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बुधवार, अगस्त 04, 2010

चातुर्मास व्रत का महत्व

chaturmaasa vrata ka mahatva,
चातुर्मास व्रत का महत्व



हिन्दू धर्मग्रंथों के अनुसार, आषाढ मास में शुक्लपक्ष की एकादशी की रात्रि से भगवान विष्णु इस दिन से लेकर अगले चार मास के लिए योगनिद्रा में लीन हो जाते हैं, एवं कार्तिक मास में शुक्लपक्ष की एकादशी के दिन योगनिद्रा से जगते हैं। इसलिये चार इन महीनों को चातुर्मास कहाजाता हैं। चातुर्मास का हिन्दू धर्म में विशेष आध्यात्मिक महत्व माना जाता हैं।

अषाढ मास में शुक्ल पक्ष कि द्वादशी अथवा पूर्णिमा अथवा जब सूर्य का मिथुन राशि से कर्क राशि में प्रवेश होता हैं तब से चातुर्मास के व्रत का आरंभ होता हैं। चातुर्मास के व्रत कि समाप्ति कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष कि द्वादशी को होती हैं। साधु संन्यासी अषाढ मासकि पूर्णिमा से चातुर्मास मानते हैं।

सनातन धर्म के अनुयायी के मत से भगवान विष्णु सर्वव्यापी हैं. एवं सम्पूर्ण ब्रह्मांडा भगवान विष्णु कि शक्ति से हि संचालित होता हैं। इस लिये सनातन धर्म के लोग अपने सभी मांगलिक कार्यो का शुभारंभ भगवान विष्णु को साक्षी मानकर करते हैं।

शास्त्रो में लिखा गया है कि वर्षाऋतु के चारों मास में लक्ष्मी जी भगवान विष्णु की सेवा करती हैं। इस अवधि में यदि कुछ नियमों का पालन करते हुवे अपनी मनोकामना पूर्ति हेतु व्रत करने से विशेष लाभ प्राप्त होता हैं।

चातुर्मास में व्रत करने वाले साधक को प्रतिदिन सूर्योदय के समय स्नान इत्यादि से निवृत्त होकर भगवान विष्णु की आराधना करनी चाहिये।

चातुर्मास के व्रत का प्रारंभ करने से पूर्व निम्न संकल्प करना चाहिये।

"हे प्रभु, मैंने यह व्रत का संकल्प आपको साक्षि मानकर उपस्थिति में लिया हैं। आप मेरे उपर कृपा रख कर मेरे व्रत को निर्विघ्न समाप्त करने का सामर्थ्य मुजे प्रदान करें। यदि व्रत को ग्रहण करने के उपरांत बीच में मेरी मृत्यु हो जाये तो आपकी कृपा द्र यह पूर्ण रुप से समाप्त हो जाये।

व्रत के दौरन भगवान विष्णु की वंदना इस प्रकार करें।

शांताकारंभुजगशयनंपद्मनाभंसुरेशं।
विश्वाधारंगगनसदृशंमेघवर्णशुभाङ्गम्॥
लक्ष्मीकान्तंकमलनयनंयोगिभिध्र्यानगम्यं।
वन्दे विष्णुंभवभयहरंसर्वलोकैकनाथम्॥

भावार्थ:- जिनकी आकृति अतिशय शांत हैं, जो शेषनाग की शय्यापर शयन कर रहे हैं, जिनकी नाभि में कमल है, जो सब देवताओं द्वारा पूज्य हैं, जो संपूर्ण विश्व के आधार हैं, जो आकाश के सद्रश्य सर्वत्र व्याप्त हैं, नीले मेघ के समान जिनका वर्ण हैं, जिनके सभी अंग अत्यंत सुंदर हैं, जो योगियों द्वारा ध्यान करके प्राप्त किये जाते हैं, जो सब लोकों के स्वामी हैं, जो जन्म-मरणरूप भय को दूर करने वाले हैं, ऐसे लक्ष्मीपति,कमलनयन,भगवान विष्णु को मैं प्रणाम करता हूं।

स्कंदपुराण के अनुशार चातुर्मास का विधि-विधान और माहात्म्य इस प्रकार विस्तार से वर्णित हैं।

चातुर्मास में शास्त्रीय विभिन्न नियमों का पालन कर व्रत करने से अत्याधिक पुण्य लाभ प्राप्त होते हैं।

  • जो व्यक्ति चातुर्मास में केवल शाकाहारी भोजन ग्रहण करता हैं, वह धन धान्य से सम्पन्न होता हैं।
  • जो व्यक्ति चातुर्मास में प्रतिदिन रात्री चंद्र उदय के बाद दिन में मात्र एकबार भोजन करता हैं, उसे सुख समृद्धि एवं एश्वर्य कि प्राप्ति होती हैं।
  • जो व्यक्ति भगवान विष्णु के शयनकाल में बिना मांगे अन्न का सेवन करता हैं, उसे भाई-बंधुओं का पूर्ण सुख प्राप्त होता हैं।
  • स्वास्थय लाभ एवं निरोगी रेहने के लिये चातुर्मास में विष्णुसूक्त के मंत्रों को स्वाहा करके नित्य हवन में चावल और तिल की आहुतियां देने से लाभ प्राप्त होता हैं।
  • चातुर्मास के चार महीनों में धर्मग्रंथों के नियमित स्वाध्याय से पुण्य फल मिलता हैं।
  • चातुर्मास के चार महीनों में व्यक्ति जिस वस्तु को त्यागता हैं वह वस्तु उसे अक्षय रूप में पुनः प्राप्त हो जाती हैं।
  • चातुर्मास का सद उपयोग आत्म उन्नति के लिए किया जाता हैं। चातुर्मास के नियम मनुष्य के भितर त्याग और संयम की भावना उत्पन्न करने के लिए बने हैं।

चातुर्मास में किस पदार्थ का त्याग करें

व्रत करने वाले व्यक्ति को...

  • श्रावण मास में हरी सब्जी का त्याग करना चाहिये।
  • भाद्रपद मास में दही का त्याग करना चाहिये।
  • आश्विन मास में दूध का त्याग करना चाहिये।
  • कार्तिक मास में दालों का का त्याग करना चाहिये।
  • व्रत कर्ता को शैय्या शयन, मांस, मधु आदि का सेवन त्याग करना चाहिये।
त्याग किये गय पदार्थो का फल निम्न प्रकार हैं।

  • जो व्यक्ति गुड़ का त्याग करता हैं, उसकी वाणी में मधुरता आति हैं।
  • जो व्यक्ति तेल का त्याग करता हैं, उसके समस्त शत्रुओं का नाश होता हैं।
  • जो व्यक्ति घी का त्याग करता हैं, उसके सौन्दर्य में वृद्धि होती हैं।
  • जो व्यक्ति हरी सब्जी का त्याग करता हैं, उसकी बुद्धि प्रबल होती हैं एवं पुत्र लाभ प्राप्त होता हैं।
  • जो व्यक्ति दूध एवं दही का त्याग करता हैं, उसके वंश में वृद्धि होकर उसे मृत्यु उपरांत गौलोक में स्थान प्राप्त होता हैं।
  • जो व्यक्ति नमक का त्याग करता हैं, उसकी समस्त मनोकामना पूर्ण होकर उसके सभी कार्य में निश्चित सफलता प्राप्त होती हैं।
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