Search

Shop Our products Online @

www.gurutvakaryalay.com

www.gurutvakaryalay.in


गुरुवार, जुलाई 14, 2011

जब दुर्वासाजी ने श्री कृष्ण की परिक्षाली?

दुर्वासाजी ने श्री कृष्ण रुकमणि, ದುರ್ವಾಸಾಜೀ ನೇ ಶ್ರೀ ಕೃಷ್ಣ ರುಕಮಣಿ, દુર્વાસાજી ને શ્રી કૃષ્ણ રુકમણિ, துர்வாஸாஜீ நே ஶ்ரீ க்ருஷ்ண ருகமணி, దుర్వాసాజీ నే శ్రీ కృష్ణ రుకమణి, ദുര്വാസാജീ നേ ശ്രീ കൃഷ്ണ രുകമണി, ਦੁਰ੍ਵਾਸਾਜੀ ਨੇ ਸ਼੍ਰੀ ਕ੍ਰੁਸ਼੍ਣ ਰੁਕਮਣਿ, দুর্ৱাসাজী নে শ্রী কৃষ্ণ রুকমণি, ଦୁର୍ବାସାଜୀ ନେ ଶ୍ରୀ କୃଷ୍ଣ ରୁକମଣି, durvAsAjI ne SrI kRuShN rukamaNi, guru poornima-2011, guru purnima-2011, shravan mas-2011, srawan masha, गुरु पुर्णिमा, गुरु पूर्णीमा,  गुरु पूर्णीमा, चातुर्मास व्रत-नियम प्रारंभ, गुरु पूर्णिमा, व्यास पूर्णिमा, स्नान-दान हेतु उत्तम आषाढ़ी पूर्णिमा, मुड़िया पूनम
जब दुर्वासाजी ने श्री कृष्ण की परिक्षाली।


हिन्दु शास्त्रो के अनुशार दुर्वासाजी ज्ञानी महापुरुष होने के साथ ही अद्वितीय योगबल के स्वामी थे जिस कारण समय-समय पर दुर्वासाजी अपनी योगलीला रचते रहते थे। एक बार दुर्वासाजी ने श्री कृष्ण के साथ योगलीला रचने का मन बनाया।
एक बार दुर्वासाजी ने चुनौती दी की, हैं कोई जो मुझे अतिथि रखने को तैयार हो। श्री कृष्ण ने देखा तो दुर्वासा जी ! आज तो दुर्वासा जी को अतिथि रखने की चुनौती मिल रही है।
श्रीकृष्णजी आये और बोलेः "महाराज ! आप आइये, हमारे अतिथि बनिये।"
दुर्वासाजी बोलेः "अतिथि तो बन जाऊ पर मेरी शर्त है।"
'मैं जब आऊँ-जाऊँ, जो चाहूँ, जहाँ चाहूँ, जितना चाहूँ खाऊँ, जिनको चाहूँ खिलाऊँ, जिनको जो चाहूँ देदूँ, जो भी लुटाऊँ, जितना भी लुटाऊँ, कुछ भी करूँ,
मुझे न कोई रोके न कोई टोके। बाहर
से तो क्या मन से भी कोई मुझे
रोकेगा-टोकेगा तो शाप दूँगा। सुन
ले, कान खोल कर! जो
मुझे अतिथि रखता है, तो
सामने आ जाय।'
"महाराज ! आपने जो कहीं
वे सभी शर्त स्वीकार हैं और जो
आप भूल गये हों या जितनी भी
और शर्तें हों वे भी स्वीकार हैं।"
महाराज! ये तो ठीक है परंतु घर का
सामान किसी को देदूँ, किसी को
दिलाऊँ, चाहे जलाऊँ...।
श्रीकृष्ण बोलेः "महाराज ! अपनी शर्त में ऐसा भी रख दीजिए। घर का सामान उठाकर देनेवाला कोई मिल जाये तो आप दोगे, आप उठा तो नहीं सकोगे। आप चाहें तो घर को भी जला दें तो भी हमारे मन में कभी दुःख नहीं होगा।
महाराज ! आप आइये, हमारे अतिथि बनिये।"
दुर्वासा ऋषि अतिथि बनकर आये, अतिथि बनकर उनको तो करनी थी कुछ लीला। अतिथि सत्कार में कहीं कुछ चूक हो जाये तो दुर्वासाजी चिल्लावें, झूठ कैसे बोलें? यहाँ तो सब ठीक-ठाक था।
दुर्वासाजी बोलेः "तो हम अभी जायेंगे और थोड़ी देर में वापस आयेंगे। हमारे जो भगत होंगे उनको भी साथ लायेंगे। भोजन तैयार हो।"
दुर्वासाजी जायें, आयें तो भोजन तैयार मिले। किसी को बाँटें, बँटवायें, कुछ भी करें। फिर भी देखा कि 'श्रीकृष्ण किसी भी गलती में नहीं आते परंतु मुझे लाना है।
अब मुझे श्रीकृष्ण को अथवा रुक्मिणी को अच्छा नहीं लगे ऐसा कुछ करना है। शर्त है कि 'ना' बोल देंगे अथवा अंदर से भी कुछ बोल देंगे तो फिर मैं शाप दूँगा।'
दुर्वासाजी श्रीकृष्ण को शाप देने का मौका ढूँढ रहे थे। सती अनुसूयाजी के पुत्र दुर्वासा ऋषि कैसे हैं!
एक दिन दोपहर के समय दुर्वासाजी विचार करने लगे कि 'सब चल रहा है। जो माँगता हूं, तैयार मिलता है। जो माँगता हूँ श्रीकृष्ण या तो प्रकट कर देते हैं या फिर सिद्धि के बल से प्रकट कर देते हैं। सब सिद्धियाँ इनके पास मौजूद हैं, 64 कलाओं के जानकार हैं।
अब ऐसा कुछ किया जाएं कि श्रीकृष्ण नाराज हो जायें।'
दुर्वासाजी ने घर का सारा लकड़ी का सामान इकट्ठा किया। फिर आग लगा दी और बोलेः "होली रे ……………..>>
>> Read Full Article In GURUTVA JYOTISH  July-2011



संपूर्ण लेख पढने के लिये कृप्या गुरुत्व ज्योतिष ई-पत्रिका जुलाई-2011 का अंक पढें।
इस लेख को प्रतिलिपि संरक्षण (Copy Protection) के कारणो से यहां संक्षिप्त में प्रकाशित किया गया हैं।


JULY-2011
इससे जुडे अन्य लेख पढें (Read Related Article)


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें