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शनिवार, सितंबर 11, 2010

वक्रतुण्ड कथा

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वक्रतुण्ड कथा


वक्रतुण्डावतारश्च देहानां ब्रह्मधारकः।
मत्सरासुरहन्ता स सिंहवाहनगः स्मृतः।।

भगवान् श्रीगणेश का ‘वक्रतुण्डावतार’ ब्रह्मरूप से सम्पूर्ण शरीरों को धारण करनेवाला, मत्सरासुर का वध करनेवाला तथा सिंहवाहन पर चलनेवाला हैं।

मुद्गल पुराण के अनुसार भगवान् गणेश के अनेकों अवतार हैं, जिनमें आठ अवतार प्रमुख हैं। पहला अवतार भगवान् वक्रतुण्ड का है। ऐसी कथा है कि देवराज इन्द्र के प्रमाद से मत्सरासुर का जन्म हु्आ। उसने दैत्यगुरु शुक्राचार्य से भगवान् शिवके ॐ नमः शिवाय (पञ्चाक्षरी मन्त्र) की दीक्षा प्राप्त कर भगवान् शंकर की कठोर तपस्या की भगवान् शंकर ने प्रसन्न होकर उसे अभय होने का वरदान दिया। वरदान प्राप्त कर जब मत्सरासुर घर लौटा तब शुक्राचार्य ने उसे दैत्यों का राजा बना दिया। दैत्यमन्त्रियों ने शक्तिशाली मत्सर को विश्व पर विजय प्राप्त करने की सलाह दी। शक्ति और पद के मद से चूर मत्सरासुर ने अपनी विशाल सेना के साथ पृथ्वी के राजाओं पर आक्रमण कर दिया। कोई भी राजा असुर के सामने टिक नहीं सका। कुछ पराजित हो गये और कुठ प्राण बचाकर कन्दराओं में छिप गये। इस प्रकार सम्पूर्ण पृथ्वी पर मत्सरासुर का शासन हो गया।

पृथ्वी साम्राज्य प्राप्त कर उस दैत्य ने क्रमशः पाताल और स्वर्ग पर भी चढ़ाई कर दी। शेष ने विनयपूर्वक उसके अधीन रहकर उसे कर पाताल लोक देना स्वीकार कर लिया। इन्द्र इत्यादि देवता उससे पराजित होकर भाग गये। मत्सरासुर स्वर्ग का भी सम्राट हो गया।

असुरों से दुःखी होकर देवतागण ब्रह्मा और विष्णु को साथ लेकर शिवजी के कैलास पहुँचे। उन्होंने भगवान् शंकर को दैत्यों के अत्याचार वृतांत सुनाया। भगवान् शंकरने मत्सरासुर के इस दुष्कर्म की घोर निन्दा की। यह समाचार सुनकर मत्सरासुर ने कैलास पर भी आक्रमण कर दिया।

भगवान् शिव से उसका घोर युद्ध हुआ। परन्तु, त्रिपुरारि भगवान् शिव भी जीत नहीं सके। उसने उन्हें भी कठोर पाश में बाँध लिया और कैलाश का स्वामी बनकर वहीं रहने लगा। चारों तरफ दैत्यों का अत्याचार होने लगा।

दुःखी देवताओं के सामने मत्सरासुर के विनाश का कोई मार्ग नहीं बचा। वे अत्यन्त चिन्तित और दुर्बल हो रहे थे। उसी समय वहाँ भगवान दत्तात्रेय आ पहुँचे। उन्होंन देवताओं को वक्रतुण्ड के गं(एकाक्षरी मन्त्र) का उपदेश किया। समस्त देवता भगवान् वक्रतुण्ड के ध्यान के साथ एकाक्षरी मन्त्र का जप करने लगे। उनकी आराधना से सन्तुष्ट होकर तत्काल फलदाता वक्रतुण्ड प्रकट हुए। उन्होंने देवताओंसे कहा आप लोग निश्चिन्त हो जायँ। मैं मत्सरासुर के गर्व को चूर-चूर कर दूँगा।

भगवान् वक्रतुण्ड ने अपने असंख्य गणों के साथ मत्सरासुर के नगरों को चारों तरफ से घेर लिया। भयंकर युद्ध छिड़ गया। पाँच दिनों तक लगातार युद्ध चलता रहा। मत्सरासुर के सुन्दरप्रिय एवं विषयप्रिय नामक दो पुत्र थे वक्रतुण्ड के गणों ने उन्हें मार डाला। पुत्र वध से व्याकुल मत्सरासुर रणभूमि में उपस्थित हुआ। वहाँ से उसने भगवान् वक्रतुण्ड को अपशब्द कहे। भगवान् वक्रतुण्ड ने प्रभावशाली स्वर में कहा यदि तुझे प्राणप्रिय हैं तो शस्त्र रखकर तु मेरी शरण में आ जा नहीं तो निश्चित मारा जायगा।

वक्रतुण्ड के भयानक रूप को देखकर मत्सरासुर अत्यन्त व्याकुल हो गया। उसकी सारी शक्ति क्षीण हो गयी। भयके मारे वह काँपने लगा तथा विनयपूर्वक वक्रतुण्ड की स्तुति करने लगा। उसकी प्रार्थना से सन्तुष्ट होकर दयामय वक्रतुण्ड ने उसे अभय प्रदान करते हुए अपनी भक्ति का वरदान किया तथा सुख शांति से जीवन बिताने के लिये पाताल लोक जाने का आदेश दिया। मत्सरासुर से निश्चिन्त होकर देवगण वक्रतुण्ड की स्तुति करने लगे। देवताओं को स्वतन्त्र कर प्रभु वक्रतुण्ड ने उन्हें भी अपनी भक्ति प्रदान की।
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