Search

लोड हो रहा है. . .

मंगलवार, मार्च 23, 2010

रामस्तुति

ram stuti, rama stuti

रामस्तुति

श्रीरामचन्द्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणम् ।
नवकञ्ज लोचन कञ्ज मुखकर कञ्जपद कञ्जरुणम् ॥१॥

कंदर्प अगणित अमित छबि नव नील नीरज सुन्दरम् ।
पटपीत पानहुँ तड़ित रुचि सुचि नौमि जनक सुतावरम् ॥२॥

भजु दीन बन्धु दिनेश दानव दैत्यवंशनिकन्दनम् ।
रघुनन्द आनंदकंद कोशल चन्द दशरथ नन्दनम् ॥३॥

सिरक्रीट कुण्डल तिलक चारु उदार अङ्ग विभूषणम् ।
आजानुभुज सर चापधर सङ्ग्राम जित खरदूषणम् ॥४॥
इति वदति तुलसीदास शङ्कर शेष मुनि मनरञ्जनम् ।

मम हृदयकञ्ज निवास कुरु कामादिखलदलमञ्जनम् ॥५॥

मन जाहि राचो मिलहि सोवर सहजसुन्दर सांवरो ।
करुणानिधान सुजान शील सनेह जानत रावरो ॥६॥

एहि भाँति गौरि अशीस सुनि सिय सहित हिय हर्षित अली ।
तुलसी भवानिहिं पूजि पुनि पुनि मुदित मन मन्दिर चली ॥७॥

जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हर्षनः जात कहि ।
मञ्जुल मङ्गल मूल वाम अङ्ग परकन लगे ॥८॥

सियावर रामचन्द्र पद गहि रहुँ ।
उमावर शम्भुनाथ पद गहि रहुँ ।
महाविर बजरँगी पद गहि रहुँ । शरणा गतो हरि ॥
इससे जुडे अन्य लेख पढें (Read Related Article)


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें