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शुक्रवार, अप्रैल 02, 2010

भूमि का शुद्धि करण

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भूमि का शुद्धि करण


 
किसी भी भूमि पर भवन निर्माण करने से पूर्व उसका शुद्धि करण करना वास्तु ग्रंथो में आवश्यक बताया गया हैं।

 

 
सम्मार्जनोपाञ्ञनेन सेकेनोल्लेखनेन च।
गवां च परिवासेन भूमिः शुद्धयाति पञ्चभिः॥ (मनुस्मृति ५।१२५)

 
अर्थातः :-  भूमि का शुद्धि करण सम्मार्जन (झाड़ना- भूमि के सतह कि मिट्टी को झाडकर शुद्ध करना), लीपना ( गोबर आदिसे लीप कर भूमि को शुद्ध करना) , सींचना ( गोमूत्र, गंगाजल आदिसे सीच कर भूमि को शुद्ध करना), खोदना ( ऊपरकी कुछ मिट्टी खोदकर निकाल कर भूमि को शुद्ध करना ) और गौ सेवा ( एक दिन और रात गाय को लाकर उसे ठहराकर उस कि सेवा कर भूमि को शुद्ध करना) - इस प्रकार से भूमि का शुद्धि करण होता हैं ।

 

 यदि भूमि को खोदने पर उसमे से गाय कि हड्डी निकले तो राजभय होता हैं।
 
यदि मानव कि हड्डी निकले तो संतान का नाश होता हैं।

यदि बकरी कि हड्डी निकले तो अग्नि का भय होता हैं।

यदि घोड़े कि हड्डी निकले तो रोग भय होता हैं।

यदि गधे या ऊँटका कि हड्डी निकले तो धन संपदा कि हानि होती हैं।

यदि श्वान (कुत्ते) कि हड्डी निकले तो गृह में रहने वालो के मध्य कलह एवं सदस्यो का नाश होता हैं।

 

हड्डी यदि एक पुरुष कि उच्चता के अनुपात के भीतर निकले तो हि दोष होता हैं। यदि पुरुष कि उच्चता के अनुपात के नीचे से मिले तो उस भूमि पर दोष नहि लगता।

 

 

 
उपाय :-  भवन निर्माण हेतु किसी भी भूमि पर भवन बनाने से पूर्व उस जगह कि एक पुरुष कि उच्चता के अनुपात कि मिट्टी को खोद कर उसमे नई मिट्टी को शुद्धिकरण कर भरवा दि जाये तो वह भूमि भवन निर्माण हेतु अति उत्तम होती हैं।
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