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गुरुवार, मई 27, 2010

विश्वंभरी स्तुति

Visvambhari Stuti, Viswambhari Stuti
विश्वंभरी स्तुति

पोस्ट सौजन्य: स्वस्तिक, स्वस्तिक सोफ्टेक इन्डिया
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विश्वंभरी अखिल विश्वतणी जनेता।
विद्या धरी वदनमां वसजो विधाता॥
दुर्बुद्धि दुर करी सद्दबुद्धि आपो।
माम् पाहि ॐ भगवती भव दुःख कापो ॥१॥

भूलो पडि भवरने भटकुं भवानी।
सुझे नहि लगीर कोइ दिशा जवानी॥
भासे भयंकर वळी मनना उतापो।
माम् पाहि ॐ भगवती भव दुःख कापो ॥२॥

आ रंकने उगरवा नथी कोइ आरो।
जन्मांध छु जननी हु ग्रही हाथ तारो॥
ना शुं सुणो भगवती शिशुना विलापो।
माम् पाहि ॐ भगवती भव दुःख कापो ॥३॥

मा कर्म जन्म कथनी करतां विचारु।
आ सृष्टिमां तुज विना नथी कोइ मारु॥
कोने कहुं कठण काळ तणो बळापो।
माम् पाहि ॐ भगवती भव दुःख कापो ॥४॥

हुं काम क्रोध मध मोह थकी भरेलो।
आडंबरे अति धणो मद्थी छकेलो॥
दोषो बधा दूर करी माफ पापो।
माम् पाहि ॐ भगवती भव दुःख कापो ॥५॥

ना शास्त्रना श्रवणनु पयःपान पीधु।
ना मंत्र के स्तुति कथा नथी काइ कीधु॥
श्रद्धा धरी नथी कर्या तव नाम जापो।
माम् पाहि ॐ भगवती भव दुःख कापो ॥६॥

रे रे भवानी बहु भूल थई ज मारी।
आ जिंदगी थई मने अतिशे अकारी॥
दोषो प्रजाळि सधळा तव छाप छापो।
माम् पाहि ॐ भगवती भव दुःख कापो ॥७॥

खाली न कोइ स्थळ छे विण आप धारो।
ब्रह्मांडमां अणु-अणु महीं वास तारो॥
शक्ति न माप गणवा अगणित मापो।
माम् पाहि ॐ भगवती भव दुःख कापो ॥८॥

पापो प्रपंच करवा बधी रीते पूरो।
खोटो खरो भगवती पण हुं तमारो॥
जाडयांधकार करी दूर सुबुद्धि स्थापो।
माम् पाहि ॐ भगवती भव दुःख कापो ॥९॥

शीखे सुणे रसिक छंद ज एक चित्ते।
तेना थकी त्रिविध ताप टळे खचिते॥
बुद्धि विशेष जगदंब तणा प्रतापो।
माम् पाहि ॐ भगवती भव दुःख कापो ॥१०॥

श्री सदगुरु शरनमां रहीने यजुं छुं।
रात्रि दिने भगवती तुजने भजुं छु॥
सदभक्त सेवक तणा परिताप चापो।
माम् पाहि ॐ भगवती भव दुःख कापो ॥११॥

अंतर विषे अधिक उर्मि थतां भवानी।
गाऊ स्तुति तव बळे नमीने मृडानी॥
संसारना सकळ रोग समूळ कापो।
माम् पाहि ॐ भगवती भव दुःख कापो ॥१२॥
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