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शनिवार, सितंबर 11, 2010

गणेश एकदंत कथा

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एकदंत कथा गणेश


एकदंत कैसे कहलाए गणेशजी
महाभारत विश्व का सबसे बड़ा महाकाव्य एवं ग्रंथ हैं। जिसकी रचना में एक लाख से ज्यादा श्लोको का प्रयोग हुवा हैं। एसी लोकमान्यता हैं कि ब्रह्माजी ने स्वप्न में ऋषि पराशर एवं सत्यवती के पुत्र महर्षि व्यास को महाभारत लिखने की प्रेरणा दी थी।

महाभारत के रचनाकार अलौकिक शक्ति से सम्पन्न महर्षि व्यास त्रिकाल द्रष्‍टा थे। इस लिये महर्षि व्यास ने महाभारत लिखने का यह काम स्वीकार कर लिया, लेकिन महर्षि व्यास के मस्तिष्क में जिस तीव्रतासे महाभारत के मंत्र आ रहेथे इस कारण उन मंत्रो को उसी तीव्रता से को कोई लिखने वाला योग्य व्यक्ति न मिला। वे ऐसे किसी व्यक्ति की खोज में लग गए जो महाभारत लिख सके। महाभारत के प्रथम अध्याय में उल्लेख हैं कि वेद व्यास ने गणेशजी को महाभारत लिखने का प्रस्ताव दिया तो गणेशजी ने महाभारत लिख का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

गणेशजी ने महाभारत लिखने के पहले शर्त रखी कि महर्षि कथा लिखवाते समय एक पल के लिए भी नहीं रुकेंगे।

इस शर्त को मानते हुए महर्षि ने भी एक शर्त रख दी कि गणेशजी भी एक-एक वाक्य को बिना समझे नहीं लिखेंगे। महाभारत लिखते समय इस शर्त के कारणा गणेशजी के समझने के दौरान महर्षि को सोचने का अवसर मिल जाता था।

महाभारत लिखने गणेशजी ने अपना एक दाँत तोडकर उसकि लेखनी बानई। इस लिये उन्हें एकदंत कहा जाता हैं। माना जाता है कि बिना रुके लिखने की शीघ्रता में यह दाँत टूटा था।

एक दांत टूट ने कि और एक कहानी हैं

ब्रह्मावैवर्त पुराण के अनुशार परशुराम शीवजी को मिल्ने कैलश गये। कैलश के प्रवेश द्वार पर ही गणेश ने परशुराम को रोक लियी किन्तु परशुराम रुके नहीं और बलपूर्वक प्रवेश करने का प्रयास किया। तब गणेशजी नें परशुराम से युद्ध कर उनको स्तम्भित कर अपनी सूँड में लपेटकर समस्त लोकों में भ्रमण कराते हुए गौलोक में भगवान श्रीकृष्ण का दर्शन कराते हुए भूतल पर पटक दिया। परशुराम ने क्रोध में फरसे(परशु ) से गणेशजी के एक दांत को काट डाला। तभिसे गणेश को एकदंत कहा जाता हैं।

एकदन्त कथा

एकदन्तावतारौ वै देहिनां ब्रह्मधारकः।
मदासुरस्य हन्ता स आखुवाहनगः स्मृतः।।

भावार्थ: भगवान् गणेश का ‘एक दन्तावतार’ देहि-ब्रह्मधारक है, वह मदासुरका वध करनेवाला है; उसका वाहन मूषक बताया गया है।

वह महर्षि च्यवन का पुत्र मदासुर एक बलवान् पराक्रमी दैत्य था। एक बार वह अपने पिता से आज्ञा प्राप्त कर दैत्यगुरु शुक्राचार्य के पास गया।

उसने शुक्राचार्य से अनुरोध किय कि आप मुझे कृप्या अपना शिष्य बना लें, मैं समग्र ब्रह्माण्ड का स्वामी बनना चाहता हूँ। कृप्या आप मेरी इच्छा पूरी करने के लिये मेरा उचित मार्गदर्शन करें। शुक्राचार्य ने सन्तुष्ट होकर उसे अपना शिष्य बना लिया। सर्वज्ञ आचार्य ने उसे "ह्रीं" (एकाक्षरी) शक्ति मन्त्र प्रदान किया। मदासुर अपने गुरुदेव शुक्राचार्य से आज्ञा पाकर के उनके चरणों में प्रणाम कर आशीर्वाद लेकर जंगल में तप करने के लिये चला गया। उसने जगदम्बा का ध्यान करते हुए एक हजार वर्षों तक कठोर तप किया। तप करते हुवे उसका शरीर दीमकों की बाँबी से ढंक गया। उसके चारों तरफ वृक्ष उग गये और लताएँ फैल गयीं। उसके कठोर तपसे प्रसन्न होकर मां भगवती प्रकट हुईं। भगवती ने उसे नीरोग रहने तथा निष्कंटक सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का राज्य प्राप्त होने का वरदान दिया।

मदासुरने पहले सम्पूर्ण धरती पर अपना साम्राज्य स्थापित किया। फिर स्वर्ग पर साम्राज्य स्थापित करने केलिये चढ़ाई की। इन्द्र इत्यादि देवाताओं को पराजीत कर उसने स्वर्ग का भी साम्राज्य स्थापित किया। उसने प्रमदासुर की कन्या सालसा से विवाह किया। सालसासे उसे तीन पुत्र हुए। उसने भगवान् शिव को पराजित कर दिया। सर्वत्र असुरों का क्रूरतम शासन चलने लगा। पृथ्वीपर समस्त धर्म-कर्म लुप्त होने लगा। सर्वत्र हाहाकार मच गया। देवतागण एवं मुनिगण दुःखीत होने लगे।

चिन्तित देवता सनत्कुमार के पास गये, तथा उनसे असुरो के विनाश एवं पूनः धर्म-स्थापना का उपाय पूछाः सनत्कुमार ने कहा देवगण आप लोग श्रद्धापूर्वक भगवान् एकदन्त की उपासना करें। वे सन्तुष्ट होकर अवश्य ही आपलोगों का मनोरथ पूर्ण करेंगे। महर्षि के उपदेश अनुसार देवगण एकदन्त की उपासना करन लगे। तपस्या के सौ वर्ष पूरे होने पर भगवान् एकदन्त प्रकट हुए तथा वर माँगने के लिये कहा। देवताओं ने निवेदन किया प्रभु मदासुर के शासन में देवताओं का स्थानभ्रष्ट और मुनिगण कर्मभ्रष्ट हो गये हैं। आप हमें इस कष्ट से मुक्ति दिलाकार अपनी भक्ति प्रदान करें।

उधर देवर्षिने मदासुर को सूचना दी कि भगवान् एकदन्त ने देवताओं को वरदान दिया हैं। अब वे तुम्हारा प्राण-हरण करने के लिये तुमसे युद्ध करना चाहते हैं। मदासुर अत्यन्त कुपित होकर अपनी विशाल सेना के साथ एकदन्त से युद्ध करने चला गया। भगवान् एकदन्त रास्ते में ही प्रकट हो गये। राक्षसों ने देखा कि भगवान् एकदन्त मूषक पर सवार होकर सामने से चले आ रहे हैं। उनकी आकृति अत्यन्त भयानक हैं। उनके हाथोंमें परशु, पाश आदि आयुध हैं। उन्होंने असुरों से कहा कि तुम अपने स्वामी से कह दो यदि वह जीवित रहना चाहता हैं तो देवताओं से द्वेष छोड़ दे। उनका राज्य उन्हें वापस कर दे। अगर वह ऐसा नहीं करता हैं तो मैं निश्चित ही उसका वध करूँगा। महाक्रूर मदासुर युद्ध के लिये तैयार हो गया जैसे ही उसने अपने धनुष पर बाण चढ़ाना चाहा कि भगवान् एकदन्त का तीव्र परशु उसे लगा और वह बेहोश होकर गिर गया।

बेहोशी टूटने पर मदारसुर समझ गया कि यह सर्व समर्थ परमात्मा ही हैं। उसने हाथ जोड़कर स्तुति करते हुए कहा कि प्रभु आप मुझे क्षमा कर अपनी दृढ़ भक्ति प्रदान करें। एकदन्त ने प्रसन्न होकर कहा कि जहाँ मेरी पूजा आराधना हो, वहाँ तुम कदापि मत जाना। आजसे तुम पाताल में रहोगे। देवता भी प्रसन्न होकर एकदन्त की स्तुति करके स्वर्ग लोक चले गये।
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