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शुक्रवार, जून 18, 2010

पंच महाभूत तत्व एवं वास्तु (भाग:२)

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पंच महाभूत तत्व एवं वास्तु (भाग:२)

पृथ्वी तत्व
पृथ्वी भी सौरमण्डल के अन्य ग्रहों मे से एक हैं। सौरमण्डल के सभी ग्रह सूर्य के अंश हैं, सभी ग्रह कि उत्पत्ति सूर्य से टूटने के बाद हुई हैं, उसी प्रकार पृथ्वी कि उत्पत्ति भी सूर्य के अंश से टूटकर लाखों वर्ष पूर्व हुई हैं। पृथ्वी एवं सौरमण्डल के अन्य सभी ग्रह सूर्य से टूट कर उसके इर्द-र्गिद घुमते हुए धीरे-धीरे सूर्य से दूर होते गयें एवं धीरे-धीरे ठंडे होते गएं। पृथ्वी सूर्य के चक्कर काटने के साथ-साथ अपनी निश्चित धुरी पर 23 डिग्री मे निरंतर घूम रही हैं। पृथ्वी पर पानी, गुरूत्वाकर्षण शक्ति तथा दक्षिण-उत्तर ध्रुविय तरंगे पृथ्वी पर एवं पृथ्वी से थोडी दूर तक सभी जीव-निर्जीव वस्तुओं को प्रभावित करती हैं। परंतु अन्य सभी ग्रहो से विपरीत पृथ्वी पर लम्बे समय तक रसायनिक क्रियाओ के फल स्वरूप पृथ्वी पर प्राकृतिक स्थलों, पर्वतों, नदियों व मैदानों आदि का जन्म हुआ, जिस्से धीरे-धीरे पृथ्वी पर जीव विकसीत होने लगे जो अन्य किसी ग्रह पर जीव के अधिक विकसीत होने के पुख्ता सबुन न होकर अभी तक सिर्फ रहस्य का विषय बन कर रह गया हैं।

इन सभी ग्रहो में सिर्फ और सिर्फ पृथ्वी ही जीवनदायिनी और पालनहार हैं। पृथ्वी कि इसी अद्वितिय क्षमता के कारण आज पृथ्वी पर जीव के निवास हेतु भवन निर्माण का कार्य होता हैं, वास्तु सिद्धांत के अनुशार पंच माहाभूत तत्व के महत्व पूर्ण तत्व पृथ्वी तत्व के बिना भवन निर्माण संभव नही हो सकता। इस लिये वास्तु के प्राचीन ग्रन्थों मे पृथ्वी की महवत्ता को ध्यान में रख कर भवन निर्माण करने पर जोर दियागया हैं।

इस लिये हमारी संस्कृति में धरति को मां कहाजाता हैं क्योकि यह समारा भरण पोषण एवं पालन करती हैं इसी लिये गृह निर्माण से पूर्व सर्व प्रथम भूमि पूजन करने का विधान हैं।



जल तत्व
जल ही जीवन है इस बात से हर कोई परिचित हैं, क्योकि हर कोइ जानता हैं हर जीव किसी ना किसी रुप से जल तत्व से जुडा हुवा हैं एवं बगैर जल के किसी जीव का अस्तित्व लम्बे समय तक नहीं रह सकता इसी प्रकार वास्तु भी पूर्णतः जल तत्व से जुडा हुवा हैं, एवं मनुष्य को अत्याधिक प्रभावित करता हैं।
सृष्टि का मुख्य आधार जलचक्र ही हैं। सागर, नदियों, नहरों, तालाबो इत्यादि का जल वाष्प बनकर वायुमंडल से होते हुए आकाश में बादल के रूप मे निर्मित होकर वर्षा के स्वरुप में पूनः जल रूप में पृथ्वी पर आ जाता हैं। इसी कारण से जीवन चक्र कायम हैं।
विज्ञान का मुख्य सिद्धात में पानी कि संज्ञा H2O हैं, अर्थांत पानी में हाइड्रोजन के २ अणु एवं ओक्सीजन के एक अणु होते हैं, एवं ओक्सीजन के माध्यम से प्रायः सभी जीव श्वास के माध्यम से ओक्सीजन लेते हैं। इसी लिये उसे प्राण वायु कहा जाता क्योकि यह हमे जीवीत रखता हैं।
मानव शरीर भी इन पंच महाभूत तत्वो से हि बना हैं, इसमे से कोइ एक तत्व का संतुलन बिगड जाये तो शरीर मे रोग उत्पन्न होजाते हैं, हालांकि सभी पंच तत्वो को एज दूसरे से मिलकर हि प्रभावशाली होते हैं, सभी तत्व यदि अलग-अलग हो तो उनका कोइ महत्व नहीं रह जाता। जल मानव जीवन हेतु अत्यंत आवश्यक तत्व हैं इसी लिये आदिकाल से पृथ्वी कि सारी संस्कृतिया कि उत्पत्ती एवं विकास जल के किनारे हि हुवा हैं।
वास्तु सिद्धांत के अनुशार जल तत्व को भवन निर्माण एवं भवन निवास में हेतु इसके सन्तुलन को ध्यान मे रखना जरूरी हैं।
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