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गुरुवार, दिसंबर 09, 2010

दांपत्य जीवन में मंगल, गुरु एवं शुक्र का प्रभाव

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दांपत्य जीवन में मंगल, गुरु एवं शुक्र का प्रभाव


किसी भी कुंडली से दांपत्य का विचार करने के लिये मंगल, गुरु एवं शुक्र इन तीनों ग्रहों कि स्थिति और प्रभाव को देखना आवश्य हैं।

वैवाहिक जीवन में गुरु का प्रभाव
• सुखी दांपत्य जीवन के लिये वर-वधू दोनों की कुंडली में गुरु शुभ प्रभाव युक्त होना चाहिये। माना जाता हैं गुरु किशुभ सप्तम भाव पर दृ्ष्टि हों तो वैवाहिक जीवन परेशानियों व दिक्कतों के उपरांत भी दोनों में अलगाव जेसी स्थिति नहीं बनती हैं।
• गुरु का शुभ प्रभाव वर-वधू को एक साथ एवं उनके वैवाहिक जीवन को सुखमय बनाये रखती हैं। गुरु कि शुभता दांपत्य जीवन की बाधाओं को दूर करने के साथ-साथ, संतान का कारक ग्रह माना जाता हैं।
• यदि किसी व्यक्ति कि कुंडली में गुरु पीडित हों तो सबसे पहले तो जातक के विवाह में विलम्ब होता हैं। यदि विवाह हो गया तो संतान प्राप्ति में परेशानियां होती हैं।
• यदी लडके-लडकी किसी कि भी कुंडली में गुरु किसी पाप ग्रह के प्रभाव में हों तो संतान प्राप्ति में बाधाएं आती हैं। यदी गुरु पर पाप प्रभाव हों या गुरु पापी ग्रह की राशि में स्थित हों तो निश्चित रुप से दांपत्य जीवन में अनेक प्रकार की परेशानियां आती हैं।

वैवाहिक जीवन में शुक्र का प्रभाव
• पूर्ण वैवाहिक सुख की प्राप्ति के लिये विवाह और वैवाहिक संबन्धों का कारक ग्रह शुक्र जन्म कुंडली में शुभ प्रभाव में होना अति आवश्यक माना जाता हैं।
• वर-वधू दोनों की कुंडली में शुक्र शुभ प्रभाव युक्त होने पर दांपत्य जीवन में सुखो कि प्राप्ति होती हैं। इसके लिये शुक्र का पूर्ण बली एवं होना भी आवश्यक होता हैं।
• वर-वधू दोनों की कुंडली में शुक्र का किसी भी प्रकार से अशुभ स्थिति में होना पति-पत्नी में से किसी के अपने साथी के अलावा अन्यत्र अवैध संबन्धों कि ओर झुकाव होने के युग बनाता हैं। इसलिये दांपत्य जीवन में सुख प्राप्ति हेतु शुक्र की शुभ स्थिति आवश्यक होती हैं।
• कुंडली में शुक्र यदि स्वयं बली हैं, स्व राशि या उच्च राशि में स्थित तो दांपत्य जीवन में सुखों कि प्राप्ति होती हैं।
• कुंडली में शुक्र यदि केन्द्र या त्रिकोण में हों तो दांपत्य जीवन में सुखों कि प्राप्ति होती हैं।
• कुंडली में शुक्र यदि त्रिक भाव, नीच का अथवा शत्रु भाव में बैठा हों तो जीवन में दांपत्य सुखों में कमी आती हैं।
• कुंडली में शुक्र यदि अस्त अथवा किसी पापी ग्रह से दृ्ष्ट अथवा पापी ग्रह के साथ में बैठा हों तो जीवन में दांपत्य सुखों में कमी आती हैं।
• शुक्र के अशुभ होने पर पति-पत्नी के अलगाव की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती हैं।

वैवाहिक जीवन में मंगल का प्रभाव
विवाह के लिये वर-वधू दोनों की कुंडली मिलन करते समय सबसे पहले मंगल कि स्थिती देखी जाती हैं। देखा जाता हैं कि कहीं जातक मंगली तो नहीं हैं। मंगल किस भाव में स्थित हैं और मंगल किस ग्रहों से द्रष्टि संबन्ध बना रहा हैं। मंगल कि किस ग्रह से युति हैं। इन सभी बातों का सूक्ष्म अध्ययन आवश्यक होता हैं।

मंगल के कारण जन्म कुंडली में मांगलिक योग का निर्माण होता हैं।
• सभी लडके-लडकी विवाह के बाद सुखी दांपत्य जीवन की कामना करते हैं। यदि लडके या लडकी किसी एक कि मांगलिक योग होने से वैवाहिक सुखों में कमी आती हैं।
• जब मंगल कुंण्डली के लग्न, द्वितीय, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम व द्वादश भाव में स्थित होता हैं तो जातक मांगलिक होता हैं। लेकिन मंगल अन्य भावों में स्थित होने परभी वैवाहिक जीवन के सुख में कमी आने की अनेक संभावनाये होती हैं।
• कुछ विशेष परिस्थिती में कुंडली में मांगलिक योग बनने पर भी इस योग की अशुभता में कमी हो जाती हैं। ऎसे में अधूरी जानकारी के कारण वर-वधू अपने मन में मांगलिक योग से प्राप्त होने वाले अशुभ फलो के कारण भयभीत होते रहते हैं और मंगली दोष को लेकर अनेक प्रकार के भ्रम अपने मन में पाल कर रखते हैं।

विशेष: कृप्या मंगल से संबंधित योग एवं उसके निवारण के उपायो का विस्तृत वर्णन इसी अंक में पृष्ठ नंबर पर आप पढ सकते हैं।
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