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सोमवार, दिसंबर 13, 2010

विवाह समय निर्धारण

ग्रहो की महादशा-अन्तर्दशा में विवाह योग, Marriage Yoga in planet's Mahadash and antardasha, marriage Posible in Planets Mahadash-antardasha,

विवाह समय निर्धारण


विवाह का समय निर्धारण करने से पहले कुंडली में विवाह योग उपस्थित है या नहीं यह देखा जाता हैं। विवाह संबंधित योग, विवाह में बाधा, अविवाहित योगो का वर्णन आपके मार्गदर्शन के लिये इस अंक में दिया गया हैं।

जन्म कुंडली में सप्तम भाव, सप्तमेश एवं शुक्र जितने अधिक शुभ ग्रहों के प्रभाव में हो उतना हि शुभ होता हैं। जन्म कुंडली में सप्तम भाव, सप्तमेश एवं शुक्र तीनो पर अशुभ ग्रहों का प्रभाव जितना कम हो या नहीं हो, उतना शुभ विवाह का समय पर होने में रहता हैं। क्योकि एसा मानाजाता हैं, अशुभ/ पापी ग्रह प्रभाव जन्म कुंडली में सप्तम भाव, सप्तमेश एवं शुक्र तीनों को या इन में से किसी एक को प्रभावित करते हो, तो विवाह की अवधि में विलंब होता हैं।

जन्म कुंडली में योगों के आधार पर विवाह की आयु निर्धारित हो जाने पर विवाह के कारक ग्रह शुक्र एवं विवाह के मुख्य भावईवं सहायक भावों की महादशा- अन्तर्दशा में विवाह होने की संभावनाये अधिक बनती हैं।

सप्तमेश की महादशा-अन्तर्दशा में विवाह योग
जन्म कुंडली में प्रबल योग विवाह की संभावनाएं बना रहे हों, तथा व्यक्ति की ग्रह दशा में सप्तमेश का शुक्र से संबन्ध हो तों इस दशा में विवाह हो सकता हैं। इसके अलावा जब सप्तमेश जब द्वितीयेश के साथ ग्रह दशा में संबन्ध बना रहे हों उस स्थिति में भी विवाह होने के योग बनते हैं।

• जातक कि ग्रह दशा का संबन्ध जब सप्तमेश व नवमेश का हो रहा हों और जन्म कुंडली में सप्तमेश व नवमेश का पंचमेश से भी संबन्ध हों, तो इस ग्रह दशा में प्रेम विवाह होने की संभावनाये होती हैं।
• जन्म कुंडली में सप्तम भाव में शुभ ग्रह स्थित हो, सप्तमेश शुभ ग्रह होकर शुभ भाव में स्थित हों, तो व्यक्ति का विवाह संबन्धित ग्रह दशा के आरम्भ होने के समय में विवाह होने की संभावनाये बनाती हैं।
• जन्म कुंडली में शुक्र अथवा सप्तम भाव में स्थित ग्रह या सप्तमेश जब शुभ ग्रह होकर अशुभ भाव या अशुभ ग्रह की राशि में स्थित हो, तो अपनी महादशा-अन्तर्दशा के मध्य भाग में विवाह की संभावनाये बनाता हैं।
• जन्म कुंडली में स्वयं सप्तमेश सप्तम भाव में स्थित हों या कोई अशुभ ग्रह बली होकर सप्तम भाव में स्थित हों, तो इस ग्रह की दशा के अन्तिम भाग में विवाह की संभावनाये बनाता हैं।
• जन्म कुंडली में विवाह कारक ग्रह शुक्र नैसर्गिक रुप से शुभ हों, शुभ राशि, शुभ ग्रह से युक्त या द्र्ष्ट हों, गोचर में शनि अथवा गुरु से संबन्ध बनाने पर अपनी महादशा-अन्तर्दशा में विवाह की संभावनाये बनाता हैं।
• जातक कि विवाह योग्य आयु होगई हो, जन्म कुंडली में महादशा का स्वामी सप्तमेश का मित्र ग्रह हों, शुभ ग्रह हों और महादशा का स्वामी ग्रह सप्तमेश या शुक्र से सप्तम भाव में स्थित हों, तो इस महादशा में विवाह होने के योग बनते हैं।
• जातक कि लग्नेश की महादशा में सप्तमेश की अन्तर्दशा चलरही हो, तो विवाह होने की संभावनाये बनती हैं।
• जन्म कुंडली में सप्तम भाव या सप्तमेश से कोई बली ग्रह द्रष्टि संबन्ध बनात हो, तो उस ग्रहों की दशा अवधि में विवाह की संभावनाये बनती हैं।
• जातक कि कुंडली में जब शुक्र शुभ ग्रह की राशि अथवा केन्द्र, त्रिकोंण, शुभ भाव में स्थित हों, तो शुक्र का संबन्ध अन्तर्दशा या प्रत्यन्तर दशा से हो रहा हो, तो इस दशामें जातक का विवाह हो सकता हैं।
• कुंडली में शुक्र पर जितना शुभ प्रभाव में हो, विवाह उतना शीघ्र होने के योग बनाता हैं और शुक्र जितना पाप प्रभाव में हो उतना विवाह में विलंब होता हैं।
• कुंडली में शुक्र के साथ स्थित ग्रह, सप्तमेश का मित्र ग्रह या कोई बली ग्रह का किसी के साथ द्रष्टि संबन्ध बना रहा हों, उन सभी ग्रहों की दशा- अन्तर्दशा में विवाह होने की संभावनाये बनती हैं।
• जन्म कुंडली में शुक्र जिस ग्रह के नक्षत्र में स्थित हों, उस ग्रह की दशा अवधि में विवाह होने की संभावनाये अधिक बनती हैं।
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