष मपिच्छती, अन्यये मासाश्च वर्जिता।।

अर्थातः जिस कन्या का विवाह माघ मास में होता हैं, वह अति धनवान होती हैं, फाल्गुन मास में विवाह होने पर कन्या सौभाग्यवती होती हैं। वैशाख और ज्येष्ठ मास में विवाह होने पर कन्या पति को अधिक प्यारी होती हैं। अकस्मात परिस्थितीओं में अति आवश्यक होने पर ही मार्गशिर्ष मास में विवाह कर सकते है। अन्य सभी माह विवाह हेतु वर्जित होते हैं।

इसके अलावा मलमास या अधिमास होने पर, सूर्य धनु एवं मीन राशि में स्थित होने पर, गुरु या शुक्र तारा अस्त होने पर विवाह निषेध माना गया हैं।

कर्पूर गौरम करूणावतारम / श्लोक

Kapoor Gouram Karunaavtaaram Shlok,

करपूर गौरम करूणावतारम
संसार सारम भुजगेन्द्र हारम

सदा वसंतम हृदयारविंदे
भवम भवानी सहितं नमामि

मंगली दोष वाले जातक थोड़े गुस्सैल व चिड़चिड़े होते हैं?

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मंगली दोष वाले जातक थोड़े गुस्सैल व चिड़चिड़े होते हैं?


 जन्म कुंडली में मंगली होना अथवा मंगल दोष होना किसी जातक के लिये अमंगलकारी नहीं हैं. मंगली होना कोई दोष नहीं हैं यह एक विशेष योग होता हैं जो कुछ विषेश जन्म कुंडली में पायेजाते हैं. मंगली जातक कुछ विशेष गुण लिये हुवे प्रतिभा संपन्न होते हैं. हमारा उद्देश्य यहा मंगल दोष के प्रभाव को नकारना नहीं हैं, उस्से जुडे भ्रम को दूर कर, उस्से जुडे शास्त्रीय नियमो से आपको परिचित करना और उसके निवारण के उपाय बताना हैं.

मंगली - दोष विचार कैसे किया जाता हैं. इस्से जुडे शास्त्रोक्त नियम इस प्रकार हैं.

अगस्त्य संहिता के अनुसार:
धने व्यये च पाताले जामित्रे चाष्टमे कुजे.
भार्या भर्तु विनाशाय भर्तुश्च स्त्री विनाशनम्.

मानसागरी के अनुसार:
धने व्यये च पाताले जामित्रे चाष्टमे कुजे.
कन्या भर्तुविनाशाय भर्तुः कन्या विनश्यति.

बृहत् ज्योतिषसार के अनुसार:
लग्ने व्यये चतुर्थे च सप्तमे वा अष्टमे कुजः.
भर्तारं नाशयेद् भार्या भर्ताभार्या विनाश्येत्.

भावदीपिका के अनुसार:
लग्ने व्यये च पाताले जामित्रे चाष्टमे कुजे.
स्त्रीणां भर्तु विनाशः स्यात् पुंसां भार्या विनश्यति.

बृहत् पाराशर होरा के अनुसार:
लग्ने व्यये सुखे वापि सप्तमे वा अष्टमे कुजे.
शुभ दृग् योग हीने च पतिं हन्ति न संशयम्.

उपरोक्त श्लोकों का भावार्थ है कि जन्म लग्न से प्रथम, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश स्थान मे मंगल स्थित होने पर मंगल दोष या कुज दोष बनता हैं. कुछ आचार्यों के अनुसार लग्न के अतिरिक्त मंगली दोष चन्द्र लग्न, शुक्र या सप्तमेश से इन्हीं स्थानो में मंगल स्थित होने पर भी होता हैं.


मंगली दोष का फल
मंगली दोष वैवाहिक जीवन को विभिन्न प्रकार से प्रभावित करता है - मे विवाह विघ्न, विलम्ब, व्यवधान या धोखा, विवाहोपरान्त दम्पति मे से किसी एक अथवा दोनाको शारीरिक, मानसिक अथवा आर्थिक कष्ट, पारस्परिक मन - मुटाव, वाद - विवाद तथा विवाह - विच्छेद. अगर दोष अत्यधिक प्रबल हुआ तो दोना अथवा किसी एक की मृत्यु भी हो सकती है.

कुंडली में यदि मंगली दोष हो तो उस्से भयभीत या आतंकित नहीं होना चाहिये. प्रयास यह करना चाहिये कि मंगली जातक का विवाह मंगली जातक से ही हो क्याकि मंगल - दोष साम्य होने से वह प्रभावहीन हो जाता हैं तथा दोनासुखी रहते हैं.

दम्पत्योर्जन्मकाले व्ययधनहिबुके सप्तमे लग्नरन्ध्रे.
लग्नाच्चन्द्राच्च शुक्रादपि भवति यदा भूमिपुत्रो द्वयोर्वै.
तत्साम्यात्पुत्रमित्रप्रचुरधनपतां दंपती दीर्घ - काला.
जीवेतामेकहा न भवति मश्तिरिति प्राहुरत्रात्रिमुख्याः.

अर्थातः यदि वर और कन्या के जन्मांग मे मंगल द्वितीय, द्वादश, चतुर्थ, सप्तम अथवा अष्टम भाव मे, चंद्रमा अथवा शुक्र से समभाव मे स्थित हो तो समता का मंगल दोष होने के कारण वह प्रभावहीन हो जाता है लग्न. परस्पर सुख, धनधान्य, संतति, स्वास्थ्य एवं मित्रादि की उपलब्धि होती हैं.

कुज दोष वत्ती देया कुजदोषवते किल.
नास्ति दोषो न चानिष्टं दम्पत्यो सुखवर्धनम्.

अर्थातः मंगल दोष वाली कन्या का विवाह मंगल दोष वाले वर के साथ करने से मंगल का अनिष्ट दोष नहीं होता तथा वर - वधू के मध्य दांपत्य - सुख बढ़ता है.

मंगल के प्रभाव वाले जाताक आकर्षक, तेजस्वी, चिड़चिड़े स्वाभाव, समस्याओं से लडऩे की शक्ति विशेष रूप से प्रभावमान हैं होता. विकट से विकट समस्याओं में घिरे होने के बावजूद जातक अपना धैर्य नहीं छोड़ते हैं. ज्योतिष ग्रथो में मंगल को भले ही क्रूर ग्रह बताया गया हैं, मंगल केवल अमंगलकारी हि नहीं हैं यह मंगलकारी भी होता हैं.

मंगल कि उत्पत्ती कैसे हुइ?
शास्त्रों में मंगल ग्रह कि उत्पत्ति शिव से मानी गई हैं. मंगल को पृथ्वी का पुत्र माना गया हैं. मंगल की उत्पत्ति भारत के मध्यप्रदेश के उज्जैन में मानी गई हैं.
• जेसे मंगल का रंग लाल या सिंदूर के रंगके समान हैं., इस लिये भगवान गणेश को भी सिंदूर चढाया जाता हैं. इस लिये गणेशजी को मंगलनाथ या मंगलमूर्ति भी कहाजाता हैं.
• मंगल कुमार को गणेशजी नें मंगलवार के दिन दर्शन देकर उनहे मंगल ग्रह होने का वरदान दिया था इसी के कारण ही भगवान गणेश को मंगल मूर्ति कहा जाता हैं और मंगलवार के दिन मंगलमूर्ति गणेश का पूजन किया जाता हैं.
• विद्वानो ने देवी महाकाली जी का पूजन भी मंगलवार को श्रेष्ठ फल देने वाला माना हैं.
• ज्योतिष शास्त्र के अनुसार मंगल का प्रभाव मनुष्य के रक्त और मज्जा पर होता है. इसी से मंगली
कुंडली वाले जातक थोड़े गुस्सैल और चिड़चिड़े स्वभाव के होते हैं.

मंगली होने के लाभ
मंगली कुंडली वाले जातक में अपनी जिम्मेदारी को पूर्ण निष्ठा से निभाने का विशेष गुण होता हैं. मंगली व्यक्ति ज्यादातर कठिन से कठिन कार्य को समय से पूर्व ही कर लेने समर्थ होते हैं. एसे व्यक्ति में नेतृत्व करने की क्षमता जन्मजात पाई जाती हैं. एसे व्यक्ति जल्द किसी से मित्रता नहीं करते और जल्द किसी से घुलते - मिलते नहीं हैं. एसे व्यक्ति जब मित्र या या संबंध बनाते हैं तो पूर्णत: निभा ने का प्रयास अवस्य करते हैं.

एसे व्यक्ति अत्याधिक महत्वाकांक्षी होने के कारण इनके स्वभाव में क्रोध पाया जाता हैं. एसे व्यक्ति उग्र स्वभाव के होने पर भी वह बहुत दयालु, शीध्र क्षमा करने वाले तथा मानवतावादी होते हैं.

एसे व्यक्ति सहीं को सहीं और गलत को गलत कहने में नहीं हिचकिचाते. व्यक्ति किसी गलत के आगे झुकते नहीं और खुद भी गलत नहीं करते. किसी कि खुशामत करना इन्हें ज्यादा रास नाहीं आता. मंगली जातक प्रायः व्यवसायी, उच्च पद आसीत, राजनीति, डॉक्टर, इंजीनियर, अभिभाषक, तंत्र का जानकार और सभी क्षेत्रों में इन्हें विशेष योग्यता प्राप्त होती हैं. व्यक्ति विपरित लिंग के प्रति विशेष संवेदनशील होते हैं उनकी और विशेष झुकाव रखते हैं.

ज्योतिष शास्त्रों के अनुशार मंगली लडके - अपने जीवन साथी से विशेष अपेक्षाएं रखते हैं और अपने जीवन साथी के मामले में अधिक संवेदनशील होते हैं लडकी. इस कारण शास्त्रों में मंगली का विवाह मंगली से ही करने पर जोर दिया गया हैं. कुछ विद्वानो का मत हैं कि लड़के की कुंडली में मंगल हो और लड़की की एक में, 4, 7, 8, 12 स्थान में शनि स्थित हो अथवा मंगल के साथ गुरु स्थित हो तब मंगल का प्रभाव समाप्त माना जाता हैं कुंडली. एसा माना जाता हैं कि मंगली जातक का विवाह विलंब से होता हैं और अच्छी जगह होता हैं.

इसी लिये मंगली कुंडली वाले व्यक्ति का विवाह मंगली से करना शुभ माना जाता हैं.

ज्योतिष महत्व: ज्योतिष में मंगल ऋण, भूमि, भवन, मकान, झगड़ा, पेट की बीमारी, क्रोध, मुकदमे बाजी और भाई का कारक होता हैं. मंगल हमें साहस, सहिष्णुता, धैर्य, कठिन, परिस्थितियों एवं समस्याओं को हल करने की योग्यता प्रदान करता हैं और खतरों से सामना करने की शक्ति देता हैं.

मंगल के शांति के उपाय:
भगवान शिव और गणेश की उपासना करें. तांबा, सोना, गेहूं, लाल वस्त्र, लाल चंदन, लाल फूल, केसर, कस्तुरी, लाल बैल, मसूर की दाल, भूमि आदि का दान करें और ज्योतिष की सलाह पर मूंगा रत्न धारण करें.

सोमवार, दिसंबर 06, 2010

सिर्फ कुंडली मिलान सफल विवाह की गारंटी नहीं होती?

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सिर्फ कुंडली मिलान सफल विवाह की गारंटी नहीं होती?


विवाह से पूर्व कुंडली मिलान करवाना एक सामान्य प्रचलन हैं।
लेकिन केवल 36 गुणों के आधार पर किया गया कुंडली मिलना सफल विवाह कि गारंटी नहीं होता हैं। वैदिक ज्योतिष अनुसार 36 गुणों के अलावा अन्य बहुत सारे कारण होते हैं जो लडके-लडकी के वैवाहिक जीवन को सफल या असफल बनाने में अपना प्रभाव रखते हैं।

भारतीय समाज में लडके-लडकी की शादी के लिये दोनो कि जन्म कुण्डलियो का मिलान किया जाता हैं। जिसमे जन्म राशी और नक्षत्र के आधार पर 36 गुणो का मिलान और मंगलीक दोष प्रमुख माने जाते हैं। दोनो कि जन्म कुण्डलियो के मिलान में 18 या उस्से अधिक गुण मिलने पर दोनो की कुंडली विवाह के लिए उपयुक्त मान ली जाती हैं। जो ज्योतिष शास्त्र के जानकार और विद्वानो के मत से अनौचित और निर्थक प्रयास मात्र होता हैं।

क्योकि कि हमने स्वयं हमारे हमारे वर्षो के अनुभवो से पाया हैं। लडके-लडकी कि जन्म कुंडली में ३० से अधिक गुण मिलने पर भी दोनो का जीवन तनाव पूर्ण होता हैं जबकी दूसरी और जन्म कुंडली में १८ से कम गुण मिलने पर जीवन सुखमय और आनंदमय होता हैं।

ऎसा क्यों होता हैं?
इसका मुख्या कारण होता हैं आज आधुनिकता का कुछ एसा दौर चला हैं, जहा प्रायः हर गली महोल्ले में ज्योतिष से संबंधित पुस्तके पत्र-पत्रिकाए उपल्ब्ध हो जाती हैं, जिसे एक दो पार आधि-अधूरी पढे ना पढे व्यक्ति ज्योतिष से संबंधित उचित जानकारी एवं योग्य ज्योतिषी शिक्षण के अभाव के कारण स्वयं को ज्योतिष का बहोत बडा जानकार और विद्वान मान लेता हैं।

आजकल प्रायः हर छोटे-बडे शहरो में ज्योतिष से संबंधित शिक्षा के लिये क्लास खूलने लगे हैं जिसमे कुछ विद्वान ज्योतिष विद्वानो के द्वारा चलाये जाते हैं तो कुछ धन लोभ के कारण आधे-अधूरे शिक्षण से दूसरो को ज्योतिष का पाठ पढाने लगते हैं। आधे-अधूरे शिक्षक से ज्योतिष विद्या प्राप्त होन हीं सकती इस्से तो हर व्यक्ति भली भाती परिचित हैं, एसे में ज्योतिष शिक्षा कि मोटी फिस देकर व्यक्ति को ज्योतिष में अमुक अमक डिग्रीया प्राप्त हो जाती हैं।

कुछ व्यक्ति विद्वान ज्योतिष के पास शिक्षण प्राप्त करने के उपरांत भी ज्योतिष विद्या के समर्पण भाव नहीं रख कर केवल धनोर्पार्जन के लक्ष्य को साधने में लग जाते हैं जहा उनका पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के उपरांत भी उन्हे वह सफलता प्राप्त नहीं हो पाती जो एक कूशल ज्योतिष को प्राप्त होनी चाहिये। एसी स्थिती में किया गया कुंडली मिलान ज्यादातर मामलो में असफल हो जाता हैं।

दूसरा कारण
ज्यादातर लडके-लडकी के माता-पिता शादी में हजारो लाखो रुपये खर्च कर देते हैं परंतु विद्वान एवं कूशल ज्योतिष के पास न जाकर उसका उचित पारिश्रमिक न देकर पैसे बचाने के चक्कर में या तो कम जानकार व्यक्ति से कुंडली मिलान करवा लेते हैं या स्वयं अपने कंप्युटर पर लडके-लडकी कि जन्म दिनांक, समय एवं स्थान देकर मिलान कर के 18 या उस्से अधिक गुण देख कर विवाह कर देते हैं। एसी स्थितीओं में लडके-लडकी का वैवाहिक जीवन कष्टमय और दूःख मय हो सकता हैं। क्योकि केवल 18 या उस्से अधिक गुण मिलने पर हि विवाह सफल नहीं होता। क्योकि कम जानकार ज्योतिष का सम्पूर्ण ध्यान नक्षत्र पर ही केन्द्रित होता हैं। जानकारी के अभाव में वहं जन्म लग्न, ग्रहोकी द्रष्टी एवं स्थिती इत्यादी की पूर्ण रुप से अवहेलना करता हैं। है.

कंप्युटर पर कुंडली मिलान करने पर उसमें केवल वर्ण, योनि, नाडी इत्यादि गुणो के आधार हि मिलान होता हैं। क्योकिं कुंडली मिलान नक्षत्रो की बजाए ग्रहो की स्थिति के आधार पर करना उचित होता हैं क्योकि नक्षत्र तो एक हि हिस्सा हैं और मनुष्य पर सबसे अधिक प्रभाव नवग्रहो का होता हैं। जिसे कंप्युटर या कम जानकार ज्योतिष बताने में असमर्थ होते हैं जिसके आधार पर विवाह सफल नहीं हो पाते हैं और कभी कभी गुण मिलने पर भी असफल हो जाते हैं।

तीसरा कारण
कुछ लडके-लडकी के माता-पिता अच्छा परिवार में रिश्ता या धनी परिवार देख कर अथवा अपने लडके-लडकी कि उम्र अधिक हो जाने पर अपने पुत्र-पुत्री कि जन्म कुंडली गलत बनवा देते हैं ताकी किसी भी प्रकार से विवाह संपन्न हो जाये परंतु अज्ञानता के कारण उन्हें कहा ज्ञात होता हैं कि वह जो बडी गलती से विवाह को संपन्न करना चाहते हैं वह अनौचित मेल को उचित में बदलने के उपरांत भी दोनो का वैवाहिक जीवन कष्टमय या दुःखमय रहेगा। ऎसी स्थितीओं में भी वैवाहिक जीवन सुखमय नहीं होता फिर दोषका सारा ठिकरा मढदिया जाता हैं ज्योतिष पर कि उचित मेल होने पर भी हमारे लडके-लडकी का विवाहीक जीवन सुखी नहीं हुवा।

गुरुत्व ज्योतिष के विवाह स्पेशयल अंक में हमने कुंडली मिलान के अलावा
विवाह से संबंधित अन्य बहोत से पहलू से आपका मार्गदर्शन करने का प्रयास किया हैं।