Search

लोड हो रहा है. . .

शनिवार, दिसंबर 05, 2009

गणेश पंच्चरत्नम्

Ganesh Panchcharatnam


।। श्री गणेशाय नमः।।

॥गणेश पंच्चरत्नम्॥
मुदा करात्तमोदकम् सदा विमुक्तिसाधकम्
कलाधरावतम्सकम् विलासिलोकरक्षकम्।
अनायकैक नायकम् विनाशितेभदैत्यकम्
नताशुभाशुनाशकम् नमामि तम् विनायकम् ॥१॥

नतेतरातिभीकरम् नवोदितार्कभास्वरम्
नमत्सुरारिनिर्जरम् नताधिकापदुद्वरम्।
सुरेश्वरम् निधीश्वरम् गजेश्वरम् गणेश्वरम्
महेश्वरम् तमाश्रये परात्परम् निरन्तरम् ॥२॥

समस्तलोकशङ्करम् निरस्तदैत्यकुञ्जरम्
दरेतरोदरम् वरम् वरेभवक्त्रमक्षरम्।
कृपाकरम् क्षमाकरम् मुदाकरम् यशस्करम्
मनस्करम् नमस्कृतां नमस्करोमि भास्वरम् ॥३॥

अकिञ्चनार्तिमार्जनं चिरन्तनोक्ति भाजनम्
पुरारिपूर्वनन्दनम् सुरारिगर्वचर्वणम्।
प्रपञ्चनाशभीषणम् धनञ्जयादि भूषणम्
कपोलदानवारणम् भजे पुराणवारणम् ॥४॥

नितान्तकान्त दन्तकान्ति मन्तकान्तकात्मजम्
अचिन्त्यरूप मन्तहीन मन्तराय कृन्तनम्।
हृदन्तरे निरन्तरम् वसन्तमेव योगिनाम्
तमेकदन्तमेव तम् विचिन्तयामि सन्ततम् ॥५॥

महागणेश पंच्चरत्नमादरेण योन्वहम्
प्रजल्पति प्रभातके हृदिस्मरन्गणेश्वरम्।
अरोगतामदोषतां सुसाहितीं सुपुत्रतां
समाहितायुरष्टभूतिमभ्युपैति सोचिरात् ॥६॥

॥इति श्री गणेश पंच्चरत्नम् सम्पुर्ण॥

इससे जुडे अन्य लेख पढें (Read Related Article)


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें