Search

लोड हो रहा है. . .

शनिवार, मार्च 19, 2011

होलिका उत्सव का महत्व

होलिका उत्सव महत्व, होली उत्सव महत्व, હોલિકા ઉત્સવ મહત્વ, હોલી ઉત્સવ મહત્વ, ಹೋಲಿಕಾ ಉತ್ಸವ ಮಹತ್ವ, ಹೋಲೀ ಉತ್ಸವ ಮಹತ್ವ, ஹோலிகா உத்ஸவ மஹத்வ, ஹோலீ உத்ஸவ மஹத்வ, హోలికా ఉత్సవ మహత్వ, హోలీ ఉత్సవ మహత్వ, ഹോലികാ ഉത്സവ മഹത്വ, ഹോലീ ഉത്സവ മഹത്വ, ਹੋਲਿਕਾ ਉਤ੍ਸਵ ਮਹਤ੍ਵ, ਹੋਲੀ ਉਤ੍ਸਵ ਮਹਤ੍ਵ, হোলিকা উত্সৱ মহত্ৱ, হোলী উত্সৱ মহত্ৱ, ହୋଳୀକା ଉତ୍ସବ ମହତ୍ବ, ହୋଲିକା ଉତ୍ସବ ମହତ୍ବ, ହୋଳି,holikA utsava mahatva, holI utsava mahatva, holi festival, holika dahan in 2011, holika story, holika and prahlad, holika prahlad, Holi celebration importance, Holly celebration importance, Festival of colors celebration importance, Holi festival importance, Holi festive importance, Holi party importance, significance of Holi celebration, the importance of Holi celebration in India,
होली २०११, होळी २०११, होलि २०११, होळि २०११, હોલી ૨૦૧૧, હોળી ૨૦૧૧, હોલિ ૨૦૧૧, હોળિ ૨૦૧૧, ಹೋಲೀ ೨೦೧೧, ಹೋಳೀ ೨೦೧೧, ಹೋಲಿ ೨೦೧೧, ಹೋಳಿ ೨೦೧೧, ஹோலீ ௨0௧௧, ஹோளீ ௨0௧௧, ஹோலி ௨0௧௧, ஹோளி ௨0௧௧, హోలీ ౨౦౧౧, హోళీ ౨౦౧౧, హోలి ౨౦౧౧, హోళి ౨౦౧౧,  ഹോലീ ൨൦൧൧, ഹോളീ ൨൦൧൧, ഹോലി ൨൦൧൧, ഹോളി ൨൦൧൧, ਹੋਲੀ ੨੦੧੧, ਹੋਲ਼ੀ ੨੦੧੧, ਹੋਲਿ ੨੦੧੧, ਹੋਲ਼ਿ ੨੦੧੧, হোলী ২০১১, হোলী ২০১১, হোলি ২০১১, হোলি ২০১১, ହୋଲି-୨୦୧୧, ହୋଲୀ-୨୦୧୧, ହୋଳି-୨୦୧୧, ହୋଳୀ-୨୦୧୧, holI 2011, hoLI 2011, holi 2011, hoLi 2011,

होलिका उत्सव का महत्व

भारतीय संस्कृती में होलिका दहन का उत्सव फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा को मनाया जाता हैं। होलिका का व्रत रखने वाले श्रद्धालु दिन भर उपवास कर के संध्या-रात्री के समय होलीका के दहन के समय होलीका का पूजन कर भोजन करते हैं।

होली का उत्सव से अनेको काथाएं एवं रहस्य जुडे हुएं हैं। पौराणिक काल में होलीका दहन के लिये माघी पूर्णिमा के दिन नगर के शूर, सामंत और गणमान्य लोग गाजे-बाजे के साथ नगर से बाहर जाकर शाखा युक्त वृक्ष ले आते थे और गंधादि से विधि-वत पूजन करके नगर या गांव से बाहर पश्चिम की और वृक्षको खडा कर देते थे। पुरातन काल में यह होली, होली का डांडा और प्रहलाद, नवान्नेष्टि का यज्ञ स्तम्भ के नाम से प्रसिद्ध थी। होलीका व्रत में व्रती अपना व्रत संकल्प करके साथा धारण करते थे।

होलिका दहन से पूर्व दहन वाले स्थान को शुद्ध जल से पवित्र किया जाता था और पूर्ण विघिवत पूजन के साथा में होलीका दहन किया जाता था। होलिका की परिक्रमा भी की जाती थी। होलीका दहन के बाद डांडा रुपी प्रह्लाद को बाहर निकालकर शीतल जल से पवित्र किया जाता था।

इसके बाद लोग घर से लाए हुए खेडा, खांडा और बडकूलों को होली में डालकर गेहूं, जौ, गेहूं की बाली और हरे चने के झाड को सेंका जाता था। इसके पीछे भक्त प्रह्लाद की कथा भी आती है। उसी के स्मरण में होलिका दहन होता है। इसके पीछे यह भी भाव बताया जाता है कि इस समय नवीन धान्य जौ, गेंहू और चने की खेती पककर तैयार हो जाती है। इसलिए यज्ञ राज को नया धान अर्पण करके उनकी पूजा की जाती हैं। यज्ञ विघि से इसे अर्पित करके नवानेष्टि यज्ञ किया जाता है।
इससे जुडे अन्य लेख पढें (Read Related Article)


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें