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मंगलवार, अप्रैल 27, 2010

हनुमत्पञ्रत्‍‌न स्तोत्रम्

Hanumant Pancharatna stotram

हनुमत्पञ्रत्‍‌न स्तोत्रम्



वीताखिलविषयेच्छं जातानन्दाश्रुपुलकमत्यच्छम्।
सीतापतिदूताद्यं वातात्मजमद्य भावये हृद्यम्॥

तरुणारुणमुखकमलं करुणारसपूरपूरितापाङ्गम्।
संजीवनमाशासे मञ्जुलमहिमानमञ्जनाभाग्यम्॥

शम्बरवैरिशरातिगमम्बुजदलविपुललोचनोदारम्।
कम्बुगलमनिलदिष्टं विम्बज्वलितोष्ठमेकमवलम्बे॥

दूरीकृतसीतार्ति: प्रकटीकृतरामवैभवस्फूर्ति:।
दारितदशमुखकीर्ति: पुरतो मम भातु हनुमतो मूर्ति:॥

वानरनिकराध्यक्षं दानवकुलकुमुदरविकरसदृक्षम्।
दीनजनावनदीक्षं पावनतप:पाकपुञ्जमद्राक्षम्॥

एतत् पवनसुतस्य स्तोत्रं य: पठति पञ्चरत्‍‌नाख्यम्।
चिरमिह निखिलान् भोगान् भुक्त्वा श्रीरामभक्तिभाग् भवति॥

॥श्रीमद् आदि शंकराचार्य श्रीहनुमत्पञ्चर स्तोत्रम् सम्पूर्णम्॥


हनुमानजी के इस पञ्चरत्‍‌न स्तोत्र का जो नियमित पाठ करता हैं, वह इस लोक में चिर-काल तक समस्त भोगों को भोगकर श्रीराम-भक्ति का भागी बनता हैं।
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