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रविवार, फ़रवरी 21, 2010

विवाह के बाद भाग्योदय

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विवाह के बाद भाग्योदय

हमारे जीवन मे घटने वाली तमात छोटी-बडी घटनाए जन्म समय पर ग्रहोकी स्थिती के अनुरुप निश्चित हो जाती हैं। अतः मनुष्य से जन्म के समय पर ही उसका भाग्य केसा रहेगा वह निश्चित होता हैं, व्यक्ति की जन्म कुंडली में नवम भाव को भाग्य भाव कहा जाता हैं, एवं भाग्य भाव को ज्योतिष मे विषेष महत्व दिया जाता हैं। क्योकि नवम भाव से व्यक्ति का भाग्य केसा रहेगा इसका अन्दाजा लगायाजा सकता हैं।

विवाह के पूर्व एवं विवाह के बाद मे पति-पत्नि दोनों की जन्म कुंडली को देखने पर जो योग बनता हैं, उसके अनुरुप भाग्य का आंकलन किया जासकता हैं।
ज्योतिष शास्त्र के प्रमुख ग्रंथो में से एक 'मानसागरी’ के अनुशार

विहाय सर्व गणकैविचिन्त्यो भाग्यालय: केवलमत्र यत्रात्।
आयुश्च माता च पिता च बन्धुर्भाग्यान्वितेनैव भविन्त धन्याः॥

यस्यास्ति भाग्यं स नर: कुलीन: स पण्डित: स श्रुतिमान् गुणज्ञः।
ए एव वक्ता स च दर्शनीयो भाग्यान्वित: सर्वगुणरूपेतः॥

अर्थात: जो व्यक्ति भाग्यवान होता हैं वह कुलीन, सुवक्ता, विद्वान एवं सर्व गुण संपन्न होता हैं, क्योकि उसे यह जो सब प्राप्त हुवा हैं वह भाग्य के हिसाब से मिला हैं। 
व्यक्ति की आयु, भाई, बहन, माता, पिता की स्थिति इत्यादि का अंदाजा इस भाग्य भाव से किया जाता हैं। आज के भौतिकता भरे युग में भाग्य बिना संसार में कुछ भी संभव नहीं हैं।
  • संसार में कुछ व्यक्ति जन्म से भाग्यवान होते हैं।
  • तो कुछ व्यक्ति अपने कर्म द्वारा भाग्यवान बनाते हैं।
  • तो कुछ व्यक्ति विवाह के बाद भाग्यवान बनाते हैं।
ज्योतिष और विवाह के पश्चयात भाग्योदय कारक योग
  • जिस व्यक्ति कि कुंडली में सप्तम भाव, सप्तम भाव का कारक ग्रह, एवं सप्तमेश की स्थिति के बलवान होने पर व्यक्ति का भाग्योदय विवाह के पश्चयात होता हैं।
  • जिस व्यक्ति कि कुंडली में शुक्र, सप्तमेश नवमांश में बली हो। सप्तमेश नवम भाव में नवमेश के साथ हो अथवा दशमेश या लग्नमेश या चतुर्थेश के साथ हो तो भी विवाह के बाद भाग्योदय होता हैं।
  • जिस व्यक्ति कि कुंडली में सप्तमेश उच्चराशिगत, स्वाराशिगत या मूल त्रिकोण राशि में हो, सप्तम भाव को कोई शुभग्रह देखते हों तो व्यक्ति कि तरक्की विवाह के बाद निश्चित है।
  • कुण्डली में सप्तम भाव का कारक शुक्र बलवान, शुभ स्थिति में हो एवं षड्वर्ग में बलवान हो, सप्तमेश गुरू अथवा शुक्र के साथ शुभ हो। शुक्र लग्न, पंचम, नवम, एकादश भाव में हो तो विवाह के बाद भाग्योदय होता हैं।
*  केवल उपरोक्त योग के होने से भाग्योदय संभव नहीं हैं ज्योतिष में अन्य योग अपना महत्व 
    रखते  हैं, उसे भी देखना आवश्यक होता हैं।
*  विवाह के पश्चयात भाग्योदय कारक योग और भी हैं।
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