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रविवार, अप्रैल 03, 2011

चैत्र नवरात्र व्रत के लाभ

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हिन्दु संसकृति के अनुशार नववर्ष का शुभारंभ चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि से होता है।
इस दिन से वसंतकालीन नवरात्र की शुरुआत होती हैं।

विद्वानो के मतानुशार चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की समाप्ति के साथ भूलोक के परिवेश में एक विशेष परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगता हैं जिसके अनेक स्तर और स्वरूप होते हैं।

इस दौरान ऋतुओं के परिवर्तन के साथ नवरात्रों का तौहार मनुष्य के जीवन में बाह्य और आंतरिक परिवर्तन में एक विशेष संतुलन स्थापित करने में सहायक होता हैं। जिस तरह बाह्य जगत में परिवर्तन होता है उसी प्रकार मनुष्य के शरीर में भी परिवर्तन होता है। इस लिये नवरात्र उत्सव को आयोजित करने का उद्देश्य होता हैं की मनुष्य के भीतर में उपयुक्त परिवर्तन कर उसे बाह्य परिवर्तन के अनुकूल बनाकर उसे स्वयं के और प्रकृति के बीच में संतुलन बनाये रखना हैं।

नवरात्रों के दौरान किए जाने वाली पूजा-अर्चना, व्रत इत्यादि से पर्यावरण की शुद्धि होती हैं। उसीके साथ-साथ मनुष्य के शरीर और भावना की भी शुद्धि हो जाती हैं। क्योकि व्रत-उपवास शरीर को शुद्ध करने का पारंपरिक तरीका हैं जो प्राकृतिक-चिकित्सा का भी एक महत्वपूर्ण तत्व है। यही कारण हैं की विश्व के प्रायः सभी प्रमुख धर्मों में व्रत का महत्व हैं। इसी लिए हिन्दू संस्कृति में युगो-युगो से नवरात्रों के दौरान व्रत करने का विधान हैं। क्योकी व्रत के माध्यम से प्रथम मनुष्य का शरीर शुद्ध होता हैं, शरीर शुद्ध होतो मन एवं भावनाएं शुद्ध होती हैं। शरीर की शुद्धि के बिना मन व भाव की शुद्धि संभव नहीं हैं। चैत्र नवरात्रों के दौरान सभी प्रकार के व्रत-उपवास शरीर और मन की शुद्धि में सहायक होते हैं।

नवरात्रों में किये गये व्रत-उपवास का सीधा असर हमारे अच्छे स्वास्थ्य और रोगमुक्ति के लिये भी सहायक होता हैं। बड़ी धूम-धाम से किया गया नवरात्रों का आयोजन हमें सुखानुभूति एवं आनंदानुभूति प्रदान करता हैं।

मनुष्य के लिए आनंद की अवस्था सबसे अच्छी अवस्था हैं। जब व्यक्ति आनंद की अवस्था में होता हैं तो उसके शरीर में तनाव उत्पन्न करने वाले सूक्ष्म कोष समाप्त हो जाते हैं और जो सूक्ष्म कोष उत्सजिर्त होते हैं वे हमारे शरीर के लिए अत्यंत लाभदायक होते हैं। जो हमें नई व्याधियों से बचाने के साथ ही रोग होने की दशा में शीघ्र रोगमुक्ति प्रदान करने में भी सहायक होते हैं।

नवरात्र में दुर्गासप्तशती को पढने या सुनने से देवी अत्यन्त प्रसन्न होती हैं एसा शास्त्रोक्त वचन हैं। सप्तशती का पाठ उसकी मूल भाषा संस्कृत में करने पर ही पूर्ण प्रभावी होता हैं।

व्यक्ति को श्रीदुर्गासप्तशती को भगवती दुर्गा का ही स्वरूप समझना चाहिए। पाठ करने से पूर्व
श्रीदुर्गासप्तशती कि पुस्तक का इस मंत्र से पंचोपचारपूजन करें-

नमोदेव्यैमहादेव्यैशिवायैसततंनम:।
नम: प्रकृत्यैभद्रायैनियता:प्रणता:स्मताम्॥

जो व्यक्ति दुर्गासप्तशतीके मूल संस्कृत में पाठ करने में असमर्थ हों तो उस व्यक्ति को सप्तश्लोकी दुर्गा को पढने से लाभ प्राप्त होता हैं। क्योकि सात श्लोकों वाले इस स्तोत्र में श्रीदुर्गासप्तशती का सार समाया हुवा हैं।

जो व्यक्ति सप्तश्लोकी दुर्गा का भी न कर सके वह केवल नर्वाण मंत्र का अधिकाधिक जप करें।

देवी के पूजन के समय इस मंत्र का जप करे।

जयन्ती मङ्गलाकाली भद्रकाली कपालिनी।
दुर्गा क्षमा शिवा धात्री स्वाहा स्वधानमोऽस्तुते॥

देवी से प्रार्थना करें-

विधेहिदेवि कल्याणंविधेहिपरमांश्रियम्।
रूपंदेहिजयंदेहियशोदेहिद्विषोजहि॥

अर्थातः हे देवि! आप मेरा कल्याण करो। मुझे श्रेष्ठ सम्पत्ति प्रदान करो। मुझे रूप दो, जय दो, यश दो और मेरे काम-क्रोध इत्यादि शत्रुओं का नाश करो।

विद्वानो के अनुशार सम्पूर्ण नवरात्रव्रत के पालन में जो लोगों असमर्थ हो वह नवरात्र के सात रात्री,पांच रात्री, दों रात्री और एक रात्री का व्रत भी करके लाभ प्राप्त कर सकते हैं। नवरात्र में नवदुर्गा की उपासना करने से नवग्रहों का प्रकोप शांत होता हैं।
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