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सोमवार, अगस्त 02, 2010

साक्षात ब्रह्म हैं शिवलिंग

SAKSHAT BRAHMA HAI SHIVLING

साक्षात ब्रह्म हैं शिवलिंग


शिवलिंगकी पूजा-अर्चना अनादिकालसे विश्वव्यापक रही हैं। संसार के सबसे प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद में लिंग उपासना का उल्लेख मिलता हैं।

 सर्वदेवात्मको रुद्र: सर्वे देवा: शिवात्मकाः॥

भावार्थ: भगवान शिव और रुद्र सर्व देवों में विराजमान होने से ब्रह्म के ही पर्यायवाची शब्द हैं। प्राय: सभी सभी शास्त्र एवं पुराणों में शिवलिंग के पूजन का उल्लेख मिलता हैं। हिन्दू शास्त्रों में जहां भी शिव उपासनाका वर्णन किया गया हैं, वहां शिवलिंग की महिमा का गुण-गान अवश्य मिलता हैं।

स्कन्दपुराणमें शिवलिंग महिमा इस प्रकार की गई है-

आकाशं लिङ्गमित्याहु:पृथ्वी तस्यपीठिका।
आलय: सर्वदेवानांलयनाल्लिङ्गमुच्यते॥

भावार्थ: आकाश लिंग है और पृथ्वी उसकी पीठिका हैं। इस लिंग में समस्त देवताओं का वास हैं। सम्पूर्ण सृष्टि का इसमें लय हैं, इसीलिए इसे लिंग कहते हैं।

शिवपुराणमें शिवलिंग महिमा इस प्रकार की गई है-

लिङ्गमर्थ हि पुरुषंशिवंगमयतीत्यदः।
शिव-शक्त्योश्च चिह्नस्यमेलनंलिङ्गमुच्यते॥

भावार्थ: शिव-शक्ति के चिह्नोंका सम्मिलित स्वरूप ही शिवलिंग हैं। इस प्रकार लिंग में सृष्टि के जनक की अर्चना होती है।

लिंग परमपुरुष सदा शिवका बोधक हैं। इस प्रकार यह विदित होता है कि लिंग का प्रथम अर्थ प्रकट करने वाला हुआ, क्योंकि इसी से सृष्टि की उत्पत्ति हुई हैं।

दूसरा भावार्थ: यह प्राणियों का परम कारण और निवास-स्थान हैं।

तीसरा भावार्थ: शिव- शक्ति का लिंग योनि भाव और अ‌र्द्धनारीश्वर भाव मूलत:एक ही स्वरुप हैं। सृष्टि के बीज को देने वाले परम लिंग रूप भगवान शिव जब अपनी प्रकृति रूपा शक्ति से आधार-आधेय की भाँति संयुक्त होते हैं, तभी सृष्टि की उत्पत्ति होती है, अन्यथा नहीं।

लिंगपुराण शिवलिंग महिमा इस प्रकार की गई है-

मूले ब्रह्मा तथा मध्येविष्णुस्त्रिभुवनेश्वरः।
रुद्रोपरिमहादेव: प्रणवाख्य:सदाशिवः॥
लिङ्गवेदीमहादेवी लिङ्गसाक्षान्महेश्वरः॥
तयो:सम्पूजनान्नित्यंदेवी देवश्चपूजितो॥
भावार्थ: शिव लिंगके मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु तथा शीर्ष में शंकर हैं। प्रणव (ॐ) स्वरूप होने से सदाशिवमहादेव कहलाते हैं। शिवलिंगप्रणव का रूप होने से साक्षात् ब्रह्म ही है। लिंग महेश्वर और उसकी वेदी महादेवी होने से लिगांचर्नके द्वारा शिव-शिक्त दोनों की पूजा स्वत:सम्पन्न हो जाती है। लिंगपुराण में शिव को त्रिदेवमयऔर शिव-शक्ति का संयुक्त स्वरूप होने का उल्लेख किया गया हैं।

भगवान शिव द्वारा शिवलिंग महिमा इस प्रकार की गई है-

लोकं लिङ्गात्मकंज्ञात्वालिङ्गेयोऽर्चयतेहि माम्।
न मेतस्मात्प्रियतर:प्रियोवाविद्यतेक्वचित्॥

भावार्थ: जो भक्त संसार के मूल कारण महाचैतन्यलिंग की अर्चना करता हैं और लोक को लिंगात्मकजानकर लिंग-पूजा में तत्पर रहता हैं, मुझे उससे अधिक प्रिय अन्य कोई मनुष्य नहीं हैं।
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