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सोमवार, अक्तूबर 24, 2011

धनत्रयोदशी पर यम-दीपदान अकालमृत्यु को दूर करता हैं ?

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धनत्रयोदशी पर यम-दीपदान अकालमृत्यु को दूर करता हैं ?
लेख साभार: गुरुत्व ज्योतिष पत्रिका (अक्टूबर-2011)
धनत्रयोदशी के दिन किये जाने वाले कर्म में एक महत्त्वपूर्ण कर्म यम के निमित्त किया जाने वाला दीपदान हैं। GURUTVA KARYALAY | GURUTVA JYOTISH
हिन्दू धर्म शास्त्र में निर्णयसिन्धु के अंतर्गत निर्णयामृत और स्कन्दपुराण उल्लेख हैं कि कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी की संध्या प्रदोष काल के समाय घर से बाहर यम के निमित्त दीपदान करने से परिवार में अकालमृत्यु का भय दूर होता हैं। GURUTVA KARYALAY | GURUTVA JYOTISH
शास्त्रोंक्त मत के अनुशार यमदेवता भगवान सूर्य और माता संज्ञा के पुत्र हैं। वैवस्वत मनु, अश्विनीकुमार एवं रैवंत उनके भाई हैं तथा यमुना उनकी बहन है। यमदेव की सौतेली माँ छाया से शनि, तपती, विष्टि, सावर्णि मनु आदि 10 सौतेले भाई -बहन भी हैं। पौराणिक मान्यता के अनुशार यम शनि ग्रह के अधिदेवता हैं। GURUTVA KARYALAY | GURUTVA JYOTISH
यमदेवता प्रत्येक प्राणी के शुभ-अशुभ कर्मों के अनुसार फल देने का कार्य करते हैं। इसी कारण उन्हें यमदेवता को धर्मराज  कहा गया हैं। क्योकि अपने कर्तव्य के प्रति यमदेव त्रुटि रहित कार्य व्यवस्था की स्थापना करते हैं। यमदेव का अपना अलग से एक लोक हैं, जिसे उनके नाम से ही यमलोक कहा जाता हैं। GURUTVA KARYALAY | GURUTVA JYOTISH
ऋग्वेद में उल्लेख है कि यमलोक में ……………..>>
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यमदीपदान: GURUTVA KARYALAY | GURUTVA JYOTISH
यमदीपदान के विषय में स्कन्दपुराण में कहा गया है कि कार्तिक के कृष्णपक्ष में त्रयोदशी के प्रदोषकाल में यमराज के निमित्त दीप और नैवेद्य समर्पित करने पर अकाल मृत्यु का नाश होता हैं। यह स्वयं यमराज का कथन था। GURUTVA KARYALAY | GURUTVA JYOTISH
यमदीपदान केवल प्रदोषकाल में करने का विधान हैं।  यमदीपदान के लिए मिट्टी का एक बड़ा दीपक लेकर उसे उसे स्वच्छ जल से धो लेना चाहिए। फिर स्वच्छ रुई लेकर दो लम्बी बत्तियॉं बना लें। GURUTVA KARYALAY | GURUTVA JYOTISH
बत्तियां इतनी लम्बी बनाये की दीपक से उसके दोनों और के छोर निकले हुए हो। बत्तियॉं को दीपक में एक-दूसरे पर इस प्रकार रखें कि दीपक के बाहर बत्तियों के चार मुँह दिखाई दें। अब दीपक को तिल के तेल से भर दें और साथ ही उसमें एक छुटकी काले तिल भी डाल दें।
प्रदोषकाल में इस प्रकार विधि से तैयार किए गए दीपक का ……………..>>
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मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन च मया सह।
त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतामिति॥
अर्थात्: त्रयोदशी को दीपदान करने से मृत्यु, पाश, दण्ड, काल और लक्ष्मी के साथ सूर्यनंदन यम प्रसन्न हों। GURUTVA KARYALAY | GURUTVA JYOTISH
उक्त मन्त्र के उच्चारण के पश्चात् हाथ में पुष्प लेकर निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए यमदेव को दक्षिण दिशा में नमस्कार करें। GURUTVA KARYALAY | GURUTVA JYOTISH
ॐ यमदेवाय नमः। नमस्कारं समर्पयामि॥ GURUTVA KARYALAY | GURUTVA JYOTISH

तत पश्चयात पुष्प दीपक के पास रख दें ……………..>>
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ॐ यमदेवाय नमः। आचमनार्थे जलं समर्पयामि॥ GURUTVA KARYALAY | GURUTVA JYOTISH

तत पश्चयात पुनः यमदेव को ॐ यमदेवाय नमः। मन्त्र का उचारण करते हुए दक्षिण दिशा ……………..>>
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संपूर्ण लेख पढने के लिये कृप्या गुरुत्व ज्योतिष -पत्रिका अक्टूबर -2011 का अंक पढें
इस लेख को प्रतिलिपि संरक्षण (Copy Protection) के कारणो से यहां संक्षिप्त में प्रकाशित किया गया हैं।
>> गुरुत्व ज्योतिष पत्रिका (अक्टूबर -2011)
OCT-2011



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