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शनिवार, सितंबर 11, 2010

गणेश पुराण कि महिमा

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गणेश पुराण कि महिमा



गणेश पुराण
शौनक जी ने पूछा हे प्रभो! गणेश पुराण का आरम्भ किस प्रकार हुआ? यह आप मुझे बताने की कृपा करें।

इस पर सूत जी बोले हे शौनक! यद्यपि गणेश पुराण अति प्राचीन हैं, क्योंकि भगवान गणेश तो आदि हैं, न जाने कब से गणेश जी अपने उपासकों पर कृपा करते चले आ रहे हैं। गणेशजी के तो अनन्त चरित्र हैं, जिनका संग्रह एक महापुराण का रूप ले सकता हैं।

गणेश पुराण को एक बार भगवान विष्णु ने नारद जी को और भगवान शंकर ने माता पार्वती जी को सुनाया था। बाद में वही पुराण संक्षेप रूप में ब्रह्माजी ने पुत्र महर्षि वेदव्यास को सुनाया और फिर व्यास जी से महर्षि भृगु ने सुना। भृगु ने कृपा करके सौराष्ट्र के राजा सोमकान्त को सुनाया था। तब से वह पुराण अनेक कथाओं में विस्तृत होता और अनेक कथाओं से रहित होता हुआ अनेक रूप में प्रचलित हैं। शौनक जी ने पूछा भगवान्! आप यह बताने का कष्ट करें कि राजा सोमकान्त कौन था? उसने महर्षि से गणेश पुराण का श्रवण किस जगह किया था? एवं उस पुराण के श्रवण से उसे क्या-क्या उपलब्धियाँ हुई? हे नाथ! मुझे श्री गणेश्वर की कथा के प्रति उत्कण्ठा बढ़ती ही जा रही हैं। सूतजी बोले-'हे शौनक! सौराष्ट्र के देवनगर नाम की एक प्रसिद्ध राजधानी थी। वहाँ का राजा सोमकान्त था। राजा अपनी प्रजा का पालन पुत्र के समान करता था। वह वेदज्ञान सम्पन्न, शस्त्र-विद्या में पारंगत एवं प्रबल प्रतापी राजा समस्त राजाओं में मान्य तथा अत्यन्त वैभवशाली था। उसका ऐश्वर्य कुबेर के भी ऐश्वर्य को लज्जित करता था। उसने अपने पराक्रम से अनेकों देश जीत लिये थे। उसकी पत्नी अत्यन्त रूपवती, गुणवती, धर्मज्ञा एवं पतिव्रता धर्म का पालन करने वाली थी। वह सदैव अपने प्राणनाथ कि सेवा में लगी रहती थी। उसका नाम सुधर्मा था। जैसे वह पतिव्रता थी, वैसे ही राजा भी एक पत्नी व्रत का पालन करने वाला था। उसका हेमकान्त नामक एक सुन्दर पुत्र था। पुत्र भी सोमकान्त कि तरह सभी विद्याओं का ज्ञाता और अस्त्र-शस्त्रादि के अभ्यास में निपुण हो गया था। इन सभी श्रेष्ठ सम्पन्न, सद्गुणी लक्षणों से राजा अपनी प्रजाजनों के हितों का अत्यन्त पोषक था।

इस प्रकार राजा सोमकान्त स्त्री, पुत्र, पशु, वाहन, राज्य एवं प्रतिष्ठा इत्यादि से सब प्रकारसुखी था। उसे किसी प्रकार का दु:ख तो था ही नहीं। सभी प्रजाजन उसका सम्मान करते थे, जिस कारण उसकी श्रेष्ठ कीर्ति भी संसारव्यापी थी। परन्तु युवावस्था के अन्त में सोमकान्त को घृणित कुष्ठ रोग हो गया। उसके अनेक उपाचार किये गये, किन्तु कोई लाभ नहीं हुआ। रोग शीघ्रता से बढऩे लगा और उसके कीड़े पड़ गये। जब रोग की अधिक वृद्धि होने लगी और उसका कोई उपाय न हो सका तो राजा ने अमात्यों को बुलाकर कहा-सुब्रतो! जाने किस कारण यह रोग मुझे पीडि़त कर रहा हैं। अवश्य ही यह मेरें किसी पूर्व जन्म के पाप का फल होगा। इसलिए मैं अब अपना समस्त राज-पाट छोड़कर वन में रहूँगा। अतः आप मेरे पुत्र हेमकान्त को मेरे समान मानकर राज्य शासन का धर्मपूर्वक संचालन कराते रहें। यह कहकर राजा ने शुभ दिन दिखवाकर अपने पुत्र हेमकान्त को राज्यपद पर अभिषिक्त किया और अपनी पत्नी सुधर्मा के साथ निर्जन वन की ओर चल दिया। प्रजापालक राजा के वियोग में समस्त प्रजाजन अश्रु बहाते हुए उनके साथ चले। राज्य की सीमा पर पहुँचकर राजा ने अपने पुत्र, अमात्यगण और प्रजाजनों को समझाया-आप सब लोग धर्म के जानने वाले, श्रेष्ठ आचरण में तत्पर एवं सहृदय हैं। यह संसार तो वैसे भी परिवर्तनशील है। जो आज है, वह कल नहीं था और आने वाले कल भी नहीं रहेगा। इसलिए मेरे जाने से दु:ख का कोई कारण नहीं हैं। मेरे स्थान पर मेरा पुत्र सभी कार्यों को करेगा, इसलिए आप सब उसके अनुशासन में रहते हुए उसे सदैव सम्मति देते रहें। फिर पुत्र से कहा-'पुत्र! यह स्थिति सभी के समक्ष आती रही हैं। हमारे पूर्व पुरूष भी परम्परागत रूप से वृद्धावस्था आने पर वन में जाते रहे हैं। मैं कुछ समय पहिले ही वन में जा रहा हूँ तो कुछ पहिले या पीछे जाने में कोई अन्तर नहीं पड़ता। यदि कुछ वर्ष बाद जाऊँ तब भी मोह का त्याग करना ही होगा। इसलिए, हे वत्स! तुम दु:खित मत होओ और मेरी आज्ञा मानकर राज्य-शासन को ठीक प्रकार चलाओ। ध्यान रखना क्षत्रिय धर्म का कभी त्याग न करना और प्रजा को सदा सुखी रखना। इस प्रकार राजा सोमकान्त ने सभी को समझा बुझाकर वहाँ से वापस लौटाया और स्वयं अपनी पतिव्रता पत्नि के साथ वन में प्रवेश किया। पुत्र हेमकान्त के आग्रह से उसने सुबल और ज्ञानगम्य नामक दो अमात्यों को भी साथ ले लिया। उन सबने एक समतल एवं सुन्दर स्थान देखकर वहाँ विश्राम किया। तभी उन्हें एक मुनिकुमार दिखाई दिया। राजा ने उससे पूछा-'तुम कौनहो? कहाँ रहते हो? यदि उचित समझो तो मुझे बताओ। मुनि बालक ने कोमल वाणी में कहा-'मैं महर्षि भृगु का पुत्र हूँ, मेरा नाम च्यवन है। हमारा आश्रम निकट में ही है। अब आप भी अपना परिचय दीजिए। राजा ने कहा-'मुनिकुमार! आपका परिचय पाकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई। मैं सौराष्ट्र के देवनगर राज्य का अधिपति रहा हूँ। अब अपने पुत्र को राज्य देकर मैंने अरण्य की शरण ली हैं। मुझे कुष्ठ रोग अत्यन्त पीडि़त किये हुए हैं, इसकी निवृत्ति का कोई उपाय करने वाला हो तो कृपया कर मुझे बताइये। मुनिकुमार ने कहा-'मैं अपने पिताजी से आपका वृतान्त कहता हूँ, फिर वे जैसा कहेंगे, आपको बताऊँगा। यह कहकर मुनि बालक चला गया और कुछ देर में ही आकर बोला-'राजन्! मैंने आपका वृत्तान्त अपने पिताजी को बताया। उनकी आज्ञा हुई हैं कि आप सब मेरे साथ आश्रम में चलकर उनसे भेंट करें तभी आपके रोग के विषय में भी विचार किया जायेगा। पूर्वजन्म का वृत्तान्त जानने के लिये राजा अपनी पत्नि और अमात्यों के सहित च्यवन के साथ-साथ भृगु आश्रम में जा पहुँचा और उन्हें प्रणाम कर बोला हे भगवान् हे महर्षि! मैं आपकी शरण हूँ, आप मुझ कुष्ठी पर कृपा कीजिए। महर्षि बोले राजन्! यह तुम्हारे किसी पूर्वजन्म के पाप कर्म का ही उदय हो गया हैं। इसका उपाय मैं विचार कर बताऊँगा। आज तो आप सब स्नानादि से निवृत्त होकर रात्रि-विश्राम करो। महर्षि की आज्ञानुसार सबने स्नान, भोजन आदि उपरान्त रात्रि व्यतीत की और प्रात: स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त होकर महर्षि की सेवा में उपस्थित हुए।

महर्षि ने कहा-'राजन्! मैंने तुम्हारे पूर्वजन्म का वृत्तान्त जान लिया हैं और यह भी ज्ञात कर लिया हैं कि किस पाप के फल से तुम्हें इस घृणित रोग की प्राप्ति हुई हैं। यदि तुम चाहो तो उसे सुना दूँ। राजा ने हाथ जोड़कर निवेदन किया बड़ी कृपा होगी मुनिनाथ! मैं उसे सुनने के लिए उत्कण्ठित हूँ। महर्षि ने कहा तुम पूर्व जन्म में एक धनवान वैश्य के लाड़ले पुत्र थे। वह वैश्य विंध्याचल के निकट कौल्हार नामक ग्राम में निवास करता था। उसकी पत्नी का नाम सुलोचना था। तुम उसी वैश्य-दम्पत्ति के पत्र हुए। तुम्हारा नाम 'कामद था। तुम्हारा लालन-पालन बड़े लाड़-चाव से हुआ। उन्होंने तुम्हारा विवाह एक अत्यन्त सुन्दरी वैश्य कन्या से कर दिया था, जिसका नाम कुटुम्बिनी था। यद्यपि तुम्हारी भार्या सुशीला थी और तुम्हें सदैव धर्म में निरत देखना चाहती थी, किन्तु तुम्हारा स्वभाव वासनान्ध होने के कारण दिन प्रतिदिन विकृत होता जा रहा था। किन्तु माता-पिता भी धार्मिक थे, इसलिए उनके सामने तुम्हारी विकृति दबी रही। परन्तु माता-पिता की मृत्यु के बाद तुम निरंकुश हो गये और अपनी पत्नी की बात भी नहीं मानते थे।

तुम्हारे अनाचार में प्रवृत्त देखकर उसे दु:ख होता था, तो भी उसका कुछ वश न चलता था। तुम्हारी उन्मुक्ताता चरम सीमा पर थी। अपनों से भी द्वेष और क्रूरता का व्यवहार किया करते थे। हत्या आदि करा देना तुम्हारे लिये सामान्य बात हो गई। पीडि़त व्यक्तियों ने तुम्हारे विरूद्ध राजा से पुकार की। अभियोग चला और तुम्हें राज्य की सीमा से भी बाहर चले जाने का आदेश हुआ। तब तुम घर छोड़कर किसी निर्जन वन में रहने लगे। उस समय तुम्हारा कार्य लोगों को लूटना और हत्या करना ही रह गया। एक दिन मध्याह्न काल था। गुणवर्धक नामक एक विद्वान् ब्राह्मण उधर से निकला। बेचारा अपनी पत्नी को लिवाने के लिए ससुराल जा रहा था। तुमने उस ब्राह्मण युवक को पकड़ कर लूट लिया। प्रतिरोध करने पर उसे मारने लगे तो वह चीत्कार करने लगा-मुझे मत मार, मत मार। देख, मेरा दूसरा विवाह हुआ है, मैं पत्नी को लेने के लिये जा रहा हूँ। किन्तु तुम तो क्रोधावेश में ऐसे लीन हो रहे थे कि तुमने उसकी बात सुनकर भी नहीं सुनी। जब उसे मारने लगे तो उसने शाप दे दिया-'अरे हत्यारे! मेरी हत्या के पाप से तू सहस्र कल्प तक घोर नरक भोगेगा। तुमने उसकी कोई चिन्ता न की और सिर काट लिया। राजन्! तुमने ऐसी-ऐसी एक नहीं बल्कि अनेक निरीह हत्याएँ की थीं, जिनकी गणना करना भी पाप है। इस प्रकार इस जन्म में तुमने घोर पाप कर्म किये थे, किन्तु बुढ़ापा आने पर जब अशक्त हो गये तब तुम्हारे साथ क्रूरकर्मा थे वे भी किनारा कर गये। उन्होंने सोच लिया कि अब तो इसे खिलाना भी पड़ेगा, इसलिए मरने दो यहीं। गणपति-उपासना का अमांघ प्रभाव राजन्! अब तुम निरालम्ब थे, चल-फिर तो सकते ही नहीं थे, भूख से पीडि़त रहने के कारण रोगों ने भी घेर लिया। उधर से जो कोई निकलता, तुम्हें घृणा की दृष्टि से देखता हुआ चला जाता। तब तुम आहार की खोज में बड़ी कठिनाई से चलते हुए एक जीर्णशीर्ण देवालय में जा पहुँचे। उसमें भगवान् गणेश्वर की प्रतिमा विद्यमान थी। तब न जाने किस पुण्य के उदय होने से तुम्हारे मन में गणेशजी के प्रति भक्ति-भाव जाग्रत हुआ। तुम निराहार रहकर उनकी उपासना करने लगे। उससे तुम्हें सब कुछ मिला और रोग भी कम हुआ।

राजन्! तुमने अपने साथियों की दृष्टि बचाकर बहुत-सा धन एक स्थान पर गाढ़ दिया था। अब तुमने उस धन को उसे देवालय के जीर्णोद्धार में लगाने का निश्चय किया। शिल्पी बुलाकर उस मन्दिर को सुन्दर और भव्य बनवा दिया। इस कारण कुख्याति सुख्याति में बदलने लगी। फिर यथा समय तुम्हारी मृत्यु हुई। यमदूतों ने पकड़कर तुम्हें यमराज के समक्ष उपस्थित किया। यमराज तुमसे बोले-'जीव! तुमने पाप और पुण्य दोनों ही किये हैं और दोनों का ही भोग तुम्हें भोगना है। किन्तु पहले पाप का फल भोगना चाहते हो या पुण्य का? इसके उत्तर में तुमने प्रथम पुण्यकर्मों के भोग की इच्छा प्रकट की और इसीलिए उन्होंने तुम्हें राजकुल में जन्म लेने के लिए भेज दिया। पूर्व जन्म में तुमने भगवान् गणाध्यक्ष का सुन्दर एवं भव्य मन्दिर बनवाया था, इसलिए तुम्हें सुन्दर देह की प्राप्ति हुई है। यह कहकर महर्षि भृगु कुछ रूके, क्योंकि उन्होंने देखा कि राजा को इस वृत्तान्त पर शंङ्का हो रही है। तभी महर्षि के शरीर से असंख्य विकराल पक्षी उत्पन्न होकर राजा की ओर झपटे। उनकी चोंच बड़ी तीक्ष्ण थी, जिनसे वे राजा के शरीर को नोच-नोच कर खाने लगे। उसके कारण उत्पन्न असह्य पीड़ा से व्याकुल हुए राजा ने महर्षि के समक्ष हाथ जोड़कर निवेदन किया-'प्रभो! आपका आश्रम तो समस्त दोष, द्वेष आदि से परे है और यहाँ मैं आपकी शरण में बैठा हूँ तब यह पक्षी मुझे अकारण ही क्यों पीडि़त कर रहे हैं? हे मुनिनाथ! इनसे मेरी रक्षा कीजिए।

महर्षि ने राजा के आत्र्तवचन सुनकर सान्त्वना देते हुए कहा-'राजन्! तुमने मेरे वचनों में शंका की थी और जो मुझ सत्यवादी के कथन में शंका करता है, उसे खाने के लिए मेरे शरीर से इसी प्रकार पक्षी प्रकट हो जाते हैं, जो कि मरे हुंकार करने पर भस्म हो जाया करते हैं। यह कहकर महर्षि ने हुंङ्कार की ओर तभी वे समस्त पक्षी भस्म हो गये। राजा श्रद्धावनत होकर उनके समक्ष अश्रुपात करता हुआ बोला-'प्रभो! अब उस पाप से मुक्त होने के उपाय कीजिए। महर्षि ने कुछ विचार कर कहा-'राजन्! तुम पर भगवान् गणेश्वर की कृपा सहज रूप से है और वे ही प्रभु तुम्हारे पापों को भी दूर करने में समर्थ हैं। इसलिए तुम उनके पाप-नाशक चरित्रों को श्रवण करो। गणेश पुराण में उनके प्रमुख चरित्रों का भले प्रकार वर्णन हुआ है, अतएव तुम श्रद्धा-भक्ति पूर्वक उसी को सुनने में चित्त लगाओ। राजा ने प्रार्थना की-'महामुने! मैंने गणेश पुराण का नाम भी आज तक नहीं सुना तो उनके सुनने का सौभाग्य कैसे प्राप्त कर सकूँगा। हे नाथ! आपसे अधिक ज्ञानी और प्रकाण्ड विद्वान् और कौन हो सकता है? आप ही मुझ पर कृपा कीजिए। महर्षि ने राजा की दीनता देखकर उसके शरीर पर अपने कमण्डल का मन्त्रपूत जल छिड़का। तभी राजा को एक छींक आई और नासिका से एक अत्यन्त छोटा काले वर्ण का पुरूष बाहर निकल आया। देखते-देखते वह बढ़ गया। उसके भयंकर रूप को देखकर राजा कुछ भयभीत हुआ, किन्तु समस्त आश्रमवासी वहाँ से भाग गये। वह पुरूष महर्षि के समक्ष हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। भृगु ने उसकी ओर देखा और कुछ उच्च स्वर में बोले-'तू कौन है? क्या चाहता है? वह बोला-'मैं साक्षात् पाप हूँ, समस्त पापियों के शरीर में मेरा निवास है। आपके मन्त्रपूत जल के स्पर्श से मुझे विवश होकर राजा के शरीर से बाहर निकलना पड़ा है। अब मुझे बड़ी भूख लगी है, बताइये क्या खाऊँ और कहाँ रहूँ? महर्षि बोले-'तु उस आम के अवकाश स्थान में निवास कर और उसी वृक्ष के पत्ते खाकर जीवन-निर्वाह कर। यह सुनते ही वह पुरूष आम के वृक्ष के पास पहुँचा, किन्तु उसके स्पर्श मात्र से वह वृक्ष जलकर भस्म हो गया। फिर जब पाप पुरूष को रहने के लिए कोई स्थान दिखाई न दिया तो वह भी अन्तर्हित हो गया।

हर्षि बोले-'राजन्? कालान्तर में यह वृक्ष पुन: अपना पूर्वरूप धारण करेगा। जब तक यह पुन: उत्पन्न न हो तब तक मैं तुम्हें गणेश पुराण का श्रवण कराता रहूँगा। तुम पुराण श्रवण के संकल्पपूर्वक आदि देव गणेशजी का पूजन करो, तब मैं गणेश पुराण की कथा का आरम्भ करूँगा। मुनिराज के आदेशानुसार राजा ने पुराण-श्रवण का संकल्प किया। उसी समय राजा ने अनुभव किया कि उसकी समस्त पीड़ा दूर हो गई है। दृष्टि डाली तो कुष्ठ रोग का अब कहीं चिन्ह भी शेष नहीं रह गया था। अपने को पूर्णरूप से रोग रहित एवं पूर्ववत् सुन्दर हुआ देखकर राजा के आश्चर्य की सीमा न रही और उसने महर्षि के चरण पकड़ लिए और निवेदन किया कि प्रभो! मुझे गणेश पुराण का विस्तारपूर्वक श्रवण कराइये। महर्षि ने कहा-'राजन्! यह गणेश पुराण समस्त पापों और संकटों को दूर करने वाला है, तुम इसे ध्यानपूर्वक सुनो। इसका श्रवण केवल गणपति-भक्तों को ही करना-कराना चाहिए अन्य किसी को नहीं। कलियुग में पापों की अधिक वृद्धि होगी, और लागे कष्ट-सहन में असमर्थ एवं अल्पायु होंगे। उनके पाप दूर करने का कोई साधन होना चाहिए। इस विचार से महर्षि वेदव्यास ने मुझे सुनाया था। उन्हीं की कृपा से मैं भगवान गणाध्यक्ष के महान चरित्रों को सुनने का सौभाग्य प्राप्त कर सका था। महाराज! भगवान गजानन अपने सरल स्वभाव वाले भक्तों को सब कुछ प्रदान करने में समर्थ हैं। निरभिमान प्राणियों पर वे सदैव अनुग्रह करते हैं किन्तु मिथ्याभिमानी किसी को भी नहीं रहने देते।
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